विशद विमर्शसीमा समाचारिका

डिजिटल युद्ध और भारत की सुरक्षा

डेटा सुरक्षा, डार्क वेब और अवैध वित्तीय प्रवाह लेफ्टिनेंट जनरल आशीष रंजन प्रसाद (सेवानिवृत्त) वर्तमान युग में किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा केवल भूमि, समुद्र, आकाश और अंतरिक्ष तक सीमित नहीं रही है। अब यह डिजिटल डोमेन में भी विस्तारित हो गई है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र और उभरती हुई तकनीकी महाशक्ति है।…

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मंदिर: सीमा सुरक्षा का सनातन स्तंभ   

 देवालय से दुर्ग तक : मंदिरों की राष्ट्रीय सीमा–चेतना   भोगेन्द्र पाठक (5 नवम्बर 2025 को सीमा जागरण मंच के ‘मंथन’’ कार्यक्रम में दिल्ली में संतों और आचार्यों द्वारा लिया गया यह निर्णय कि पूर्वोत्तर की अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं पर प्रथम चरण में सौ मंदिर स्थापित किए जाएँ, केवल धार्मिक गतिविधि नहीं, बल्कि सहस्राब्दियों पुराने ‘मंदिर–सीमा–सुरक्षा-तंत्र’…

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विशद विमर्शसीमा समाचारिका

जाली मुद्रा: मौन खतरा

जाली मुद्रा: अर्थव्यवस्था की जड़ों पर प्रहार, राष्ट्र की सुरक्षा पर अदृश्य खतरा आशीष केसरवानी  एक देश की राष्ट्रीय प्रगति की रीढ़ उसकी वित्तीय प्रणाली होती है। हालांकि, इस प्रणाली में जाली मुद्रा का प्रवेश एक मौन लेकिन बहुआयामी खतरा पैदा करता है जो आर्थिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालता है। नकली…

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विशद विमर्श

सीमा पार से आतंकवाद

सीमाओं के पार: आतंकवाद, मानव तस्करी और सुरक्षा की खोज के. के. शर्मा (पूर्व महानिदेशक, सीमा सुरक्षा बल (BSF) कौटिल्य ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में उल्लेख किया है कि किसी राष्ट्र के पड़ोसी स्वाभाविक रूप से उसके शत्रु होते हैं। अतः उनके साथ अत्यंत सावधानीपूर्वक व्यवहार किया जाना चाहिए। सीमाओं का प्रबंधन एक जटिल…

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बंगाल की लड़ाई: सत्ता नहीं, सभ्यता का प्रश्न

  चुनाव से आगे की सोच: क्यों बंगाल भारत के लिए निर्णायक है अश्वनी कुमार च्रोंगू बीते वर्ष 2025 के अंतिम सप्ताह में भाजपा के राष्ट्रीय संगठनात्मक मामलों के प्रमुख और पार्टी के अखिल भारतीय महासचिव (संगठन) बी.एल. संतोष ने नई दिल्ली से प्रकाशित पत्रिका पाञ्चजन्य  को एक विशेष साक्षात्कार दिया, जिसे मीडिया में व्यापक…

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विशद विमर्शसीमा समाचारिका

सोमनाथ मंदिर – विरासत, विध्वंस और पुनर्स्थापन

सोमनाथ: सीमा, सभ्यता और स्वाभिमान की सहस्राब्दी   – भोगेन्द्र पाठक सोमनाथ भारतीय सभ्यता की वह चेतना-धुरी है जिसके चारों ओर इतिहास की आँधियाँ घूमती रहीं, किंतु जिसकी ज्वाला कभी मंद नहीं पड़ी। सोमनाथ का नाम लेते ही भारतीय चेतना के अतल-पृष्ठों पर एक दीर्घ स्मृति-ज्योति प्रज्वलित हो उठती है, जैसे आदिगुरु शिव की ध्यान–निमीलित दृष्टि…

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