फिल्म ‘धुरंधर’: सीमा-जागरण और राष्ट्र-संघर्ष के आख्यान
धुरंधर वह पुरुषार्थी है जो युग का सबसे बड़ा बोझ अपने कंधों पर लेता है, विषम समय में झुकता नहीं, टूटता नहीं, वरन् ज्वालामुखी की भाँति भीतर से दहकते हुए भी बाहर से हिमालय की तरह स्थिर दिखाई देता है। इस शब्द की व्यंजना में बल, बुद्धि, दक्षता, धैर्य और आत्मबलिदान एक वर्तुल की तरह समाहित हैं। महाभारत के भीषण रण में, रामायण के असुर-संहार में और आज के गोपनीय अभियानों में यही धुरंधरत्व एक अदृश्य सूत्र की तरह चलता हुआ दिखता है। धुरंधर का आशय है कौशल, साहस, बुद्धि और आत्मत्याग का वह समन्वय, जो विषमतम परिस्थिति में राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर हो जाता है। यह शब्द की व्यंजना भारतीय सभ्यता के मर्मस्थल को स्पर्श करती है। “धुरंधर” वह है जो सर्वाधिक भार को अपने कंधों पर लादकर चलता है, जो प्रतिकूलतम परिस्थितियों में भी अपनी दृढ़ता न खोते हुए अग्रसर होता है। भारतीय भाषिक परंपरा में शब्द ‘धुरंधर’ मात्र विशेषण नहीं, एक पूर्ण चरित्र है। धूरी को धारण करनेवाले को धुरंधर कहते हैं। धुर वह स्थान है जहाँ बोझ टिकता है, जहाँ रथ का भार सिमटता है; और धर वह शक्ति है जो इस भार को सहती, संभालती और दिशा देती है। आधुनिक परिप्रेक्ष्य में ‘धुरंधर’ फिल्म इसी धुरी पर खड़ी है। यह कोई हल्की-फुल्की मनोरंजन-कथा नहीं, बल्कि उन अदृश्य सेनानियों की आधुनिक गाथा है जो सीमा के आर-पार, दुश्मन की धरती पर, अपने नाम और अस्तित्व को मिटाकर केवल ‘भारत’ नाम की रक्षा करते हैं। कथानक में IC-814 अपहरण की अपमानजनक स्मृति भी है, संसद-हमले की जलती हुई राख भी है; कराची की गलियों की बारूदी गंध भी है और दिल्ली के सत्ता-मंडल की नीति-दुविधा भी। इन सबके बीच ‘धुरंधर’ एक ऐसे नायक की यात्रा बन जाता है जो अपराध की अँधेरी सुरंग से निकलकर राष्ट्रधर्म की दहकती चुनौती को अजस्र साहस के साथ स्वीकार करता है। सीमा-सुरक्षा, सीमा जागरण और समृद्ध भारत के लिए फिल्म ‘धुरंधर’ की अनुपमेय उपादेयता द्रष्टव्य हैं –

फिल्म धुरंधर में रणवीर सिंह
अपराध से आस्था तक
आदित्य धर द्वारा निर्मित फिल्म ‘धुरंधर’ केवल एक सिनेमाई रचना नहीं है; यह भारत की भू-राजनीतिक विषमताओं, आतंकवाद-विरोधी अभियानों, और उन अदृश्य योद्धाओं की महागाथा है जो देश की सीमांत पर, दुश्मन के प्रदेश में, जीवन की तुच्छ कामनाओं को त्यागकर राष्ट्र-सुरक्षा के महान व्रत में नियोजित रहते हैं। यह पटकथा, ऐतिहासिक तथ्यों और कल्पनात्मक संरचना का ऐसा सुंदर उपलब्धि है कि दर्शक-समूह यथार्थ और कल्पना के बीच विभाजन-रेखा खोज पाने में असमर्थ रह जाता है।
फिल्म का कथानक दिखाता है कि व्यक्ति और राष्ट्र के बीच का रिश्ता कितना जटिल, किन्तु कितना पवित्र होता है। फिल्म का नायक एक टूटा हुए युवक हमज़ा है। वह परिवार की झूठी मुठभेड़ में हुई हत्या, अन्याय का दंश और बदले की आग में भटकता हुआ अराजकता की ओर अग्रसर हो जाता है। लेकिन वही युवक जब भारतीय गुप्तचर-तंत्र के हाथों एक प्रस्ताव के सम्मुख खड़ा होता है तब उसके भीतर एक भीतरी युद्ध आरम्भ होता है – या तो आजीवन जेल में रहने का, या जीवन राष्ट्र के लिए जीने का। यहीं से पटकथा मानवीय मन के गहरे तल तक उतरती है। क्या न्याय केवल अदालत के कागज़ों में है, या वह भी उन गुप्त गलियारों में साँस लेता है जहाँ कानून से बड़ा राष्ट्र का अस्तित्व बन जाता है?
कराची के ल्यारी क्षेत्र में चल रहा ‘ऑपरेशन धुरंधर’ केवल भूगोल नहीं, मनोविज्ञान का मानचित्र भी है। एक ओर खुफिया एजेंसियों की ठंडी रणनीति, दूसरी ओर हमज़ा की उबलती भावनाएँ; एक ओर कठोर राष्ट्रीय हित, दूसरी ओर व्यक्ति की थरथराती अंतरात्मा। यह द्वंद्व इस फिल्म को सामान्य एक्शन फिल्म से ऊपर उठाकर सिद्धांत और संवेदना की बहस में ले आता है। यहाँ गोली और ग्रेनेड के बीच भी नैतिकता, मानवाधिकार और कर्तव्य की त्रिकोणीय टकराहट निरंतर उपस्थित रहती है।
धुरंधर की आवश्यकता
आज भारत असहज भू-राजनीतिक घेरे में खड़ा है। उत्तरी सीमाओं पर चीन की धौंस और घुसपैठ, पश्चिम में पाकिस्तान की स्थायी छलना और प्रायोजित आतंक, पूर्व में घुसपैठ और तस्करी के मार्ग के रूप में उपयोग होता बांग्लादेश का गलियारा, समुद्री मोर्चों पर नई चुनौतियाँ और अंतरिक्ष–साइबर आयाम में चल रहा मौन युद्ध – इन सबके बीच भारत किसी एक मोर्चे पर नहीं, बहु-दिशात्मक घेराबंदी में है। ऐसे समय में ‘धुरंधर’ जैसे चरित्र केवल फिल्म के लिए नहीं, राष्ट्रीय कल्पना के लिए अनिवार्य हो जाते हैं। सीमा जागरण मंच का मूल मंत्र भी यही है कि सीमाएँ केवल रेखाएँ नहीं, राष्ट्र-चेतना की परिधि हैं। जब तक सीमावर्ती गाँव निर्जन, अविकसित और असुरक्षित रहेंगे, तब तक मानचित्र पर खिंची कोई भी रेखा स्थिर नहीं रह सकती। ‘धुरंधर’ फिल्म ऐसे ही विचार को नई पीढ़ी की भाषा में रूपायित करती है। यह फिल्म दिखाती है कि सीमा की सुरक्षा केवल बंकर, राडार और मिसाइलों से नहीं, बल्कि ऐसे मनुष्यों से सम्भव है जो अपने अस्तित्व से अधिक मूल्यवान राष्ट्र के अस्तित्व को मानते हैं।

साभार: फिल्म धुरंधर ट्रेलर
चित्रपट से चेतना तक
यह फिल्म अनेक स्तरों पर उपयोगी है। एक स्तर पर यह पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क, चीनी विस्तारवाद और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अँधेरों को दर्शाती है। दूसरे स्तर पर यह भारतीय नागरिक को यह समझाती है कि सुरक्षा कोई मुफ्त में मिला वरदान नहीं है। यह अनगिनत त्यागों की संचित पूँजी है। दर्शक जब देखता है कि किसी गली के अँधेरे में, किसी सीमा पार के होटल में, किसी खुफिया ठिकाने की सीलन भरी दीवारों के पीछे कोई युवक अपने नाम, अपने परिवार और अपने भविष्य को तिल-तिल जलाकर केवल भारत की रक्षा कर रहा है, तब उसके भीतर निष्क्रिय देशभक्ति नहीं, सक्रिय और चिंतनशील राष्ट्र-चेतना जन्म लेती है। इसलिए युवा पीढ़ी के लिए यह कथा एक आईना है। यहाँ विराटता किसी राजनेता की भाषण-कला में नहीं, बल्कि बिना नाम वाले एजेंट की घावों में दिखाई देती है। यह फिल्म उन छात्रों के लिए जीवंत पाठ्य-पुस्तक है जो आतंकवाद, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, सीमा-संघर्ष, गुप्त-चाल और सुरक्षा-चर्या के सम्मिलित परिदृश्यों से परिचित होना चाहते हैं। भारतीय जनमानस में नवीन चेतना और राष्ट्र के प्रति अटूट त्याग के भाव भरने में यह फिल्म सफल दिखती है। भारतीय फिल्मों के कथानक और नैरेटिव में सुखद परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। जहाँ फिल्मों में पहले सनातन संस्कृति का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपमान किया जाता था, वहाँ अब भारतीय साहस, समर्पण, स्वाधीनता और गौरव की गाथाएँ फिल्मों में नव राष्ट्र-ऊर्जा बनकर समाहित हो रही हैं।
राष्ट्र-विरोध के विरुद्ध वज्र-घोष
राष्ट्र केवल सीमाओं का घेरा नहीं, इतिहास और भविष्य के बीच खड़ी एक जीवित मशाल है। राष्ट्र-विरोधी तत्व केवल दुश्मन के वेश में बैठे भेड़िए नहीं हैं, वे भी हैं जो अपने ही घर में बैठकर सीमाओं पर तैनात सैनिकों की पीठ पर शंका के तीर चलाते हैं – सीमाओं के मोर्चे पर भी और विचारों के संसार में भी। ‘धुरंधर’ ऐसे ही दुहरे मोर्चे पर शत्रु-सर्वनाश के लिए उत्प्रेरित करती है। यह फिल्म देश की सुरक्षा पर खड़े प्रश्नों का अनावरण करती है। जो लोग राष्ट्र-सेवा को मात्र स्टेट हिंसा कहकर निरस्त करते हैं, जो आतंकवाद और प्रतिरक्षा के बीच कृत्रिम समता स्थापित करते हैं, उन्हें यह फिल्म गंभीर तीखा प्रश्न बनकर कटु सच के समक्ष खड़ा करती है। यदि आज भी कंधार की तरह अपहरण हो, संसद पर फिर हमला हो, कारगिल जैसा षड्यंत्र दोहराया जाए, तब क्या उन गुप्त योद्धाओं के बिना केवल भाषणों से देश को बचाया जा सकता है? जो सीमा की मिट्टी पर शहीद की राख को अपमानित करता है, वह केवल प्रतिपक्ष नहीं, इतिहास के न्यायालय में भी अभियुक्त है, दण्ड का भागी है।
सीमा जागरण मंच का ध्येय भी इसी तेवर में निहित है – देश की हर सीमा पर जागरण, हर गाँव में राष्ट्रीय स्वाभिमान की मशाल, हर नागरिक के भीतर यह चेतना कि सीमा पर खड़ा जवान अकेला नहीं है, उसके पीछे एक जागृत राष्ट्र खड़ा है। ‘धुरंधर’ फिल्म इस ध्येय को काल्पनिक नहीं, मूर्त रूप में दिखाती है।
आधुनिक युद्धभूमि

फिल्म धुरंधर में अक्षय खन्ना और रणवीर सिंह
यदि ‘धुरंधर’ शब्द को देखा जाए तो यह केवल वीरता नहीं, मर्यादा और करुणा का भी सूचक बन जाता है। यह फिल्म आधुनिक हथियारों, खुफिया तकनीक, साइबर-जासूसी और अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों की जटिलता के बीच भी भारतीय सभ्यता की आत्मा को विस्मृत नहीं होने देती। यह दिखाती है कि धुरंधर होना केवल दुश्मन को मार देना नहीं, उस मूल्य-बोध को जीवित रखना भी है जिसके कारण दुश्मन और मित्र का भेद निर्धारित होता है।
सीमा जागरण मंच की मान्यता है कि सीमा केवल सैनिक की चौकी नहीं, संस्कृति की चौखट भी है। यदि सीमांत के गाँव खाली हो गए, यदि वहाँ की बोली, गीत, पर्व और परंपराएँ सूख गईं, तो शत्रु की बंदूक से पहले उसकी जनसंख्या और उसकी भाषा वहाँ कब्ज़ा जमा लेगी। ‘धुरंधर’ फिल्म जैसे सांस्कृतिक उत्पाद यह स्मरण कराते हैं कि सीमा-रक्षा का पहला चरण सीमा-चेतना है, और यही इस फिल्म की सबसे बड़ी सैद्धांतिक उपयोगिता भी है।
हर क्षेत्र में निपुण धुरंधर चाहिए
आज भारत को केवल सीमाओं पर नहीं, हर क्षेत्र में धुरंधरों की आवश्यकता है। सीमा पर सैनिक, खुफिया तंत्र में अदृश्य योद्धा, प्रशासन में नीति-निर्माता, न्यायालय में अडिग न्यायाधीश, प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक, खेत में अन्न-वीर, और कक्षा में चरित्र-निर्माण करते गुरु चाहिए ही चाहिए। ‘धुरंधर’ फिल्म इसी भारतीय स्वप्न का सिनेमाई रूप है। यह दर्शक से कहती है कि यदि भारत को विकसित, आत्मनिर्भर और जनसुखदायक राष्ट्र बनाना है, तो केवल फिल्म देखकर प्रेरित होने से काम नहीं चलेगा; प्रत्येक व्यक्ति को अपने-अपने क्षेत्र में धुरंधर बनना होगा, उस भार को उठाना होगा जिससे भारत और भारत के नागरिक समृद्ध-शक्तिशाली बना सकता है। राष्ट्र-विरोधी तत्वों के लिए यह फिल्म और यह दृष्टि एक स्पष्ट उत्तर है कि यह देश केवल बहस से नहीं बचेगा, बलिदान से बचेगा; केवल अधिकारों की माँग से नहीं, कर्तव्यों की स्वीकृति से बचेगा। जो इस सत्य को नहीं मानते, वे इतिहास के हाशिए पर स्वयं को लिख रहे हैं। काल जब निर्णय देगा, तो वही धुरंधर कहलाएगा, जिसने बोझ उठाया, सीमा बचाई, और भारत नाम की इस अनादि कथा को आगे बढ़ाया।








