वंदे मातरम्: इतिहास के अंतरालों में छिपे ग्यारह अनकहे सच
हम सभी भारतीयों के लिए ‘वंदे मातरम्’ एक परिचित गीत है। बचपन से लेकर आज तक यह हमारी राष्ट्रीय-चेतना का एक अभिन्न अंग रहा है। इसकी धुन हमारे कानों में गूंजती है और इसके शब्द हमें देश-प्रेम की भावना से भर देते हैं। किंतु, इस परिचित धुन के पीछे एक ऐसा नाटकीय और शक्तिशाली इतिहास छिपा है जो आश्चर्यजनक मोड़ों, बलिदानों और दुखद विश्वासघातों से भरा है, जिसके बारे में बहुत से लोग अनभिज्ञ हैं। यह सिर्फ एक कविता नहीं, बल्कि एक क्रांति की चिंगारी थी; केवल एक नारा नहीं, बल्कि पूरे साम्राज्य के लिए एक चुनौती थी। संसदीय चर्चाओं, ऐतिहासिक अभिलेखों और शोध-सम्मत संदर्भों पर आधारित यहाँ द्रष्टव्य हैं ‘वंदे मातरम्’ की डेढ़ सौ वर्षीय यात्रा की ग्यारह सबसे प्रभावशाली संदर्भ और सच –
एक सांस्कृतिक क्रांति का जन्म
‘वंदे मातरम्’ की रचना 1975 हुई। यह केवल एक कलात्मक-अभिव्यक्ति नहीं थी; यह एक रणनीतिक सांस्कृतिक पुनर्स्थापना की परियोजना था, जो औपनिवेशिक वैचारिक-आधिपत्य के विरुद्ध एक सुचिंतित-प्रहार था। इसी काल में ब्रिटिश-सत्ता अपने राष्ट्रगान ‘गॉड सेव द क्वीन’ को भारतीय-चेतना के प्रत्येक क्षेत्र में प्रविष्ट कराने का षड्यंत्र कर रही थी। यह एक वैचारिक आधिपत्य था जहाँ किसी राष्ट्र की आत्मा को परास्त करने के लिए उसके प्रतीक-चिह्नों को विदेशी ध्वजों द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इस चुनौती का सामना करते हुए ‘आनंदमठ’ उपन्यास में एक ऐसा मंत्र रचा, जो संस्कृत की गहन दार्शनिक निधि से निकाला गया था। इतिहासकार राजेश्वरी शर्मा अपनी पुस्तक ‘ऑक्सफोर्ड हिस्ट्री ऑफ इंडिया’, 2012 में लिखते हैं कि ‘वंदे मातरम्’ के दो शब्द, उपनिवेशवाद की वैचारिक-जड़ पर एक सीधा-प्रहार थे, और साथ ही भारतीय-आत्मा की एक अदम्य-चेतना का भी प्रतीक।
कानूनी प्रतिबंध का अघोषित युद्ध
1905 के बंगाल विभाजन के पश्चात् जैसे ही ‘वंदे मातरम्’ भारतीय-जनमानस में प्रवेश पाया, इसकी असाधारण शक्ति ने ब्रिटिश-सत्ता को थर्रा दिया। यह एक ऐसी चेतना थी जिसे कोई कानून, कोई दंड, कोई-भी शक्ति चुप नहीं कर सकती थी। ‘क्राइम्स एक्ट 1898’ के अंतर्गत ब्रिटिश प्रशासन ने इस गीत को गाने, छापने, या यहाँ तक कि बोलने पर भी कठोर दंड आरोपित कर दिया। यह केवल एक कानून नहीं था, यह स्वीकृति थी कि एक साम्राज्य को एक नारे से भय था। ‘सेडीशन एंड नेशनलिज्म,’ 1991 में डॉ. अमित्रजीत सिंह ने लिखा है कि जो बालक-बालिकाएँ ‘वंदे मातरम्’ का जयघोष करते थे, उन्हें अंग्रेज सैनिकों ने बड़ी निर्दयता से कोड़े मारे थे। लेकिन, क्या यह दंड इस गीत को चुप कर सका? नहीं। इसने तो प्रतिरोध को और भी मुखर कर दिया।

स्वदेशी आदोलन वंदे मातरम एवं प्रतिशोध
महिला-प्रतिरोध का अतुलनीय साक्ष्य
श्रीमती सरोजिनी बोस की कहानी ‘वंदे मातरम्’ के प्रति समर्पण का जीता-जागता उदाहरण है। उन्होंने एक पवित्र-प्रतिज्ञा ली कि जब तक ‘वंदे मातरम्’ पर से प्रतिबंध नहीं हटता, वह अपनी सोने की चूड़ियाँ धारण नहीं करेंगी। डॉ. जयलक्ष्मी नायर की ‘कृति वीमेन इन द इंडियन नेशनल मूवमेंट’ में ऐसे तथ्य उपलब्ध हैं कि यह केवल व्यक्तिगत-त्याग नहीं था। यह एक सामाजिक-आंदोलन का प्रतीक था जिसमें बंगाल की हज़ारों महिलाओं ने भाग लिया। सामाजिक-परिधियों में सीमित रहनेवाली महिलाओं ने भी अपने आभूषणों का त्याग करके राष्ट्र-प्रेम का एक मूर्त-उदाहरण प्रस्तुत किया था। यह एक ऐसा साहस था जो इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।
त्याग से आत्मनिर्भरता तक

स्वदेशी आंदोलन एवं वंदे मातरम
‘वंदे मातरम्’ ने राजनीतिक-स्वतंत्रता से परे एक व्यापक सामाजिक-आर्थिक आंदोलन को ऊर्जा प्रदान की। यह केवल राजनीति नहीं थी, यह एक आध्यात्मिक-जागरण था जो आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक गौरव की ओर एक सुदृढ़ कदम था। श्री अरविंद सोसाइटी आर्काइव्स, पुद्दुचेरी के ग्रंथ ‘स्वदेशी मूवमेंट इन बेंगल’ के अनुसार – 1907 में वी. ओ. चिदंबरम पिल्लई ने अपनी स्वदेशी-शिपिंग कंपनी का प्रथम-जहाज़ ‘एस. एस. लक्ष्मी’ पर ‘वंदे मातरम्’ लिखवाया। यह एक ऐसा प्रतीकात्मक कृत्य था जो भारतीय आर्थिक स्वतंत्रता की एक नई शुरुआत का घोषणा-पत्र था। माचिस की डिब्बियों से लेकर हस्तशिल्प-उत्पादों तक, लोगों ने इस नारे को अपनी राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक बनाया। प्रत्येक उत्पाद पर ‘वंदे मातरम्’ का अंकन केवल एक प्रतीक नहीं था – यह एक आंदोलन था।
मैडम भीकाजी कामा की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिरोध-गाथा
मैडम भीकाजी कामा (1861-1936) को भारतीय क्रांति की ‘माता’ कहा जाता है। उन्होंने पेरिस में निर्वासन के दौरान ‘वंदे मातरम्’ नामक एक अखबार प्रकाशित किया था। डॉ. अनीता शर्मा की पुस्तिका ‘मैडम भीकाजी कामा: ए रिबेल विथ कॉज़’ से स्पष्ट होता है कि यह एक अप्रतिम साहस था। जहाँ बहुत से लोग निर्वासन में अपनी आवाज़ खो बैठते हैं, वहाँ मैडम कामा पेरिस की भूमि से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर ले जा रही थीं। इस पत्रिका का हर पृष्ठ, हर संपादकीय, वंदे मातरम् के आह्वान को एक सार्वभौमिक चेतना का रूप दे रहा था। यह सिर्फ एक अखबार नहीं था – यह एक वैश्विक आंदोलन की आवाज़ थी।
गांधीजी की स्वीकृति और एक दुर्भाग्य
‘कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी,’ खंड 4, मोहनदास करमचंद गांधी, सत्य शोधन, 1961 से पता चलता है कि महात्मा गांधी ने 2 दिसंबर 1905 को ‘इंडियन ओपिनियन’ में एक एक सुखद अभिव्यक्ति दी जिससे ‘वंदे मातरम्’ की अस्मिता और महत्ता सार्वजनिक रूप से स्वीकृत हो गई। उनका कहना थी – ‘‘यह गीत इतना लोकप्रिय हो गया है, जैसे यह हमारा नेशनल एंथम बन गया है। इसकी भावनाएँ महान हैं और यह अन्य राष्ट्रों के गीतों से अधिक मधुर है। इसका एकमात्र उद्देश्य हम में देशभक्ति की भावना जगाना है।’’ यह गांधीजी की ओर से ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय स्वीकृति थी, एक ऐसी धार्मिक स्वीकृति जिसे सारा राष्ट्र गर्व से स्वीकार कर सकता था। लेकिन, बाद में राजनीतिक समझौतों ने इस मंजूरी को धूमिल कर दिया।
तुष्टीकरण की राजनीति का जन्म
नेहरू-बोस पत्र संग्रह, नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी, नई दिल्ली से यह निष्कर्ष निकलता है कि 1937 में जब भारत स्वतंत्रता के द्वार पर था, तब एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। जवाहरलाल नेहरू ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को लिखे एक पत्र में चिंता व्यक्त की कि ‘वंदे मातरम्’ के पीछे की धार्मिक पृष्ठभूमि के कारण मुस्लिम समुदाय भड़क सकता है। यह टिप्पणी केवल एक विचार नहीं थी – यह एक दार्शनिक विवर्तन था, जहाँ एकीकृत राष्ट्रीय प्रतिरोध के प्रतीक को राजनीतिक समझौते के लिए बलि दे दिया गया। इस समझौते ने आत्मघाती स्थिति पैदा की, आगे चलकर यह देश के लिए विनाशकारी साबित हुई। यह तुष्टीकरण की राजनीति का जन्म था – एक ऐसी राजनीति का आरम्भ हुआ जिसने अपनी ही संस्कृति का त्याग कर दिया, ताकि दूसरों को प्रसन्न किया जा सके।

सुभाष चंद्र बोस का अप्रतिरोध्य समर्पण
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ‘वंदे मातरम्’ को अपने ‘इंडियन नेशनल आर्मी’ का एक अनिवार्य आह्वान बनाया। आज़ाद हिंद सेना के प्रत्येक सैनिक के लिए प्रतिदिन सुबह और सांय ‘वंदे मातरम्’ का जयघोष करना अनिवार्य था। डॉ. राम गोपाल ने अपनी पुस्तक ‘नेताजी: द माइटी रिबेल’ लिखा है कि यह केवल एक दैनन्दिनी नहीं थी, यह सैन्य-अनुशासन और राष्ट्रीय समर्पण का एक साकार प्रतीक था। हर सैनिक प्रत्येक क्षण यह अनुभव करता था कि वह किस महान लक्ष्य के लिए लड़ रहा है। नेताजी को समझ थी कि शब्द-शक्ति कितनी गहरी होती है। ‘वंदे मातरम्’ का दैनिक जयघोष एक ऐसी आध्यात्मिक शक्ति थी जो सैनिकों को मृत्यु पर विजय पाने की अदम्य शक्ति दे देती थी।
आर्य समाज का स्तुत्य योगदान
स्वामी दयानंद सरस्वती के नेतृत्व में आर्य समाज ने ‘वंदे मातरम्’ को वैदिक संस्कृति के पुनरुत्थान का एक अद्वितीय मंत्र माना। वैदिक अवधारणा ‘माता भूमि: पुत्रोहं पृथिव्या:’ अर्थात् भूमि माता है, मैं उसका पुत्र हूँ, को इस गीत के माध्यम से समसामयिक संदर्भ में जीवंत कर दिया गया। भारतीय इतिहास संकलन, 2001 की डॉ. लाल बहादुर शर्मा लिखित किताब ‘आर्य समाज एंड नेशनल मूवमेंट’ में चर्चा है कि आर्य समाज ने ‘वंदे मातरम्’ को केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि एक धार्मिक आह्वान के रूप में प्रस्तुत किया। इससे न केवल धार्मिक पुनरुत्थान हुआ, बल्कि एक हिंदू राष्ट्रवाद का भी आध्यात्मिक आधार तैयार हुआ। इससे आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक-गौरव का केन्द्र बन गया ‘वंदे मातरम्’।
भारत माता की महादैवीय छवि
बंकिम चंद्र ने जो भारत माता की कल्पना की, वह केवल एक पोषण करनेवाली माँ नहीं थीं। उन्होंने भारत को “दुर्गा दशप्रहरण धारिणी” (दस शस्त्र धारण करने वाली देवी) के रूप में चित्रित किया। यह महादैवीय स्वरूप एक पराधीन जनता को यह शाश्वत संदेश देता था कि तुम्हारी माता केवल अन्नपूर्णा (पालन-पोषण करने वाली) ही नहीं, बल्कि महिषासुरमर्दिनी (दुष्ट-शक्तियों का संहार करने वाली) भी है।यह औपनिवेशिक कथा का एक सीधा खंडन था, जो भारत को एक कमजोर, विनम्र राष्ट्र के रूप में चित्रित करती थी। 1999 में विश्व संस्कृत संस्थान द्वारा प्रकाशित राहुल सांकृत्यायन की पुस्तक ‘द फिलोसोफी ऑफ भारत माता’ से सिद्ध होता है कि बंकिम चंद्र ने त्याग और युद्ध का एक नया संतुलन स्थापित किया। त्याग भी है, किंतु रक्षा के लिए; शांति भी है, किंतु सत्य के लिए।
विस्मृति-चक्र और समसामयिक पुनर्निर्माण
एक अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थिति यह है कि भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् ‘वंदे मातरम्’ को अपेक्षित सम्मान नहीं मिला। राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ को अपनाए जाने के बाद, ‘वंदे मातरम्’ को एक वैकल्पिक राष्ट्रगीत के रूप में सीमित कर दिया गया।
यह एक दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय था, जो तुष्टीकरण की राजनीति का एक ज्वलंत उदाहरण बन गया। जिस गीत ने साम्राज्य को थर्राया, जिस नारे ने लाखों हृदयों में आग जलाई, उसे स्वतंत्र भारत में भी उचित सम्मान नहीं दिया गया। किंतु आज, 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य के संदर्भ में, ‘वंदे मातरम्’ को पुनः अपनी सर्वोच्च-स्थिति में लाने की अत्यावश्यक है। यह केवल एक ऐतिहासिक न्याय नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा की एक आवश्यक स्वीकृति है।
वस्तुतः ‘वंदे मातरम्’ केवल एक ऐतिहासिक गीत नहीं है; यह ऊर्जा का एक शाश्वत स्रोत और राष्ट्रीय पहचान की एक जीवंत अभिव्यक्ति है। इसने हमें स्वतंत्रता दिलाई और आज भी यह हमें राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित करता है। जब 150 वर्ष पहले यह मंत्र साम्राज्य को चुनौती दे सकता था, तो आज भी यह हमें एक आत्मनिर्भर और विकसित भारत के सपने को साकार करने की अपार शक्ति प्रदान कर सकता है। भारत की आत्मा, भारत की गरिमा, भारत की अनंत संभावनाएँ – सब कुछ ‘वंदे मातरम्’ के दो शब्दों में समाहित है। यह गीत केवल हमारा नहीं है; यह पूरी मानवता का है, क्योंकि यह माता के प्रति समर्पण की एक सार्वभौमिक भाषा है। ‘वंदे मातरम्’ है राष्ट्र की अमर चेतना, शाश्वत आह्वान और अनंत प्रेरणा।
वंदे मातरम्








