भारत-नेपाल की साझा विरासत को सहेजता जौलजीबी मेला
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जनपद में हर वर्ष 14 नवम्बर से 25 नवम्बर के बीच जौलजीवी मेले का आयोजन होता है। काली और गोरी नदियों के पवित्र संगम पर हर साल लगने वाला यह मेला एक बार फिर जीवंत हो उठा है। सदियों पुराना यह मेला सिर्फ़ व्यापारिक आदान–प्रदान का अवसर नहीं, बल्कि भारत–नेपाल की साझी संस्कृति, विश्वास और बंधुत्व को भी बढावा देता है। दोनों देशों के व्यापारी एक ही मैदान में अपने उत्पाद बेचते हैं—नेपाल के ऊनी परिधान, चाय, हस्तशिल्प और मसाले भारतीय ग्राहकों को बांध लेते हैं, जबकि भारत के फल, मसाले, बनावटदार कपड़े और घरेलू सामान नेपाली व्यापारियों और पर्यटकों का ध्यान खींचते हैं। यह व्यापारिक संवाद दोनों देशों के लोगों को जोड़ता है और सीमांत क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है।
मेले के इतिहास के बारे में लोगों का मानना है कि इसकी शुरुआत पाल ताल्लुकदार स्व. गजेन्द्रबहादुर पाल ने की थी, जिन्होंने यह मेला सन् 1914 में प्रारम्भ किया। यद्यपि उस समय यह मेला धार्मिक दृष्टिकोण से ही प्रारम्भ हुआ था परन्तु धीरे-धीरे इसका स्वरुप व्यवसायिक हो गया। स्व. गजेन्द्रबहादुर पाल कुमाऊँ की अस्कोट रियासत के ताल्लुकदार थे। अस्कोट के पाल राजाओं ने ही यहाँ जैलेश्वर महादेव तथा अन्नपूर्णा देवी के मन्दिरों की स्थापना की थी।
जौलजीव नाम का कस्बा श्री कैलाश-मानसरोवर के प्राचीन यात्रा मार्ग पर बसा है। जौलजीवी में काली-गौरी नदियों का संगम है और शिवजी का प्राचीन मंदिर भी स्थित है। जो स्कन्दपुराण में भी वर्णित है। शायद इसलिए ही मार्गशीर्ष महीने की संक्रान्ति को मेले का शुभारम्भ भी संगम स्नान से होता है। इसके पश्चात् महादेव की पूजा-अर्चना की जाती है।

जौलजीबी मेले में सांस्कृतिक आयोजन
स्वतंत्रता के बाद चीनी आक्रमण से पहले तक यह मेला उत्तर भारत का सबसे प्रसिद्ध व्यापारिक मेला था तथा मेले में तिब्बत और नेपाल के व्यापारियों की सक्रिय भागीदारी होती थी। इस मेले में नेपाल के जुमली डोटी के व्यापारी सबसे अधिक आते थे। तब उत्तर प्रदेश के ही नहीं कोलकाता के व्यापारी भी माल खरीदने के लिए पहुँचते थे।
जौलजीबी का मेला हिमालयी परंपराओं के सबसे खूबसूरत रूपों में से एक है, जहाँ रंग-बिरंगी पहाड़ी पोशाकें, लोकगीतों की मधुर धुनें और जनजातीय नृत्यों की गूँज वातावरण को उत्सवमय बना देती है। मेले में लगने वाले स्टॉल इसकी सबसे अहम पहचान हैं। ऊनी वस्त्रों की गर्माहट—जैसे पांघरू, पाखी, शाल और स्वेटर—हर आगंतुक को ठंडी पहाड़ी हवाओं से सुरक्षा का कराते हैं। वहीं दूसरी ओर, हिमालयी जड़ी-बूटियों की सुगंध से महकते स्टॉल इस क्षेत्र की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति का परिचय कराते हैं। स्थानीय महिलाएँ अपने हाथों से तैयार किए गए उत्पादों—कढ़ाईदार टोपी, हस्तनिर्मित गहने, लोककथाओं से प्रेरित सजावटी सामान—बेचकर न केवल अपने परिवार की आर्थिकी में योगदान देती हैं, बल्कि पहाड़ी कला को जीवित भी रखती हैं।
जौहार, दारमा, व्यास, चौंदास घाटी के स्थानीय ऊनी माल के लिए तो इस मेले का विशेष रुप से इंतजार किया जाता था। तब तक गौरी और काली नदियों पर पुल भी नहीं होते थे। इसलिए अस्कोट के राजाओं द्वारा गोरी नदी पर कच्चा पुल बनाया जाता तो नेपाल की ओर से भी काली नदी पर पुल डाला जाता था।
जौलजीवी मेले के व्यापारिक महत्व को देखते हुए तिब्बती व शौका व्यापारी सांभर, खाल, चँवर, पूँछ, कस्तूरी, जड़ी-बूटियों को लेकर आने लगे। कपड़ा, नमक, तेल, गुड़, हल, निंगाल के बने डोके, काष्ठ उपकरण-बर्तन आदि यहाँ प्रचुर मात्रा में बिकते थे । उस समय यह क्षेत्र सड़कों और आवागमन की दृष्टि से दुरुह था। जौलजीवी तक सड़क भी नहीं पहुँचती थी। इसलिए नेपाल-तिब्बत का भी यही सबसे प्रमुख व्यापारिक स्थल बन गया। अपनी जरुरतें पूरी करने के लिए आसपास के इलाके इसी मेले पर निर्भर हो गये थे।

चित्र: काली और गोरी नदी सा संगम
जौलजीबी मेला सिर्फ़ खरीद–फरोख्त या मनोरंजन का केन्द्र नहीं, बल्कि सामाजिक रिश्तों की भी अमूल्य कड़ी है। दूर–दूर के गांवों से लोग अपने परिवारों, रिश्तेदारों और मित्रों से मिलने आते हैं। कई परिवार इस मेले को वार्षिक मिलन–स्थल की तरह मानते हैं।
वास्तव में, जौलजीबी मेला सीमावर्ती सभ्यता की आत्मा है—जहाँ परंपरा, प्रकृति, व्यापार और मित्रता एक ही धारा में बहती दिखाई देती हैं। काली और गोरी नदियों की तरह यह मेला भी दो देशों की सांस्कृतिक लहरों को मिलाकर एक ऐसे प्रवाह में बदल देता है, जो पीढ़ियों से बहता आया है और आगे भी बहता रहेगा








