सीमांत ग्राम परिदृश्य
भारत की सीमाएँ केवल कठोर पत्थरों या लुप्त होती तारों का जाल नहीं हैं; वे हमारी सांस्कृतिक धरोहर, रोज़मर्रा की चुनौतियाँ और सामूहिक आकांक्षाओं का मधुर संगम हैं। ये सीमांत ग्राम – जिन्हें आज ‘फ्रंटियर विलेज’ अथवा ‘वाइब्रेंट विलेज’ अथवा ‘प्रथम गाँव’ की संज्ञा दी गई है = देश की अखंडता और समृद्धि की नींव हैं। पितृपरंपराओं की कसावट में पले-बढ़े ये ग्राम, चाहे वह पाकिस्तान की झीलों के किनारे हों, तिब्बतीय ऊँचाइयों में बसे हों, बांग्लादेश की नदियों से लगे हों, या म्यांमार की बरसाती जंगलों में स्थित हों – मुख्यधारा की सुविधाओं से वंचित रहकर भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखते आए हैं। उनकी मिट्टी, उनकी मान्यताएँ और उनका उत्साह ही इस विशाल राष्ट्र को जीवंत बनाए रखते हैं। कठिनाइयाँ, कमजोरियाँ और चुनौतियाँ भी साथ-साथ लगी रही हैं जिन पर विजय पानी है। इसके लिए सीमा जागरण मंच का अटूट प्रयास 1985 से जारी है। इनके बहुआयामी परिदृश्य द्रष्टव्य हैं –
1. सीमांत गांवों की परिभाषा और समस्या-परिदृश्य
सीमांत गांव, जिन्हें ‘फ्रंटियर विलेज’ कहा जाता है, 3 वर्गीकृत श्रेणियों में आते हैं:
I. प्रथम गांव (First Village): अंतर्राष्ट्रीय सीमा से 0–5 किमी की दूरी पर बसे मुख्य गांव।
II. द्वितीय गांव (Second Village): प्रथम से 10 किमी भीतर स्थित उपनगरीय या कृषक गांव।
III. वाइब्रेंट विलेज (Vibrant Village): पायलट परियोजना के तहत हर सीमांत ब्लॉक में चयनित किमी पर बसे गांव, जहाँ विशेष विकास मॉडल लागू होता है।
इन गांवों की मुख्य समस्याएँ:
i. भौगोलिक दुर्गमियता – पहाड़ी, मरुस्थलीय या दलदली इलाकों में आवागमन कठिन।
ii. बुनियादी सुविधाएँ – बिजली, सड़क, पानी, स्कूल, अस्पताल की समस्याएँ।
iii. संसाधन-आभाव – स्वास्थ्यकर्मी, शिक्षामित्र, कृषि तकनीक और वित्तीय साधनों की कमी।
iv. संचार दूरी – डिजिटल कनेक्टिविटी का अभाव, प्रशासनिक सेवा केंद्र से दूरी।
v. सुरक्षा-चिंता – दिन-रात सीमा पर गश्त होती है; परन्तु परिवारों को आत्मरक्षा प्रशिक्षण की कमी।
2. 2014 के बाद विकास की प्रमुख पहल
2.1 आधारभूत संरचना और सुरक्षा संयोजन
i. प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY): पहाड़, रेतीले और दलदलीन सीमांत में 1,63,000 से अधिक बसाहटें मुख्य मार्गों से जुड़ीं; बाज़ार तक पहुँच का समय 40% तक घटा।
ii. 220 केवी श्रीनगर–लेह विद्युत् परियोजना: लद्दाख के प्रथम गांवों में 24×7 बिजली पहुंचाई; स्थानीय कृषि-आधारित उद्योग चालू।
iii. अर्धसैनिक गढ़बाढ़ सम्प्रेषण: BSF, ITBP, SSB, Assam Rifles ने सीमा के प्रथम गांवों में सामुदायिक सुरक्षा चौकियाँ स्थापित कीं, जहाँ स्थानीय युवाओं को संचार, प्राथमिक चिकित्सा व पहाड़ आरोहण शिक्षा मिली।
2.2 डिजिटल कनेक्टिविटी एवं ई-सेवाएँ
i. भारतनेट (BharatNet): 1,500 से अधिक प्रथम गांवों में हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड; ऑनलाइन शिक्षा, टेलीमेडिसिन व ई-गवर्नेंस केंद्र स्थापित।
ii. डिजिटल सिक्योरिटी हब: सीमांत ब्लॉकों में साइबर जागरूकता कैंप; किसान, महिलाओं व युवाओं को डिजिटल बैंकिंग ट्रेनिंग।
2.3 मानव विकास – स्वास्थ्य व शिक्षा
i. मोबाइल हेल्थ यूनिट एवं टेलीमेडिसिन: साप्ताहिक दौरे से गांवों में विशेषज्ञ चिकित्सक सेवाएँ; आपातकालीन दूरसंचार-आधारित ऑपरेशन।
ii. स्मार्ट क्लासेज: 500+ प्रथम और द्वितीय गांवों में स्थापित; भौगोलिक दूरी की वजह से पढ़ाई छूटने वाले बच्चों की संख्या 60% तक कम।
iii. मुख्यमंत्री बाल सशक्तिकरण योजना: बालिका शिक्षा व पोषण पर विशेष ध्यान, टीकाकरण कवरेज 90% पार।
2.4 स्वरोजगार एवं कौशल विकास
i. दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना: सीमांत युवाओं को हस्तशिल्प, बुनाई, ऐग्रो-प्रोसेसिंग में ट्रेनिंग; स्वरोजगार 50,000 से अधिक युवाओं को मिला।
ii. ग्रामीण स्टार्टअप फंड: लघु उद्योग के लिए 2,000 करोड़ का अनुदान; दलित, आदिवासी व पशुपालन आधारित व्यवसायों का विस्तार।
3. परिणाम एवं प्रगति
आर्थिक सशक्तिकरण:
i. प्रति परिवार औसत वार्षिक आय में 35% की वृद्धि।
ii. कृषि सततता के लिए 25% अधिक सिंचाई उपक्रम।
सामाजिक समरसता:
i. महिलाओं का श्रमबल 45% बढ़ा; स्थानीय पंचायतों में निर्णय-सत्रों में बराबर प्रतिनिधित्व।
ii. सांस्कृतिक मेले – ‘सेना-ग्राम उत्सव’ में सीमा सुरक्षा बल और ग्रामीण साझा मंच बन गये।
राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव:
i. सीमावर्ती घुसपैठ प्रयास 70% कम; स्थानीय निगरानी थानों से इंटेलिजेंस साझेदारी मजबूत।
ii. सामुदायिक पुलिसिंग से नागरिक-सैनिक भरोसे में वृद्धि।
4. भविष्य की चुनौतियाँ
i. स्थिर वित्त पोषण: योजनाओं की निरंतरता हेतु मल्टी-स्टेकहोल्डर मॉडल तैयार करना।
ii. जलवायु अनुकूलन: हल्की-ताकत सुरक्षा ढांचे में पर्यावरणीय आपदाओं को मध्यनजर लाना।
iii. तकनीकी आत्मनिर्भरता: टेलीमेडिसिन, दूरस्थ शिक्षा व स्मार्ट ग्रिड में ग्रामीण-निर्मित समाधानों को प्राथमिकता देना।
iv. सांस्कृतिक संरक्षण: विकास के साथ पारंपरिक ज्ञान, लोक कला, बोली व त्योहारों को संरक्षित करना।
सीमांत ग्राम केवल भौगोलिक सीमारेखाओं के चिह्न मात्र न होकर, समग्र राष्ट्र की आत्मा के अविभाज्य और पावन अंग हैं – जैसे शरीर में प्राणवायु का संचार होता है, वैसे ही ये ग्राम राष्ट्रीय चेतना के प्राणाधार हैं। सन् 2014 के पश्चात् प्रारंभ हुई समेकित आधारभूत-संरचना की स्थापना, डिजिटल सशक्तिकरण के माध्यम से ज्ञान-प्रसार, स्वास्थ्य–शिक्षा के क्षेत्र में आमूल परिवर्तन तथा स्थानीय स्वरोजगार के संवर्धन से इन ग्रामों की स्थायी उन्नति का मार्ग प्रशस्त हुआ है। सुषुप्त भूमि में नवजीवन का संचार हो रहा हो।









