विशद विमर्शसीमा समाचारिका

सोमनाथ मंदिर – विरासत, विध्वंस और पुनर्स्थापन

सोमनाथ: सीमा, सभ्यता और स्वाभिमान की सहस्राब्दी   – भोगेन्द्र पाठक सोमनाथ भारतीय सभ्यता की वह चेतना-धुरी है जिसके चारों ओर इतिहास की आँधियाँ घूमती रहीं, किंतु जिसकी ज्वाला कभी मंद नहीं पड़ी। सोमनाथ का नाम लेते ही भारतीय चेतना के अतल-पृष्ठों पर एक दीर्घ स्मृति-ज्योति प्रज्वलित हो उठती है, जैसे आदिगुरु शिव की ध्यान–निमीलित दृष्टि…

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विशद विमर्शसीमा समाचारिका

रक्षा शक्ति को नई धार

  79,000 करोड़ का भारत का संकल्प राष्ट्र भारत आज एक अभूतपूर्व सुरक्षा परिस्थिति का सामना कर रहा है। उत्तर में हिमालय की सर्वोच्च चोटियों से लेकर बांग्लादेश की समतल सीमाओं तक, और पश्चिमी मरुस्थलों से पूर्वी वनक्षेत्रों तक –  भारत की 15,106 किलोमीटर की सीमाएँ अनेक सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रही हैं। पाकिस्तान…

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विशद विमर्श

माड धरा जैसलमेर : सामरिक पहलू

माड़ धरा जैसलमेर: रेगिस्तान और भारत की रणनीतिक शक्ति का सामरिक महत्व डॉ ममता भाटी प्राचीन साहित्य में थार प्रदेश को मरू , मरुमंडल , मरूदेश , मरूस्थल , मरुधन्व , मरूकान्तार  आदि शब्दों से सम्बोधित किया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ निर्जल प्रदेश से है। इस मरुधरा की ऐतिहासिकता इस प्रदेश में उपलब्ध पैलियोजोइक,…

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विशद विमर्श

ध्वजारोहण: राष्ट्र की आत्मा का पुनरुत्थान

  शिखर ध्वजारोहण: 500 वर्षों की प्रतीक्षा एक पल में पूर्ण                                 भोगेन्द्र पाठक, वरिष्ठ पत्रकार जब भारत-भूमि के हृदय अयोध्या में पंचशतकीय प्रताड़नाओं की विभीषिका को झेलते हुए एक मंदिर का शिखर आकाश को छूने लगता है, तब उस…

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विशद विमर्श

रामध्वज के साए में जागती भारतीय अस्मिता

अयोध्या के आकाश पर रामध्वज: राष्ट्रचेतना, आस्था और सनातन पुनर्जागरण का घोष     – भोगेन्द्र पाठक, वरिष्ठ पत्रकार अयोध्या के श्रीराम मंदिर में मार्गशीर्ष की शुक्ल पंचमी यानी विवाह पंचमी, तदनुसार 25 नवम्बर 2025 को होने वाला ध्वजारोहण केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि राष्ट्रचेतना, धर्मनिष्ठा और सनातन संस्कृति की पुनर्पुष्टि का घोष है।…

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विशद विमर्श

क्यों युग-धर्म की हुंकार लक्ष्मीबाई

क्यों लक्ष्मीबाई केवल इतिहास नहीं -भोगेन्द्र पाठक, वरिष्ठ पत्रकार इतिहास के विराट गगन में अनेक नारी–दीप्तियाँ उदित हुईं, जिनकी प्रकाश–रेखाएँ भारत–पथ को आलोकित करती रहीं। पर झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई का प्राकट्य तो ऐसा था, जैसे भारत–माता के ललाट पर गौरव का उज्ज्वल सिंदूर–चिह्न स्वयं उतर आया हो। वह एक ऐसा अदम्य व्यक्तित्व थीं जिनमें…

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