भैरबकुंडा: सीमाओं से आगे, संस्कृतियों का संगम
भूटान की सीमाओं पर भारत की सीमाएँ केवल मानचित्र की रेखाएं नहीं हैं, वे तो संस्कृतियों, इतिहास और आत्मीयता के जीवंत संगम स्थल हैं। असम के उदलगुड़ी जिले में वसे भैरबकुंडा इसी वक्तव्य का सर्वोत्तम उदाहरण है। यह भारत का ऐसा प्रथम गाँव है, जहां बँटवारे की कथा नहीं, बल्कि एकता और अखंडता का अमर गान गुंजित रहता है। यह स्थान असम, अरुणाचल प्रदेश और भूटान की त्रिसीमा-संगम में स्थित है, जहाँ तीन प्रदेश और दो राष्ट्र की आत्माएँ एक साथ मिलकर एक पावन धरती का सृजन करती हैं। भूटान की शीतल वर्षा-जल और हिमालय की बर्फ से निर्मित जम्पानी नदी की कलकल धारा अरुणाचल की पर्वत शृंखला से निकली भैरबी नदी के संघर्ष में मिलती है, और दोनों मिलकर धनसीरी नदी का रूप धारण करती हैं। उसी जल संगम के पास खड़ा भैरबकुंडा हमें शिक्षा देता है कि अनेक पथ अंततः एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं।
भैरबकुंडा न केवल एक भौगोलिक संगम, अपितु सांस्कृतिक सहअस्तित्व एवं सौहार्द का प्रतिरूप है। यहां की लोककथाएँ, पर्व-त्योहार, गीत-संगीत और खान-पान में असम, अरुणाचल और भूटानी संस्कृतियों का अप्रतिम मेल है। गांव के मेले में अरुणाचली ढोल की थाप पर असमिया गांगूरियों की स्वरमालाएं साथ गुनगुनाती हैं, जबकि भूटानी बकरी नृत्य की ताल स्थानीय बच्चों के उत्सव में जीवन संचार करती है।
इतिहास के गर्भ में भैरबकुंडा ने सीमांत जनों के मध्य व्यापारिक सम्बन्धों और पारस्परिक सहयोग की संस्कृति को सदा पुष्ट किया है। इस बाजार में भारतीय मसाले और भूटानी चाय, अरुणाचली शॉल तथा परंपरागत हस्तशिल्प के कारोबार के माध्यम से आर्थिक एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान की एक अनूठी छवि उभरती है।
आज भैरबकुंडा हमें स्मरण कराता है कि राष्ट्र की एकता केवल सीमाओं और सीमांकन की रेखाओं पर टिकती नहीं, अपितु मानव हृदयों के संस्कारों, सम्मान और साझा विरासत की आधारशिला पर स्थापित होती है। यह वह स्पर्शस्थल है जहाँ ‘विभाजन’ की परिभाषा क्षीण हो चुकी है और ‘संगम’ का सार सदैव जीवित है। इस पावन भूमि के हर पत्थर और हर बहती धारा हमें यही गीत सुनाती है – ‘‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत!








