वंदे मातरम्: जब एक गीत ने ब्रिटिश साम्राज्य को थरथराय
भारत की शताब्दियों पुरानी संस्कृति में सदैव एक न एक दीपक जलता रहा है। उसे ही कहते हैं राष्ट्र-चेतना। परंतु जब यह दीपक गीत बनकर देशभक्ति के स्वर में सामने आया, तब ब्रिटिश शासकों के हृदय में वह भय की लपट बन उठा। यह गीत था बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की वह अमर रचना ‘वंदे मातरम्’, जिसने केवल शब्द नहीं थे, अपितु एक सम्पूर्ण राष्ट्र की आत्मा को जागृत हो गई थी। बंकिम ने यह गीत अपने उपन्यास ‘आनंदमठ’ में समाविष्ट कर दिया, जहाँ दृढ़ संकल्पित सन्यासियों की भारत माता से अपार प्रेम की राष्ट्रप्रवण भक्तिपूर्ण गाथा विश्लेषित हुई थी। यहाँ यह गीत एक आह्वान के रूप में, एक जीवन-धारा के स्वरूप में अभिव्यक्त हुई थी। यह गीत ‘आनंदमठ’ के वीर सन्यासियों के हृदयों से निकलकर भारत के समस्त ह्रदयों में समाहित हो गई थी।
ब्रिटिश साम्राज्य के लिए यह गीत केवल गीतात्मक रचना नहीं थी, वरन् एक विद्रोह की पुकार थी। बंगाल विभाजन की घड़ी में अर्थात् सन् 1905 में इसका शक्ति-प्रदर्शन हुआ, जब कोलकाता टाउन हॉल में हजारों मातृभूमि के प्रेमियों ने ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष किया। ब्रिटिश सरकार ने इस पर घोर प्रतिक्रिया की, दमनकारी आदेश दिए और इस गीत को सार्वजनिक स्थलों, स्कूल-कॉलेजों और जनता के बीच गाने-सुनाने से रोक दिया। उस समय लॉर्ड कर्जन देश के शासन का मुखिया था, जिसने तुरंत आदेश पारित किया कि जो कोई भी ‘वंदे मातरम्’ गाएगा उसे गिरफ्तार किया जाएगा। इसके बाद पूरे भारत में पुलिस नाकेबंदी, छात्र-छात्राओं पर निरीक्षण और विरोध करने वालों पर पिटाई की घटनाएँ हुईं। यह विरोध केवल दिल्ली या कोलकाता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि गाँव-गाँव तक फैल गया। 1906 में बरिसाल में एक सम्मेलन में पुलिस लाठीचार्ज कर आयोजन को कुचला गया। 1908 में बेलगाम में छात्रों को दंडित किया गया। तिरुपुर में तिरुपुर कुमारन ने ‘वंदे मातरम्’ का जयघोष करते हुए पुलिस की मार सहन की और वीरगति को प्राप्त हो गए।
परंतु इस दमन से देशवासियों के हृदय में देशभक्ति का भाव और प्रज्ज्वलित हो गया। दमनकारी उपायों के फलस्वरूप ये गीत और अधिक जन-जन तक पहुंचा, और जन-मन में जोश भरता ही गया। बंकिम ने अंग्रेजी सत्ता के विरोध में निरंतर संघर्ष किया। उन्होंने अपने लेखन और संस्मरणों के माध्यम से भारतीयों की जागृति का आह्वान जारी रखा। अपनी भाषाओं और भावों में भारतीयों को स्वाधीनता के लिए प्रोत्साहित किया। उनकी कलम ने अंग्रेजों की अस्मिता और भेदभाव को तेजी से जन-जन तक पफैलाया। वे जानते थे कि केवल राष्ट्रीय गीत से राष्ट्र का उद्धार संभव नहीं हो सकता; परंतु उस गीत ने राष्ट्र को संयोजित करने, मानसिक एकता से बंधाने का कार्य अप्रतिम कार्य किया। उनका विश्वास अटल था कि भारत की माटी के प्रति श्रद्धा भारत को स्वतंत्रता की ओर अग्रसर करेगी।
इस प्रकार, बंकिमचंद्र की रचना ‘वंदे मातरम्’ जिसका विरोध अंग्रेजों ने दमन के रूप में किया, वह भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक अमिट आधार बनी। उपन्यास ‘आनंदमठ’ में समाहित यह गीत आज भी भारतीय हृदय की धड़कन है और राष्ट्र की प्राणधारा बनी हुई है। बंकिम ने इस गीत के माध्यम से अंग्रेजों के विरुद्ध आवाज उठायी और अपनी जीवन-प्रतिज्ञा को अमर किया। ‘वंदे मातरम्’ हमारा परम सम्मानित अमर राष्ट्रगीत है
वन्दे मातरम्!








