त्रिशूल-आकृति में वीरत्व का दिव्य प्रतीक
भारतभूमि के उत्तरतम प्रांत लद्दाख की बर्फीली वादियों में, जहां देवताओं के पदचिह्न हैं, वहां गलवान घाटी की वीरभूमि पर 7 दिसम्बर 2025 को युद्ध स्मारक रूप में एक नव-मंदिर प्रतिष्ठित हुआ है। गलवान घाटी में शहीद हुए 20 भारतीय सैनिकों के सम्मान में बना यह मेमोरियल अब जनता के लिए खुल गया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस स्मारक का उद्घाटन किया, जो न केवल एक पर्यटन स्थल है, बल्कि आत्मार्पण का प्रतीक है। उत्तरी भारत की सीमावर्ती पर्वतमालाओं में, जहाँ प्राकृतिक विषमता और कठोर जलवायु हमारे साहस की परीक्षा लेती है, वहीं चौदह हजार पाँच सौ फीट की ऊँचाई पर भारत-माता के सुरक्षा-कवच के रूप में एक भव्य स्मारक अपना गर्वोन्नत शीश उठाए खड़ा है। यह स्मारक केवल पाषाण और ग्रेनाइट का समाहार नहीं है, अपितु भारतीय सेना की अदम्य वीरता और राष्ट्र-संरक्षण के प्रति समर्पण का शाश्वत साक्षी है। यह स्मारक, जो लद्दाख की कंटीली और बर्फीली घाटियों में अवस्थित है, आने वाली पीढ़ियों के लिए त्याग, बलिदान और राष्ट्रभक्ति की एक अमर-स्मृति-स्तंभ बन गया है। लद्दाख की पर्वत-शृंखलाएँ का तापमान शून्य से तीस डिग्री सेल्सियस कम तक निम्नगामी हो जाता है। वहाँ कई बार श्वास-प्रश्वास दूभर हो जाता है। वहाँ मानव-जीवन का अस्तित्व स्वयं एक चमत्कार बन उठता है। इस अतिक्रूर वातावरण में पृथ्वी की आक्सीजन-विरल परतें मानव-शरीर को निरंतर चुनौती देती रहती हैं। वहाँ हमारी भारतीय सेना के बीस वीर-सिपाही अपने राष्ट्र के रक्षार्थ सर्वोच्च बलिदान प्रदान कर गए। यह स्मारक हिमालय के उसी कष्टसाध्य स्थल पर निर्मित हुआ है। यह ऐसी भूमि है जहाँ प्रकृति स्वयं मनुष्य की सहनशीलता की परीक्षा लेती है।

फोटो: गलवान वॉर मेमोरियल का उद्धाटन
बीस वीर-सेनानियों का अतुलनीय त्याग
15 जून, 2020 की उस रात आकाश तारकों से सुसज्जित था और पृथ्वी गर्वोन्नत थी, वहाँ गलवान घाटी में बीस भारतीय सेनानियों ने अपने प्राण-पंजर को मातृभूमि की सुरक्षा-वेदी पर अर्पित कर दिया। घटना 15 जून, 2020 की रात की है। एलएसी पर गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ भारतीय वीर सैनिकों की हिंसक झड़प हुई। भारतीय सीमा को आँच नहीं आई, दर्जनों चीनी सैनिक मिट्टी में मिल गए, भारत के शूरों ने रणभूमि हिला दी, लेकिन 20 भारतीय सैनिक भी वीर गति को प्राप्त हो गए। यह घटना भारत के सैन्य इतिहास संप्रभुता और साहस का प्रमाण है। ये वीर-योद्धा जानते थे कि उनके सामने मृत्यु की काली छाया विद्यमान है; वे परिचित थे कि प्रतिपक्षी की प्रत्येक चाल घातक और संकटपूर्ण है। तथापि, उन्होंने अपने राष्ट्र-प्रेम के आगे अपने जीवन को तुच्छ समझा। इन अमर-वीरों के हृदय में जो देश-प्रेम की अग्नि ज्वलित थी, वह भारतीय सैनिक-परंपरा के स्वर्णाक्षर-संवलित इतिहास में चिरकाल के लिए अंकित हो गई है। उनके साहस, निष्ठा और अंतिम क्षणों तक मातृभूमि-रक्षा के प्रति समर्पण भारतीय सेना के शौर्य-परंपरा को अपार गौरव प्रदान करते हैं।
त्रिशूल-आकृति, कांस्य-प्रतिमाएं और देवत्व और राष्ट्र-गौरव तिरंगा
हिंदू-संस्कृति और धर्मशास्त्र के मूल-ग्रंथों में त्रिशूल को शिव-शक्ति, ब्रह्माण्डीय-शक्ति और सार्वभौमिक-न्याय का अपरिहार्य प्रतीक माना जाता है। गलवान वॉर मेमोरियल का त्रिशूल-आकृति का डिजाइन इसी दार्शनिक-भाव को प्रतिफलित करता है। शक्ति, धर्म और रक्षा – ये तीन अर्थ इस मेमोरियल के भव्य आकार में निहित हैं। स्मारक के केंद्रस्थल में एक शाश्वत-ज्योति प्रज्वलित की गई है, जो न केवल एक भौतिक-प्रकाश है, अपितु चेतना की अमर ज्ञान-दीप्ति का प्रतीक है। यह अग्नि अनंत-काल तक जलती रहेगी। यह दीपशिखा उन बीस वीर-योद्धाओं के आत्मा की अविनाशी-गरिमा का प्रतিनिधित्व करती है। उनका बलिदान प्रत्येक भारतीय के हृदय में सदा-सदा दीप्तिमान रहेगा। दुर्बुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी रोड पर, किलोमीटर-120 पोस्ट के पास यह मेमोरियल खड़ा है। यह एक संदेश है। यह पीड़ा है, यह गौरव है, यह अमरता है।
स्मारक के चतुर्दिक् बीस कांस्य-निर्मित प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं, जो प्रत्येक शहीद-वीर का प्रतिनिधित्व करती हैं। ये मूर्तियाँ केवल पदार्थ-निर्मित नहीं हैं, अपितु उन वीरों की संकल्प-शक्ति, आत्म-समर्पण और देश-प्रेम की साकार-अभिव्यक्ति हैं। प्रत्येक प्रतिमा, अपने गौरवान्वित मुद्रा में, आने वाली पीढ़ियों को शौर्य और संघर्ष के उदात्त-मूल्यों की शिक्षा प्रदान करती है।
स्मारक के शीर्ष-भाग पर लहराता हुआ भारतीय तिरंगा, न केवल एक राजनीतिक-प्रतीक है, अपितु भारतीय-राष्ट्र की अस्मिता, स्वतंत्रता और गरिमा का जीवंत-प्रकाश है। यह तिरंगा उन बीस वीरों की शुभ्र विभा हैं। यह प्रत्येक भारतीय को अपने राष्ट्र के प्रति गर्व और कर्तव्य का स्मरण कराता है।
इस स्मारक के निर्माण में लाल-ग्रेनाइट और विविध-रंगों के पाषाण का उपयोग किया गया है। लाल-वर्ण, वीरता, साहस और बलिदान का पारंपरिक-प्रतीक माना जाता है। ग्रेनाइट की दृढ़ता और अविचल प्रकृति उन सैनिकों की अटूट-संकल्प-शक्ति को प्रतिबिंबित करती है जो कठिनतम परिस्थितियों में भी अपने धर्म से विचलित न हुए।
अत्याधुनिक संग्रहालय और डिजिटल-गैलरी
स्मारक-परिसर के भीतर एक प्रशस्त और अत्याधुनिक संग्रहालय का निर्माण किया गया है। इसे डिजिटल-प्रौद्योगिकी से सज्जित किया गया है। इस संग्रहालय में भारतीय-सेना की गौरव-गाथाएँ, गलवान घाटी में घटित हुई ऐतिहासिक-घटनाएँ, और आधुनिक-सैन्य-तकनीकी से संबंधित महत्वपूर्ण-सूचनाएँ प्रदर्शित की गई हैं। यह संग्रहालय आगंतुकों को केवल सूचना-प्रदान नहीं करता, अपितु कठिन-परिस्थितियों में भारतीय-सेना द्वारा राष्ट्र-सीमाओं की रक्षा के प्रति एक गहन-सम्मान और आदर-भाव का संचार करता है।

गलवान घाटी स्थित स्मारक
रेजांग-ला की प्रेरणा से प्राप्त एक विशाल ऑडिटोरियम का निर्माण किया गया है। इस आधुनिक सभागार में गलवान घाटी की ऐतिहासिक-घटनाओं, शहीद-सेनानियों की वीरगाथाओं और लद्दाख के रणनीतिक-महत्व से संबंधित विविध आख्यानों को आकर्षक दृश्य-माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। यह ऑडिटोरियम शिक्षा, प्रेरणा और देशभक्ति का एक संपूर्ण-केंद्र बन गया है जहाँ भारत के नागरिक अपने वीर-पूर्वजों के त्याग से सीधे संवाद स्थापित कर सकते हैं।
भारत-रणभूमि-दर्शन‘ योजना
गलवान वॉर मेमोरियल को भारत सरकार की ‘भारत-रणभूमि-दर्शन‘ योजना के अंतर्गत निर्मित किया गया है। यह योजना एक राष्ट्रव्यापी-दृष्टिकोण से भारत की ऐतिहासिक रणभूमियों को पर्यटन-केंद्रों के रूप में विकसित करने का प्रयास है।
यद्यपि इस स्मारक की स्थिति आबादी-से लगभग सौ किलोमीटर दूरस्थ है, और निकटतम जनबस्ती श्योक ग्राम है, फिर भी प्रशासन ने पर्यटकों की सुविधा के लिए रास्ते में आवास, भोजन-व्यवस्था और आवश्यक-सुविधाएँ उपलब्ध कराई हैं। पहाड़ी-मार्गों की दुर्गमता अब पूर्व-काल की अपेक्षा काफी सुगम हो गई है।
वाइब्रेंट-विलेज‘ कार्यक्रम
यह स्मारक ‘वाइब्रेंट-विलेज‘ कार्यक्रम का भी एक महत्वपूर्ण-अंग बन गया है। इस कार्यक्रम के माध्यम से न केवल पर्यटन का सर्वांगीण-विकास होगा, अपितु स्थानीय-समुदायों को नवीन रोजगार, आर्थिक-सुविधा और सामाजिक-उन्नयन के अवसर भी मिलेंगे। दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों के निवासियों के लिए यह विकास का एक नया-द्वार खोलता है।
शौर्य-तीर्थ के रूप में गलवान
आने वाले युगों में यह गलवान वॉर मेमोरियल उन सभी भारतीयों के लिए एक पवित्र-तीर्थ-स्थल बन उठेगा, जो अपने वीर-पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए इस रणभूमि-दर्शन के दर्शन करने आएँगे। यहाँ आकर प्रत्येक देश-प्रेमी यह गहन-अनुभूति करेगा कि भारत की सीमाएँ लाल-रक्त से अभिसिंचित हैं, ये केवल भौगोलिक-सीमाएँ नहीं हैं, अपितु एक स्तुत्य आध्यात्मिक-सत्ता हैं। यह स्मारक भारत के युवाओं को राष्ट्र-चेतना और देश-प्रेम का एक अनन्य-संदेश प्रदान करता है। यहाँ आने वाले प्रत्येक नागरिक, भले ही वह बालक हो या वयस्क, अपने राष्ट्र के प्रति एक अपरिमित-स्नेह और कर्तव्य-भावना से अनुप्राणित होगा।
गलवान वॉर मेमोरियल केवल एक पाषाण-निर्मित-संरचना नहीं है। यह भारतीय-राष्ट्र के आत्मा की एक अमर-अभिव्यक्ति है। यह उन बीस वीर-सेनानियों को श्रद्धांजलि है, जिन्होंने अपने प्राण-पंजर को तिरंगे की बेदियों पर अर्पित कर दिया। यह भारत-माता के पुत्रों के लिए एक शाश्वत-संदेश है कि राष्ट्र-रक्षा से महान कोई कर्तव्य नहीं है और त्याग से महान कोई मूल्य नहीं है।

फोटो: गलवान शिला
अपने त्रिशूल-आकार में यह स्मारक आकाश की ओर अपनी तीक्ष्ण-दृष्टि डाले अनंत-काल तक खड़ा रहेगा। प्रतिदिन जब उषा की प्रथम-किरणें इसे छुएँगी और सायंकाल की स्वर्णिम-रक्तिम छाया इसे आच्छादित करेंगी, तब यह शाश्वत-ज्योति निरंतर यह उद्घोषणा करती रहेगी कि भारत की सीमाएँ, सैनिकों के रक्त और त्याग से सुरक्षित हैं। भारत-माता की सुरक्षा के लिए, हमारे बीस वीर-सपूतों ने अपने सर्वस्व न्योछावर कर दिया। उनका बलिदान कभी विस्मृत नहीं होगा; उनकी गाथा चिर-काल तक गायी जाएगी। हर कदम जो यहां रखा जाएगा, हर श्वास जो यहां ली जाएगी – वह शहीदों का आलिंगन होगा, वह केवल पत्थर नहीं देखेगा। वह राष्ट्र-धर्म को देखेगा। वह शौर्य को देखेगा। । वह त्याग के उस शाश्वत सत्य को समझेगा, जहां मनुष्य अपने को मिटा कर, राष्ट्र में विलीन हो जाता है।








