सर क्रीक का विजय-नाद: अभ्यास त्रिशूल
कच्छ के सर क्रीक की दलदली भूमि – जहाँ समुद्र, धरती और आकाश एक अद्भुत संयोग में मिलते हैं – वहाँ आज भारत की सैन्य चेतना का एक नया अध्याय लिखा जाने वाला है। यह है ‘अभ्यास त्रिशूल‘ – भारत के सेना, नौसेना और वायु सेना का एक विराट त्रि-शक्तिमान संयोग।
यह अभ्यास केवल एक सैन्य अभ्यास नहीं – यह है भारत की रक्षा-चेतना का एक पवित्र प्रण। यह एक सार्वभौमिक संकल्प है कि हमारी सीमाएँ अभेद्य रहेंगी, हमारा तट सुरक्षित रहेगा, हमारा आकाश स्वतंत्र रहेगा। इस बड़े लक्ष्य का ही पूर्वाभ्यास सर क्रीक में करने की योजना है। सर क्रीक की 96 किलोमीटर की दलदली पट्टी भारत के पश्चिमी मोर्चे की सर्वाधिक संवेदनशील क्षेत्र है। यहाँ जल, थल, नभ – तीनों तत्व एक साथ भारत की सीमा-रक्षा की परीक्षा लेते हैं। यह परीक्षा कोई साधारण परीक्षा नहीं – यह है राष्ट्रीय अस्मिता का परीक्षण। ‘अभ्यास त्रिशूल‘ में हमारे सैनिक, नाविक और वायु-सेना के रणबांकुरे एक एकीकृत शक्ति के रूप में उभरेंगे। यहाँ उभयचर लैंडिंग, समन्वित पैंतरेबाजी, और हवाई समर्थन का एक सुसंगत अभ्यास होगा – जो आधुनिक युद्ध-प्रणाली का एक नया मानदंड स्थापित करेगा।
पाकिस्तान से घुसपैठ करनेवाली नौकाओं की बढ़ती घटनाएँ हमें एक कठोर सत्य बताती हैं कि हमारी सीमाएँ निरंतर संकट में हैं, हमारे पड़ोसी की आँखें हमारे तट पर लगी हैं। लेकिन यह अभ्यास उन सभी आँखों को एक संदेश देगा कि भारत की रक्षा-चेतना कभी सोती नहीं, भारत की सेना कभी विचलित नहीं होती। इस अभ्यास में वास्तविक समय की खुफिया साझेदारी, तेजी से लामबंदी, और बहु-स्तरीय समन्वय के माध्यम से, हमारे सशस्त्र बल एक नई सैन्य परिपक्वता का प्रदर्शन करेंगे। यह अभ्यास भारत के लिए केवल एक सैन्य प्रदर्शन नहीं है। यह एक सार्वभौमिक घोषणा है कि सर क्रीक से लेकर हिमालय तक, अरब सागर से लेकर बंगाल की खाड़ी तक भारत की सीमाएँ, भारत का सम्मान, भारत की अस्मिता – ये सब हमारे रणबांकुरों के लिए एक पवित्र लक्ष्य हैं। हम उन्हें किसी भी कीमत पर अक्षुण्ण रखेंगे।








