भारत में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग एक-तिहाई योगदान देता है और 11 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है। वर्षों से, भारत सरकार ने छोटे व्यवसायों के लिए पंजीकरण, संचालन और सरकारी सहायता तक पहुंच को आसान बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। इस यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक रही है एमएसएमई पंजीकरण प्रणाली का डिजिटल रूपांतरण – जिसने विशेष रूप से दूर-दराज़ और सीमावर्ती क्षेत्रों, जैसे उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (एनईआर) में लाखों उद्यमियों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ा है।
कागज़ से डिजिटल तक: सुधार की यात्रा 
पहले, एमएसएमई पंजीकरण का अर्थ था उद्यमी ज्ञापन (ईएम-II) प्रणाली (2007–2015) के तहत ज़िला उद्योग केंद्रों (डीआईसी) के चक्कर लगाना। इस अवधि में पूरे देश में केवल लगभग 22 लाख एमएसएमई पंजीकृत हुए, जिनमें से एनईआर की भागीदारी मात्र 1.4% थी। इन बाधाओं को पहचानते हुए, सरकार ने 2015 में ‘उद्योग आधार ज्ञापन’ (यूएएम) शुरू किया –  जो एक पेज का, आधार आधारित ऑनलाइन फॉर्म था, जिससे पंजीकरण निःशुल्क, सरल और तत्काल हो गया। इस डिजिटल सुधार से 2020 तक पंजीकृत एमएसएमई संख्या एक करोड़ से अधिक पहुंच गई।
अगला बड़ा कदम जुलाई 2020 में आया, जब सरकार ने ‘उद्योग पंजीकरण पोर्टल’ शुरू किया, जिसे पैन और जीएसटी डेटाबेस से जोड़ा गया। इसने एमएसएमई पंजीकरण को पूरी तरह डिजिटल और सत्यापन योग्य बना दिया। अब उद्यमी देश में कहीं से भी बिना किसी कागज़ी दस्तावेज़ के पंजीकरण कर सकते थे। 2025 तक, 6.13 करोड़ से अधिक एमएसएमई ‘उद्योग’ प्लेटफ़ॉर्म से पंजीकृत हो चुके थे, जो भारत में व्यापार करने की सुगमता में आए डिजिटल परिवर्तन का सशक्त प्रमाण है।
व्यापार और असंगठित उद्यमों का समावेश 
2021 में एक और अहम सुधार के तहत खुदरा और थोक व्यापारियों को भी एमएसएमई की परिभाषा में शामिल किया गया – जिससे लाखों दुकानदारों, वितरकों और स्थानीय सेवा प्रदाताओं को सरकारी लाभों के दायरे में लाया गया। यह सुनिश्चित करने के लिए कि वे सूक्ष्म उद्यम जो जीएसटी या पैन नंबर के बिना थे, पीछे न रह जाएं, सरकार ने जनवरी 2023 में ‘उद्योग असिस्ट प्लेटफ़ॉर्म’ (यूएपी) लॉन्च किया, जिसका संचालन सिडबी (SIDBI) द्वारा किया जाता है। यह प्लेटफ़ॉर्म ऐसे सूक्ष्म उद्यमों को आधिकारिक मान्यता देता है और प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (PSL) के तहत लोन तक पहुंच प्रदान करता है।
उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (एनईआर) को सशक्त बनाना 
डिजिटल क्रांति का सबसे गहरा प्रभाव उत्तर-पूर्वी क्षेत्र पर पड़ा है, जिसमें आठ राज्य शामिल हैं – अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा। एमएसएमई पंजीकरण इस क्षेत्र में 30,851 इकाइयों (2007–2015, ईएम-II) से बढ़कर 82,537 (2015–2020, उद्योग आधार) और फिर 17 लाख से अधिक (2020–2025, उद्योग) तक पहुंच गया। भारत के कुल एमएसएमई में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी 0.81% से बढ़कर 2.9% हुई, जो इंटरनेट व सड़क संपर्क, नीतिगत पहुंच, बुनियादी ढांचे और उद्यमशीलता की भावना में सुधार को दर्शाती है।
असम, त्रिपुरा और मणिपुर अग्रणी राज्य बनकर उभरे हैं, जो क्षेत्र के लगभग 88% एमएसएमई का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन उद्यमों ने न केवल स्थानीय रोजगार और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया है, बल्कि भारत की सीमाई अर्थव्यवस्था को भी मज़बूत किया है – जिससे पलायन पर रोक लगी है और चीन, बांग्लादेश, म्यांमार तथा भूटान से सटी संवेदनशील सीमाओं पर स्थिरता और सुरक्षा बनी रही है।
डिजिटल और समावेशी भविष्य की ओर 
आज एमएसएमई उद्यमी एकीकृत डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकते हैं, ऋण के लिए आवेदन कर सकते हैं और लाभों की स्थिति ऑनलाइन ट्रैक कर सकते हैं। ‘उद्योग असिस्ट’ के तहत असंगठित उद्यमों को शामिल करने और व्यापारिक गतिविधियों को मान्यता देने से यह सुनिश्चित हुआ है कि कोई भी उद्यमिता पीछे न छूटे। भारत सरकार की डिजिटलाइजेशन मुहिम ने एमएसएमई पारिस्थितिकी तंत्र को पारदर्शिता, समावेश और सशक्तिकरण का आदर्श बना दिया है। उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में इसने न केवल उद्यमिता को बल दिया है, बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय एकता को भी सुदृढ़ किया है। इन पहलों की सफलता यह साबित करती है कि प्रौद्योगिकी आधारित शासन न केवल क्षेत्रीय असमानताएँ मिटा सकता है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को सशक्त कर ‘सबका साथ, सबका विकास’ के मंत्र को साकार कर सकता है।