कश्मीर: प्राचीन संस्कृति, व्यापारिक मार्गों और ऐतिहासिक उत्खननों का अद्भुत संगम
उत्तरी कश्मीर के बारामूला ज़िले के शांत और सुंदर पहाड़ियों के बीच स्थित ज़ेहनपोरा गाँव में इन दिनों चर्चे में है। यहां शोधकर्ताओं और पुरातत्वविदों ने एक बौद्ध परिसर के अवशेषों का पता लगाया है, जो कश्मीर के प्राचीन सांस्कृतिक परिदृश्य को नया आयाम दे सकती है। यह उत्खनन जम्मू-कश्मीर अभिलेखागार, पुरातत्व विभाग और कश्मीर विश्वविद्यालय के मध्य एशियाई अध्ययन केंद्र का संयुक्त प्रयास है। यह उत्खनन धीरे-धीरे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक परत को सामने ला रहा है।
जम्मू-कश्मीर का पुरातात्विक महत्व अत्यंत समृद्ध रहा है। यह क्षेत्र प्राचीन बौद्ध संस्कृति, कश्मीर शैववाद, मुगल स्थापत्य और नवपाषाण सभ्यताओं का संगम रहा है। बुर्जहोम में मिले नवपाषाण कालीन अवशेष, अवंतिपुर स्थित मार्तंड मंदिर, पण्ड्रेथन जैसे शैव स्थल के अवशेष और मुगल उद्यान कश्मीर की ऐतिहासिक परंपरा को दर्शाते हैं। सिक्कों, मूर्तियों और गुफा-स्थलों से यह स्पष्ट होता है कि कश्मीर व्यापार, संस्कृति और दर्शन का प्राचीन केंद्र रहा है। यह भूमि हजारों वर्षों से सभ्यताओं के विकास की गवाही देती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ज़ेहनपोरा का उत्खनन किसी मठीय संरचना के अवशेषों का संकेत नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आंदोलन के साक्ष्य प्रस्तुत करती है जिसने सदियों पहले कश्मीर को बौद्ध चिंतन का एक जीवंत केंद्र बनाया था। यहां उत्खन का कार्य निरंतर जारी है और जैसे-जैसे खुदाई हो रही है वैसे-वैसे पत्थर की नींवों के क्रमबद्ध खंड, सूक्ष्म शिल्प वाले मूर्तियां, मिट्टी के रंगीन बर्तनों के टुकड़े मिले हैं। इससे साफ संकेत मिलता है कि यहाँ कभी एक सुदृढ़ नियोजित मठ परिसर था, जो यात्रियों, भिक्षुओं और व्यापारियों का महत्वपूर्ण पड़ाव हुआ करता था।

जेहनपोरा उत्खनन स्थल
पुरातत्वविदों का मानना है कि यह स्थल ‘सिल्क रूट’ से जुड़े मार्गों पर स्थित था, जिनके माध्यम से कश्मीर का संपर्क मध्य एशिया, तुर्किस्तान और चीन तक फैला हुआ था। ऐसे में जेहनपोरा केवल स्थापत्य अवशेषों तक सीमित न रहकर एक बहुआयामी सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र था जिसने प्राचीन कश्मीर की पहचान को आकार दिया।
जेहनपोरा में जारी यह उत्खनन आने वाले दिनों में प्राचीन कश्मीर के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक जीवन शैली पर नई रोशनी डालती नजर आएगी। यह खोज उस विराट सांस्कृतिक धरोहर को पुनः पहचानने का मौका है जिसने कश्मीर को सदियों से ज्ञान, आध्यात्मिकता और कला का संगम बनाए रखा।








