हिमालय की गोद में भारत का अभेद्य किला – कुनु-चारंग
कुनु-चारंग, भारत-तिब्बत सीमा के ऐसे जुड़वाँ गाँव हैं जहाँ जड़ें संस्कृति की हैं, शाखाएँ साहस की और फल देशभक्ति के। ये गाँव, कुनु और चारंग, न सिर्फ़ प्राकृतिक क़िले हैं, बल्कि भारतीय सीमा की सुरक्षा के पहले प्रहरी भी हैं। यहाँ हिमालय की चुनौतियाँ और देश की सीमा-सुरक्षा-व्यवस्था एक साथ गूँजती हैं। फावरांग, राचो और बेशरांग जैसी चोटियाँ भारत की रक्षा में युगों से अडिग खड़ी हैं। ये दोनों गाँव ऐसे पहरेदार हैं जो हमारी सीमा को हर मौसम में मज़बूत बनाए रखते हैं। यहीं से भारत-तिब्बत की मैत्री की विरासत और सीमाओं की उत्तुंग गाथाएँ भी प्रत्यक्ष होती हैं।

फोटो: चारंग मंदिर
यहाँ का रंगरिक तुंगमा मठ, प्राचीन चोर्टन और चारंग-ला-पास न केवल संस्कृति के तीर्थ हैं, बल्कि सामरिक और भौगोलिक दृष्टि से भी ख़ास मायने रखते हैं। सीमाओं के इस सन्नाटे में, हर पत्थर, हर पेड़ और हर हवा के झोंके में देशभक्ति की धड़कन साफ़ सुनाई देती है।
आईटीबीपी चौकी शुर्टिंग से जब आप इन पर्वतीय रास्तों पर दो घंटे चढ़ते हैं, तो प्रत्यक्ष अनुभव होता है कि भारत की रक्षा सिर्फ़ सिपाही नहीं, गाँव वाले भी उतनी ही ज़िम्मेदारी से करते हैं। यहाँ लोकशक्ति और भारतीय सैनिकों का जज़्बा एक साथ सीमा की रक्षा करते हैं। कुनु-चारंग – दोनों गाँव भारत की सीमा की वही नींव हैं जिनकी मज़बूती पर देश का वर्तमान और भविष्य टिका है। ये जुड़वाँ गाँव हैं भारतीय आत्मा के हिमालयी प्रहरी। कुनु-चारंग सीमा और संस्कृति के अभेद्य दुर्ग हैं। कुनु-चारंग सरहद पर बसे दो गाँव नहीं, देशभक्ति की हिमालयी महाध्वनि हैं!








