वन्दे मातरम् : भारत की अमर चेतना का शाश्वत गीत
सात नवम्बर, अठारह सौ पचहत्तर। यह तिथि, यह दिन, यह पल भारतीय चेतना के लिए कोई साधारण क्षण नहीं था। यह दिन भारतीय इतिहास में स्वर्णाक्षरों से अंकित है। पश्चिम बंगाल के नैहाटी नगर में, एक छोटे से गाँव कंधालपाड़ा में, एक आम के पेड़ की छाया में, एक कलमकार बैठा था। उसका नाम था बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय। और उस दिन, उस क्षण, उस शांत पल में, उसके कलम से निकले दो शब्द – वन्दे मातरम् – और साकार हो गया पूरा राष्ट्रगीत, जिसने भारत की आत्मा को जागृत कर दिया। यह दिन अक्षय नवमी था। जब बंगाल की माता, जगद्धात्री की पूजा का सर्वोच्च अवसर आता है। डेढ़ सो वर्ष बीत गए हैं, आज भी जब हम देखते हैं, तब वह गीत वन्दे मातरम् अब भी करोड़ों भारतीयों के हृदय में धड़क रहा है, हमारी साँसों में बस गया है, हमारी आत्मा में समा गया है। बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने जो पंक्तियाँ रचीं, वह केवल काव्य नहीं है – वह है एक क्रांति, एक संकल्प, एक राष्ट्र की आत्मा की पुकार।
अब, यह क्षण – सात नवम्बर, दो हजार पचीस। जब नरेंद्र मोदी, इस युग के एक राष्ट्र-नायक, ने नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में उस अक्षय गीत ‘वन्दे मातरम्’ के स्मरणोत्सव का शुभारंभ किया, तो वह क्षण पुनः जीवंत हो गया। उसी अक्षय भावना ने पूरे राष्ट्र को अमर आह्लाद से भर दिया है। वन्दे मातरम् क्यों अमर गीत है, राष्ट्रगीत है, हमारी स्वतंत्रता का स्वर है? – कुछ तथ्य ध्यातव्य हैं –
दर्शन : रूप और अरूप का मिलन
रूप-अरूप – यह है भारतीय दर्शन का मूल। ‘वन्दे मातरम्’ में, बंकिम चन्द्र ने इसी दर्शन को जीवंत किया है-
सुजलां सुफलां मलयजशीतलां
शस्यशामलां मातरम्।
माँ भारती केवल भूमि नहीं है। वह हैं रूप – दृश्यमान, मूर्त, साकार। पवित्र जल, समृद्ध फसल, मलय पर्वत की शीतल हवा, हरीतिमा से ढके खेत – ये सब माता-भूमि का साकार सौंदर्य है। यह है शृंगार रस, परंतु यह किसी प्रेमिका का प्रेम नहीं, बल्कि माता के वात्सल्य की अभिव्यक्ति है।
शक्ति का उद्घोष
कोटि-कोटि-कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले
कोटि-कोटि-भुजैर्धृत-खरकरवाले।
इसे सुनते ही, भारत का रक्त उबल जाता है। करोड़ों कंठ, करोड़ों भुजाएँ – यहाँ शक्ति है, यहाँ है जनता की सामूहिक ऊर्जा, यहाँ है राष्ट्र की अपराजेय भावना। बंकिम चन्द्र ने भुजा को खरकर (तीक्ष्ण हथियार) से जोड़ा है। यह कोई साधारण भुजा नहीं है। यह है योद्धा की भुजा, वीर की भुजा, न्याय के लिए संघर्ष करने वाली भुजा।
“अबला केन मा एत बले?” — माता अबला क्यों है? यह प्रश्न ही एक वीर चेतना का आह्वान है। यह कह रहा है – हे भारत के वीरों, अपनी माता को असहाय न रहने दो।
शक्ति के तीन आयाम
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदलविहारिणी
वाणी विद्यादायिणी।
यहाँ माँ भारती अरूप हो जाती हैं – अदृश्य, अमूर्त, निराकार – दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती। ये केवल नाम नहीं हैं, बल्कि शक्ति के तीन आयाम हैं – रक्षा, पोषण, ज्ञान। यहाँ माता देवी बन जाती हैं, ब्रह्म बन जाती हैं।
राष्ट्र-भक्ति का आध्यात्मिकीकरण
लोक और शास्त्र अलग नहीं होते। ये दोनों एक ही सत्य के दो पहलू हैं। वन्दे मातरम्]] में भी यही तत्व निहित है। भारत को देवी के रूप में प्रस्तुत करके, बंकिम चन्द्र ने राष्ट्र-भक्ति को धर्म में परिणत कर दिया। यह कोई राजनीतिक गीत नहीं है। यह है एक आध्यात्मिक आह्वान। माता-भूमि केवल भूमि नहीं है। यह है देवी, यह है ब्रह्म, यह है हमारे जीवन का आत्मतत्व।
तुमि विद्या, तुमि धर्म, तुमि हृदि, तुमि मर्म
त्वं हि प्राणाः शरीरे।
यहाँ भारत सिर्फ एक अभौतिक भूमि नहीं है। यह हमारी विद्या है, हमारा धर्म है, हमारे हृदय का मर्म है, हमारे प्राणों की शक्ति है। यहाँ भौतिक और आध्यात्मिक एक हो जाते हैं।
रहस्यात्मकता : मंत्र की शक्ति
‘वन्दे मातरम्’ को बार-बार दोहराया जाता है। मंत्र में शब्द की पुनरावृत्ति ही चेतना को जागृत करती है। प्रत्येक बार जब हम कहते हैं ‘वन्दे मातरम्’ तब हमारे भीतर एक नई चेतना जागृत होती है। एक नई शक्ति का संचार होता है। यह कोई साधारण गीत नहीं है। यह है एक ऋचा – वेदों की तरह जो पीढ़ियों को पार करके, युगों के पार जाकर, भारत की आत्मा को हर क्षण जीवंत रखती है।
सहज सौंदर्य में दिव्यता
श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषितां
धरणीं भरणीं मातरम्।
यहाँ कोई अलंकार नहीं है। कोई छिपा हुआ अर्थ नहीं है। यहाँ है एक माता का सहज, कोमल, किंतु दृढ़ स्वरूप। यह है छायावाद का सार – जहाँ साधारण में असाधारण छिपा होता है, जहाँ सरल में गहन निहित होता है।
150 वर्षों की यात्रा
1875 में ‘वन्दे मातरम्’ की रचना हुई। 1882 में जब बंकिम चन्द्र का उपन्यास आनंद मठ प्रकाशित हुआ, तो यह गीत आग की तरह पूरे बंगाल में फैल गया। 1905 के स्वदेशी आंदोलन में, यह गीत भारत की आत्मा बन गया। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे गाया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने इसे अपनी फौज का युद्ध-घोष बनाया। लेकिन आज, 150 वर्षों के बाद, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहते हैं –“‘वन्दे मातरम्’ एक मंत्र है, एक ऊर्जा है, एक स्वप्न है, एक संकल्प है” – तो वे बंकिम की सोच को जन-जन तक पुनः बढ़ा रहे हैं।
शाश्वत पुकार
150 वर्षों के बाद भी ‘वन्दे मातरम्’ की प्रासंगिकता अक्षुण्ण है। क्योंकि यह केवल एक गीत नहीं है। यह एक कालातीत सत्य का आह्वान है। जब कभी भारत को अपनी आत्मा की खोज करनी हो, जब कभी राष्ट्र को अपनी शक्ति को पुनः संगठित करना हो, तब वन्दे मातरम् की पुकार फिर से गूंजती है। यह है भारत की शाश्वत धड़कन। यह है भारतीय आत्मा की अमर वाणी। वन्दे मातरम् भारत की अमर चेतना का शाश्वत गीत।









