क्यों लक्ष्मीबाई केवल इतिहास नहीं
-भोगेन्द्र पाठक, वरिष्ठ पत्रकार
इतिहास के विराट गगन में अनेक नारी–दीप्तियाँ उदित हुईं, जिनकी प्रकाश–रेखाएँ भारत–पथ को आलोकित करती रहीं। पर झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का प्राकट्य तो ऐसा था, जैसे भारत–माता के ललाट पर गौरव का उज्ज्वल सिंदूर–चिह्न स्वयं उतर आया हो। वह एक ऐसा अदम्य व्यक्तित्व थीं जिनमें सौंदर्य, साहस, मर्यादा तथा राष्ट्र की अखंडता का सार एक रूप में साकार हो उठा था। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का आविर्भाव एक ऐसा ज्योतिर्बिंदु है, जिसकी प्रभा केवल एक युग में नहीं, अपितु भारत के संपूर्ण भविष्य को प्रकाशित करती रहेगी। उनके जीवन का प्रत्येक पल, उनके संघर्ष की प्रत्येक घड़ी, उनके बलिदान की प्रत्येक बूंद भारत-माता के निमित्त एक अमिट संदेश है। लक्ष्मीबाई का वह महान् उद्घोष “मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगी!” – यह केवल एक राजनीतिक घोषणा नहीं, अपितु भारतीय जनमानस के लिए एक शाश्वत मंत्र है। यह घोषणा भारत की अगली डेढ़ सदी के स्वतंत्रता संग्राम को दिशा देने वाली प्रेरणा बन गई। ध्यातव्य हैं कुछ विशेष विन्दु जो रानी लक्ष्मीबाई को अप्रतिम बनाती हैं –
1. राष्ट्रीय संप्रभुता का पहला आधुनिक उद्घोष
सन् 1854 – ब्रिटिश साम्राज्य की मशीनरी अपनी निर्दयी गति में चल रही थी। “हड़प नीति” के नाम पर यह दुःसाहसिक शक्ति झाँसी को हड़पने के लिए आगे बढ़ी। तब रानी लक्ष्मीबाई ने उद्घोष किया – . “मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगी!” यह केवल एक कंठ की आवाज़ नहीं, अपितु राष्ट्र-चेतना की अमिट गर्जना थी। यह शब्दों का साधारण संयोजन नहीं, अपितु एक राष्ट्र की आत्मचेतना का प्रथम आधुनिक संदेश था। इसमें न केवल एक राजा की संपत्ति की रक्षा का भाव निहित है, अपितु पूरे भारत की संप्रभुता, पूरे भारत की गरिमा, पूरे भारत के अस्तित्व की रक्षा का संकल्प निहित है। भारतीयों को इस घोषणा ने सिखाया कि अपनी भूमि, अपनी संप्रभुता, अपने अधिकार के लिए किसी से समझौता नहीं करना चाहिए। बल्कि, जब तक प्राण विद्यमान हैं, तब तक इन सब की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष करना चाहिए। यह घोषणा आज भी भारत की प्रत्येक सीमा पर, प्रत्येक सैनिक के ह्रदय में, प्रत्येक भारतीय नागरिक की आत्मा में गूंजती रहती है।
2. हड़प नीति के विरुद्ध कानूनी संघर्ष
जब ब्रिटिश शक्ति अपने अन्यायी आदेशों को कार्यान्वित करने लगी, तब लक्ष्मीबाई ने एक अलौकिक दृष्टि दिखाई। उन्होंने यह समझा कि सत्य का पहला चरण कानून ही है। तलवार उठाने से पहले उन्होंने विधि के शस्त्र का प्रयोग किया। ब्रिटिश अधिकारियों को विस्तृत, तर्कपूर्ण, वैधानिक दृष्टि से अप्रतिरोध्य पत्र लिखे। लंदन के निर्देशकों तक अपील भेजी। भारतीय साम्राज्य की अदालतों में मामले दायर किए। हर संभव कानूनी मार्ग का अवलंबन किया। यह एक गहन संदेश था कि संघर्ष केवल तलवार और बंदूकों का नहीं होता, अपितु न्याय और कानून के माध्यम से भी संघर्ष किया जा सकता है। परंतु जब कानून स्वयं अन्याय का साधन बन जाता है, जब विधि-व्यवस्था पूर्णतः भ्रष्ट हो जाती है, तब अन्य मार्ग अपनाना अनिवार्य हो जाता है। लक्ष्मीबाई के इस दृष्टिकोण ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की नींव तैयार की।
3. महिलाओं को सैन्य-प्रशिक्षण
सन् 1857 में जब भारत में स्वाधीनता की आग प्रज्वलित हो गई थी, विद्रोह की ज्वाला सर्वत्र व्याप्त थी। ऐसे समय में, लक्ष्मीबाई ने एक ऐसा कदम उठाया, जो केवल एक सैन्य निर्णय नहीं था, अपितु एक सामाजिक क्रांति थी। उन्होंने महिलाओं को युद्ध-कला सिखाना आरंभ किया। घुड़सवारी, तलवारबाजी, निशानेबाजी, युद्ध-कलाएँ – सब कुछ। यह भारतीय इतिहास में पहली बार था कि महिलाओं ने सशस्त्र सेना में भाग लिया। उन्नीसवीं शताब्दी के भारत में, जब महिलाओं का घर की चारदीवारी से बाहर निकलना भी वर्जित था, तब यह निर्णय कितना दुष्साहसी था! यह केवल कानूनी-सामाजिक परंपराओं का ही नहीं, अपितु वर्णित नैतिकता के भी विरुद्ध था। परंतु लक्ष्मीबाई के लिए राष्ट्र-रक्षा सभी सामाजिक मानदंडों से परे थी। यह संदेश था कि स्वतंत्रता और सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल पुरुषों की नहीं, अपितु पूरे समाज की है। महिला भी अपनी मातृभूमि की सेविका हो सकती हैं, दोनों ही सेना के जवान हो सकते हैं, दोनों ही राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर सकते हैं।
4. दुर्गम परिस्थितियों में भी संकल्प
मार्च 1858 में ब्रिटिश सेनापति सर ह्यूग रोज़, जिसके पास 20,000 से अधिक सैनिक थे, जिसके पास 68 तोपें थीं, जिसके पास संपूर्ण ब्रिटिश साम्राज्य की शक्ति थी – वह झाँसी की ओर बढ़ा। लक्ष्मीबाई के पास मात्र 4,000-5,000 सैनिक, सीमित संसाधन, परंतु असीमित साहस। लगातार 14 दिन तक लक्ष्मीबाई की छोटी सी सेना ने ब्रिटिश साम्राज्य के विशाल सैन्य-यंत्र से लड़ाई की। तोपों की गड़गड़ाहट, बंदूकों की मार, मृत्यु की निनाद- सबके सामने राष्ट्रघोष जारी रहा, झाँसी की दीवारें अपनी जगह बनी रहीं। यह सिखाता है कि संख्या में कमी या संसाधनों की कमी होने पर भी साहस, संकल्प, और अपने उद्देश्य के प्रति अटूट विश्वास के सहारे युद्ध लड़ा जा सकता है। एक छोटी सी सेना, अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए लड़ी। ब्रिटिश साम्राज्य को भी यह स्वीकार करना पड़ा कि यह कोई साधारण संघर्ष नहीं था।
5. मातृत्व और शौर्य का संगम
झांसी के किले की दीवारें टूटने लगीं। ब्रिटिश तोपों की मार से वह भव्य दुर्ग छिन्न-भिन्न हो रहा था। तब, लक्ष्मीबाई ने एक ऐसा निर्णय लिया, जो भारतीय इतिहास में शाश्वत रहेगा। अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को अपनी पीठ पर बांधा। तलवार हाथ में लीं। अपने प्रिय घोड़े “बादल” पर सवार हुईं। और फिर, 40 फुट की खाई के ऊपर से छलांग लगा गईं। एक माता अपनी संतान की रक्षा कर रही थी। परंतु साथ ही साथ, एक योद्धा, जो अपनी मातृभूमि के लिए लड़ रही थी। दोनों भूमिकाएं एक ही क्षण में, एक ही शरीर में। यह संदेश है कि परिवार की रक्षा और राष्ट्र की सेवा – ये दोनों एक ही नहीं, अपितु एकाकार हो सकते हैं। एक माता अपनी संतान की सुरक्षा करते हुए भी अपनी मातृभूमि के लिए लड़ सकती है।
6. पराजय का विजय में रूपांतरण
झाँसी का पतन हुआ। परंतु लक्ष्मीबाई का संकल्प नहीं टूटा। वे कालपी पहुंचीं। यहाँ, अन्य विद्रोही नेताओं – तात्या टोपे, नाना साहब, राव साहब के साथ मिलकर, फिर से एक विशाल सेना का संगठन किया। कालपी भी ब्रिटिश शक्ति के आगे झुक गया। परंतु लक्ष्मीबाई ने हार नहीं मानी। ग्वालियर की ओर जहाँ सिंधिया राजकुल का शाही किला था, उधऱ वे अग्रसर हुईं। यहाँ पुनः संघर्ष हुआ। पुनः युद्ध हुआ। यह एक गहन संदेश है: एक पराजय का अर्थ युद्ध का अंत नहीं है। असली योद्धा बार-बार उठता है, बार-बार लड़ता है। हर बार गिरने के बाद, वह फिर से खड़ा हो जाता है। यही तो योद्धा की पहचान है, योद्धा की आत्मा है।
7. अंतिम क्षण में भी निर्भीकता
ग्वालियर के पास कोटा की सराय के निकट, अंतिम युद्ध हुआ। लक्ष्मीबाई मात्र 29-30 वर्ष की उम्र में, अपने घोड़े पर सवार होकर तलवार हाथ में लहराते हुए ब्रिटिश सेना से टकराईं। अंग्रेजी सेना की गोली छाती में लगी। खून बहने लगा। पीड़ा असहनीय हुई। परंतु… आत्मसमर्पण नहीं किया। घायल होने के बाद भी, वे अपनी सेना का निर्देशन करती रहीं। अपनी अंतिम साँस तक, वे लड़ती रहीं। जीवन के अंतिम पलों में भी, लक्ष्मीबाई अपनी स्वाधीनता और अपनी मातृभूमि के लिए लड़ीं। अंततः, 18 जून 1858 को, लक्ष्मीबाई ने अपने प्राण त्याग दिए। परंतु कौन कह सकता है कि वे “मरीं”? वे तो अमर हो गईं। उनकी आत्मा, उनका संकल्प, उनका साहस – सब भारत की मिट्टी में सदा-सर्वदा के लिए समाहित हो गए।
जब सुभाष चंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) में महिलाओं की पहली सशस्त्र रेजिमेंट का गठन किया, तब उन्होंने उसे “रानी झाँसी रेजिमेंट” नाम दिया। यह सीधे-सीधे लक्ष्मीबाई की प्रेरणा का प्रमाण था। बोस के शब्द थे: रानी झाँसी ने सिद्ध किया कि महिलाएं भी युद्ध में पुरुषों के समान योगदान दे सकती हैं। इस रेजिमेंट का नेतृत्व कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन (लक्ष्मी सहगल) ने किया। सिंगापुर, रंगून, बैंकाक – इन सभी जगहों पर, 500 से अधिक महिला सैनिकों को प्रशिक्षित किया गया। वे लड़ीं। यह लक्ष्मीबाई की विरासत का सीधा प्रभाव और विस्तार था। क्रांतिकारी भगत सिंह ने अपने लेखों में रानी लक्ष्मीबाई को ‘भारतीय क्रांति की पहली शहीद’ कहा। उनके शब्दों में: रानी ने हमें सिखाया कि स्वतंत्रता के लिए जीवन की बलि भी देनी पड़े, तो देनी चाहिए। चन्देरशेखर आजाद ने लक्ष्मीबाई से प्रेरित होकर एक अटूट संकल्प लिया कि वे कभी ब्रिटिश के हाथों जीवित पकड़े नहीं जाएंगे। अंततः, 25 फरवरी 1931 को, उन्होंने अल्फ्रेड पार्क में अपनी अंतिम गोली स्वयं को मारकर अपना वचन निभाया।
भारत की ‘नाइटिंगेल’ सरोजिनी नायडू ने तो उन पर एक अमर प्रेरक कविता लिख दी –
“चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।“
ब्रिटिश सेनापति ह्यूग रोज़ ने अपनी डायरी में लिखा कि रानी लक्ष्मीबाई सभी भारतीय नेताओं में सबसे खतरनाक थीं। हालाँकि वह एक महिला थीं, परंतु वह निर्भीक और सर्वश्रेष्ठ सैन्य नेता थीं। यह एक शत्रु द्वारा दी गई सबसे बड़ी प्रशंसा है। अपने शत्रु से ऐसी स्वीकारोक्ति पाने से बड़ी कोई विजय हो सकती है क्या?
भारत में सैनिकों को प्रशिक्षण के दौरान लक्ष्मीबाई की कहानियाँ सुनाई जाती हैं। लक्ष्मीबाई का संदेश है कि अपनी भूमि की रक्षा अंतिम साँस तक करनी है। आज भी भारतीय सेना, नौसेना, वायुसेना का यह मूल सिद्धांत है। हर सैनिक की यह प्रतिज्ञा होती है कि हम भारत की सीमा की रक्षा अपनी अंतिम साँस तक करेंगे, जैसे रानी लक्ष्मीबाई ने की। स्वतंत्रता, साहस, शौर्य और बलिदान का सत्य क्या है? यही कि हम किसी भी परिस्थिति में, अपनी संप्रभुता, गरिमा, और अधिकार का समझौता न करेंगे। यह केवल एक राजनीतिक सत्य नहीं, अपितु एक आध्यात्मिक सत्य है। भवानी प्रसाद मिश्र की कविता द्रष्टव्य है –
“माथे को फूल जैसा
अपना चढ़ा दे जो,
रुकती-सी दुनिया को
आगे बढ़ा दे जो,
मरना वही अच्छा है।“
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविताएँ भी रानी लक्ष्मीबाई से सद्यः अनुप्रेरित लगती हैं; कुछ पंक्तियाँ अत्यंत प्रेरक हैं –
“गान गाये महासिन्धु-से सिन्धु-नद-तीरवासी!
सैन्धव तुरंगों पर चतुरंग चमू संग;
”सवा-सवा लाख पर एक को चढ़ाऊंगा
गोविन्द सिंह निज नाम जब कहाऊंगा”
किसने सुनाया यह
वीर-जन-मोहन अति दुर्जय संग्राम राग,
फाग का खेला रण बारहों महीने में?
शेरों की मांद में आया है आज स्यार
जागो फिर एक बार!
समर में अमर कर प्राण!”
माँ भारती की वीर पुत्री लक्ष्मीबाई से अनुप्राणित भारत की सीमाओं पर अडिग और समर्पित हमारे देश के जवान और सीमाओं पर बसे नौजवान गर्व से कहते हैं –
“आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है,
दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है।“
रानी लक्ष्मीबाई को शत शत नमन!
वन्दे मातरम्








