अयोध्या के आकाश पर रामध्वज: राष्ट्रचेतना, आस्था और सनातन पुनर्जागरण का घोष
– भोगेन्द्र पाठक, वरिष्ठ पत्रकार
अयोध्या के श्रीराम मंदिर में मार्गशीर्ष की शुक्ल पंचमी यानी विवाह पंचमी, तदनुसार 25 नवम्बर 2025 को होने वाला ध्वजारोहण केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना, धर्मनिष्ठा और सनातन संस्कृति की पुनर्पुष्टि का घोष है। यह केवल ध्वज का आरोहण नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना के आकाश पर रामनाम के स्वर्णाक्षरों का पुनर्लेखन है, जिसमें इतिहास का दीर्घ संघर्ष, वर्तमान की जागृत आस्था और भविष्य की संभावनाएँ एक ही क्षण में एकस्थ होकर उज्ज्वल दीप्ति बन उठी हैं। मंदिर के शिखर पर चढ़ने वाला केसरिया धर्मध्वज, मंदिर-निर्माण की औपचारिक पूर्णता और मर्यादा पुरुषोत्तम राम के राज्यधर्म की प्रतिष्ठा, दोनों का संयुक्त उद्घोष है। यह मानो सम्पूर्ण भारत की आकाशरेखा पर उत्कीर्ण घोषणा है कि यह भूमि पुनः राम के नाम, राम के गुण और राम के आदर्शों को अपना ध्रुवतारा मानती है। इस ध्वज पर उदित सूर्य, ‘ॐ’ और कोविदार वृक्ष जैसे प्रतीक अंकित हैं। ये तेजस्विता, आध्यात्मिकता और शाश्वत जीवन-मूल्यों की हरित चेतना का दिग्दर्शन कराते हैं। यह ध्वज किसी राजनीतिक सत्ता का नहीं बल्कि धर्म, सत्य और कर्तव्यबोध का ध्वज है, जिसे राष्ट्र के निर्वाचित नेतृत्व द्वारा आरोहित किया गया है।

साभार: फ्री प्रेस जरनल
यह ध्वजारोहन उस दीर्घ संघर्ष का प्रतीक भी है, जिसमें रामलला की जन्मभूमि को न्यायिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर पुनर्स्थापित कर राष्ट्र के समक्ष एक नवीन आदर्श प्रस्तुत किया गया। यह दृश्य स्मरण कराता है कि ध्वज केवल आकाश में नहीं फहरता, वह मानव-हृदय की ऊर्ध्वगामी इच्छाओं में भी लहराता है, जहाँ यह मंत्र सजीव हो उठता है – “धर्मो रक्षति रक्षितः” अर्थात् जो धर्म की रक्षा करे, धर्म उसकी रक्षा करता है। राम मंदिर के पूर्णता–अवसर पर आयोजित यह ध्वजारोहण भारत के भविष्य के लिए भी एक सांस्कृतिक घोषणापत्र जैसा है। यह बताता है कि आधुनिक भारत अपनी प्रगति के रथ को विज्ञान, तकनीक और विकास की तेज गति से आगे बढ़ाना चाहता है, पर उस रथ के ध्वज पर अंकित चिन्ह आज भी राम हैं, सीता हैं, धर्म है, करुणा है, न्याय है; अर्थात् प्रगति की दिशा चाहे जितनी नवीन हो, उसकी दिशा-सूचक धुरी अब भी सनातन मूल्यों की ओर ही संकेत करती है। आज अयोध्या के आकाश में फहराता यह ध्वज, प्रभु श्रीराम और माता सीता स्वरूप दिव्य दम्पत्ति के जीवन से निकलने वाले संदेशों – धैर्य, त्याग, निष्ठा, समर्पण और मर्यादा को आधुनिक गृहस्थ की दहलीज तक पहुँचा देने वाली आध्यात्मिक आराधना है। “रामो विग्रहवान् धर्मः” और “सीता धर्मपत्नी साक्षात् लक्ष्मीस्वरूपिणी” का तात्पर्य है – राम धर्म के साकार रूप हैं और सीता स्वयं धर्मसंगिनी लक्ष्मी की प्रतिरूपा। शास्त्र कहते हैं कि जिन घरों की छतों पर राम और सीता के गुणों का ध्वज नहीं फहरता, वे केवल मकान हैं, गृह नहीं।
राम मंदिर का स्थापत्य और शिल्प-माधुर्य
अयोध्या का यह मंदिर नागर शैली की भारतीय मंदिर-वास्तु परम्परा का अद्भुत और सुविचारित पुनर्जागरण है। इसकी लंबाई लगभग 380 फुट, चौड़ाई 250 फुट और ऊंचाई लगभग 161 फुट रखी गई है। इस त्रि-तल मंदिर में 392 से अधिक स्तंभ और अनेक द्वार हैं, जो भारतीय शिल्पशास्त्र, शिल्प-सूक्ष्मता और अलंकरण-परम्परा का सजीव भव्य भौतिक प्रतीक हैं। मुख्य गर्भगृह 20×20 फुट के अनुपात में निर्मित है और इसे शिखर की सम्पूर्ण ऊंचाई के नीचे ऐसे नियोजित किया गया है कि भक्त को प्रवेश करते ही ऊर्ध्वगामी, अलौकिक विस्तार का अनुभव हो। पत्थर पर की गई नक्काशी, मंडप, रंगमंडप, नृत्यमंडप आदि की संरचना तथा विशाल परिधि-दीवारें, समूचे परिसर को दिव्यता और गरिमा की एकल लय में बाँध देती हैं।

एआई इमेज: श्रीराम मंदिर अयोध्या
इतिहास, पुराण और दीर्घ संघर्ष की स्मृति
श्रीराम जन्मभूमि का यह स्थल केवल पुराणों और रामायण में वर्णित अवतार-स्थली ही नहीं, बल्कि कई सदियों के संघर्ष, अपमान, प्रतिरोध और पुनरुद्धार की गाथा का केंद्र भी है। 16वीं शताब्दी में निर्मित बाबरी संरचना से लेकर आधुनिक काल तक चले विवाद, आंदोलनों और न्यायालयीन संघर्षों में असंख्य पीढ़ियों ने अपनी आस्था, आशा और संघर्ष का निवेश किया। 2019 में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय ने 2.77 एकड़ विवादित भूमि को रामलला के अधिकार में देकर इस पंचशतकीय विवाद का शांतिपूर्ण समाधान किया तथा साथ ही मस्जिद के लिए वैकल्पिक भूमि का प्रावधान कर संवाद और संतुलन का मार्ग प्रशस्त किया। इसके पश्चात गठित ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ ट्रस्ट द्वारा मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ, जो आज ध्वजारोहण के रूप में अपने एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुँचा है।
धर्म, आध्यात्म और आस्था की अंतर्धारा
राम मंदिर केवल किसी एक संप्रदाय का पूजास्थल नहीं, बल्कि धर्म के उस व्यापक अर्थ का प्रतीक है जिसमें सत्य, करुणा, न्याय, सेवा और आत्मसंयम समाहित हैं। श्रीराम की बालरूप मूर्ति – रामलला – गर्भगृह में विराजमान होकर भक्त को स्मरण कराती है कि ईश्वर का निवास वहीं स्थायी है जहाँ विनम्रता, करुणा और निष्काम भक्ति हो। यह मंदिर, अपने विस्तृत प्रांगण और सतत होने वाले वैदिक मंत्रोच्चार के साथ, आधुनिक मनुष्य की विभाजित, व्यग्र और प्रतिस्पर्धी मानसिकता को धीरज, शांति और आत्मानुशासन की दिशा में मोड़ने का एक आध्यात्मिक केंद्र बन सकता है। यहाँ की आरती, परिक्रमा और दर्शन केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर बैठे ‘रामत्व’ से मिलने का अभ्यास हैं।
कर्तव्यबोध, राष्ट्रधर्म और देशभक्ति
अयोध्या के इस मंदिर पर फहराता धर्मध्वज, केवल मंदिर-शिखर पर ही नहीं, राष्ट्र के अंतःकरण में भी कर्तव्य का एक अदृश्य ध्वज प्रतिष्ठित करता है कि राम को मानना हो तो उनके जैसा आचरण भी अपनाना होगा। राम का जीवन सत्य के लिए संघर्ष, वचन के लिए अपना सब कुछ त्याग देना और प्रजा के हित के लिए व्यक्तिगत सुखों का विलोप है; यही आदर्श आधुनिक भारत के नागरिक-धर्म की कसौटी बन सकते हैं। यह मंदिर उन असंख्य कारसेवकों, साधु-संतों और सामान्य नागरिकों के बलिदान की स्मृति भी है, जिन्होंने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस आंदोलन में अपना योगदान दिया। इस प्रकार राम मंदिर, देशभक्ति और धर्मनिष्ठा दोनों का संयुक्त तीर्थ बनकर उभरता है, जहाँ राष्ट्रचेतना और आध्यात्मिकता परस्पर विगलित होकर एकाकार हो जाती हैं।
स्थापत्य और सनातन संस्कृति का पुनर्जागरण

3D फोटो नागर शैली, श्रीराम मंदिर
मंदिर का पूर्ण परिसर लगभग 70-71 एकड़ क्षेत्र में नियोजित है, जिसमें से अधिकांश भाग हरित क्षेत्र के रूप में रखा गया है। यह संदेश देता हो कि सनातन संस्कृति के प्राण केवल पत्थर की दीवारों में नहीं, प्रकृति के साथ सामंजस्य में भी बसते हैं। भारतीय नागर शैली पर आधारित यह मंदिर, शिल्पशास्त्र और वास्तुशास्त्र के प्राचीन सूत्रों को आधुनिक इंजीनियरिंग के साथ जोड़कर एक जीवंत सेतु बन गया है। सैकड़ों स्तंभों, कलात्मक तोरणों और अलंकृत दीवारों पर अंकित रूपांकनों में रामकथा, लोककला और शास्त्रीय सौंदर्य का संगम दिखाई देता है, जो भविष्य की स्थापत्य पीढ़ियों के लिए आदर्श पाठ बन सकता है। यह केवल एक भवन नहीं, बल्कि भारतीय कला-संस्कृति के पुनर्जन्म का घोष-पत्र है, जो अपने मौन में भी एक महाकाव्य सुनाता है।
भारत का भविष्य और वैश्विक संदेश
राम मंदिर के शीर्ष पर ध्वजारोहण भारत के लिए केवल घरेलू धार्मिक अनुष्छान नहीं, बल्कि दुनिया के सामने एक सांस्कृतिक घोषणा है कि यह राष्ट्र अपनी जड़ों की ओर लौटते हुए भी आधुनिकता से विरोध नहीं रखता। ‘रामराज्य’ की अवधारणा से प्रसूत न्याय, सुशासन, जनकल्याण और नीतिपरायण नेतृत्व आदि भारत के लोकतांत्रिक भविष्य के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत हैं।
आध्यात्मिक पर्यटन, सांस्कृतिक अध्ययन, रामराज्य के दर्शन, प्रजार्पित सत्ता-शासन, कला, संगीत, नाटक, जीवन दर्शन और तुलनात्मक धर्मचर्चा का अंतरराष्ट्रीय केंद्र बनने की क्षमता रखती है अयोध्या। अयोध्या की भव्यता-दिऴ्यता से स्थानीय अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत की सॉफ्ट पावर भी सुदृढ़ होगी। इस दृष्टि से राम मंदिर केवल स्मृति का नहीं, संभावनाओं का भी धाम है। अयोध्या का श्रीराम मंदिर, अपने शिखर पर फहराते केसरिया ध्वज के साथ, पत्थर में अंकित आस्था, इतिहास में संचित संघर्ष और भविष्य में अंकुरित होने वाली राष्ट्र-चेतना का अद्वितीय संगम बनकर खड़ा है। युगों से लोकमय रामकथा आज नए स्वर में कह रही है कि भारत का हृदय रामनाम की धड़कन से सदा संचालित रहेगा।
आस्था, समरसता और सनातन की रक्षा
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में मंदिर और मस्जिद दोनों के लिए व्यवस्था की गई। यह तथ्य इस बात का संकेत है कि सनातन संस्कृति का आदर्श केवल ‘विजय’ नहीं, ‘समरस समाधान’ भी है। अयोध्या का श्रीराम मंदिर न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण समाधान की मिसाल है। यह भारतीय बहुलतावाद, सहअस्तित्व और संवाद की संस्कृति को और भी प्रतिष्ठित करेगा।
श्रीराम मंदिर ध्वजारोहण सनातन संस्कृति की रक्षा को बाहरी संघर्ष से अधिक आंतरिक साधना से जोड़कर देखता है। अपने भीतर के काम, क्रोध, लोभ और अहंकार पर विजय पाना ही, वास्तव में ‘अयोध्या’ को अपने हृदय में बसाना है। अपने छोटे-से जीवन में सत्य, मर्यादा और सेवा को स्थापित करना भी इस धर्मध्वज की स्थापना वास्तविक में अपने जीवन में भी करना है।









