भारत की सीमाएँ : विरासत की रक्षा, भविष्य का निर्माण
साइबर से सिंधु तक: सीमा सुरक्षा का नया युग
राष्ट्र-रक्षा की सीमाएँ अब धरती, जल, आकाश और डिजिटल चारों आयामों में विस्तृत
भारत की सीमाएँ केवल मानचित्रों पर अंकित सूखी रेखाएँ नहीं, अपितु वे हमारे राष्ट्रस्वाभिमान की अटूट दुर्गप्राचीरें हैं, जिन्हें अक्षुण्ण बनाए रखना हमारा परम धर्म, परम व्रत और परम संकल्प है। यह कवच सिंधु-सागर की गूंजती लहरों से हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों तक फैला हुआ है, जहाँ हमारी सांस्कृतिक विरासत, वैचारिक एकता और आर्थिक समृद्धि का पवित्र अंग बँधा रहता है।
प्राचीन काल से प्रत्येक आक्रमणकारी — चाहे वह राक्षसों का भय हो या साम्राज्यवादी सेनाओं की संगीन तलवार — उन्होंने हमारी आत्मा पर घातक वार किए परन्तु ‘वेष्टित धर्म’ और ‘धर्मात्मा विवेक’ की अलौकिक तलवार ने हर बार उन्हें पराजित किया। आज हमारे सामने वही अभेद्य कवच नई चुनौतियों से टकरा रहा है: साइबर हमले, फेक न्यूज़, जैव–रासायनिक खतरें चुपके से हमारी जागरूकता की कमी भेद कर हमारे आंतरिक आत्मबल में कीटाणु समाने की कोशिश कर रहे हैं।
जहाँ उत्तर दिशा में हिमालय की श्वेतगौरवशाली शिखरमालाएँ शौर्य और साहस का शाश्वत प्रतीक बनी हैं, वहीं छिपे हुए साइबर-जासूसी के जाल हमारी गोपनीय चेतना पर विषधर प्रहार करते हैं। समुद्र का नीलाभ विस्तार केवल तरंगों का नर्तन नहीं, बल्कि वहां गूँजती है हमारी नौसेना की गर्जना; पर उसी के भीतर आर्थिक षड्यंत्रों का गुप्त नेटवर्क हमारी भौगोलिक मर्यादा को पार करने का प्रयत्न कर रहा है।
आज का आकाश केवल तारा-झिलमिल नहीं, साम्राज्यों के मूक युद्ध का रणांगन बन चुका है। धरती की सीमाएँ अब बादलों से ऊपर तक विस्तृत हैं, जहाँ सैकड़ों यांत्रिक नेत्र चौबीसों घंटे निगरानी करते हैं। यहाँ तोपों की गर्जना नहीं सुनाई देती, न राइफल की गोली, परन्तु सूचनाओं की प्रत्येक किरण शत्रु के किले पर बम-बिस्फोट से कम नहीं प्रभाव डालती। भविष्य का युद्ध उस राष्ट्र का होगा जिसके पास “आकाश-आँखें” — सूक्ष्मदर्शी यंत्रों से लैस निगरानी प्रणाली — अधिक होंगी।
इसलिए आज हमारे वैज्ञानिक, सैनिक और निजी उद्योगों का समग्र प्रयास है — अपने आकाश को स्वावलंबी बनाना और अचूक शक्ति प्रदान करना। इतिहास गवाह है कि जिसने आकाश पर प्रभुत्व प्राप्त किया, उसी ने धरती पर वर्चस्व स्थापित किया। उपग्रह और स्वचालित निगरानी यंत्र राष्ट्रीय सुरक्षा की धुरी बन गए हैं; प्रत्येक डेटा–लिंक, प्रत्येक क्षण राष्ट्र की अखण्डता और हमारे अस्तित्व का प्रश्न तय करता है।
सीमावर्ती अर्वा’चीन’ प्रतिद्वंद्वी कोडों की चपल चाल और विषाणुओं की सूक्ष्म व्यूह-रचना से भी हमला कर सकते हैं। वे हमारी ‘रक्षा पंक्ति’ पर केवल बारूद की रेखाएँ नहीं खींचते, बल्कि सूचना-युद्ध की अदृश्य शल्य-धाराओं में लगे रहते हैं। अतः शासन की दूरदर्शी नीतियाँ, विज्ञान की अचूक साधनाएँ और नागरिकों की सतत् चौकसी — नीति, प्रौद्योगिकी और जन-जागरूकता की त्रिमूर्ति ही हमारी यशस्विता अक्षुण्ण रख सकती है।
डिजिटल चौखट पर खड़ा प्रत्येक जागरूक नागरिक, प्रत्येक सुरक्षित पासवर्ड, प्रत्येक सजग क्लिक राष्ट्र-रक्षा की अग्रिम पंक्ति का अदृश्य प्रहरी है। अब केवल तोपों की गर्जना और बंदूकों की गूँज में न उलझकर, कोड-भेदन-कक्षों की मौन तत्परता में भी सामर्थ्य सिद्ध करने की आवश्यकता है। सीमा की अडिग रक्षा हेतु सतत् सीमा जागरण, सीमा से पलायन रोकना और सीमाजन की सक्रिय भागीदारी — ये तीन स्तंभ हमारी सीमाओं को केवल कृषि-भूमि नहीं, बल्कि जीवंत दुर्ग बना देंगे, जहाँ हर पल मातृभूमि की रक्षा और प्रेम की अमर गाथाएँ गूँजती रहेंगी।
भारत की सीमाएँ: आत्मगौरव से आत्मरक्षा तक
- भारत की सीमाएँ केवल मानचित्र रेखाएं नहीं, बल्कि राष्ट्रस्वाभिमान की अटूट दुर्गप्राचीर हैं जिनकी रक्षा हमारा परम धर्म है।
- सीमा की प्रमुख विशेषता यह है कि वे हमारी सांस्कृतिक विरासत, वैचारिक एकता और आर्थिक समृद्धि का अभिन्न अंग हैं।
- प्राचीन आक्रमणकारियों के विरुद्ध ‘वेष्टित धर्म’ एवं ‘धर्मात्मा विवेक’ की तलवार से भारतीय समाज ने हर बार विजय प्राप्त की है।
- आज साइबर हमले, फेक न्यूज और जैव–रासायनिक खतरे सीमा सुरक्षा की नई चुनौतियाँ हैं जो अंदरूनी आत्मबल को संक्रमित कर सकते हैं।
- हिमालय की श्वेत शिखरमालाएँ जहां साहस का प्रतीक हैं, वहीं साइबर-जासूसी की गहन कूटनीतियाँ हमारी गोपनीय चेतना पर विषधर वार कर रही हैं।
- समुद्र का नीलाभ विस्तार नौसेना की गर्जना है, पर साथ ही आर्थिक षड्यंत्रों का गुप्त जाल भी हमारी भौगोलिक मर्यादा को लांघता है।
- आकाश केवल तारों की चौकी नहीं, बल्कि साइबर आक्रमणों और सूचना-युद्ध का रणांगन बन चुका है।
- भविष्य का युद्ध उस देश का होगा जिसके पास सूक्ष्मदर्शी यंत्रों से लैस अधिक ‘आकाश-आँखें’ होंगी।
- भारत के वैज्ञानिक, सैनिक और निजी उद्योग सभी अपना आकाश-निगरानी कौशल स्वावलम्बी बनाने के लिए एकजुट हैं।
- जिनके पास आकाश पर प्रभुत्व है, वही धरती पर वर्चस्व भी स्थापित करता है — इतिहास इसका साक्षी है।
- उपग्रह और स्वचालित निगरानी प्रणालियाँ यंत्र नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की धुरी बन गई हैं।
- सीमावर्ती अर्वाचीन प्रतिद्वंद्वी कोडों और विषाणुओं से भी हमला कर सकते हैं; इसे रोकने के लिए विज्ञान, नीति और जन-जागरूकता की त्रिमूर्ति आवश्यक है।
- डिजिटल चौखट पर हर जागरूक नागरिक, सुरक्षित पासवर्ड और सजग क्लिक अनिवार्य प्रहरी हैं।
- केवल तोपों और बंदूकों की गर्जना से नहीं, बल्कि कोड-भेदन कछों की मौन तत्परता से भी शक्ति सिद्ध करनी होगी।
- सीमा की अडिग रक्षा हेतु सीमा जागरण, सीमा से पलायन रोकना और सीमाजन की सक्रिय भागीदारी — ये तीन स्तंभ हमारी सीमाओं को जीवंत गढ़ बनाकर विश्व का श्रेष्ठ राष्ट्र बनाएँगे।

