मूक विध्वंसकः अवैध प्रवासन और स्लीपर सेल्स
– ले. जन. (रि.) डॉ. नितिन कोहली,अध्यक्ष, सीमा जागरण मंच, दिल्ली प्रांत
भारत का विशाल भू-भाग, उसकी विस्तीर्ण सीमाएँ और विविध सांस्कृतिक विरासत एक अद्भुत संगम के समान हैं, जहाँ अनेक रंगों, भाषाओं और परंपराओं का मिलन हुआ है। इस पावन भूमि की सीमाएँ केवल भौतिक रेखाएँ नहीं, अपितु देश की आत्मा, उसकी सुरक्षा और समृद्धि के चिह्न हैं। परंतु आज इस अखंड भूमि पर ऐसे छिपे संकट मंडरा रहे हैं, जो परतंत्रता के समग्र संघर्षों से भी अधिक सूक्ष्म, जटिल और घातक हैं। अवैध घुसपैठ और स्लीपर सेल्स जैसे अदृश्य खतरों ने हमारे समाज की जड़ों को हिला कर रख दिया है, ये वे साए हैं जो अंधकार में काम करते हुए हमारे आर्थिक स्थिरता, सामाजिक एकता और राष्ट्रीय सुरक्षा को भीतर से चोट पहुँचाते हैं। ऐसे समय में जहाँ सामान्य आतंक और आक्रमण को समझना अपेक्षाकृत सरल है, वहीं ये छिपे हुए कूटनीतिक खेल और गृहद्रोही षड्यंत्र हमें अधिक सजगता, खुफिया सहयोग और नीति सुधारों की आवश्यकता का आह्वान करते हैं। अतः यह हमारा कर्तव्य है कि हम अपनी सीमा सुरक्षा को सद्यःसंकल्प, समन्वित प्रयास और लोक जागरूकता से सुदृढ़ करें, ताकि महान देश भारत का दीप प्रज्वलित रहे और उसके सांस्कृतिक वैभव की छाया निरंतर विस्तार पाए।
भारत की छिद्रयुक्त सीमाएँ, जटिल सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियां और लोकतांत्रिक जीवंतता इसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष चुनौतियाँ प्रस्तुत करते हैं। इनमें सबसे खतरनाक हैं वे अदृश्य खतरे – जो छाया में काम करते हैं, पारंपरिक जांच से बचते हैं, और धीरे-धीरे देश की सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और सामाजिक एकता को भीतर से क्षीण कर देते हैं। ऐसे दो खतरे विशेष रूप से गंभीर हैं – अवैध प्रवासन और स्लीपर सैल्स की उपस्थिति।
जहां पारंपरिक खतरे जैसे सैन्य आक्रमण और आतंकवाद को पहचानना और जवाब देना अपेक्षाकृत सरल होता है, वहीं अदृश्य खतरे अधिक सतर्कता, खुफिया समन्वय और नीतिगत सुधारों की मांग करते हैं। अवैध प्रवासी और स्लीपर सेल्स अक्सर तब तक जांच के दायरे से बाहर रहते हैं जब तक उनका प्रभाव इतना बड़ा नहीं हो जाता कि उसे नकारा नहीं जा सकता, और तब तक आमतौर पर नुकसान गहरा और व्यापक हो चुका होता है। वर्षों से बड़ी संख्या में लोग बिना वैध दस्तावेजों के भारत में प्रवेश कर चुके हैं या अपने वीजा की अवधि पार कर चुके हैं, जिससे वे अवैध निवासी बन जाते हैं।

अवैध घुसपैठ
भारत, अपनी भौगोलिक और भू-राजनीतिक स्थिति के कारण, 11 देशों के साथ 15,106.7 किलोमीटर से अधिक लंबी स्थलीय सीमा और 11098.81 किलोमीटर लंबी समुद्री तटरेखा साझा करता है। इन सीमाओं की सुरक्षा के लिए विभिन्न बल नियुक्त हैं:
BSF: पाकिस्तान और बांग्लादेश सीमाओं के लिए
SSB: नेपाल और भूटान सीमाओं के लिए
Assam Rifles: म्यांमार सीमा के लिए
ITBP: चीन सीमा के लिए
Coast Guard: समुद्री सीमाओं के लिए (रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत)
Marine Police: संबंधित राज्य सरकारों के अधीन
भारत की पाकिस्तान सीमा बाड़बंद है, बांग्लादेश के साथ 4,000 किमी सीमा में भी अधिकांश क्षेत्र बाड़बंद है, सिवाय 400 किमी (मुर्शिदाबाद क्षेत्र)। म्यांमार के साथ 1,600 किमी की सीमा का अधिकांश भाग अभी तक बाड़बंद नहीं किया गया है, जबकि नेपाल और भूटान के साथ सीमाएँ बिल्कुल बाड़बंद नहीं हैं। सीमाओं पर सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ने के बावजूद, हथियार, ड्रग्स, मानव तस्करी, जाली मुद्रा और अवैध प्रवासन जैसी समस्याएँ गंभीर बनी हुई हैं।
खुफिया रिपोर्टों से पता चला है कि लश्कर-ए-तैयबा, जमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश (JMB) जैसे चरमपंथी समूहों ने अवैध प्रवासियों को सूचनादाता या सामान पहुँचाने वालों के रूप में इस्तेमाल करने का प्रयास किया है।
अवैध प्रवासी प्रायः झुग्गियों या अनियमित बस्तियों में रहते हैं, जहाँ कानून-व्यवस्था की पहुँच सीमित होती है। ये क्षेत्र राष्ट्र-विरोधी तत्वों के लिए सुरक्षित ठिकाने बन सकते हैं या हथियार और प्रतिबंधित वस्तुओं के पारगमन स्थल के रूप में उपयोग किए जा सकते हैं।
इन प्रवासियों के पास वैध दस्तावेज़ नहीं होने से, उन्हें पहचानना, अभियोजन करना या देश से निष्कासित करना अत्यंत कठिन होता है। एक आम चाल यह होती है कि वे जाली आधार कार्ड, पेन कार्ड और वोटर आईडी बनवाते हैं। इनसे उन्हें बैंक खाते, कल्याणकारी योजनाएँ और यहाँ तक कि रोज़गार प्राप्त हो जाते हैं, जिससे भारत की वैध पहचान प्रणाली की अखंडता खतरे में पड़ जाती है।
स्लीपर सैल्स क्या हैं?
स्लीपर सैल्स गुप्त समूह या व्यक्ति होते हैं जो लंबे समय तक सामान्य नागरिकों की तरह समाज में रहते हैं और फिर किसी उपयुक्त समय पर आतंकी या जासूसी गतिविधियाँ अंजाम देने के लिए सक्रिय किए जाते हैं। इन सैल्स को शत्रु देशों या संगठनों द्वारा देश में गुप्त रूप से स्थापित किया जाता है। ये सैल्स निम्नलिखित तरीकों से काम करते हैं:

स्लीपर सेल्स
कमजोर समुदायों में घुसपैठ कर सामान्य नागरिकों के रूप में रहते हैं।सांप्रदायिक तनाव या सामाजिक-आर्थिक असंतोष का लाभ उठाकर नए सदस्य बनाते हैं।हवाला, क्रिप्टोकरेंसी या नकली चैरिटेबल संस्थानों के माध्यम से विदेशी फंडिंग प्राप्त करते हैं।
एन्क्रिप्टेड डिजिटल कम्युनिकेशन का उपयोग कर खुफिया एजेंसियों से बचते हैं। ऑपरेशन सिंधु से ठीक पहले, पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने कहा था कि भारत में उनके पास पर्याप्त स्लीपर सेल्स हैं, जिन्हें आवश्यक समय पर सक्रिय किया जा सकता है। 04 जुलाई 2025 को पाकिस्तान के बहावलपुर से एक प्रसारण में मसूद अज़हर ने कहा कि उनके पास 30,000 फ़िदायीन भारत में प्रवेश के लिए तैयार हैं। बांग्लादेश के आतंकी जफरुद्दीन रहमानी, जो अंसारुल्लाह बांग्ला टीम के प्रमुख हैं, ने पूर्वोत्तर भारत में जिहाद छेड़ने की बात कही है।इस प्रकार के ट्रोजन हॉर्स को भारत में घुसाने के निरंतर प्रयासों के बीच, सीमाओं की सुरक्षा के लिए प्रभावी, समन्वित और एकीकृत दृष्टिकोण समय की मांग है।
राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता और मौजूदा चुनौतियाँ
- किसी भी संप्रभु राष्ट्र को यह अधिकार है कि वह अपनी सीमाओं की सुरक्षा करे और किसी भी प्रकार की अवैध घुसपैठ को रोके, जिससे जनसंख्या, कानून-व्यवस्था, स्थानीय संस्कृति और देश की सुरक्षा प्रभावित होती है। परंतु कुछ लोग उदारवाद, बहुसंस्कृतिवाद और मानवाधिकारों के नाम पर इस अवैधता को न्यायोचित ठहराते हैं।
- एक संगठित इकोसिस्टम इन अवैध प्रवासियों को सीमा पार कराने, देश में रहने, फर्जी दस्तावेज उपलब्ध कराने, लॉजिस्टिक्स और कानूनी मदद तक प्रदान करता है।
- वर्तमान में भारत के पास अवैध प्रवास को संभालने के लिए कोई एकीकृत राष्ट्रीय नीति या डिजिटल आधारयुक्त ढांचा नहीं है। अधिकांश कानून जैसे कि विदेशी नागरिक अधिनियम (1946) और पासपोर्ट अधिनियम (1920) पुराने हैं, जो बायोमेट्रिक पहचान धोखाधड़ी, सीमा पार आतंकवाद या डिजिटल फर्ज़ीवाड़े जैसी आधुनिक चुनौतियों को संबोधित नहीं करते।
- नागरिकता अधिनियम 1955 को कई बार संशोधित किया गया है, विशेषकर 2003 (NRC की अवधारणा) और 2019 (CAA) में, जो पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के सताए गए अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करता है। लेकिन प्रवर्तन कमजोर बना हुआ है और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी के कारण कई अवैध प्रवासी पकड़े नहीं जाते।
सिफारिशें (Recommendations)
- राष्ट्रीय सीमा नीति (National Border Policy) बनाई जाए, ताकि सभी सीमाओं के लिए एक समान रणनीति हो।
- नेपाल, बांग्लादेश, भूटान और म्यांमार के साथ मौजूदा संधियों की समीक्षा हो, ताकि कोई भी व्यक्ति बिना वैध दस्तावेज के सीमा पार न कर सके।
- सभी सीमाओं की प्राथमिकता पर बाड़बंदी किया जाए। दलदली और नदीय क्षेत्रों में स्मार्ट लेज़र बाड़बंदी की जाए।
- पूर्वी सीमाओं पर वी सुरक्षा इंतजाम किए जाएं जैसे भारत-पाक सीमा पर हैं।
- फ्री-मूवमेंट रेजीम (FMR) को समाप्त या संशोधित किया जाए।
- राष्ट्रीय सीमा प्रबंधन प्राधिकरण (NBMA) का गठन किया जाए (NDMA की तर्ज पर), जिसके पास गिरफ्तारी, अभियोजन और नीति निर्माण का अधिकार हो।
- राज्य पुलिस की सीमा अपराधों से संबंधित ज़िम्मेदारी को NBMA के अधीन किया जाए।
- सीमा से सटे 5-10 कि.मी. क्षेत्र को “फेडरल ज़ोन” घोषित किया जाए, ताकि सुरक्षा चौकियों की स्थापना बिना राज्य सरकार की बाधा के की जा सके।
- कुमाऊँ स्काउट या लद्दाख स्काउट की तरह विशेष सीमा सुरक्षा बल बनाए जाएं, जैसे जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रीय राइफल्स दूसरी पंक्ति की सुरक्षा प्रदान करती है।
- राज्य मरीन पुलिस को NBMA के अधीन लाया जाए।
- समाज को जागरूक किया जाए कि वे गुमनाम माध्यमों में किसी भी संदिग्ध गतिविधि की रिपोर्ट करें। स्लीपर सेल्स केवल स्थानीय समर्थन से जीवित रहते हैं।
- पुलिस को दस्तावेज़ों की जांच का अधिकार हो और नागरिकता प्रमाणित करना व्यक्ति की जिम्मेदारी हो।
- मतदाता सूची की विशेष साधन पुनरीक्षण प्रक्रिया नियमित रूप से की जाए।
- फर्जी दस्तावेज़ बनाने पर कड़ी सजा हो, इसे UAPA के तहत दंडनीय अपराध बनाया जाए। आवश्यकता हो तो विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएं।
- NIA, NCB, BSF और अन्य एजेंसियों की क्षमता और संसाधनों में वृद्धि की जाए।
आधार प्रणाली में “नागरिकता सत्यापन परत” (Citizenship Verification Layer) जोड़ी जाए:
- आधार को जन्म प्रमाणपत्र, माता-पिता और मूल स्थान से जोड़ा जाए।
- पहचान की सुरक्षा हेतु ब्लॉकचेन एनक्रिप्शन का उपयोग किया जाए।
निष्कर्ष: सरकार ने ‘इमीग्रेशन एंड फॉरेनर्स बिल, 2025’ पारित कर दिया है और अवैध प्रवासियों की पहचान व निष्कासन की कार्रवाई शुरू हो चुकी है। इस प्रक्रिया को गति दी जानी चाहिए और इसमें पुलिस, न्यायपालिका, मीडिया और नागरिकों की पूर्ण भागीदारी होनी चाहिए। लोकतंत्र की आत्मा और संप्रभुता की शक्ति की रक्षा के लिए भारत को निर्णायक और शीघ्र कार्य करना होगा। यह एक अदृश्य आक्रमण है, जिससे निपटने के लिए नए कानूनी ढांचे, एंटी-इंफिल्ट्रेशन ग्रिड और कठोर दंड की व्यवस्था जरूरी है, और यह लड़ाई हमें जल्द जीतनी होगी, इससे पहले कि देर हो जाए।
(लेखक परिचयःअध्यक्ष, सीमा जागरण मंच, दिल्ली प्रांत; पूर्व-भारतीय सेना सिग्नल अधिकारी-प्रभारी, चार दशकों की सेवा अनुभव के साथ; राष्ट्रीय दूरसंचार एवं साइबर सुरक्षा का नेतृत्व किया तथा सूचना युद्ध में पीएच.डी. सहित उच्च उपाधियाँ।)








