वन्दे मातरम्: भारत की आत्मचेतना
कभी-कभी इतिहास ऐसे विलक्षण क्षणों से गुजरता है, जहाँ एक कलम की नोक, एक विचार की चमक और एक शब्द का स्पर्श समूचे राष्ट्र को झकझोर कर उठा देता है। ऐसा ही एक ऐतिहासिक क्षण तब उदित हुआ, जब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की लेखनी से ‘वन्दे मातरम्’ जैसा अमर गीत प्रस्फुटित हुआ। मंत्र-तुल्य यह गीत केवल साहित्य की अनुपम कृति नहीं, बल्कि भारत की आत्मचेतना का सजीव प्रतीक बनकर उभरा। यह एक ऐसी अनंत गूंज बन गई जिसका प्रभाव आज डेढ़ सदी बाद भी क्षीण नहीं, वरन् और अधिक प्रखर हो गया है।
परंतु यह प्रश्न सदैव से मन को उद्वेलित करता रहा है कि क्यों लिखा बंकिम ने यह गीत? क्यों उसे अपने उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया? और सबसे महत्वपूर्ण, क्यों बंकिम ने भारत को ‘माँ’ कहा? इस संदर्भ में कुछ अनुपमेय तथ्य द्रष्टव्य हैं –
बंकिम का युग – विषपान और पुनर्जन्म
19वीं शताब्दी का भारत एक ऐसे समय की धरातल पर उद्विग्न था जब राष्ट्र की आत्मा पराधीनता की लौह-शृंखलाओं में कसकर बांध दी गई थी। ब्रिटिश साम्राज्य अपनी कठोर प्रशासनिक मशीनरी से भारतीय चेतना को कुचलने में लगा था। बंगाल, जो कभी भारत के सांस्कृतिक गर्व का ध्रुवतारा था, अब एक औपनिवेशिक प्रांत की उदासी में ढला पड़ा था। इसी वातावरण में, 1838 में कंथलपाड़ा गाँव में एक बालक ने जन्म लिया जिन्हें हम बंकिमचंद्र के नाम से जानते हैं। उसके परिवार की शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं थी; वह थी राष्ट्र–स्मृति, गौरव–भाव और प्राचीन अस्मिता की सजीव परंपरा। जैसे–जैसे बंकिम बड़े हुए, उन्होंने देखा कि भारत का इतिहास ब्रिटिश लेखन के माध्यम से विकृत हो रहा है, संस्कृति को पिछड़ा और अवैज्ञानिक कहकर नीचा दिखाया जा रहा है। यह अपमान उनके हृदय को विदीर्ण करता था। तभी उनकी कलम उठी – आक्रोश से, करुणा से, और राष्ट्र की गौरवभूमि को पुनर्जीवित करने के संकल्प से; और यहीं प्रस्फुटित हुआ राष्ट्र-चेतना का यह अनुपम मंत्र ‘वन्दे मातरम्’। इसके पीछे केवल भावुकता नहीं; बल्कि पुनर्जागरण, आत्माभिमान और राष्ट्र-चेतना की ज्वलंत अग्नि भी है।
भारत को ‘माँ’ क्यों कहा बंकिम ने? इसके पीछे दर्शन और भावना का संगम है। बंकिमचंद्र ने भारत को ‘माँ’ इसलिए कहा क्योंकि उनके भीतर यह अनुभूति जाग उठी थी कि मातृत्व से बड़ा कोई भाव-प्रेरण नहीं हो सकता है। भारतीय धर्मदर्शन में भूमि स्वयं माता हैं। इसलिए अथर्ववेद के बारहवें काण्ड में कहा गया है – “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।” रामायण का यह वाक्य है – “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”। यह मातृभाव उन्हें तीव्रता से उद्वेलित करता था। बंकिम के लिए राष्ट्र को ‘माँ’ कहना केवल काव्यात्मक अलंकार नहीं था। यह भारतीय दर्शन की जड़ से निकला हुआ सत्य था। वे जानते थे कि मातृत्व से अधिक पवित्र, अधिक प्रेरक, अधिक बाध्यकारी कोई भावना नहीं। बंकिम ने इस वेदांत को आधुनिक राष्ट्रचेतना में रूपांतरित किया। उनका मत था कि यदि हर भारतीय अपनी भूमि को माँ के रूप में देखेगा, तो कोई भी शक्ति उसे दास नहीं बना सकती। माता की रक्षा केवल कर्तव्य नहीं; यह धर्म है, तप है, पूजा है। यह केवल राजनीतिक कर्तव्य नहीं, बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक साधना है। वे समझ गए कि राष्ट्र को माँ के रूप में प्रतिष्ठित करने से भारतीय हृदय में स्वाभिमान की ज्योति फिर से प्रज्वलित होगी। इस रूप में ‘माँ’ का अर्थ केवल ममता नहीं, वह शक्ति भी है, वह रक्षक भी है। यही माँ काली का दर्शन है – कोमलता और प्रचंडता का दिव्य संतुलन। माँ केवल पोषण करने वाली नहीं होती हैं। जब समय आता है तो वह दुर्गा बनकर संतानों की रक्षा भी करती है। कोमलता और बल का यही द्वैत भारत माँ की संपूर्ण छवि है।

सन् 1882 में बंकिमचंद्र की महान कृति ‘आनंदमठ’ प्रकाशित हुई, तब मानो भारत की निद्रित चेतना पर एक तेजस्वी प्रभात उदित हो गया था। यह मात्र एक उपन्यास नहीं था; यह तो एक राष्ट्र-जागरण का परम प्रेरक घोषणा-पत्र था। इसकी पृष्ठभूमि में 1770 का भीषण अकाल, पराधीनता की व्यथा और 18वीं शताब्दी का संन्यासी विद्रोह प्रमुख तत्व थे। उस कालखण्ड में संन्यासी, तपस्वी, विरक्त योद्धा भारतमाता को अंग्रेजी सत्ता से मुक्त करने के लिए हिमालय-सा संकल्प लेकर उठ खड़े हुए थे।
‘वन्दे मातरम्’ की रचना हुई एक प्रार्थना के रूप में, प्रतिज्ञा के रूप में, लेकिन देखते-देखते यह गीत भारतीय राष्ट्रवाद की आध्यात्मिक ध्वनि भी बन गया। ‘आनंदमठ’ प्रकाशित होते ही ‘वन्दे मातरम्’ का स्वर जन-मन में फैल गया। 1905 का स्वदेशी आंदोलन आते-आते ‘वन्दे मातरम्’ राष्ट्र का घोष बन चुका था। अरविंद घोष, बिपिन चंद्र पाल, क्रांतिकारी दल, मजदूर – सब इसका गायन करते हुए राष्ट्र-पथ पर निकल पड़े। बंकिम का यह गीत केवल साहित्य नहीं, भारत की आत्मा का अमर स्वर बन गया।
‘आनंदमठ’ की वास्तविक ऊर्जा उसके दर्शन में है। बंकिम ने एक ऐसे ‘आनंद के मठ’ की कल्पना की, जहाँ संतान कहलाने वाले संन्यासी मातृभूमि की रक्षा के लिए तपस्या, युद्ध, त्याग – सब कुछ अर्पित करते हैं। इसी पवित्र वातावरण में बंकिम ने ‘वन्दे मातरम्’ को स्थान दिया। क्यों? क्योंकि इन संन्यासियों के लिए मातृभूमि कोई भू-भाग नहीं, वह देवी थी, पूजा थी, आराधना थी। और जब उनकी पूजा होती थी, तो गूंजता था – ‘वन्दे मातरम्’।
बंकिम जानते थे कि भारतीय राष्ट्रवाद पश्चिमी राजनीति की देन नहीं हो सकता; उसे भारतीय आध्यात्मिकता की जड़ चाहिए। इसीलिए ‘वन्दे मातरम्’ केवल गीत नहीं – राष्ट्र-भक्ति का मंत्र बना। ‘आनंदमठ’ प्रकाशित होते ही यह मंत्र वायु की तरह फैल गया। बंगाल से भारत, भारत से जनमानस तक। 1905 के स्वदेशी आंदोलन में यह गीत राष्ट्रगान बन गया। क्रांतिकारी इसे गाते थे, मजदूर इसे गाते थे, छात्र इसे गाते थे। 1906 में अरविंद घोष और बिपिन चंद्र पाल ने ‘बंदे मातरम्’ नामक पत्र निकाला, तो यह शब्द राजनीतिक क्रांति का ध्वज बन गया। यह गीत देशभक्तों की आवाज़, युवाओं का प्रण और क्रांतिकारियों की शपथ बना। बंकिम की कलम का एक गीत धीरे-धीरे एक पूरे राष्ट्र का धड़कता हृदय बन गया।
अधिराष्ट्रगीत से राष्ट्रगीत तक
1950 में गणराज्य बनने के साथ ही ‘वन्दे मातरम्’ गीत के केवल पहले दो पदों को ही राष्ट्रगीत की गरिमा प्रदान किया। फिर भी यह केवल इस गीत का सम्मान नहीं था; यह भारत के हृदय में बसी उस चिरंतन चेतना का सम्मान था जिसे बंकिम ने स्वर दिया था। बंकिम ने माता के रूप में ‘वन्दे मातरम्’ में गणेश की बुद्धि, दुर्गा की शक्ति और काली की प्रचंडता को एक साथ प्रतिष्ठित किया। इसी कारण यह गीत ममता और महिमा के साथ-साथ सौंदर्य और वीरता का अनुपम संगम बन गया।
बंकिम का धर्म और राष्ट्र
बंकिम के अनुसार राष्ट्र-धर्म कोई राजनीतिक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक पवित्र दायित्व है। उनकी दृष्टि में राष्ट्र-धर्म राजनीति से कहीं ऊपर, एक आध्यात्मिक संकल्प था। जो व्यक्ति मातृभूमि की सेवा से विमुख हो, वह धर्म से भी विमुख है; और जो राष्ट्र की रक्षा में प्राण अर्पित करे, वही धर्म के वास्तविक पथ पर है। यह विचार युग-परिवर्तक था, क्योंकि इसने पश्चिम के अधिकार-प्रधान राष्ट्रवाद को भारत की समर्पण-प्रधान चेतना में रूपांतरित कर दिया। यह विचार उस समय अत्यंत क्रांतिकारी हो गया था, क्योंकि यह पश्चिमी राष्ट्रवाद के अधिकार-केंद्रित तर्क को भारतीय समर्पण और सामूहिक चेतना में रूपांतरित करता था, अहंकार को त्याग में बदल देता था। इसलिए लोकमान्य तिलक ने ‘वन्दे मातरम्’ को जल, जंगल और जमीन की लड़ाई का मन्त्र बनाया; सुभाषचंद्र बोस ने इसे आज़ाद हिंद फौज की आत्मा बना दिया। यहाँ तक कि महात्मा गांधी भी, अहिंसा के दूत होते हुए, इस गीत के तेज को नमन करते थे। संदेश स्पष्ट था कि यह गीत हर भारतीय को एक सूत्र में बाँधने में स्तुत्य भूमिका निभाई।
समसामयिक प्रासंगिकता
21वीं सदी का भारत जब वैश्विक मंच पर एक महाशक्ति का रूप धारण कर रहा है, तब ‘वन्दे मातरम्’ का शाश्वत संदेश और अधिक उजागर होकर सामने आता है। बंकिमचंद्र की जिस आत्मचेतना को जगाना चाहते थे, उसकी आवश्यकता आज भी अप्रमेय है। सीमा पर किसी भी चुनौती की आहट मिलते ही उनकी कलम के ओज स्मरण हो आता है; और जब भारतीय संस्कृति को तुच्छ दिखाने का प्रयास होता है, तो ‘वन्दे मातरम्’ का स्वर स्वयं हमारी रक्षा करने को उठ खड़ा होता है। यह नारा, यह गीत, यह पुकार – आज भी भारत-हृदय की अमर स्पंदना है। भारत सदा रहेगा और यह गीत भी अविनाशी रहेगा।
वन्दे मातरम्!








