करिमगंज: सीमा की धड़कन, व्यापार का द्वार, पर्यटन का नया उजाला
असम के दक्षिणी सीमांत पर स्थित करिमगंज भारत की पूर्वी सीमा-चेतना की धड़कन, भारतीय अस्मिता के अंतिम पहरेदार की पोस्ट और उस अनंत संघर्ष का जीवंत प्रतीक है जो निरंतर अपने आप को नई परिस्थितियों के साथ अनुकूलित करता रहता है। हिमालय की पवित्र गोद से जन्मी कुशियारा नदी जब करीमगंज के निकट पहुँचती है, तो वह केवल दो राष्ट्रों की सीमा-रेखा नहीं बन जाती, वह तो उस महान सत्य का जीवंत अवतार बन जाती है, जिसमें कहा गया है कि सीमाएँ केवल भूमि को विभाजित नहीं करतीं, बल्कि वे दो सभ्यताओं के बीच एक सेतु भी बन जाती हैं। इस सेतु पर दो संस्कृतियाँ मिलती हैं, दो अर्थव्यवस्थाएँ संवाद करती हैं, और दो जनजीवन एक-दूसरे को समझने का प्रयास करते हैं। करिमगंज की भौतिक संरचना अत्यंत सामान्य है, न यह एक भव्य महानगर है, न ही यह किसी बड़े सांस्कृतिक साम्राज्य की राजधानी है। यह तो एक ऐसा सामान्य, साधारण नगरी है, जो बाहर से अत्यंत विनम्र दिखाई देता है, परंतु इसके भीतर एक अलौकिक शक्ति निहित है। इसके भीतर सीमा-सुरक्षा की वह दृढ़ता निहित है, जो सदा सावधान रहती है। इसके भीतर व्यापार की वह धारा बहती है, जो कभी रुकती नहीं, और इसके भीतर सांस्कृतिक सौहार्द की वह सुगंध विद्यमान है, जो सीमा के दोनों ओर के लोगों के हृदय को एक सूत्र में बाँधती है।

इमेज: करिमगंज
सुतारकांडी का एकीकृत जाँच चौकी है करिमगंज। यह केवल एक प्रशासनिक ढाँचा नहीं है। यह है करिमगंज के संपूर्ण अस्तित्व की धुरी, वह केंद्र-बिंदु जिसके चारों ओर भारत-बांग्लादेश के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध अपनी परिक्रमा करते हैं। यह चौकी न केवल सीमा-नियंत्रण का केंद्र है, बल्कि यह दोनों देशों के पारस्परिक विश्वास और सहयोग का प्रतीक भी है। यहाँ से प्रतिदिन 300 से 400 ट्रक गुजरते हैं। प्रत्येक ट्रक एक जीवंत अध्याय है, एक आर्थिक गाथा है, एक विकास की कथा है। यहाँ से कोयला, फल, खाद्यान्न, औद्योगिक सामग्रियों का व्यापार होता है। इन वस्तुओं के पीछे हजारों परिवारों की आजीविका छिपी है। लाखों-करोड़ों का व्यापार इस छोटे-से कस्बे को असम के आर्थिक मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करता है। लेकिन यह व्यापार केवल वाणिज्य नहीं है। यह है पड़ोसियों के बीच विश्वास का प्रतीक। जब भारतीय ट्रक बांग्लादेशी बाज़ारों में पहुँचते हैं तो यह केवल वस्तु-विनिमय नहीं होता है, बल्कि एक सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता है। जब बांग्लादेशी सामग्री भारत में आती है, तो वह केवल आयात नहीं है, बल्कि एक भाईचारे का विस्तार है। हाँलांकि वर्तमान बांग्लादेश की इस्लामिक और आंतंक-आवेष्ठित गतिविधियाँ इस भाईचारे के भाव को ध्वस्त कर रही हैं।
करिमगंज की पहचान त्रि-आयामी है। यही इसकी वास्तविक शक्ति है। यहाँ सीमा-सुरक्षा वह कठोर, अविचल, सतर्क आयाम है जो इस कस्बे को कभी भी अपनी दृष्टि से ओझल होने नहीं देता। फिर, व्यापार-समृद्धि वह गतिशील, जीवंत आयाम है जो निरंतर विकास की गति में लगा रहता है। साथ ही, पर्यटन-विकास वह इतिहास और अनुभव का आयाम है जो इस क्षेत्र को एक नई पहचान दे रहा है। बराक घाटी की हरियाली वह शाश्वत, अंतहीन हरियाली है जिसे देखते ही मन को एक गहरी शांति मिलती है। यह करीमगंज के परिवेश को एक सुरम्य, मनोरम स्पर्श देती है। सीमा के दोनों ओर फैली ग्रामीण बस्तियाँ, धान के खेतों की पंक्तियाँ, नदी के किनारे तैरती नावें, और पगडंडियों पर साधारण जीवन की गति – ये सब मिलकर एक ऐसा सीमा-परिदृश्य गढ़ते हैं जो किसी गीतिकाव्य से कम नहीं है। ‘बॉर्डर टूरिज़्म’ की अवधारणा ने इस क्षेत्र को एक नई दिशा दी है। अब लोग यहाँ आते हैं सीमा-जीवन की चुनौतियों को समझने के लिए, सुरक्षा बलों की दिनचर्या को देखने के लिए और सीमा व्यापार की धड़कन को महसूस करने के लिए।

करिमगंज में सीमा की सुरक्षा एक बड़ी आवश्यकता है। घुसपैठ, तस्करी, नकली मुद्रा की आवाजाही, देश-विरोधी गतिविधियाँ – ये सब पुराने समय में इस क्षेत्र की परिचित समस्याएँ थीं। परंतु पिछले दशक में सीमा-सुरक्षा की एक नई चेतना का जन्म हुआ है, एक नई जागरूकता की शृंखला बनी है। यह परिवर्तन केवल बेहतर तकनीकों के कारण नहीं हुआ है। हालाँकि बीएसएफ की चौकसी, आधुनिक निगरानी प्रणालियाँ, और अत्याधुनिक उपकरण निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं। परंतु असली परिवर्तन आया है केन्द्र सरकार और स्थानीय नागरिकों की चेतना से, जन-जागरण के आंदोलनों से, और सीमा जागरण मंच जैसे संगठनों की निरंतर सक्रियता से। अब सीमाएँ केवल सेना के कंधों पर नहीं टिकी हैं, बल्कि वे राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक की सजग चेतना पर भी टिकी हैं। करिमगंज केवल एक सीमा-रेखा नहीं है, बल्कि सीमाओं के पार बहने वाली ऊर्जा, साझेदारी, संघर्ष और सह-अस्तित्व की एक शाश्वत कथा है। यहाँ की हवा में सुरक्षा का विश्वास है, व्यापार की गतिशीलता है, संस्कृति का स्पंदन है, और आशा की सुगंध है। ये सब मिलकर इस दक्षिणी असम के छोटे-से कस्बे को एक विशाल, जीवंत, और दूरगामी महत्व का केंद्र बना देते हैं।








