जिगना – संस्कृति और प्रकृति का संगीत
पश्चिमी चंपारण की धरती पर, मैनाटांड़ के अंचल में बसा है एक गाँव – जिगना। यह नाम नहीं, यह एक पुकार है – उन परंपराओं की, उन रीति-रिवाजों की, जो सदियों से इस मिट्टी में रची-बसी हैं। जहाँ लोकजीवन की सरलता, मेलों का उत्साह, और त्योहारों की रंगीनियाँ मिलकर एक जीवंत चित्रपट रचती हैं। घने जंगलों की गहराई, पक्षियों का कलरव, और प्रकृति का अछूता सौंदर्य – यह सब मिलकर जिगना के पर्यटन को नया जीवन देते हैं।
यहाँ के लोग जब अपने लोकगीतों में डूबते हैं, तो लगता है मानो प्रकृति स्वयं नृत्य करने लगी हो। मिट्टी की खुशबू, बांस की बुनावट, और हाथों से गढ़ी गई हस्तशिल्प कृतियाँ जिगना की पहचान बनती हैं। यहाँ की लोककलाएँ केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों की धरोहर हैं।
यहाँ के पास ही है वाल्मीकि टाइगर रिज़र्व – जहाँ प्रकृति अपने पूरे वैभव में विराजमान है। भारत-नेपाल की सीमा पर फैला यह अभयारण्य बाघों का घर है, वन्यजीवों का अभयस्थल है।
जिगना – यहाँ परंपरा, प्रकृति और पहचान एक ही धारा में प्रवाहित होती हैं। यह गाँव सीमांत अंचल का सांस्कृतिक केंद्र ही नहीं, बल्कि राष्ट्र की धड़कन है, जो हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है। सीमा जागरण और सीमा सुरक्षा की दृष्टि से इस तरह के सीमावर्ती गाँवों को राष्ट्रीय मानचित्र पर स्थापित करना होगा, उनकी संस्कृति को संरक्षित करना, और स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाना होगा। तभी भारत की सीमाएँ सशक्त होंगी।








