बोधगया में भारत-श्रीलंका सैन्य सहयोग का नया अध्याय
बिहार के बोधगया में भारत और श्रीलंका के बीच सीमा सुरक्षा, संस्कृति, अध्यात्म और कूटनीति पर वार्ता संपन्न हो गई। यहां 18 से 20 नवंबर 2025 तक भारत-श्रीलंका आर्मी-टू-आर्मी स्टाफ टॉक्स (AAST) का 11वां दौर संपन्न हो गया। यह बैठक श्रीलंका के छह सदस्ययों की अगुवाई में हुई। बैठक के दौरान दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय रक्षा सहयोग को मजबूत करने पर जोर दिया गया।
बिहार की पवित्र धरती बोधगया में धीमी हवाओं के झोंके और महाबोधि मंदिर की घंटियों की मधुर ध्वनि के बीच मोहक वातावरण में एक आत्मिक शांति तैरती नजर आई, जैसे इतिहास किसी नए अध्याय का स्वागत कर रहा हो। बोधिवृक्ष की फैलती शाखाओं के नीचे बुद्ध की करुणा की अनुगूँज सदियों से लोकमंगल कर रही है। भारत और श्रीलंका के सैनिक एक साथ इस पवित्र स्थल पर उपस्थित हुए और एक नया इतिहास लिखना आरम्भ कर दिया।

दोनों देशों के बीच तीन दिनों तक एक नए संकल्प और आपसी सहयोग पर गहन चर्चा हुई। बोधगया की ये बैठक संस्कृति, अध्यात्म और कूटनीति के साथ-साथ आपसी सहयोग के लिए संयोजित हुआ था। इसकी उफादेयता इस बात से स्तुत्य हो गई क्योंकि यहाँ सैन्य शक्ति भी शांति के आगे नतमस्तक दिखाई दे रही थी। कार्यक्रम में सबसे पहले दोनों देशों के कों ने जब एक-दूसरे का अभिवादन किया। इसके बाद सैनिकों के मन में सीमाओं की रक्षा और आपसी सहयोग के दृढ़ संकल्प दिखाई दे रहे थे।
भारत और श्रीलंका का रिश्ता केवल भूगोल का रिश्ता नहीं है; यह समुद्रों, यात्राओं, ग्रंथों, और हजारों वर्षों की आध्यात्मिक परंपराओं से बुना हुआ सांस्कृतिक ताना-बाना है। बुद्ध के ज्ञान से लेकर अशोक के धर्म-दूतों तक, संघर्षों के समय की कूटनीति से लेकर आधुनिक सुरक्षा सहयोग तक, दोनों देश हर युग में एक-दूसरे के साथ प्राय़ः खड़े रहे हैं। बोधगया में दोनों देशों की सेनाओं का यह संयुक्त संकल्प उसी ऐतिहासिक धारा की अगली कड़ी थी।
महाबोधि मंदिर के प्रांगण में आयोजित इस विशेष समारोह में भारतीय सेना के प्रतिनिधियों ने श्रीलंका के अधिकारियों का पारंपरिक वस्त्र और ‘मिथला पेंटिंग’ से स्वागत किया। प्रत्युत्तर में श्रीलंकाई सैनिकों ने ‘कंदीयन ड्रम्स’ की धीमी लय के बीच अपनी सांस्कृतिक परंपरा का प्रदर्शन किया। यह दृश्य केवल दो सेनाओं के बीच मैत्री का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि दक्षिण एशिया की साझा सांस्कृति की नई पहचान का उत्सव था।
साथ ही दोनों सेना-प्रतिनिधियों ने बोधिवृक्ष के नीचे संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित किया। यह दीप केवल मित्रता का प्रतीक नहीं था, बल्कि शांति, सुरक्षा और समृद्धि सहयोग का संकल्प था। भारत और श्रीलंका ने ये संकल्प लिया कि दोनों मिलकर क्षेत्रीय शांति, समुद्री सुरक्षा, सीमा सुरक्षा और मानवीय सहायता में अपनी भूमिका निभाते रहेंगे।
यहां एक अनोखा नजारा देखने को मिला जब दीपक की लौ हिल रही थी, पर बुझ नहीं रही थी; मानो कह रही हो कि सदियों जैसा यह संबंध समय की कसौटी पर बार–बार खरा उतरेगा।
इसके बाद सैनिकों ने बोधगया के ऐतिहासिक मार्गों पर एक संयुक्त ‘पीस वॉक’ किया। राह में स्थानीय ग्रामीणों ने पुष्पवर्षा की, बच्चों ने झंडियाँ लहराईं और विदेशी पर्यटकों ने कैमरों में इस अद्भुत क्षण को कैद किया। यह केवल एक कूटनीतिक गतिविधि नहीं थी। यह लोगों के दिलों को जोड़ने वाला सांस्कृतिक संवाद था।

कार्यक्रम के अंत में दोनों देशों की सेनाओं ने घोषणा की कि वे आतंकवाद निरोधी सहयोग, समुद्री सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और प्रशिक्षण के क्षेत्र में नई योजनाओं पर साथ मिलकर काम करेंगें। लेकिन इन घोषणाओं की औपचारिकता से कहीं अधिक प्रभावशाली वह भावनात्मक क्षण था – जब एक भारतीय सैनिक ने कहा- “हम अलग देश हैं, पर हमारी जड़ें एक ही पेड़ की शाखाएँ हैं।”
बोधगया की पवित्र भूमि एक बार फिर साक्षी बनी भारत-श्रीलंका के आत्मिक संबंध के। दोनों देशों के बीच भगवान बुद्ध की करुणा और उनके उपदेश का प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित हुआ। दोनों देशों ने दुनिया को यह संदेश दिया कि “शक्ति तब सबसे सुंदर होती है जब वह शांति की रक्षक बनती है।”








