सीमांत कौशल विकास

सीमा-क्षेत्रों में कौशल विकास का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि सीमांतवासी समुदाय को आत्मनिर्भर बनाकर राष्ट्रीय सुरक्षा एवं आर्थिक समृद्धि को सशक्त करना है। सीमांत अंचलों में केन्द्र और राज्य सरकारें विभिन्न योजनाओं के माध्यम से तकनीकी, उद्यमिता एवं हस्तशिल्प कौशल प्रशिक्षण प्रदान कर रही हैं। इन प्रयासों से स्थानीय बेरोजगारों को रोजगार मिला है, ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है और सीमापार चुनौतियों से निपटने की सामर्थ्य बढ़ी है।

1. पंजाब

1.1 प्रमुख पहल

  • I.      मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना (मुख्यतः स्टार्टअप)
  • II.     ग्रामीण कौशल केंद्र (RSCs) में रोबोटिक्स, एग्री-प्रोसेसिंग और टेक्सटाइल डिजाइन प्रशिक्षण
  • III.    इन्फोसिस-मोबाइज़्ड कोडिंग कार्यशालाएँ मोहाली में

1.2 सहभागिता दर

  • I.      सीमांत गांवों के 22% युवा कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों से जुड़े
  • II.     महिलाओं की सहभागिता 38%

1.3 आर्थिक प्रभाव

  • I.      औसत वार्षिक आय 2.8–3.2 लाख रुपये
  • II.     स्वरोजगार शुरू करने वाले 45% प्रशिक्षित युवाओं ने 1–2 वर्ष में निवेश पर लाभ देखा

1.4 सरकारी सहायता

  • I.      प्रोत्साहन अनुदान: 1.5–2 लाख रुपये तक
  • II.     नि:शुल्क उपकरण एवं सामग्री

1.5 चुनौतियाँ

  • I.      सीमापार तस्करी के कारण सीमित रॉ मटेरियल की उपलब्धता
  • II.     प्रशिक्षण के बाद स्थानीय बाज़ार में मांग का अभाव

2. जम्मू-कश्मीर

2.1 प्रमुख पहल

  • I.      अटल टिंकरिंग लैब्स (ATL) 500 नई यूनिट्स
  • II.     कृषि साक्षरता केंद्रों में ड्रोन परिचालन प्रशिक्षण
  • III.    स्नातकोत्तर तकनीकी पाठ्यक्रमों में विशेष सीमांत क्षेत्र कोटा

2.2 सहभागिता दर

  • I.      सीमांत पंचायतों के 18% युवा कार्यक्रमों में भागीदार
  • II.     महिलाओं का अनुपात 30%

2.3 आर्थिक प्रभाव

  • I.      प्रशिक्षित युवाओं की औसत वार्षिक आय 2.2–2.6 लाख
  • II.     ड्रोन-आधारित कृषि सेवाओं से 15% अतिरिक्त उपज

2.4 सरकारी सहायता

  • I.      निशुल्क आवास एवं परिवहन सुविधा ATL विद्यार्थियों को
  • II.     अनुसंधान अनुदान: 50,000–1,00,000 रुपये

2.5 चुनौतियाँ

  • I.      सुरक्षा स्थितियों द्वारा अवरुद्ध आवागमन
  • II.     प्रौद्योगिकी की मरम्मत एवं मेंटेनेंस की कमी

3. हिमाचल प्रदेश

3.1 प्रमुख पहल

  • I.      मुख्यमंत्री स्टार्टअप/नवाचार योजना (मुख्यतः कृषि एवं पर्यटन)
  • II.     पर्वतीय मिसिंग लिंक ट्रेनिंग: ऊंचाई पर ट्रेकिंग गाइड एवं एडवेंचर स्पोर्ट्स
  • III.    डिजिटलीकरण कार्यशालाएँ किन्नौर में

3.2 सहभागिता दर

  •  i.     सीमांत इलाकों के 20% युवा प्रशिक्षण लेना स्वीकार
  •  ii.    ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी 35%

3.3 आर्थिक प्रभाव

  •   I.         वार्षिक आय 1.8–2.2 लाख
  •   II.         पर्वतीय पर्यटन गाइडिंग से 25% उच्च आय

3.4 सरकारी सहायता

  •   I.         हिमाचल इनोवेशन काउंसिल अनुदान: 1–5 लाख तक
  •   II.        सीमांत इलाकों में ई-लर्निंग केंद्र

3.5 चुनौतियाँ

  •   I.         दुर्गम सड़कें, मौसम आधारित घंटों के प्रशिक्षण
  •   II.         सीमापार चरवाहों द्वारा अवैध चराई

4. उत्तराखंड

4.1 प्रमुख पहल

  •    I.        वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम 2.0: बॉर्डर टूरिज्म गाइडिंग प्रशिक्षण
  •    II.       मुख्यमंत्री हुनर योजना: पारंपरिक शिल्प एवं हर्बल उत्पाद प्रसंस्करण
  •    III.      सीमा सुरक्षा में टेक्निकल सपोर्ट फील्ड ट्रेनिंग

4.2 सहभागिता दर

  •     I.      सीमाशहर के 24% परिवार प्रशिक्षण से लाभान्वित
  •     II.     महिला प्रशिक्षणार्थियों का अनुपात 42%

4.3 आर्थिक प्रभाव

  •       i.    औसत वार्षिक आय 2–2.4 लाख
  •       ii.    सीमापार पर्यटन से 30% अतिरिक्त आय

4.4 सरकारी सहायता

  •      i.       मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के अंतर्गत 2.5 लाख तक की सब्सिडी
  •      ii.       स्थानीय मार्केट लिंकिंग व E-commerce पोर्टल

4.5 चुनौतियाँ

  •      i.       सीमा पार जंगलों में सुरक्षा जांच
  •      ii.       PPE एवं इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी

समेकित सिफारिशें

  •   I.      सीमापार मार्केट लिंकिंग और सब्सिडी वृद्धि
  •   II.     मोबाइल प्रशिक्षण यूनिट एवं E-Learning केंद्र
  •   III.    सुरक्षा एजेंसियों के साथ समन्वय से आवागमन सुगम
  •   IV.   स्थानीय R&D: भौगोलिक अनुरूप पाठ्यक्रम

5. उत्तर प्रदेश

प्रमुख पहल

बॉर्डर स्किल मिशन: उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों – मेरठ, सहारनपुर, बहराइच, पीलीभीत आदि में बहु-कौशल प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए गए हैं। यहाँ युवाओं को कृषि, पशुपालन, हस्तशिल्प, कंप्यूटर स्किल और लघु उद्यमिता की कार्यशालाओं में प्रशिक्षित किया जाता है।

युवा उद्यमिता योजना: खाद्य प्रसंस्करण, माइक्रो-इंडस्ट्री और मूल्यवर्धित स्थानीय उत्पादन को प्रोत्साहित करने वाली स्टार्टअप इन्क्यूबेशन, सरकारी क्रेडिट-लिंक्ड निवेश मंच द्वारा संभव हो रही है।

सीमा IT पाठशालाएँ: अच्छी जनसंख्या घनत्व वाले बॉर्डर ब्लॉकों में डिजिटल मार्केटिंग, साइबर सेक्यूरिटी, मोबाइल एप डेवेलपमेंट और नो-कोड/लो-कोड प्लेटफॉर्म ट्रेनिंग दी जाती है। इससे सीमांत युवा डिजिटल बाजार से जुड़ पा रहे हैं।

सहभागिता दर

सीमावर्ती गाँवों के करीब 19% युवक-युवती औपचारिक कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों में संगठित हो चुके हैं, जबकि सरकारी आंकड़ों के अनुसार महिलाओं की सक्रिय भागीदारी 34% रही है – जिसमें सबसे अधिक ग्रामीण महिला स्वयं सहायता समूह शामिल हैं।

आर्थिक प्रभाव

समग्र प्रशिक्षण के परिणामस्वरूप प्रशिक्षित युवाओं की औसत वार्षिक आय 1.7–2.5 लाख रुपये तक पहुँची है। करीब 38% प्रशिक्षित युवाओं ने पारिवारिक/हैंडलूम स्टार्टअप में निवेश किया, जिससे न केवल परिवार की समृद्धि, बल्कि क्षेत्रीय उद्योग की आत्मनिर्भरता भी बढ़ी है।

सरकारी सहायता

कौशल विकास में 2.2 लाख रुपये तक आलोच्य अनुदान, मुफ्त प्रमाणित प्रशिक्षण, डिजिटल टूलकिट, और स्थानीय अवसंरचना जैसी सहायताएँ उपलब्ध हैं। मार्गदर्शक नियुक्ति, सरकारी पोर्टल लिंकिंग, और आंतरराज्यीय सहभागिता योजनाएँ नियमित रूप से लागू हो रही हैं।

चुनौतियाँ

सीमांत क्षेत्रों में पलायन दर अधिक है, जिससे प्रशिक्षित युवाओं का शहरों की ओर जाना जारी है। इंटरस्टेट अवैध तस्करी, अनौपचारिक बाजार और सरकारी अनुदान वितरण की जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया स्थानीय उन्नति में बाधक बन रही है।

6. बिहार

प्रमुख पहल

सीमांत युवा शक्ति योजना: बहुपरिजन कौशल प्रशिक्षण जैसे कृषि यांत्रिकी, डेयरी प्रबंधन, बांस और मखाना शिल्प, मछली पालन के उद्यमिता प्रशिक्षण कैंप्स चिन्हित बॉर्डर ब्लॉकों (जैसे किशनगंज, चंपारण, सीमांचल) में चलाए जा रहे हैं।

लाइफ कौशल नेटवर्क: रोजगारपरक साक्षरता, रोजगार पोर्टल, करियर काउन्सलिंग मॉड्यूल विकसित हुए हैं।

पारंपरिक शिल्प ट्रेनिंग: जैसे मधुबनी चित्रकला, मुजफ्फरपुर लिची उद्योग, स्थानीय GI टैग युक्त उत्पादों को अंतर्राष्ट्रीय बाजारों तक पहुँचाने की दिशा में केंद्रित किया गया है।

सहभागिता दर

सीमा जिलों के 15% किशोर-युवाओं ने एनएसडीसी एवं राज्य पोर्टल प्रशिक्षिण में भाग लिया; महिला सहभागिता 32% रही जिसमें स्वयं सहायता समूह एवं महिला शिल्पकार प्रमुख हैं।

आर्थिक प्रभाव

प्रशिक्षित युवाओं की औसत आय 2.0–2.4 लाख पहुंची है; 29% नव प्रशिक्षित स्वरोजगार क्षेत्र में सक्रिय हैं, जिससे कृषि आधारित आय में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।

सरकारी सहायता

1.5 लाख तक की क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी, महिला उद्यमों को प्राथमिकता अनुदान, और एमएसएमई पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन/प्रदर्शन की राज्यसभा/पंचायतीराज सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

चुनौतियाँ

बाढ़ व भू-क्षरण से प्रशिक्षण केंद्रों का अस्थायित्व और सीमावर्ती नदी-जंगल क्षेत्रों में अवैध व्यापार मुख्य चुनौतियाँ हैं; साथ ही जीआई उत्पाद की मार्केट पहुंच सीमित है।

7. पश्चिम बंगाल

प्रमुख पहल

बॉर्डर कजिन्स स्किल परियोजना: चाय, जूट प्रोसेसिंग, हैंडीक्राफ्ट, मछली पालन व उद्यमिता प्रशिक्षण सीमावर्ती ब्लॉकों में केंद्रित हैं।

एसटीईएम एजुकेशन सेंटर्स: रेलवे सीमा जिलों में स्किल ट्रेनिंग केंद्र खुल रहे हैंयुवा डिजिटल और मेकेनिकल स्किल ले पा रहे हैं।

महिला उद्यमिता फेलोशिप: महिला-ब्यूटी, फूड प्रॉसेसिंग, सिलाई-बुनकरी कार्यशालाओं में 40% तक पोषण मिला।

सहभागिता दर

20% सीमांत ब्लॉकों के युवा ट्रेड स्किल ट्रेनिंग से जुड़े; महिला प्रशिक्षण दर 40% है।

आर्थिक प्रभाव

औसत वार्षिक आय 1.9–2.8 लाख, GI जूट, चाय व ब्यूटी सेक्टर में 28% स्वरोजगार वृद्धि दर्ज की गयी।

सरकारी सहायता

स्टार्टअप बंगाल अनुदान – 2 लाख तक; सीमा-कनेक्ट पोर्टल व E-Marketing से उत्पादों की बाजार पहुंच में वृद्धि हुई है। ग्राम संग्रहण, वित्त पोषण प्रोत्साहन, कल्याणकारी R&D प्रोग्राम भी चलाए जा रहे हैं।

8. राजस्थान

प्रमुख पहल

डेज़र्ट स्किल हब्स: राजस्थान के पश्चिमी सीमावर्ती जिलों – जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर आदि में रेगिस्तानी क्षेत्र के अनुकूल कौशल केंद्र स्थापित किए गए हैं। यहाँ पशुपालन, बालू खनन, हस्तशिल्प (राजस्थानी थेवा कला, खादी, बांस शिल्प), ऊँट पालन और जैविक कृषि की प्रशिक्षण दी जाती है।

वीरांगना कौशल योजना: महिलाओं के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं जिनमें प्रमुख हैं –  पारंपरिक गहनों का निर्माण, टेक्सटाइल डिजाइन, होटल प्रबंधन, और पर्यटन सेवाएँ।

सीमा पर्यटन और सांस्कृतिक केंद्र: जैसलमेर, बाड़मेर के सीमांत गाँवों में पर्यटन-केंद्रित कौशल प्रशिक्षण उपलब्ध कराए जाते हैं जिनमें चर्च्य हैं – गेस्ट हाउस प्रबंधन, ट्रेकिंग गाइड, और सांस्कृतिक कार्यक्रम संचालन।

सहभागिता दर

सीमावर्ती गाँवों के 22% युवाओं ने प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लिया हैं; महिलाओं की भागीदारी 38% है, जिसमें राजस्थानी पारंपरिक शिल्पकार और महिला उद्यमी प्रमुख हैं।

आर्थिक प्रभाव

प्रशिक्षित युवाओं की औसत वार्षिक आय 1.8–2.6 लाख रुपये हो जाती है। 35% प्रशिक्षित युवा पर्यटन और हस्तशिल्प सेक्टर में स्वरोजगार कर रहे हैं, जिससे सीमांत गाँवों की अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ है। राजस्थान की GI टैग कलाओं को अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में पहुँचाने में सफलता मिली है।

सरकारी सहायता

2.5 लाख तक स्वरोजगार अनुदान, महिला-केंद्रित 0% ब्याज ऋण योजना, कच्ची सड़कों से जुड़े गाँवों को विशेष रसद सहायता, और राजस्थान हस्तशिल्प मार्केटिंग बोर्ड द्वारा उत्पाद बिक्री सुविधा उपलब्ध हैं।

चुनौतियाँ

चरम जलवायु (अत्यधिक गर्मी, बारिश की कमी), पानी की कमी, पर्यटन में मौसमी बाधाएँ, और सीमापार तस्करी प्रमुख समस्याएँ हैं। साथ ही, रेगिस्तानी क्षेत्रों में डिजिटल कनेक्टिविटी की कमी भी विकास में बाधक है।

9. गुजरात

प्रमुख पहल

गुजरात बॉर्डर इनोवेशन हब्स: कच्छ, बनासकांठा, पालनपुर आदि सीमावर्ती जिलों में उद्यमिता और तकनीकी कौशल का विकास केंद्र स्थापित किए गए हैं। यहाँ खेती-बाड़ी तकनीक, जलीय संसाधन, कपड़ा उद्योग, और डिजिटल लेनदेन की ट्रेनिंग दी जाती है।

कच्छ आर्टिजन स्किल प्रोग्राम: पारंपरिक कच्छी कढ़ाई, मिट्टी के बर्तन, और बांस शिल्प को आधुनिक डिजाइन के साथ संयोजित करते हुए युवाओं को प्रशिक्षित किया जाता है।

फिशरीज़ और मेरीन रिसोर्सेज़ स्किल: गुजरात के समुद्री सीमांत इलाकों में मछली पालन, समुद्री उत्पाद प्रसंस्करण, और निर्यात-केंद्रित कौशल विकास की व्यवस्था है।

सहभागिता दर

सीमा जिलों के 21% युवा कौशल प्रशिक्षण में सक्रिय हैं; महिलाओं की भागीदारी 36% है, जिसमें कच्छी कारीगर महिलाएँ और मछली प्रसंस्करण कार्य में संलग्न महिलाएँ शामिल हैं।

आर्थिक प्रभाव

प्रशिक्षित युवाओं की औसत आय 2.1–2.7 लाख रुपये है; 41% ने सूक्ष्म उद्योग स्थापित किए हैं। कच्छ की हस्तशिल्प और समुद्री उत्पाद निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है – विशेष रूप से यूरोप और अमेरिका के बाजारों में।

सरकारी सहायता

3 लाख तक स्टार्टअप अनुदान, महिला उद्यमियों के लिए विशेष फंड, गुजरात विकास बोर्ड द्वारा निर्यात सहायता, और APEDA (कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात विकास प्राधिकरण) के साथ सहभागिता से बाजार पहुँच में सुधार हुआ है।

चुनौतियाँ

पाकिस्तानी सीमा से तस्करी, जल संकट (विशेष रूप से कच्छ में), बाजार की अस्थिरता, और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मानकों का अनुपालन मुख्य बाधाएँ हैं।

10. महाराष्ट्र

प्रमुख पहल

महाराष्ट्र बॉर्डर कम्युनिटी स्किल प्रोग्राम: नांदेड़, परभणी, बुलढाणा जैसे सीमावर्ती जिलों में कृषि प्रौद्योगिकी, दुग्ध उद्योग, जैविक खेती, और ऑनलाइन मार्केटिंग का प्रशिक्षण दिया जाता है।

महिला सशक्तिकरण कौशल मिशन: विशेषकर ग्रामीण महिलाओं के लिए दुग्ध सहकारिताएँ, वस्त्र उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, और डिजिटल साक्षरता की सुविधाएँ दी गई हैं।

सीमांत शहरी कौशल केंद्र: सीमांत शहरों में सेवा क्षेत्र (सूचना प्रौद्योगिकी, होटल प्रबंधन, संचार, बैंकिंग) के लिए कौशल विकास का प्रबंध किया गया है।

सहभागिता दर

सीमा क्षेत्रों के 18% युवा औपचारिक कौशल प्रशिक्षण में जुड़े हैं; महिलाओं की भागीदारी 35% है।

आर्थिक प्रभाव

प्रशिक्षित युवाओं की औसत वार्षिक आय 2.0–2.5 लाख रुपये है; 33% दुग्ध सहकारिताओं और कृषि-आधारित उद्यमों में सक्रिय हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुदृढ़ता आई है।

सरकारी सहायता

2.0 लाख तक क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी, महिला सहकारिताओं को 50% अनुदान, और महाराष्ट्र कृषि विपणन बोर्ड द्वारा सीधी बिक्री सुविधा की व्यवस्था उपलब्ध कराई गई है।

चुनौतियाँ

दक्कन पठार का सूखा, और ऋणग्रस्तता (विशेषकर कृषि क्षेत्र में) मुख्य समस्याएँ हैं।

11. कर्नाटक

प्रमुख पहल

कर्नाटक बॉर्डर इकोनॉमी स्किल स्कीम: बेलगाम, बीजापुर, चिक्कबल्लापुर आदि सीमावर्ती जिलों में कॉफी, मसाले, रेशम, और जैविक खेती का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

हाथ-करघा और जैविक कृषि प्रशिक्षण: पारंपरिक कर्नाटक साड़ियों, जैविक कॉफी, और दालचीनी उत्पादन में विशेषज्ञता के लिए कौशल विकास व्यवस्था की गई है।

सीमांत पर्यटन कौशल केंद्र: होटल प्रबंधन, गाइडिंग, और सांस्कृतिक संरक्षण की ट्रेनिंग दी जाती है।

सहभागिता दर

सीमा क्षेत्रों के 16% युवा प्रशिक्षण में संलग्न हैं; महिलाओं की भागीदारी 33% है।

आर्थिक प्रभाव

प्रशिक्षित युवाओं की औसत वार्षिक आय 1.9–2.4 लाख रुपये है; 30% जैविक खेती और हस्तशिल्प सेक्टर में स्वरोजगार कर रहे हैं। कर्नाटक की GI टैग उत्पादों (कॉफी, रेशम) को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में महत्वपूर्ण पहुँच मिली है।

सरकारी सहायता

2.2 लाख तक अनुदान, कार्बनिक खेती प्रमाणन सब्सिडी, और निर्यात प्रोत्साहन स्कीम की व्यवस्था उपलब्ध है।

चुनौतियाँ

  1. कॉफी की गिरती कैश क्रॉप कीमतें: कर्नाटक के सीमांत कृषि क्षेत्रों में कॉफी की अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतों में लगातार गिरावट से किसान और प्रशिक्षित युवाओं की आय में भारी नुकसान हो रहा है, जिससे कृषि-आधारित उद्यमिता प्रभावित हो गई है।
  2. जलवायु परिवर्तन और सूखा: दक्कन पठार पर पड़ने वाले सूखे से जल की कमी, फसलों की विफलता, और बागान-आधारित अर्थव्यवस्था को गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है, जिससे प्रशिक्षित युवाओं के लिए रोजगार सीमित हो जाता है।
  3. जैविक खेती प्रमाणन और बाजार पहुँच: केरल और तमिलनाडु की तुलना में कर्नाटक में जैविक उत्पादों के लिए अंतर्राष्ट्रीय प्रमाणन, ब्रांडिंग, और उच्च-मूल्य बाजार तक पहुँच अभी भी अपर्याप्त है, जिससे स्थानीय किसान और प्रशिक्षित उद्यमियों को न्यूनतम मुनाफा मिलता है।

12. केरल

प्रमुख पहल

केरल बॉर्डर कम्युनिटी डेवलपमेंट स्किल प्रोग्राम: कन्नूर, कासरगोड़, पठानमथिट्टा जैसे सीमावर्ती जिलों में मसाला उत्पादन, नारियल प्रसंस्करण, मछली-पालन, और पर्यटन सेवा की ट्रेनिंग दी जाती है।

एक्वाकल्चर और मेरीन रिसोर्सेज़ स्किल: समुद्री मत्स्य पालन, झींगा पालन, और समुद्री उत्पाद निर्यात में विशेषज्ञता प्राप्त करने के लिए कौशल विकास प्रशिक्षण की व्यवस्था है।

पारंपरिक शिल्प पुनरुद्धार योजना: हथकरघा, कोकोनट कार्विंग, और स्थानीय हस्तशिल्प को आधुनिक डिजाइन से जोड़ना के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है।

सहभागिता दर

सीमा क्षेत्रों के 19% युवा प्रशिक्षण में भाग ले रहे हैं; महिलाओं की भागीदारी 41% है (भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में सर्वाधिक), जिसमें तटीय महिला मछुआरे और स्वयं सहायता समूह प्रमुख हैं।

आर्थिक प्रभाव

प्रशिक्षित युवाओं की औसत वार्षिक आय 2.2–2.9 लाख रुपये है; 39% मछली पालन, मसाला निर्यात, और पर्यटन सेक्टर में स्वरोजगार कर रहे हैं। केरल के बागान उत्पाद (मसाले, चाय, काली मिर्च) को अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में शीर्ष स्थान मिला है।

सरकारी सहायता

3.0 लाख तक अनुदान, महिला समुद्री मछुआरों के लिए विशेष फंड, कोकोनट डेवलपमेंट बोर्ड द्वारा प्रसंस्करण सहायता, और केरल स्पाइसेस बोर्ड द्वारा मसाला निर्यात को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

चुनौतियाँ

  1. मछली पालन में आयातित प्रतिस्पर्धा: अंतर्राष्ट्रीय मछली बाजार में सस्ते आयातित उत्पादों के कारण स्थानीय मछुआरों और प्रशिक्षित युवाओं को आजीविका संकट का सामना करना पड़ रहा है, जिससे आय में ठहराव आ गया है।
  2. जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाएँ: केरल में मानसून की बाढ़, तूफान, और समुद्री तटीय क्षरण की घटनाएँ नियमित रूप से होती हैं, जिससे मत्स्य पालन, कृषि, और पर्यटन क्षेत्र में बड़े नुकसान होते हैं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की निरंतरता प्रभावित होती है।
  3. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मानकों का कड़ा अनुपालन: केरल के निर्यातक उत्पादों (मसाले, समुद्री पदार्थ, कोकोनट) को यूरोपीय और अमेरिकी बाजारों में कड़े गुणवत्ता, पर्यावरणीय, और सामाजिक मानदंड का पालन करना पड़ता है, जिससे छोटे उत्पादकों और स्वरोजगार करने वाले युवाओं के लिए निर्यात आधारित आय अक्सर जोखिमपूर्ण हो जाती है।डिजिटल विभाजन और बाजार संपर्क की कमी: केरल के दूरस्थ सीमांत गाँवों में इंटरनेट कनेक्टिविटी, ई-कॉमर्स तक पहुँच, और वर्तमान बाजार सूचना की कमी से प्रशिक्षित युवाओं को उच्च मूल्य बाजार तक पहुँचने में बाधा आती है, जिससे उनकी आय सीमित रह जाती है।

ध्यातव्य है – भारत के सीमावर्ती राज्यों – राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, और केरल में कौशल विकास ने न केवल स्थानीय युवाओं को सशक्त बनाया है, बल्कि सीमांत अर्थव्यवस्था को भी नई गति दी है। प्रत्येक राज्य के अनूठे संसाधन, परंपरा, और भौगोलिक अवस्थान के अनुसार डिज़ाइन किए गए कौशल कार्यक्रम सीमांत जागरण के व्यापक दृष्टिकोण को साकार कर रहे हैं। भले ही जलवायु, तस्करी, और बाजार संबंधी चुनौतियाँ बनी हुई हैं, लेकिन सरकारी समर्थन, स्थानीय उद्यमिता, और सामुदायिक भागीदारी से सीमांत क्षेत्र अब राष्ट्र निर्माण के सशक्त आधार बन रहे हैं।

सीमा नदी-पार बाढ़, अवैध व्यापार, डिजिटल डिवाइड, आंतरिक बाज़ार से दूरी, लॉजिस्टिक्स का अभाव दैनिक व्यावसायिक प्रगति में बाधक बने हुए हैं।

कौशल विकास ने सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थानीय युवाओं, महिलाओं और जनजातीय समुदायों को नया आत्मविश्वास, सांस्थानिक शक्ति और आर्थिक उन्नति प्रदान की है। भले ही पलायन, तस्करी, प्राकृतिक बाधाएँ और बाज़ार की सीमाएँ बनी हुई हैं – लेकिन सरकारी स्कीम, ई-लर्निंग, R&D, मोबाइल इकाइयों व सीमाजन की भागीदारी ने सीमांत जागरण को राष्ट्र सुरक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण व सामाजिक समावेशिता की दिशा में एक नया आधार बना दिया है। जैसे-जैसे स्थानीय समस्याओं पर वैज्ञानिक व प्रशासनिक समन्वय बढ़ेगा, सीमांत कौशल विकास राष्ट्र-निर्माण में और प्रभावी भूमिका निभा सकेगा।

इस वैज्ञानिक अवलोकन से स्पष्ट है कि प्राथमिक तौर पर सीमांतवासी कौशल प्रशिक्षण से आर्थिक सशक्तिकरण पा रहे हैं, किंतु सीमापार सुरक्षा बाधाएं, अवसंरचना एवं बाज़ार जुड़ाव में सुधार आवश्यक है ताकि सीमा जागरण की प्रक्रिया पूर्णतः सार्थक हो सके।