मंथन: 3, 2025-स्थान: मालवीय स्मृति भवन, नई दिल्ली, तिथि: 5 नवम्बर2025

मंदिर निर्माण से राष्ट्र निर्माण का संकल्प

  विस्तृत कार्यक्रम रिपोर्ट
आयोजक: सीमा जागरण मंच
सीमा जागरण मंच द्वारा आयोजित मंथन–3  एक ऐतिहासिक और विचारोत्तेजक आयोजन रहाजिसका मुख्य उद्देश्य भारत की सीमाओं पर सांस्कृतिक पुनर्जागरणआध्यात्मिक चेतना और राष्ट्रीय एकता को सशक्त बनाना है। इस वर्ष का सम्मेलन सीमा से सेवा तक: राष्ट्र निर्माण का संकल्प विषय पर केंद्रित थाजो भारत की सीमांत क्षेत्रों में मंदिर निर्माण और सांस्कृतिक विकास के माध्यम से राष्ट्र निर्माण के संकल्प को प्रतिफलित करता है।
कार्यक्रम का संचालन श्री नचिकेत जोशीसंयोजकमंथनसीमा जागरण मंच ने किया। उन्होंने विस्तार से बताया कि मंथन – 3 का यह मंच संतोंसैनिकोंसमाजसेवियों और युवाओं के विचारों का एक अद्वितीय संगम हैजिसका मुख्य उद्देश्य सीमा सुरक्षा और सामाजिक चेतना को एक सूत्र में पिरोना है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सीमांत क्षेत्रों का विकास केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं हैबल्कि इसमें सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनरुद्धार भी शामिल है।
कार्यक्रम का शुभारंभ आदरणीय मुरलीधर जी, अखिल भारतीय संयोजकसीमा जागरण मंच के आशीर्वचन से हुआ। उन्होंने अपने संबोधन में कहा: सीमा केवल भौगोलिक रेखा नहींबल्कि भारत माता की आत्मा की मर्यादा है। सीमाओं की रक्षा तभी स्थायी होगी जब सीमांत समाज सांस्कृतिक-आध्यात्मिक-सामरिक रूप से सशक्त होगा।” यह वक्तव्य सीमा जागरण मंच के मूल दर्शन को प्रतिबिंबित करता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा केवल सैनिक शक्ति पर निर्भर नहीं हैबल्कि सीमांत समाज की सांस्कृतिक चेतना और आत्मविश्वास भी समान रूप से महत्वपूर्ण है।
अवकाशप्राप्त लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) नितिन कोहली जीअध्यक्षसीमा जागरण मंचदिल्ली ने राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमांत विकास के गहरे संबंध पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सीमांत क्षेत्रों में धार्मिक चेतनासांस्कृतिक एकता और आत्मनिर्भरता ही भारत की सामरिक शक्ति का अदृश्य आधार है। जनरल कोहली ने जोर दिया कि सीमा सुरक्षा में स्थानीय जनता की भूमिका केवल निगरानी तक सीमित नहीं हैबल्कि वे राष्ट्र निर्माण के सक्रिय भागीदार हैं।
लेफ्टिनेंट जनरल वी. के. चतुर्वेदी (अवकाशप्राप्त)अध्यक्ष अखिल भारतीय पूर्व सैनिक परिषद ने अपने प्रस्तुतीकरण में भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से घुसपैठ और जनसंख्या पलायन  के वास्तविक आँकड़े साझा किए। उन्होंने महत्वपूर्ण बिंदु रखा:
1. सीमांत इलाकों का पलायन केवल आर्थिक समस्या नहीं है।     2.यह एक सांस्कृतिक और भावनात्मक चुनौती भी है    3. इसे समाजिक-सांस्कृतिक-सामरिक सहभागिता से ही सुलझाया जा सकता है। 4. स्थानीय समाज का सशक्तिकरण और सांस्कृतिक गौरव ही इसका समाधान है   5. जनरल चतुर्वेदी ने रेखांकित किया कि जहाँ सीमांत क्षेत्रों में सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र स्थापित किए जाते हैंवहाँ न केवल पलायन रुकता है बल्कि सामाजिक एकता और राष्ट्रीय चेतना भी बढ़ती है।
मंथन–3 में विविध धार्मिक परंपराओं और आध्यात्मिक परंपराओं के प्रतिष्ठित धार्मिक नेताओं की उपस्थिति रही। इन महापुरुषों का सम्मिलित मंच राष्ट्रीय एकता और सामाजिक सहमति का प्रतीक है:
1.  शैव परंपरा के प्रतिनिधि: महामंडलेश्वर स्वामी अभिषेक चैतन्य गिरि महाराज जी – जगद्गुरु सन्यास आश्रम के प्रमुख      2. दिगंबर स्वामी विवेकानंद सरस्वती जी –  निरंजनी अखाड़ा    3..महामंडलेश्वर रामन गिरि जी महाराज  4.दाती महाराज.   5.. वेदांत परंपरा के प्रतिनिधि: महामंडलेश्वर स्वामी अनंतानंद सरस्वती जी – वेदांत आश्रममेरठ     6. सन्यास परंपरा के अन्य संत: महंत स्वामी श्री ज्ञानानंद सरस्वती जी महाराज   7. संत मथुरादास जी   8.महंत विवेकानंद जी   9. महंत सुरेंद्रनाथ जी    10.दिनेश कुमार जी   11.महाराजा परमवीर सिंह परमार जी   12.बाबा गुरप्रीत सिंह पाँच प्यारे जी.  13.महामंडलेश्वर ऋतु माँ.  14. सहिल नेपाली जी   15.स्वामी अजयदास जी
यह विविध और समावेशी मंच यह संदेश देता है कि सीमा सुरक्षा और राष्ट्र निर्माण धर्मसंप्रदाय या पंथ से परे एक सामान्य लक्ष्य है।
विचार-विमर्श और निर्णय
I. सीमांत मंदिर निर्माण योजना: मंथन–3 का सबसे महत्वपूर्ण और ठोस प्रस्ताव पूर्वोत्तर भारत में 100 मंदिर निर्माण की योजना है। इस योजना की मुख्य विशेषताएं हैं:
1. पूर्वोत्तर भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों में 100 नए मंदिरों का निर्माण   2.वे क्षेत्र जहाँ वर्तमान में कोई मंदिर नहीं है   3.जीर्ण-शीर्ण अवस्था में स्थित प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार

योजना के उद्देश्य:
1. सांस्कृतिक पहचान को सशक्त करना.  2. सीमांत समाज में आस्था और विश्वास का संचार.  3. स्थानीय सामाजिक गतिविधियों का एक धार्मिक केंद्र स्थापित करना.  4.युवाओं को सांस्कृतिक चेतना से जोड़ना   5.शिक्षा कार्यक्रम और स्कूल संचालन.  6. स्वास्थ्य सेवा और औषधि वितरण.  7.कृषि और आजीविका परामर्श.  8.महिला सशक्तिकरण.  9. युवा प्रशिक्षण कार्यक्रम   10.आपातकालीन सहायता
सीमांत गाँवों में धार्मिक जागरण:
1. धार्मिक यात्राओं को प्रोत्साहन: सीमांत क्षेत्रों के लोगों के लिए तीर्थ यात्रा.  2. धार्मिक आयोजन: स्थानीय पर्वों और उत्सवों को राष्ट्रीय महत्व देना.  3. संत-समागम: धार्मिक नेताओं का सीमांत क्षेत्रों का नियमित दौरा   4.आध्यात्मिक प्रशिक्षण: स्थानीय युवाओं का आध्यात्मिक विकास

 

मंथन–3 को निम्नलिखित कारणों से एक महत्वपूर्ण आयोजन माना जा सकता है:
1. व्यापक भागीदारी:संतसैनिकनागरिक प्रशासक और समाजसेवियों का सम्मिलित मंच     2.ठोस योजना: 100 मंदिर निर्माण जैसी व्यावहारिक पहल   3. बहु-आयामी दृष्टिकोण: सांस्कृतिकआध्यात्मिकआर्थिक और राजनीतिक सभी पहलुओं को शामिल करना.  4.राष्ट्रीय एकता: धार्मिक और सामुदायिक विभाजन के परे एकता का संदेश
संदेश
मंथन–3 का संदेश: जिस तरह शरीर के विभिन्न अंग एक-दूसरे को सशक्त करते हैंउसी तरह भारत की सीमांत क्षेत्र समूची राष्ट्रीय शक्ति का आधार हैं। सीमा से सेवा तक की यह यात्रा केवल भौगोलिक नहींबल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परिवर्तन की यात्रा है।