अमृत सागर, अमर राष्ट्र: भारत का समुद्री सुरक्षा मंत्र
अमृत सागर, अमर राष्ट्र: भारत का समुद्री सुरक्षा मंत्र जल की लहरों पर टिकी हमारी समुद्री सीमाएँ न सिर्फ भारत के भौगोलिक विस्तार को प्रमाणित करती हैं, बल्कि आर्थिक, पर्यावरणीय एवं सुरक्षा के विविध आयामों में हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता की आधारशिला भी हैं। 11,098 किलोमीटर की तटरेखा, जिसमें 12 समुद्री मील का प्रादेशिक जल, 24 मील का सन्निहित क्षेत्र और 200 मील का विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र सम्मिलित है, समुद्री सीमा प्रबंधन को बहुआयामी एवं जटिल बनाता है¹. भारतीय नौसेना, तटरक्षक बल, राज्य तटीय पुलिस एवं विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियाँ मिलकर इस विशाल जल क्षेत्र के असीम अवसरों एवं चुनौतीपूर्ण खतरों का सामना करती हैं।
समुद्री सीमाओं का लेखा-जोखा
प्रादेशिक जल (Territorial Waters)
प्रादेशिक जल वह क्षेत्र है जहाँ तट से 12 समुद्री मील तक भारत की संप्रभुता पूर्ण होती है। अन्य किसी भी विदेशी जहाज को बिना अनुमति प्रवेश करने का अधिकार नहीं। यह क्षेत्र सामरिक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ तटीय रक्षा, निर्वहन नियंत्रण और विदेशी अवैध गतिविधियों पर नियंत्रण संभव होता है।
सन्निहित क्षेत्र (Contiguous Zone)
प्रादेशिक जल से 12–24 समुद्री मील की पट्टी को सन्निहित क्षेत्र कहते हैं। इस क्षेत्र में भारत का अधिकार सीमित होकर उन अपराधों, उल्लंघनों और अवैध विज्ञापनों पर नज़र रखता है जो तटीय सुरक्षा एवं न्यायिक अधिकारों का उल्लंघन करते हों।
विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone – EEZ)
विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र 200 समुद्री मील तक फैला हुआ है, जहाँ भारत को प्राकृतिक संसाधनों – खनिज, तेल, गैस और मत्स्यन – पर विशेष अधिकार प्राप्त हैं। इस क्षेत्र में अवैध मत्स्यन, समुद्री ध्वनि प्रदूषण, खनिजों की चोरी एवं समुद्री पर्यावरण क्षरण जैसी समस्याएँ मुख्य चुनौती हैं।
मौजूदा प्रबंधन संरचना
भारतीय नौसेना
भारतीय नौसेना समुद्री सीमा रक्षक की भूमिका निभाती है। युद्धकालीन तथा शांति-कालीन अभियानों में यह नौसेना तटीय रक्षा, विदेशी जहाजों के मूवमेंट ट्रैकिंग, समुद्री डकैती तथा समुद्री आतंकवाद रोधी अभियानों का संचालन करती है।

भारतीय तटरक्षक बल (Indian Coast Guard)
1977 में स्थापित यह बल प्रादेशिक जल एवं EEZ में समुद्री कानून-व्यवस्था बनाए रखता है। समुद्री प्रदूषण नियंत्रण, आपदा राहत, विद्रोही गतिविधियों पर रोक, मादक पदार्थों की तस्करी निरोध तथा मरीन सुरक्षा समीक्षा इसकी प्रमुख जिम्मेदारियाँ हैं।
राज्य तटीय पुलिस एवं बंदरगाह सुरक्षा
राज्यों की तटीय पुलिस और बंदरगाह सुरक्षा बल सीमांत जलक्षेत्र में स्थानीय अपराधों, तस्करी एवं बंदरगाह सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। यह तटरक्षक बल तथा नौसेना के साथ मिलकर संवेदी जाल बनाते हैं।
अन्य केंद्रीय एजेंसियाँ
धन्वंतरी कार्यक्रम (Deep Ocean Survey and Research): समुद्री संसाधनों के सर्वेक्षण हेतु।
नेशनल सेंटर फॉर समुद्री एप्लिकेशन (NCML): अनुसंधान एवं विकास में सहयोग।
नैविगेशनल सहायता (DG Shipping): जहाजों के पंजीकरण, डॉक्यूमेंटेशन एवं समुद्री सुरक्षा मानकों का प्रवर्तन।
समकालीन चुनौतियाँ
अवैध मत्स्यन और समुद्री संसाधन विवाद
विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र में पड़ोसी देशों के साथ मत्स्यन अधिकारों का टकराव, विशेषकर पाकिस्तान एवं म्यांमार के साथ, मत्स्यन के स्वामित्व और जाल तंत्र पर विवाद उत्पन्न करता है।
समुद्री अंतर्राष्ट्रीय अपराध
मानव तस्करी, हथियार तस्करी, ड्रग तस्करी तथा समुद्री डकैती के बढ़ते मामले राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देते हैं>
समुद्री प्रदूषण
तेल रिसाव, औद्योगिक कचरा, प्लास्टिक प्रदूषण एवं रसायनिक अपशिष्ट तटीय पारिस्थितिकी तंत्र को क्षति पहुँचाते हैं। इको-मारिन संरक्षण और अंतर्राष्ट्रीय महासागरीय कानूनों का अनुपालन सुनिश्चित करना अनिवार्य हो गया है।
जलवायु परिवर्तन व समुद्री परिक्षेत्र
समुद्री स्तर वृद्धि, चक्रवाती तूफान और कोरल रीफ का क्षरण तटीय सुरक्षा एवं मछुआरों के आजीविका को प्रभावित कर रहा है।
तकनीकी एवं नीति नवाचार.
समुद्री मॉनिटरिंग प्रणाली.
1. सैटेलाइट सर्विलांस: ISRO के एडवांस्ड सैटेलाइट्स से जलक्षेत्र पर निगरानी¹¹.

2. एयूवी/यूएवी (AUV/DRONES): स्वायत्त जलयानों से गहराई में निगरानी.
3. स्वचालित पहचान प्रणाली (AIS): जहाजों का ट्रैकिंग नेटवर्क.
समन्वित कमांड एवं कंट्रोल
नौसेना, तटरक्षक बल, बंदरगाह सुरक्षा, एवं रेलवे एवं वायु मार्ग से आने वाले आपत्तिजनक माल पर एकीकृत कमांड सेंटर द्वारा नियंत्रण।
अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग
1. अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) के साथ ऊर्जा एवं सुरक्षा समझौते।
2. नेओ स्ट्रेलेटेजिक सिस्टम्स: मालिका अभ्यास एवं समुद्री संयुक्त अभियान।
भविष्य की दिशा
1. नीले अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करना
2. विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र में सतत मत्स्यन, समुद्री खनिज अन्वेषण, जैव प्रौद्योगिकी आधारित समाधान और ग्रीन शिपिंग के माध्यम से नीली अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना होगा।
पारिस्थितिक संरक्षण
कोरल रीफ संरक्षण, मैंग्रोव पुनर्स्थापना और समुद्री पार्कों का विकास करके जैव विविधता की रक्षा
नीतिगत सुधार
1. राष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा नीति: एक समग्र दस्तावेज़ जिसमें अपराध, पर्यावरण और आर्थिक दृष्टिकोण शामिल हों।
2. नदी-समुद्र इंटरफेस प्रबंधन: नदियों से आने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए पंजाब, गुजरात और तमिलनाडु में विशेष प्रावधान चूँकि भारतीय प्रादेशिक जल, सन्निहित क्षेत्र एवं विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र हमारी संप्रभुता की अभिव्यक्ति हैं, इसलिए उनका प्रभावी प्रबंधन राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास एवं पर्यावरण संरक्षण का अनिवार्य आधार है। स्थलीय सीमाएँ राष्ट्र की हड्डियाँ हैं, वैसे हमारी समुद्री सीमाएँ उसकी रक्त-धारा हैं। अतः समन्वित रणनीति, तकनीकी नवाचार और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को समाहित करते हुए समुद्री सीमा प्रबंधन को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना अपरिहार्य है।








