सीमा दर्शन यात्रा: माणा प्रथम गाँव, बद्रीनाथ (उत्तराखंड)
माणा –उत्तराखण्ड में देश का प्रथम गाँव, बद्रीनाथ सीमा-दर्शन (20–24 जून 2025) पर्यटन नहीं, चेतना की यात्रा थी – जहाँ नक्शे की रेखा जीवन की नाड़ी बनकर धड़कती दिखी। पतली हवा, ऊँचाई की तपस्या और सीमांत-जीवन की सादगी के बीच 18 प्रतिभागियों और एक शिशु का दल सीमा सुरक्षा, स्थानीय संस्कृतियों, पारिस्थितिकी और भारत की भू-रणनीतिक उपस्थिति को आँखों-देखे अनुभव में बदले बिना नहीं लौटा। आख़िरी गाँव माणा में संवाद हुए – रोज़गार, पलायन, सेना-ग्राम तालमेल, जल-स्रोत, कचरा-प्रबंधन; बद्रीनाथ में भीड़-प्रबंधन और श्रध्दा-संयम की सीखें दर्ज हुईं। निष्कर्ष सादा रहा: सीमाएँ फेंस से नहीं, भरोसे से सुरक्षित रहती हैं; और भरोसा प्रशासन, समाज और सैनिक तीनों की साझा अनुशासन से बनता है।
दल का चेहरा देश का चलता-फिरता कटआउट था – छह महिलाएँ/लड़कियाँ; शोध-विद्वान, सहायक प्रोफेसर, चार्टर्ड एकाउंटेंट, वकील, आईटी पेशेवर और व्यवसायी – जिसने बहस को डेटा, कानून, टेक और स्थानीय संवेदना से समृद्ध किया। चार रात-पाँच दिन के रोज़नामचे से पाँच क्रियात्मक संकेत उभरे: सीमांत-ग्रामों में नागरिक स्वयंसेवक तंत्र; होम-स्टे, और ‘लो-इम्पैक्ट’ यात्रा आचार; विश्वविद्यालय-आधारित सीमा-अध्ययन इंटर्नशिप और स्थानीय डेटा-बैंक; सेना-प्रशासन-ग्राम तिमाही संवाद; और डिजिटल कनेक्टिविटी व आपदा-तैयारी का तेज़ी से उन्नयन। अंत में एक वाक्य मन में ठहरा – सीमा वहाँ से शुरू होती है जहाँ नागरिक मन देश के लिए जागरूक होता है; बाकी सब उसी जागरूकता का विस्तार है।