घुसपैठिए आएँ और हम लाल क़ालीन बिछाएँ?
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को रोहिंग्या घुसपैठियों के मुद्दे पर राष्ट्रहित का ऐसा सख़्त रुख अपनाया, जो सीमाओं को सबल और संबर्धित करेगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्य बागची की पीठ ने स्पष्ट प्रश्न रखा कि जब हमारे करोड़ों नागरिक गरीबी, बेरोज़गारी और बुनियादी ज़रूरतों के लिए त्राहिमाम कर रहे हैं, तब अवैध घुसपैठियों के लिए लाल कालीन बिछाकर स्वागत क्यों? मानवाधिकार कार्यकर्ता रीता मंचंदा की बन्दी प्रत्यक्षीकरण याचिका में कहा गया कि मई 2025 में दिल्ली पुलिस ने कई रोहिंग्याओं को पकड़ा, किंतु वे अब हिरासत से ग़ायब हैं। अदालत ने फटकार लगाई और तंज कसा कि बिना वैध दस्तावेज़़ उत्तर भारत की अति-संवेदनशील सीमाओं को लाँघकर आने वालों को शरण, संसाधन और संरक्षण क्यों दिए जाएँ? उन्हें वापस भेजने में बाधा कहाँ?
यह प्रश्न केवल रोहिंग्या तक सीमित नहीं है। म्यांमार में 2017 के सैन्य दमन से 10 लाख से अधिक रोहिंग्या बांग्लादेश-भारत की ओर भागे। उत्तर-पूर्वी सीमाओं पर पिछले 5 वर्षों में 2 लाख अवैध घुसपैठ के मामले दर्ज हैं, जो आतंकवाद और नक्सल को बढ़ावा दे रहे हैं। CJI सूर्य कांत का यह रुख उनके पूर्व फैसलों से मेल खाता है, जैसे CAA पर उन्होंने राष्ट्रहित को प्राथमिकता दी थी। मामला अब 16 दिसंबर को दोबारा सुना जाएगा।
निस्संदेह, यह टिप्पणी राष्ट्रहित की अमिट रेखा खींचती है। सीमा सुरक्षा केवल सेनानियों का दायित्व नहीं है। यह विधि-व्यवस्था, नीति-निर्माताओं और हर सजग नागरिक का सामूहिक दायित्व है। भारत की सीमाएँ अटल रहेंगी, तभी राष्ट्र अखंड रहेगा, तभी विकास की उज्ज्वल गंगा बहेगी, सम्मान की ज्योति प्रज्वलित होगी। वन्दे मातरम्!








