माता का आंचल: सीमाएँ, संस्कृति और राष्ट्र-रक्षा
मानव-सभ्यता के उषाकाल से लेकर आज के इस आधुनिक काल तक, मानवता की समस्त संस्कृतियों के हृदय में एक ऐसा अमर सत्य निहित रहा है, जो कालातीत है, सीमाहीन है, और जिसकी गहराई अथाह है। वह सत्य यह है कि धरती को माता के रूप में पूजने की पवित्र परंपरा पूरी दुनिया में, हर देश में, हर जाति में, हर संस्कृति में विद्यमान रही है। यह केवल भारतवर्ष की विशिष्ट विरासत नहीं है, अपितु यह तो विश्व की समस्त संस्कृतियों का एक अनंत, सार्वभौमिक सत्य है। यह भाव सभ्यताओं की भाषा को पार कर, सभी सीमाओं को अतिक्रमण करके, सभी हृदयों में एक समान वेदना और एक समान पूजनीयता का भाव जागृत करता है।
प्रश्न उठता है क्यों? यह प्रश्न इतना सरल नहीं है जितना लगता है। इसका उत्तर निहित है मानव-अस्तित्व के उस सर्वाधारभूत अभिन्न संबंध में जो जन्म से पहले शुरू होता है और मृत्यु के पश्चात् भी जारी रहता है। जैसे संतान को जन्म देने वाली माता केवल शारीरिक पोषण ही नहीं प्रदान करती हैं, अपितु वह भावनात्मक सुरक्षा, नैतिक शिक्षा, मानसिक प्रेरणा और आत्मिक संरक्षा का एक अखंड स्रोत होती हैं, वैसे ही धरती-पृथ्वी मानव को अन्न, जल, वायु, वस्त्र, आश्रय, आलंबन, अवलंबन – सब कुछ देती है। वह हमारे जीवन के प्रत्येक क्षण में, प्रत्येक साँस में, प्रत्येक स्पंदन में मौजूद रहती है। इसी कारण विश्व की विभिन्न संस्कृतियों, विभिन्न सभ्यताओं ने, भिन्न-भिन्न नामों से, अलग-अलग भाषाओं में, पृथ्वी को माता का सर्वोच्च सम्मान दिया है।
विश्वव्यापी पृथ्वी माता की पूजा-परंपरा: एक सार्वभौमिक धर्म
प्राचीन यूनानी सभ्यता में ‘गैया’ को पृथ्वी की परमेष्ठी देवी माना जाता था। वह केवल एक देवता नहीं, अपितु समस्त जीवन की स्रष्टा, पोषक और संरक्षक मानी जाती थीं। मेसोपोटामिया की अत्यंत प्राचीन सभ्यता] में ‘निन्हुर्साग’ को पृथ्वी-माता की परम प्रतीक माना जाता था, जिन्हें ‘पर्वतों की राजमाता’ के रूप में संबोधित किया जाता था। नेटिव अमेरिकन संस्कृतियों में माता पृथ्वी अथवा ‘मदर अर्थ’ की भक्ति एक ऐसी पवित्र परंपरा थी जो सदियों-सदियों तक, पीढ़ियों-पीढ़ियों तक निरंतर प्रवाहित रही है। अफ्रीकी परंपराओं में भी पृथ्वी को जीवन-दायिनी माता के रूप में पूजा जाता है। इस प्रकार, पृथ्वी को माता मानने की यह चेतना मानवता की आंतरिक, अर्न्ततम सच्चाई है। यह एक अलिखित, अनाधिकृत, किंतु सार्वभौमिक धर्म है।

भारतीय सनातन परंपरा में पृथ्वी-माता
भारतीय सनातन परंपरा में पृथ्वी को माता कहने का संदर्भ सबसे प्राचीन है, सबसे गहरा है, और सबसे विस्तृत है। मानव-सभ्यता के सबसे प्राचीन ग्रंथों में से एक ऋग्वेद में एक अमर मंत्र है – “पृथिवी माता, रोहिणी वसुन्धरा” अर्थात्, पृथ्वी माता है, परम माता है। और वह है वसुंधरा यानी धन-दायिनी, संपत्ति-प्रदायिनी। यजुर्वेद के ग्यारहवें अध्याय में, एक अत्यंत गहन और दार्शनिक सत्य कहा गया है कि जिस प्रकार एक माता अपने गर्भ में पुत्र को धारण करती है, पोषण करती है, संरक्षण करती है, वैसे ही पृथ्वी ने भी अपने गर्भ में अग्नि को धारण किया है, पोषण किया है – “माता पुत्रं यथोपस्थे साग्निं बिभर्तु गर्भ आ।” अथर्ववेद में पृथिवी सूक्त विद्यमान है। यह सूक्त एक महान ग्रंथ है, जो पृथ्वी को समस्त जीवन-रूपों का अनंत पालक और पोषक बताता है। इसमें कहा गया है कि पृथ्वी ही सभी ऋतुओं की निर्माता है, सभी वनस्पतियों की सृजनकर्ता है, सभी प्राणियों की जीवनदायिनी शक्ति है। अथर्ववेद की एक अत्यंत प्रसिद्ध, अत्यंत पवित्र पंक्ति है – “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।” अर्थात्, पृथ्वी मेरी माता है, और मैं उसका पुत्र हूँ। यह कथन केवल भावनात्मक नहीं है, यह एक गहन दार्शनिक सत्य है, जो मानव को पृथ्वी से अभिन्न रूप से जोड़ता है।
भारतीय दर्शन के सर्वोच्च शिखर उपनिषदों में, विशेषकर ईशोपनिषद में, पृथ्वी को ब्रह्म का ही एक रूप माना गया है। तैत्तिरीय उपनिषद में पञ्चमहाभूतों यानी पाँच मौलिक तत्वों में पृथ्वी को सबसे महत्वपूर्ण, सबसे निकटतम, सबसे साक्षात् माना गया है। क्योंकि पृथ्वी सभी प्राणियों के सबसे निकट है, सबसे सुलभ है, और इसलिए उसका महत्व अन्य चार तत्वों – जल, अग्नि, वायु, आकाश – से अधिक है। भारतीय संस्कृति का महाकाव्य ‘रामायण’ में एक अत्यंत हृदयस्पर्शी प्रसंग है। जब माता सीता को अपनी पतिव्रता का प्रमाण देना पड़ा, तो वह धरती-माता को पुकारती हैं, और उनसे करुणापूर्ण प्रार्थना करती हैं। वह कहती हैं, “अगर मैं केवल राम की ही हूँ, अगर मेरे जीवन में कोई कलंक, कोई दोष नहीं है, तो हे माता धरती, मुझे अपनी गोद में समा लो।” यह प्रसंग भी यह दर्शाता है कि धरती को माता माना जाता है, जो अपनी पुत्री की पवित्रता की रक्षा करती है, उसके सम्मान की रक्षा करती है। संसार का सबसे बृहत्तम महाकाव्य ‘महाभारत’ में भी पृथ्वी को माता के रूप में संबोधित किया गया है। भीष्म पर्व में पृथ्वी का विस्तृत भूगोल और गहन महत्व वर्णित है। कहा गया है कि यह धरती चक्रवर्ती सम्राटों की सेविका है, अर्थात्, जो राजा धरती की रक्षा करता है, जो राष्ट्र की रक्षा करता है, वही सत्य का रक्षक है, धर्म का रक्षक है। पुराणों – विशेषकर विष्णु पुराण और ब्रह्मांड पुराण में, पृथ्वी-देवी को अदिति यानी परम माता के रूप में दर्शाया गया है। एक प्राचीन धार्मिक ग्रंथ ‘पृथ्वीस्तोत्र’ में पृथ्वी-माता की महिमा को गाया गया है, उसकी वंदना की गई है। इसमें कहा गया है कि जो व्यक्ति पृथ्वी का पूजन करता है, जो उसका सम्मान करता है, जो उसकी रक्षा करता है, वह कई जन्मों तक भूपति यानी राजा होने का परम सौभाग्य प्राप्त करता है।
सीमाओं के निर्धारण का इतिहास
मानव-सभ्यता के प्रारंभिक काल में जब मानव अभी पूर्णतः सभ्य नहीं हुआ था, उस समय सीमाओं का निर्धारण प्राकृतिक भौगोलिक विशेषताओं पर्वत, नदियाँ, घाटियाँ, सागर के आधार पर होता था। किंतु जैसे-जैसे समाज सुसंगठित हुआ, जैसे-जैसे राज्य और साम्राज्य की स्थापना हुई, वैसे-वैसे राजनीतिक सीमाओं का औपचारिक निर्धारण शुरू हुआ। भारत में विशेषकर मौर्य काल में सीमाओं का एक स्पष्ट, सुव्यवस्थित विभाजन हुआ।
सम्राट अशोक भारतीय इतिहास के सबसे महान और सबसे दूरदर्शी शासकों में से एक थे। उऩके काल में लगभग 260 ईसा पूर्व से 232 ईसा पूर्व, भारत का विस्तार अपने सर्वाधिक शीर्ष पर पहुँचा था। अशोक के शिलालेखों से ज्ञात होता है कि उनका साम्राज्य उत्तर में हिंदुकुश पर्वत से लेकर अफगानिस्तान और ईरान की सीमाओं तक विस्तृत था। दक्षिण में यह साम्राज्य गोदावरी नदी और सुवर्णगिरि पहाड़ियों के दक्षिण तक पहुँचा था। पूर्व में यह बांग्लादेश और असम तक विस्तारित था। कहा जाता है कि अशोक का साम्राज्य आज का समस्त भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान और म्यांमार के विशाल भूभाग पर विस्तृत था। इस अतुलनीय विशाल साम्राज्य में अशोक ने न कि केवल सैन्य विजय की, बल्कि धर्म विजय की नीति भी प्रस्थापित की। उसके शिलालेखों में पड़ोसी देशों के महान सम्राटों, जैसे – एंटियोकस, टॉलेमी, महिंद आदि का उल्लेख है। ये अशोक के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध रखते थे।

AI इमेज: सम्राट अशोक
गुप्त साम्राज्य के स्वर्णकाल में भारत की सीमाओं का पुनः विस्तार
गुप्त साम्राज्य के काल को भारतीय इतिहास का स्वर्णकाल कहा जाता है। इस कालखणअड में भारत की सीमाएँ पुनः एक बार विस्तारित हुईं। लगभग 335 ईस्वी से 380 ईस्वी के बीच महान विजेता और विद्वान समुद्रगुप्त ने अपने शासन काल में अद्भुत पराक्रम से भारत की सीमाओं को पुनः विस्तृत किया। उसने 12 महत्वपूर्ण उत्तर भारतीय राज्यों पर विजयध्वज फहराया, मध्य भारत को अपने अधीन किया, और दक्षिण की ओर कांचीपुरम तक अपनी विजय-पताका लहराई। एक अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज़ समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति शिलालेख से ज्ञात होता है कि उसका राज्य बंगाल की खाड़ी से आंतरिक असम, नेपाल और कुमायूँ तक विस्तृत था।
चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य का कालखण्ड लगभग 380 ईस्वी से 415 ईस्वी के बीच रहा। उऩ्हें गुप्त साम्राज्य का सबसे महान सम्राट माना जाता है। उऩ्होंने शकों को परास्त कर मालवा, गुजरात और सौराष्ट्र को अपने राज्य में मिला लिया। इस प्रकार, गुप्त काल में भारत की सीमाएँ अशोक के समय जितनी विस्तृत नहीं थीं, किंतु आर्थिक समृद्धि और सांस्कृतिक विकास के मामले में वह काल संसार में अतुलनीय था।
भारत की सीमाओं का दारुण इतिहास
भारत की सीमाओं में क्रमिक, निरंतर, पीड़ादायक संकुचन भी हुआ। इसके प्रमाण इतिहास के पृष्ठों से स्पष्ट हैं। 8वीं-18वीं शताब्दी के बीच सीमा-संकुचन की स्थिति इस्लामिक आतंक और साम्राज्यवाद के कारण होता रहा। मोहम्मद गोरी और मुहम्मद बिन कासिम के विदेशी आक्रमणों से भारत की पश्चिमी सीमाएँ धीरे-धीरे सिकुड़ने लगीं। सिंध और पंजाब के समृद्ध क्षेत्र ईस्लामिक आक्रमणकारियों के हाथों में चले गए।
दिल्ली सल्तनत के अंधकारमय काल में भारत के अंदरूनी क्षेत्रों पर भी विदेशी नियंत्रण स्थापित हो गया। 16वीं से 18वीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के अधीन भारत की सीमाएँ पुनः कुछ स्पष्ट हुईं, किंतु यह भारतीय शासकों की सीमा नहीं थी, बल्कि विदेशी-मूल के शासकों की सीमा थी। 19वीं-20वीं शताब्दी के मध्य ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन सीमाओं का और भी गहरा संकोचन हुआ। ब्रिटिश साम्राज्य के भारत में प्रवेश से भारत की सीमाएँ और भी गहराई से सिकुड़ गईं। मैकमोहन रेखा (1914) के माध्यम से ब्रिटिशों ने भारत के अरुणाचल प्रदेश और तिब्बत के बीच एक कृत्रिम सीमा तय की, किंतु चीन ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया। रैडक्लिफ रेखा (1947) के माध्यम से ब्रिटिशों ने भारत का सबसे दारुण विभाजन किया और पाकिस्तान का अस्तित्व बनाया।
15 अगस्त 1947 की विभाजन-विभीषिका
भारत का विभाजन एक अत्यंत दारुण, अत्यंत पीड़ादायक सत्य है। 1947 में ब्रिटिश साम्राज्य ने लॉर्ड माउंटबेटन की योजना के तहत, एक रात में, कलम की एक खींचाई से भारत को दो भागों में बाँट दिया। एक ब्रिटिश वकील सर सिरिल रैडक्लिफ का भारत से कोई संबंध नहीं था। उसने रैडक्लिफ रेखा खींचकर भारत को विभाजित कर दिया। इसके परिणामस्वरूप पंजाब का विभाजन हुआ। पश्चिमी पंजाब पाकिस्तान को, और पूर्वी पंजाब भारत को मिला। बंगाल का विभाजन हुआ। पूर्वी बंगाल पाकिस्तान (बाद में बांग्लादेश) को और पश्चिमी बंगाल भारत को मिला। सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा पाकिस्तान को मिले। इस विभाजन में लगभग 10 लाख से अधिक लोगों की जानें गईं। लाखों-लाखों लोग विस्थापित हुए, उजड़ गए, बिखर गए। भारत की सीमाएँ अचानक सिकुड़ गईं, और भारत एक विघटित, विभक्त, दुर्बल राष्ट्र बन गया।
स्वतंत्र भारत की सीमाओं का विस्तार
एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पीड़ाजनक प्रश्न यह है कि स्वतंत्र भारत के काल में क्या भारत की सीमाओं का विस्तार हुआ? इतिहास में इसके प्रमाण अत्यंत विरल हैं, कम दृष्टिगत होते हैं। किंतु कुछ उल्लेखनीय घटनाएँ अवश्य हैं। 1961 में भारत की सरकार ने गोवा को पुर्तगाली शासन से मुक्त किया। यह भारतीय क्षेत्र का पुनः एकीकरण था। दमन और दीव भी इसी समय भारत में मिले। भारत की सेना ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में पूर्वी पाकिस्तान को पाकिस्तान से स्वतंत्र करवाया, और एक नए राष्ट्र बांग्लादेश का निर्माण हुआ। इसे भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण माना जाता है। किंतु ये उदाहरण भारत की सीमा-विस्तार का नहीं हैं।

फोटो: 1965 भारत पाक युद्ध
देश की सीमाएँ माता का आंचल क्यों?
देश की सीमाएँ केवल नक्शों पर बनी लकीरें नहीं हैं। सीमाएँ राष्ट्र की पहचान हैं, राष्ट्र की संस्कृति की रक्षा हैं, राष्ट्र की परंपरा का संरक्षण हैं, राष्ट्र की सम्मान की रक्षा हैं। माता का आंचल एक अत्यंत गहन, अत्यंत मार्मिक प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। यह वह क्षेत्र है, वह परिसर है, जहाँ संतान सुरक्षित रहती है, पोषित रहती है, सम्मानित रहती है। जैसे माता अपने आंचल में अपने संतान को छिपाती है, सुरक्षित रखती है, ताकि बाहरी संकट, बाहरी विपत्ति, बाहरी दुर्भावना से रक्षा हो सके, वैसे ही देश की सीमाएँ राष्ट्र के नागरिकों की रक्षा करती हैं। जब सीमाएँ कमजोर पड़ जाती हैं, जब सीमाएँ असुरक्षित हो जाती हैं, तो बाहरी शत्रु घुस आते हैं, विदेशी आक्रमण होते हैं, राष्ट्र का अपमान होता है, संस्कृति का विनाश होता है। इतिहास इसका साक्षी है कि भारत की कमजोर सीमाओं का लाभ उठाकर अरब, तुर्क, अफगान और मुगल आक्रमणकारियों ने भारत को अनंत बार लूटा, जलाया, विनष्ट किया।
माता के कंधों पर दायित्व होता है अपनी संतान की रक्षा करने का, उसके भविष्य की चिंता करने का, उसके सम्मान की रक्षा करने का। वही दायित्व राष्ट्र-रक्षा के क्षेत्र में सैनिकों, सीमा-रक्षकों और जागरूक नागरिकों]के कंधों पर होता है। सीमा की रक्षा केवल एक सैनिक का कर्तव्य नहीं है। यह तो देशभक्ति का सबसे पवित्र, सबसे महान, सबसे उच्च रूप है। वेद और उपनिषद में कहा गया है कि जो राजा अपनी प्रजा की रक्षा नहीं करता, जो अपने राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा नहीं करता, वह अपने राज्य को भी नष्ट कर देता है। ‘रामायण’ के कथानक बताते हैं कि भगवान राम ने अपनी मातृभूमि को माँ के समान सम्मान दिया है। उन्होंने अपने भाई लक्ष्मण से कहा था – “अपि स्वर्ण लंका न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।“ अर्थात्, हे लक्ष्मण, यद्यपि लंका जिसे हमने रावण के साथ युद्ध में जीता है, वह एक स्वर्ण देश है, बहुत समृद्ध है, किंतु मुझे यह देश पसंद नहीं है। क्योंकि जिस अयोध्या में, जिस भारत देश में हम पैदा हुए, वह हमारी माता के समान है और देवताओं के निवास स्वर्ग से भी वह देश हमारे लिए अधिक प्रिय है, अधिक महान है। ‘महाभारत’ कहती है कि पांडवों ने कुरुक्षेत्र में अपनी धरती की रक्षा के लिए, अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए, कई भीषण युद्ध किये थे।
सीमा की रक्षा करना इसलिए देशभक्ति है क्योंकि इससे राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा होती है। सीमा राष्ट्र की पहचान है, राष्ट्र के आत्मसम्मान का प्रतीक है। कमजोर सीमा कमजोर राष्ट्र का परिचायक है। सीमा की दुर्बलता ही राष्ट्र की दुर्बलता है। सीमा की रक्षा करने से ही नागरिकों की जान और संपत्ति की सुरक्षा हो पाती है। वर्तमान में सीमा के पार आतंकवाद है, युद्ध है, दुर्भावनापूर्ण शक्तियाँ हैं। सीमा-रक्षा से नागरिकों की जान सुरक्षित रहती है, उनकी संपत्ति सुरक्षित रहती है, उनका जीवन सुरक्षित रहता है। सीमा संरक्षण-संवर्धन से ही सांस्कृतिक संरक्षण संभव हो पाता है। एक कमजोर सीमा से बाहरी संस्कृति, बाहरी विचारधाराएँ, बाहरी मूल्यबोध अंदर घुस आते हैं। सीमा की रक्षा करके हम अपनी संस्कृति की, अपनी परंपरा की, अपनी सभ्यता की भी रक्षा करते हैं। जो भविष्य के नागरिक हैं, उन्हें एक सुरक्षित, सम्मानित, स्वतंत्र राष्ट्र देना हमारा परम दायित्व है। आनेवाली पीढ़ियों को गुलामी में नहीं बाँधना है, दुर्बल नहीं करना है।
सीमा-विवाद से ग्रस्त संसार
आज की दुनिया में सीमा-विवाद अत्यंत संकटजनक है। अनेक देश सीमा-विवादों से जूझ रहे हैं। हर दिन सैनिक शहीद हो रहे हैं। हर दिन नागरिकों को संकट का सामना करना पड़ रहा है। रूस ने 2022 में यूक्रेन पर आक्रमण किया, और अभी भी इस भीषण संघर्ष का अंत नहीं हुआ। इस युद्ध में लाखों लोग विस्थापित हुए हैं, हजारों-हजार सैनिक मारे गए हैं, और असंख्य नागरिकों को अपार कष्ट का सामना करना पड़ रहा है। आज यह सीमा-विवाद का सबसे बड़ा, सबसे भीषण उदाहरण है। मध्य पूर्व में इजराइल और फिलिस्तीन के बीच दशकों से एक दारुण संघर्ष चल रहा है। 2023 में इस संघर्ष ने एक भयानक रूप ले लिया। हजारों नागरिक मारे गए। सूडान में 2023 से सैन्य गुटों के बीच एक भीषण गृहयुद्ध चल रहा है। लाखों लोग विस्थापित हुए हैं, और भुखमरी से मृत्यु का एक भीषण साया मंडरा रहा है।

फोटो: रूस यूक्रेन युद्ध
भारत की सीमाओं पर मंडराते संकट
भारत के लिए भी सीमाएँ एक बहुत बड़ी, एक अत्यंत गंभीर चुनौती हैं। चीन के साथ अनंत तनाव बना हुआ है। मैकमोहन रेखा को लेकर चीन से लगातार, निरंतर तनाव बना रहता है। लद्दाख में 2020 में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच एक भीषण संघर्ष हुआ था। पाकिस्तान से आतंकवादी घुसपैठ निरंतर होती रहती है, जिससे भारतीय सीमांत क्षेत्रों में अस्थिरता और असुरक्षा बनी रहती है। बांग्लादेश-भारत सीमा पर घुसपैठ और तस्करी के मामले होते रहते हैं। म्यांमार से विस्थापित रोहिंग्या लोगों से भारत को राष्ट्रीय सुरक्षा की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है।
माता, मातृभूमि और सीमा-रक्षा
सीमा केवल एक भौगोलिक सीमांकन नहीं है। सीमा पृथ्वी-माता की गोद का वह पवित्र आंचल है, जहाँ अपने नागरिकों को सुरक्षा मिलती है, सम्मान मिलता है, सांस्कृतिक विरासत मिलती है, अपनत्व मिलता है। शास्त्र कहते हैं कि पृथ्वी माता है, वैसे ही देश की सीमा भी राष्ट्र-माता के आंचल का परम प्रतीक है, परम प्रतिनिधि है। सीमा-रक्षा का कर्तव्य केवल सैनिकों का नहीं है, केवल सीमा-रक्षकों का नहीं है। यह एक विशाल, एक अखंड, एक सामूहिक दायित्व है – सरकार का, नीति-निर्माताओं का, विधि-व्यवस्था के कर्मियों का, शिक्षकों का, पत्रकारों का, और सबसे अधिक प्रत्येक सजग, जागरूक नागरिक का। जब तक सीमाएँ सुरक्षित रहती हैं, तब तक राष्ट्र सुरक्षित रहता है। जब तक राष्ट्र सुरक्षित रहता है, तब तक विकास की राह प्रशस्त होती है, सम्मान की ज्योति प्रज्वलित रहती है, समृद्धि की बयार बहती है। भारत को अपनी सीमाओं की रक्षा करनी है, अपनी सीमाओं को सशक्त करना है, अपनी सीमाओं को पवित्र रखना है। भारत को अखण्ड भारत में परिणत करना है। पृथ्वी-माता की रक्षा करना, मातृभूमि की गरिमा बनाए रखना, सीमाओं की पावनता को संरक्षित रखना – यही आज के इस संकट-ग्रस्त काल में, इस अस्थिर दुनिया में, सबसे महत्वपूर्ण, सबसे पवित्र, सबसे परम देशभक्ति का अनंत और शाश्वत कर्तव्य है।








