वन्दे मातरम्: ब्रिटिश दमन से लेकर भारत की सीमा-रक्षा तक
-भोगेन्द्र पाठक, वरिष्ठ पत्रकार
जब किसी राष्ट्र की चेतना पर विदेशी सत्ता की हथकड़ी बैठती है, तब कभी-कभी किसी संत के हृदय से ऐसी कविता फूट पड़ती है, जो इतिहास के सर्वाधिक क्रांतिकारी परिवर्तन का कारण बन जाती है। ‘वन्दे मातरम्’ ऐसा ही महामंत्र है। यह गीत नहीं, एक संपूर्ण सांस्कृतिक आंदोलन बन गया, जिसने जन-जन को स्वतंत्रता की पावन अमृतधारा में आप्लावित कर कर दिया।
गीत की उत्पत्ति: मातृभूमि की उपासना से क्रांति तक
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय बंगाल की मिट्टी के महान सपूत थे, जिनकी संवेदना ने गुलाम भारत की पीड़ा का अनुभव किया। सरकारी कर्मचारी रहते हुए भी उनके अंतर में भारतमाता का भाव प्रतिक्षण जागृत रहता था। ब्रिटिश राज ने जब सरकारी पदाधिकारियों पर ‘गॉड सेव द क्वीन’ गाने का आदेश थोप दिया, तो उनके भीतर स्वाधीनता की ज्वाला सुलग उठी। इसी आंतरिक आक्रोश से 1875 में ‘वन्दे मातरम्’ का सृजन हुआ, जो सर्वप्रथम 1882 के विख्यात उपन्यास ‘आनंदमठ’ में प्रकट हुआ। ऐसा होता भी क्यों नहीं? जिस देश की भूमि ने वेदों की ऋचाएँ रची हों, वहाँ जब राष्ट्रीय चेतना कलंकित होती है, तब किसी अकिंचन के हास्य-रोदन में से अमरत्व का गान निकल पड़ता है।
इस गीत के प्रथम दो पद संस्कृत में और शेष पद्य बंगला में गूंज उठे। ये भारत-भूमि की बहु-सांस्कृतिक चेतना के शब्द और स्वरूप बन गए। इस महागीत में भारतमाता के रूप में जननी की आराधना, उसकी हरियाली, उसके जल और धनधूलि की महत्ता चरितार्थ की गई – “सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम शस्यश्यामलाम मातरम्…”
स्वाधीनता संग्राम में गीत की शक्ति
विश्ववनाथ मुखर्जी अपनी महत्त्वपूर्ण कृति ‘वन्दे मातरम् का इतिहास’ में यह युक्ति प्रस्तुत करते हैं- “एक गीत कब क्रांति का शंखनाद बन जाता है, कहना कठिन है। लेकिन जब ‘वन्दे मातरम्’ का प्रथम स्वर फूटा, तो बंगाल से लेकर बनारस, दिल्ली, लाहौर, बंबई और मद्रास तक स्वाधीनता की लहर दौड़ गई।” सव्यसाची भट्टाचार्या अपनी शोधमूलक पुस्तक ‘वन्दे मातरम्’ में ऐतिहासिक संदर्भ देते हैं कि 1896 में कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ‘वन्दे मातरम्’ गाकर उसे राष्ट्रीय जागरण का स्वर दे दिया। गीत न केवल अधिवेशनों में, अपितु लोक सत्याग्रह, जुलूसों, प्रतिरोध सभाओं, क्रांतिकारियों के आंदोलनों में भी उद्घोष बन गया। 1905 के बंग-भंग विरोधी स्वदेशी आंदोलन में यह गीत अनेक स्वरों में, अप्रतिम राष्ट्र-भाव से गूंजा। “जब हजारों-हजारों स्वदेशी प्रेमी सड़कों पर प्रतिरोध करते हेतु एकत्र हुए, उनका उद्घोष यही था – वन्दे मातरम्!” ब्रिटिश शासकों ने जब इस गान पर पाबंदी लगाई, तो बंगाल क्रांतिकारियों और विद्यार्थियों ने इसे और भी तीव्रता से गाया। यह महज गान नहीं – “जन-जन का आराध्य मंत्र था, और वही मंत्र बना अंग्रेजी सत्ता के ताबूत की अंतिम कील।” (‘वन्दे मातरम् का इतिहास’, पृष्ठ 119)

देशभक्ति और सांस्कृतिक चेतना का संगम
सव्यसाची भट्टाचार्या स्पष्ट करते हैं – ‘वन्दे मातरम्’ में मातृभूमि की संज्ञा ‘जननी’ के रूप में दी गई है। गीत के प्रतीक, देवी-रूप, हरियाली, सम्पन्नता, साधना और शक्ति के बिंब मिलकर भारतमाता की विराट छवि उकेरते हैं। ‘वन्दे मातरम्’ न केवल विद्रोह का उद्घोष था, बल्कि सांस्कृतिक एकता का भी ध्वज था। इसमें मुसलमान, हिन्दू, सिख, पारसी – सभी शामिल थे। यह गीत अनेक भाषाओं में अनुवादित हो राष्ट्रीय गीत बना। सव्यसाची भट्टाचार्या के अनुसार – “1920 तक यह विभिन्न भाषा-संस्कृतियों के बीच रहकर भी देश के कोने-कोने तक पहुँच गया था। बंकिम का गीत अब केवल बंगाल का नहीं, भारत का स्वर बन गया था।” महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक, सुभाषचंद्र बोस, लाला लाजपत राय, पंडित मदन मोहन मालवीय जैसे समस्त स्वतंत्रता-सेनानियों ने इसे स्वतंत्रता के युद्ध का मंत्र स्वीकार किया। “प्रतिरोध से पूर्व कारावास में जाते क्रांतिकारी यही गीत गाते।” (‘वन्दे मातरम् का इतिहास’, पृ. 151)
अडिगता का उत्सव
यह गीत केवल भावात्मक नहीं, बल्कि प्रेरक-पथ-प्रदर्शक भी बना। सव्यसाची भट्टाचार्या अपने चर्चित निबंध ‘द कॉल ऑफ ट्रुथ’ में लिखते हैं – “किसी भी दमनकारी सत्ता के सम्मुख बुद्धि और स्व की स्वतन्त्रता का आग्रह ही वास्तविक स्वतंत्रता का प्रस्थान-बिंदु है। जब तक भारत यह नहीं जान लेता कि उसकी बुनियाद उसका आत्मबल है, तब तक स्वराज्य केवल स्वप्न होगा।”
ब्रिटिश सत्ता ने जहाँ इसे रोकने का प्रयास किया, वहीं “हर बार, हर सार्वजनिक सभा, हर सत्याग्रह में ‘वन्दे मातरम्’ की गूंज अंग्रेजों की नींव हिला देती थी।” सांस्कृतिक जागरण और राष्ट्रीय चेतना में इसके गूंजने के संस्कार आज भी जीवित हैं। “वन्दे मातरम् केवल स्वाधीनता का नहीं, आत्माभिमान का जयघोष है।”
‘वन्दे मातरम्‘ – एक अविरल अमृतधारा
कोई गीत, कोई मंत्र यदि राष्ट्र की माटी की गंध, उसके स्वप्न, उसके रक्त और उसके आंसुओं की भाषा बन जाता है तो वही चिरंजीवी हो जाता है। भारत का राष्ट्रगीत ‘वन्दे मातरम्’ ऋषि-मुनियों की वेदना और भावुक जनता की आस्था का संगम है। इसने अपमान के काल में गौरव का गर्जन किया, निराशा के अंधकार में आशा के दीप जलाए। यही कारण है कि ‘वन्दे मातरम्’ केवल ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सामुदायिक प्रतिरोध नहीं, संपूर्ण राष्ट्र के सांस्कृतिक पुनरुत्थान का अमर घोष बना; जिसने भारत को स्वाधीनता, आत्मबल, और राष्ट्र-चेतना की अमृतधारा से आप्लावित कर दिया।








