सीमांत कुटीर उद्योग

राष्ट्र की सीमा भौगोलिक रेखा के रूप में एक जीवंत प्रतीक है। सीमांत क्षेत्रों में कुटीर उद्योग केवल आर्थिक गतिविधि नहीं हैं। ये राष्ट्रीय चेतना के केंद्र हैं, जहाँ ग्रामीण परिवार अपने कौशल, अपनी परंपरा, और अपने श्रम से स्वयं को और राष्ट्र को सशक्त करते हैं। जब सीमांत समुदाय आर्थिक रूप से समृद्ध होता है, तो सीमा स्वयं सुरक्षित हो जाती है। किंतु आज यह समुदाय तीन-स्तरीय संकट का सामना कर रहा है।
तत्काल: तस्करी, विद्युत कटौती, बाजार की दुर्गमता
मध्यकालीन: आर्थिक ठहराव, पीढ़ीगत कौशल का विलोपन
दीर्घकालीन: सीमांत समाज का विस्थापन, राष्ट्रीय चेतना का क्षरण

जम्मू-कश्मीर

जम्मू-कश्मीर

भौगोलिक विडंबना – जम्मू-कश्मीर की विडंबना यह है कि यह क्षेत्र न केवल एक सीमांत क्षेत्र है, बल्कि दो सीमांतों की सीमा है – पश्चिम-मध्य पाकिस्तान (कश्मीर घाटी, कारगिल) की सीमा और पूर्व-उत्तर तिब्बत-चीन (लद्दाख, LAC) की सीमा। इस प्रदेश की विशेष सीमा-सुरक्षा और सीमा-जन संवर्धन आवश्यक है।

  • प्रमुख कुटीर उद्योग
  • कश्मीरी पश्मीना शॉल एक सांस्कृतिक संकट
  • पश्मीना” शब्द का मतलब केवल एक शॉल नहीं है। यह कश्मीर की पहचान, उसका गौरव, और उसकी सभ्यता है।
  • वास्तविकता:
  • कच्चा माल: चांगथांगी बकरी की ऊन (चांगथांग पठार, 4,000 मीटर पर)
  • निर्माण समय: एक शॉल = 6-12 महीने
  • विशेषज्ञता: 50+ चरणों की बुनाई प्रक्रिया
  • कीमत: 50,000 से 1,00,000+ रुपये (सच्ची शॉल)
  • आर्थिक वास्तविकता:
  • कारीगर: 3.40 लाख हस्तकार (UT में कुल)
  • महिलाओं की भागीदारी: 60%
  • औसत आय: 1.5-2.2 लाख रुपये (वार्षिक)
  • किंतु बुजुर्ग कारीगरों की पीढ़ी से युवा इस कला को नहीं सीख रहे हैं। एक 65 वर्षीय शॉल निर्माता कश्मीरी ने कहा: “मेरे बेटे ने 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी और कुछ और करने लगा। इस कला को कौन सीखेगा? मैं जो 50 साल से करता आ रहा हूँ, वह हमारे साथ ही खत्म हो जाएगा।”
  • कश्मीरी कालीन विरासत का विलोपन
  •  सिल्क-ऊन के पारंपरिक कालीन
  • निर्यात: यूरोप, अमेरिका
  • किंतु नकली कालीनों की तस्करी से बाजार खराब हो गया
  • जेली-जैम उद्योग अल्पाइन कृषि की फसल
  • मुख्य फल: एप्रिकॉट, बेर, खुबानी
  • महिला-केंद्रित उद्योग
  • प्रति परिवार वार्षिक आय: 50,000-1,00,000 रुपये
  • सूखे मेवे और मसाले
  • बादाम, अखरोट, केसर (कारगिल क्षेत्र की विशेषता)
  • प्रसंस्करण समूह: 10,000+
  • चुनौतियाँ: डबल-फ्रंट संकट
  • पाकिस्तान सीमांत की समस्याएँ:
  • नकली शॉल तस्करी
  • पाकिस्तान से नकली/अर्द्ध-निर्मित शॉलें आती हैं
  • कीमत: असली शॉल की 10-15% पर बेचीं जाती हैं
  • परिणाम: कश्मीरी कारीगरों की आय में 50% की गिरावट
  • कच्चे माल की तस्करी
  •  ऊन, रंग, सोती पाकिस्तान से आता है।
  • सीमा पर देरी से लागत में वृद्धि होती है।
  •  चीन सीमांत (LAC) की समस्याएँ:ॉ
  • सीमा पार संचार मार्ग का अवरोध
  •  लेह-लद्दाख राजमार्ग: 6-8 महीने बर्फ से बंद
  • परिणाम: लद्दाख के कुटीर उद्योगों का सांस्कृतिक अलगाथन
  • दोनों सीमांतों की साझा समस्या:
  • जलवायु कठोरता
  •  सर्दी में 6-8 महीने तापमान –15°C तक गिरता है
  • उत्पादन: पूरी तरह बंद
  • परिणाम: वार्षिक आय में 40% का नुकसान
  • पीढ़ीगत संकट
  •  शॉल बुनाई के लिए धैर्य, कठोर परिश्रम, और वर्षों की मेहनत आवश्यक है
  • युवाएँ शहरी नौकरियों की ओर भागते हैं
  • परिणाम: पारंपरिक कौशल का विलोपन

हिमाचल प्रदेश

 

हिमाचल प्रदेश

तिब्बत-चीन LAC सीमांत

  • लाहौल-स्पीति: अति-दुर्गम क्षेत्र
  • लाहौल-स्पीति जिला भारत के सबसे ऊँचे, सबसे दुर्गम और सबसे महत्वपूर्ण सीमांत क्षेत्रों में से एक है।
  • भौगोलिक विशेषताएँ:
  • ऊंचाई: 3,000-5,000 मीटर
  • तापमान: सर्दी में –30°C तक
  • बर्फ: 6-8 महीने पूर्ण बर्फ से ढका
  • रोहतांग दर्रा (3,978 मीटर): मुख्य सड़क
  • निवास: भोटिया, किन्नौर, लद्दाखी जनजातियाँ
  •  प्रमुख कुटीर उद्योग
  • iबांस-लकड़ी की कारीगरी
  • पारिवारिक यूनिट्स
  • उत्पादन: 100-200 आइटम प्रति परिवार वार्षिक
  • विशेषता: सरल, टिकाऊ, पर्यावरण-अनुकूल
  • ऊन बुनाई महिला-नेतृत्ववाली
  • शॉल, पट्टू, मफलर
  • कारीगर: 3,000-4,000 (मुख्यतः महिलाएँ)
  • आय: 40,000-80,000 रुपये प्रति महिला (वार्षिक)
  •  नई आर्थिक गतिविधियाँ आशा की किरण
  •  हरी मटर प्रसंस्करण: नई पहल
  • उत्पादन समय: 3-4 महीने
  • वैश्विक गुणवत्ता (निर्यात योग्य)
  • प्रति परिवार आय: 1,00,000-1,50,000 रुपये
  •  आलू की खेती: विरासत फसल
  •  लाहौल आलू: विश्व-प्रसिद्ध गुणवत्ता
  • कम कीटनाशक की आवश्यकता
  • प्रति परिवार आय: 80,000-1,20,000 रुपये
  •  घोड़ा खेती विलुप्त परंपरा
  •  ऐतिहासिक: लाहौल के घोड़े सिल्क रोड पर प्रसिद्ध थे
  • वर्तमान: घटती पारंपरिक माँग
  •  कुल्हड़ और बर्तन पारंपरिक कला
  •  कुम्हार परिवार: 500-1,000
  • प्रति परिवार आय: 30,000-50,000 रुपये
  • संलग्न जनसंख्या
  • ग्रामीण परिवारों की भागीदारी: 30%
  • युवाओं की भागीदारी: सीमित (शहरी पलायन का कारण)
  • आर्थिक वास्तविकता
  • औसत वार्षिक आय: 0.7-1.1 लाख रुपये (लाहौल में)
  • यह आय पश्चिमी भारत के कुटीर कारीगरों की तुलना में 50% कम है, किंतु उच्च-ऊंचाई वाले कठोर परिस्थितियों में उल्लेखनीय है।
  • सीमांत-विशिष्ट चुनौतियाँ
  • तत्काल संकट:
  • अति-दुर्गम भूगोल
  •  रोहतांग दर्रा: 6-8 महीने बंद
  • पहुँच की लागत: 1.5-2 गुना अधिक
  • बाजार दुर्गमता: 300+ किलोमीटर
  •  ट्रांसपोर्ट महंगाई
  •  पहाड़ी सड़कें: खतरनाक और महंगी
  • एक यूनिट की कीमत में ट्रांसपोर्ट = 30-40%
  • मध्यकालीन संकट:
  • कारीगरों की उम्रदराज़ी
  •  औसत आयु: 55+ वर्ष
  • कौशल हस्तांतरण: 10% से भी कम
  • अगले 15 वर्षों में 70% कारीगर अवकाश ले लेंगे
  •  चीन सीमांत से तस्करी
  •  तिब्बत से अवैध ऊन व्यापार
  • लकड़ी की तस्करी (चीन में बहुत माँग)
  • परिणाम: स्थानीय उत्पादकों को प्रतिस्पर्धा में हार
  •  दीर्घकालीन संकट:
  • शीतकालीन उत्पादन का पूर्ण बंद
  •  6-8 महीने: कोई आर्थिक गतिविधि नहीं
  • वार्षिक आय = 4-6 महीने के श्रम में ही सीमित

उत्तराखंड

उत्तराखंड

  •  दोहरी सीमांत – तिब्बत-चीन और नेपाल
  • भौगोलिक विशिष्टता
  • उत्तराखंड भारत का एकमात्र राज्य है जो दो भिन्न अंतर्राष्ट्रीय सीमांतों से लगा है:
  • उत्तर-पूर्व: चीन LAC (तिब्बत) – 350+ किलोमीटर
  • पूर्व-दक्षिण: नेपाल – 276 किलोमीटर (भारत-नेपाल सीमा का 16%)
  • प्रमुख कुटीर उद्योग
  • घरेलू खाद्य प्रसंस्करण
  • कुटीर नमकीन, अचार, जैम
  • महिला-नेतृत्ववाली यूनिट्स
  • औसत आय: 0.9-1.3 लाख रुपये
  • कुटीर लकड़ी कारखाने
  • हल्के फर्नीचर
  • कलात्मक लकड़ी के बर्तन
  • आय: 0.8-1.2 लाख रुपये
  • संलग्न जनसंख्या
  • ग्रामीण परिवार: 28%
  • महिला भागीदारी: 50%
  • सीमांत-विशिष्ट चुनौतियाँ
  • नेपाल-चीन दोहरी सीमांत
  • सीमा पार अवैध व्यापार होता है, यह तस्करी मार्ग है। पर सुरक्षा प्रतिबंध (चीन LAC के निकट) की व्यवस्था बनी हुई है।
  • लकड़ी की तस्करी
  • सीमापार जंगलों से अवैध निष्कर्षण हो रहा है जिससे पर्यावरणीय विनाश हो रहा है।
  •  आदिवासी समुदाय का पलायन
  • आदिवासी समुदाय शहरी रोजगार की ओर पलायन कर रहे हैं। पारंपरिक आजीविका छूट रही है
  • अंतर्राष्ट्रीय सीमांत-विशिष्ट चुनौतियाँ और समाधान
  • समस्याओं की गहन विश्लेषणात्मक संरचना
  • तत्काल समस्याएँ
  • तस्करी का बहुआयामी संकट
  • तस्करी केवल अवैध व्यापार नहीं है। यह भारतीय कारीगर का शोषण है। पाकिस्तान से सस्ते उत्पाद (10-20% कीमत में) की तस्करी होती है। चीन से स्टील, ऊन, लकड़ी की तस्करी होती है। नेपाल से भी सीमांत सामग्रियों की तस्करी होती है।
  • परिणाम: भारतीय कारीगर की सच्ची कृति अमूल्य रहती है, जबकि नकल सस्ते में बिकती है।
  • विद्युत, जल, संचार का अभाव
  • सीमांत गाँवों में 40% गाँवों में 24/7 विद्युत-आपूर्ती नहीं है।
  • इंटरनेट कनेक्टिविटी: 15% से कम
  • परिणाम: उत्पादन और विपणन दोनों बाधित
  • बाजार दुर्गमता
  • सीमांत से निकटतम बाजार: 50-200 किलोमीटर दूर है।
  • ऑनलाइन मार्केटिंग: 5% से कम कारीगर को ज्ञात है।
  •  स्तर 2: मध्यकालीन चुनौतियाँ (3-10 वर्ष)
  • कौशल का विलोपन
  • युवा पारंपरिक कार्य सीख नहीं रहे
  • 2035 तक: 50-70% पारंपरिक कारीगर अवकाश ले लेंगे
  • परिणाम: पीढ़ीगत ज्ञान का स्थायी विलोपन
  • सामाजिक विभाजन
  • पलायन करने वाले: शहरी, शिक्षित, आधुनिक
  • रुकने वाले: = ग्रामीण, कम शिक्षित, पारंपरिक
  • परिणाम: ग्रामीण-शहरी विभाजन का गहरा होना
  • दीर्घकालीन संकट (10+ वर्ष)
  • सीमांत समाज का विस्थापन
  • जब आय अपर्याप्त हो, तो समुदाय पलायन करेगा।
  • 2045 तक: सीमांत क्षेत्रों में 20-30% जनसंख्या में कमी
  • परिणाम: सीमा स्वयं सांस्कृतिकता खो देगी
  • राष्ट्रीय सुरक्षा पर भीषण प्रभाव
  • असुरक्षित और निराश सीमांत समुदाय
  • तस्करी में सहयोग (विवशता से)
  • आतंकवाद के प्रति संवेदनशीलता
  • सभ्यतागत संकट (हमेशा के लिए)
  • भारतीय सांस्कृतिक विरासत का नुकसान
  • फुलकारी, पश्मीना शॉल, लाहौल की बुनाई: वैश्विक प्रतीक
  • यदि ये लुप्त हों, तो भारत की सांस्कृतिक पहचान को चोट पहुँचेगी।
  • समाधान: रणनीतिक हस्तक्षेप
  • तीन-स्तरीय समाधान वास्तुकला
  • डिजिटल कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम
  • लक्ष्य: 50,000 कारीगरों को ई-कॉमर्स प्रशिक्षण
  • साधन: Google, Amazon, Flipkart के साथ साझेदारी
  • परिणाम: कम से कम 2,000-3,000 कारीगर ऑनलाइन बिक्रय शुरू कर सकेंगे।
  • वृद्धि: 50-100% की संभावना
  •  सीमा-पार तस्करी से निपटने के लिए संगठित बाजार बनाना
  • सरकार सीमांत कुटीर कोषा स्थापित करें।
  • सीधी बिक्री: सरकारी खरीद से सार्वजनिक संस्थानों को आपूर्ति हो।
  • शुरुआती आय: 20-30% की वृद्धि की वृद्धि हो।
  • विद्युत की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करना
  • सीमांत क्षेत्रों में सौर ऊर्जा पैनल: 5,000+ यूनिट्स स्थापित करें
  • लागत: 5,000-10,000 रुपये प्रति यूनिट (भारत सरकार सब्सिडी दे)
  • लाभ: 24/7 विद्युत, उत्पादन में 40% वृद्धि
  •  कौशल संरक्षण कार्यक्रम
  • सीमांत शिल्पी स्कॉलरशिप: 10,000 युवाओं को ₹10,000/माह 3 साल तक
  • शर्त: पारंपरिक कला सीखना, फिर 5 साल तक अपने गाँव में काम करना
  • निवेश: 30 करोड़ रुपये (3 साल में)
  • रिटर्न: 10,000 युवा कारीगर = 1,00,000+ लोगों का रोजगार
  •  “सीमांत कुटीर क्लस्टर” का विकास
  • प्रत्येक जिले में 5-10 क्लस्टर्स स्थापित करें
  • सुविधाएँ: कच्चा माल, बिजली, इंटरनेट, प्रशिक्षण केंद्र
  • निवेश: 100 करोड़ रुपये (सभी सीमांत क्षेत्रों में)
  • परिणाम: सीमांत गाँव का आधुनिकीकरण हो बिना सांस्कृतिक नुकसान पहुँचाए
  • अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौते
  • भारत-पाकिस्तान: सीमांत कुटीर उद्योग” के लिए विशेष व्यापार करार
  • भारत-चीन-नेपाल: त्रिपक्षीय सीमांत विकास समझौता
  • लक्ष्य: कारीगरों को सुरक्षित व्यापार मार्ग मिले
  •  सीमांत को “आर्थिक केंद्र” में रूपांतरित करना
  • सीमांत क्षेत्रों में विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ)
  • सुविधा: 5-7 वर्षों के लिए 50% कर छूट हो
  • परिणाम: बड़ी कंपनियों के निवेश, जहाँ कुटीर कारीगर आपूर्तिकर्ता बन सकें

उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश

  • सीमावर्ती जिला
  • (पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर और महाराजगंज)
  •  पीलीभीत
  • बाँस की बाँसुरी का उद्योग
  • पीलीभीत जिला, जो नेपाल की सीमा से सटा है, हज़ारों वर्षों से बाँस की बाँसुरी निर्माण के लिए विश्व प्रसिद्ध रहा है। यह केवल एक उद्योग नहीं हैयह भारतीय संगीत परंपरा का एक अभिन्न अंग है। कृष्ण की बाँसुरी, गोपियों का संगीत, हज़ारों वर्षों की सांस्कृतिक विरासत – सभी कुछ पीलीभीत की बाँसुरियों में गुँथा था।
  • उद्योग का पतन: पीलीभीत की बाँस बाँसुरी उद्योग का पतन एक आधुनिक विहंगावलोकन है। आँकड़े कहते हैं:
  • 2005-2010: 7,000+ कारीगर
  • 2024-2025: 150-200 कारीगर
  • पतन दर: 90% का विलोपन मात्र 20 वर्षों में
  • वार्षिक माँग का संकुचन:
  • तब: 60 लाख बाँसुरियों की वार्षिक माँग
  • अब: 5-5.5 लाख बाँसुरियों की वार्षिक माँग
  • माँग में गिरावट: 91.67%
  • कारण: बहुआयामी संकट
  • Ø  कच्चे माल की समस्या: पारंपरिक हिमालयी बाँस के स्थान पर अब असम का बाँस आयात किया जा रहा है, जो गुणवत्ता में अलग है और महँगा भी।
  • Ø  बाज़ार का विनाश: प्लास्टिक की सस्ती बाँसुरियों, इलेक्ट्रॉनिक संगीत यंत्रों का आगमन, संगीत शिक्षा में परिवर्तन।
  • Ø  विद्यार्थी वर्ग का विलोपन: नई पीढ़ी, बाँसुरी बनाने की कला सीखने के बजाय, शहर में रोज़गार ढूँढ रही है।
  • Ø  तस्करी और सीमा-पार अवैध व्यापार: नेपाल से सस्ती प्रतियों का आगमन।
  • लखीमपुर खीरी
  • लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में बसा यह जिला राज्य का सबसे बड़ा जिला (7,680 वर्ग किमी) है। इसकी 21.38% भूमि वनाच्छादित है – 165,212 हेक्टेयर वन है। शाग, शीशम, खैर, बाँस, इमली – ये वनों की संपदा हैं।
  • लखीमपुर खीरी के कुटीर उद्योग:

उद्योग का प्रकार

इकाइयाँ

रोजगार

निवेश (लाख रु.)

कृषि-आधारित

234

612

36.10

वस्त्र (तैयार कपड़े व कढ़ाई)

20

63

0.90

लकड़ी के फर्नीचर

23

65

2.36

चमड़ा-आधारित

12

38

0.28

धातु-आधारित (स्टील)

0

0

मरम्मत व सेवा

156

394

5.48

कुल

495

1,363

51.45

  • आर्थिक विश्लेषण 
  • औसत वार्षिक आय: 1.2-1.8 लाख रुपये (पारिवारिक स्तर पर)
  • यदि एक पारिवारिक इकाई 1.5 लाख रुपये वार्षिक कमाती है, तो 5 व्यक्तियों के परिवार की प्रति व्यक्ति मासिक आय = 2,500 रुपये। यह विश्व बैंक द्वारा परिभाषित अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा ($ 1.90/दिन = लगभग 150-200 प्रतिदिन) से अलग है, किंतु भारत की राष्ट्रीय गरीबी रेखा (ग्रामीण = 1,000/माह) से कुछ ऊपर है। परंतु आत्मनिर्भरता का एक प्रतीक यह आय है। जहाँ पूरा भारत सरकारी सहायता के लिए हाथ पसारता है, वहीं लखीमपुर खीरी के ये परिवार अपनी मेहनत से जीते हैं।
  • सरकारी समर्थन: अपर्याप्त
  •  लखीमपुर खीरी में सरकारी योजनाएँ:
  • मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना (CSRY): 25,000 रु. प्रति परिवार अनुदान (कवरेज: 40-50% पात्र परिवार)
  • प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP): सस्ते ऋण, किंतु आवेदन प्रक्रिया अत्यंत जटिल
  • वन-आधारित उद्यम: लगभग अस्पृश्य
  • बहराइच
  • बहराइच जिला, नेपाल की सीमा से सटा, गहरी वन संपदा से परिपूर्ण है (67,926 हेक्टेयर वन = जिले का 13.97%)। यहाँ का अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि-आधारित है, किंतु एक अनोखा पहलू है: गेहूँ की नरवार (wheat-stalk) से हस्तशिल्प।
  •  अद्भुत उद्योग: गेहूँ की नरवार का शिल्प
  •  बहराइच का गेहूँ-नरवार हस्तशिल्प (Wheat-stalk Handicrafts) भारत की सबसे अनोखी परंपराओं में से एक है। इसमें:
  • ताज-महल, संसद भवन, लाल क़िला, अक्षरधाम मंदिर – इन सभी को गेहूँ की नरवार से बनाया गया है।
  • पुरस्कार-प्राप्त शिल्पकार: तीन कारीगरों को राज्य पुरस्कार।
  • पर्यावरणीय लाभ: कृषि-अपशिष्ट का सर्वोत्तम उपयोग।
  •  बहराइच का कुटीर उद्योग परिदृश्य

उद्योग का प्रकार

इकाइयाँ

रोजगार

निवेश (करोड़ रु.)

कृषि-आधारित

1,310

4,855

9.06

तैयार कपड़े व कढ़ाई

800

2,800

5.52

लकड़ी/फर्नीचर

850

2,890

5.78

चमड़ा-आधारित

400

1,320

2.40

धातु-आधारित (स्टील)

650

1,950

4.42

कुल

5,518

18,779

38.19

  • बाँस कारीगर: डोकरा समुदाय
  • बहराइच के डोकरा समुदाय (Dokra—परंपरागत बाँस कारीगर) में:
  • कुल बाँस कारीगर: 200+
  • महिला स्वयंसेवी समूह: 15+ (कपड़े, कढ़ाई, मिट्टी के काम में)
  • मुख्य उत्पाद: टोकरियाँ (Tokri), चालनी (Soops), खिलौने, घर की वस्तुएँ
  • काम के घंटे: दैनिक 4-8 घंटे (अधिकांश कारीगरों के लिए)
  • वार्षिक आय: 80,000-1,20,000 रुपये (परिवार स्तर पर)
  •  संकट: बाज़ार और कौशल का विनाश
  • डोकरा कारीगरों के सामने:
  • Ø  बाज़ार संपर्क का अभाव: स्थानीय विक्रय तक सीमित
  • Ø  कच्चे माल की कमी: बाँस की गुणवत्ता में गिरावट
  • Ø  आधुनिक प्रतियोगिता: बड़ी कंपनियों की सस्ती प्लास्टिक टोकरियों से।
  • Ø  युवा पलायन: नई पीढ़ी बहराइच को छोड़ रही है।
  •  श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, महाराजगंज: लघु जिलों की अर्थव्यवस्था
  •  श्रावस्ती:
  • श्रावस्ती – जहाँ भगवान बुद्ध का कर्मक्षेत्र, यहाँ अंगुलिमाल का मंदिर है। यह आज भी जनजातीय शिल्प का केंद्र है। आँकड़े उपलब्ध नहीं, किंतु आवश्यक है कि राष्ट्र इस ऐतिहासिक सीमांत क्षेत्र के लिए विशेष विकास योजना बनाए।
  • बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, महाराजगंज
  •  ये तीनों जिले राष्ट्रीय एकल-उत्पाद योजना (One District One Product
  • अर्थात् एक जिलाएक उत्पाद) के अंतर्गत हैं:
  • बलरामपुर: शहद और शहद उत्पाद (मधुमक्खी पालन)
  • सिद्धार्थनगर: काला नमक चावल (खाद्य प्रसंस्करण)
  • महाराजगंज: जनजातीय शिल्प और फर्नीचर (220 कारीगर; 10 SHG अर्थात् स्वयं सहायता समूह)
  • प्रत्येक में कारीगरों की संख्या 5,000-15,000 के बीच अनुमानित है।
  •  तुलनात्मक विश्लेषण: पंजाब बनाम उत्तर प्रदेश
  •  

पहलू

पंजाब (8 जिले)

उत्तर प्रदेश (7 जिले)

कुल कारीगर (अनुमानित)

1,90,000

80,000-1,00,000

मुख्य उद्योग

वस्त्र, जूते, बर्तन

वन-उत्पाद, खाद्य, शिल्प

परिवारिक आय

1.5-2.5 लाख

1.2-1.8 लाख

इंटरनेट पहुँच

65%

35-40%

महिला भागीदारी

40%

35-40%

युवा पलायन दर

25-30%

30-40%

सीमा-पार तस्करी

अधिक व्यवस्थित

कम व्यवस्थित, किंतु गंभीर

सरकारी समर्थन

अपेक्षाकृत बेहतर

अत्यंत अपर्याप्त

 

  • उत्तर प्रदेश की सीमांत अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ
  •  Ø  वन-आधारित अर्थव्यवस्था: यूपी की सीमांत अर्थव्यवस्था जंगल पर निर्भर है। बाँस, लकड़ी, शहद, औषधीय पौधे – ये सब वन से आते हैं। यह पंजाब के कृषि + कुटीर संयोजन से भिन्न है।
  • Ø  जनजातीय आधार: यूपी की सीमांत जनता में डोकरा, कोल, गोंड जैसी जनजातियाँ हैं। इनकी परंपराएँ, ज्ञान-पद्धति, पीढ़ियों से चली आई हैं। पंजाब के सिख, हिंदू कारीगरों से यह अलग है।
  • Ø  कम बाज़ार संपर्क: पंजाब में लुधियाना, अमृतसर, जालंधर बड़े औद्योगिक केंद्र हैं। यूपी में ऐसा कुछ नहीं है। महाराजगंज, बहराइच को निकटतम बड़े शहर 100+ किमी दूर हैं।
  • Ø  अंतर्राष्ट्रीय सीमा का अलग प्रभाव: पाकिस्तान सीमा पर सैन्य तनाव है। नेपाल सीमा पर सांस्कृतिक और वाणिज्यिक गतिविधियाँ हैं। यह आर्थिक गतिविधियों को भिन्न ढंग से प्रभावित करता है।
  •  सीमांत-विशिष्ट चुनौतियाँ
  •  तत्कालिक (2-3 वर्ष) चुनौतियाँ: कच्चे माल की सीमा पार अनिश्चितता: नेपाल से आयातित बाँस, रंग, छोटी वस्तुओं की आपूर्ति में दिन-प्रतिदिन बदलाव।
  • पर्यावरण प्रतिबंध: वन संरक्षण कानून, वन्यजीव संरक्षणये कारीगरों के लिए कच्चे माल पर प्रतिबंध लगाते हैं। कोई विकल्प नहीं है।
  • विद्युत की अनिश्चितता: बहराइच, लखीमपुर खीरी में 5-6 घंटे की दैनिक कटौती।
  •  मध्यकालिक (3-10 वर्ष) चुनौतियाँ:
  • पारंपरिक कौशल का विलोपन: पीलीभीत में 7,000 बाँसुरी कारीगर में 200 भी नहीं बचे हैं।
  • होशियारपुर: 3,000 (सभी 60+ आयु के)
  • महाराजगंज: 220 50 (15 वर्षों में)
  • श्रावस्ती, बलरामपुर: संपूर्ण विलोपन
  • जनसंख्या का विस्थापन: यदि कारीगर नहीं रह पाएँ, तो उनके परिवार भी शहर चले जाएँगे। 2035 तक यूपी की सीमांत जनता में 20-25% जनसंख्या कमी की संभावना है।
  •  राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव: जब सीमांत समुदाय आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं, तो तस्करी में सहयोग करने लगते हैं। यह राष्ट्रीय सीमा की सुरक्षा को कमजोर करता है।
  •  दीर्घकालीन (10+ वर्ष) चुनौतियाँ:
  • सांस्कृतिक विरासत का विलोपन: एक बार जब कौशल खो जाता है, तो उसे पुनः सीखना असंभव नहीं, किंतु बहुत महँगा होता है। पीलीभीत की बाँसुरी परंपरा उदाहरण है। अब पुनः शुरुआत करना बिलकुल नई पीढ़ी को प्रशिक्षित करने जितना महँगा होगा।
  •  सरकारी योजनाएँ: पर्याप्त नहीं
  •  यूपी में जो योजनाएँ हैं:
  • राष्ट्रीय एकल-उत्पाद योजना (ODOP): सभी 7 जिलों में सक्रिय
  • परिणाम: सीमित
  • कवरेज: 20-30% पात्र कारीगरों का
  •  प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP):
  • ऋण सुविधा: सस्ता
  • आवेदन प्रक्रिया: अत्यंत जटिल (60-70 कागज़ात)
  • कवरेज: 10-15% पात्र परिवारों का
  • वन-आधारित उद्यम योजना: लगभग अस्पृश्य, बहराइच, लखीमपुर खीरी में कोई सामग्री नहीं
  •  सुझाव और समाधान
  •  तत्काल (अगले 2 वर्ष):
  • Ø  डिजिटलीकरण: सभी सीमांत जिलों में 4G कनेक्टिविटी, ई-कॉमर्स प्रशिक्षण
  • Ø  कच्चे माल का संरक्षण: वन-आधारित उद्योगों के लिए विशेष अनुमति, सस्ते दरों पर आपूर्ति
  • Ø  ऋण सुविधा: 50,000 रु. तक ब्याज-मुक्त ऋण (2 वर्षों के लिए)
  •  मध्यकालीन (3-10 वर्ष):
  • Ø  कौशल हस्तांतरण: जनजातीय कारीगरों के साथ आधुनिक डिजाइन और बाज़ार ज्ञान जोड़ना
  • Ø  क्लस्टर विकास: हर जिले में कम-से-कम एक कारीगर क्लस्टर (पंजाब में हज़ारों हैं, यूपी में शून्य)
  • Ø  निर्यात सहायता: नेपाल, बांग्लादेश, दक्षिण-एशिया को निर्यात के लिए बाज़ार सुविधा
  •  दीर्घकालीन (10+ वर्ष):
  •  Ø  सांस्कृतिक संरक्षण: यूनेस्को, भारतीय संस्कृति मंत्रालय के साथ सीमांत शिल्पों को “मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत” के रूप में सूचीबद्ध करना
  • Ø  ग्रामीण-शहरी जुड़ाव: शहरी बाज़ारों में सीमांत उत्पादों की दुकानें खोलना
  •  उत्तर प्रदेश की नेपाल सीमा, पंजाब की पाकिस्तान सीमा की तुलना में आर्थिक दृष्टि से अधिक संकटग्रस्त है। साक्षरता कम है, आय कम है, बाज़ार दूर है, और सरकारी सहायता लगभग शून्य है। परंतु इसी सीमा पर दुनिया की सबसे पुरानी शिल्प-परंपराएँ जीवंत हैं। यहाँ वन से जीविका निकालने वाली जनता रहती है। यहाँ जनजातीय ज्ञान-पद्धति संरक्षित है।
  •  राष्ट्र-दायित्व
  • Ø  बाहर से – सुरक्षा: सीमा को सुरक्षित रखना, तस्करी को रोकना
  • Ø  भीतर से – विकास: इन कारीगरों को सम्मान, आय, बाज़ार, और भविष्य देना
  • जब तक उत्तर प्रदेश की सीमांत जनता आर्थिक रूप से सशक्त नहीं होगी, तब तक सीमा की सुरक्षा अधूरी रहेगी। यह राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण का अभिन्न संबंध है। सीमांत से राष्ट्र बनता है, कारीगर से
  • संस्कृति निर्मित होती है।” यह सत्य आज भी प्रासंगिक है।

राजस्थान

  • राजस्थान की सीमांत कुटीर अर्थव्यवस्था: थार मरुस्थल का कारीगर वर्ग
  • श्रीगंगानगर से बाड़मेर तक: पाकिस्तान सीमा के चार जिलों की शिल्प विरासत
  • राजस्थान की पाकिस्तान सीमा उस तरह नहीं है जैसी किसी नक्शे में दिखती है। यह एक जीवंत, धड़कता हुआ सीमांत है – जहाँ रेगिस्तान की सुनहरी रेतें राष्ट्र की रक्षा करती हैं, और साथ-साथ हजारों साल की सांस्कृतिक धरोहर को संभाले रखती हैं। श्रीगंगानगर की ग्वार से लेकर बाड़मेर की आईना कढ़ाई तक – यह सब कुछ भारत के आत्मबोध की गाथा है जो गाँव के कारीगरों के हाथों से लिखी जाती है। उपनिषद् कहते हैं: “अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्।” अर्थात्, अपने-पराए का भेद करना छोटे मन का काम है। थार मरुस्थल के इन सीमांत गाँवों में इसी भाव को जीते-जागते देखा जा सकता है। यहाँ कारीगर न केवल अपनी कला को जीवंत रखते हैं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा को भी तराशते हैं। लाखों हाथ, मुख्यतः महिलाओं के हाथ, दिन-रात परिश्रम में डूबे रहते हैं, और इसमें न तो शोर है, न ही मीडिया की चकाचौंध। केवल अदृश्य भारत की गूँज है।
  • श्रीगंगानगर
  • श्रीगंगानगर राजस्थान का सबसे उत्तरी जिला है। यहाँ सतलज नदी की धारा पाकिस्तान सीमा से मिलती है। यह जिला अपने आप में एक अद्भुत संश्लेषण है – कृषि की समृद्धि और शिल्प की परंपरा के अलौकिक मेल का। सिंधु घाटी की सभ्यता के अवशेष यहाँ अभी भी धरती की गोद में सोए हैं। खानाबदोश राइका और बिश्नोई समुदाय सदियों से यहाँ वास करते हैं, और सदियों से इसी परंपरा को जीवंत रखते हैं। यहाँ नहरों की धारा बहती है, किन्नू के बागों में सुगंध तैरती है, और गाँवों की गलियों में रंगीन कपड़ों की गंध उड़ती है। यह वह भूमि है जहाँ राजा गंगा सिंह की दूरदर्शिता ने नहरों का जाल बिछाया था, और आज भी वही परंपरा यहाँ की आत्मा को जल देती है।
  • कारीगरी की परंपराएँ और एक जिला एक उत्पाद (ODOP) उत्पाद
  • श्रीगंगानगर का राष्ट्रीय एकल-उत्पाद योजना (ODOP) का उत्पाद है – गम पाउडर (ग्वार का मैदा)। ग्वार मरुस्थल में उगने वाली एक कृषि पदार्थ है, जो खाद्य उद्योग में गाढ़ापन कारक के रूप में काम आती है। भारत में गम पाउडर उत्पादन में राजस्थान सर्वोच्च स्थान पर है और इसमें श्रीगंगानगर की भूमिका केंद्रीय है।
  • परंतु इससे अधिक महत्वपूर्ण है यहाँ की पारंपरिक हस्तशिल्प परंपरा, जो अभी भी जीवंत है।
  • प्रमुख हस्तशिल्प क्षेत्र:
  • श्रीगंगानगर में कपड़ों की कढ़ाई एक कला है, छपाई एक भाषा है। यहाँ की बुनकर जाति कपास और ऊन की बुनाई में पारंगत है। जामदानी और दोपट्टों का निर्माण यहाँ होता है। ये उत्तर भारत की महिलाओं की सजावट का अभिन्न अंग हैं। हाथी दांत की कढ़ाई (जो अब कृत्रिम सामग्री से होती है) और मनिहारी के काम भी इसी क्षेत्र की विरासत हैं। दीवार पर लगी कढ़ाई को देखिए तो लगता है कि प्रत्येक धागा एक संवाद है, रंग से रंग तक, पैटर्न से पैटर्न तक। यह केवल कला नहीं है; यह संस्कृति का पवित्र पठन-पाठन है।
  • संघर्ष की गाथा
  • श्रीगंगानगर के हस्तशिल्प कारीगरों की औसत वार्षिक आय (पारिवारिक स्तर पर) 80 हजार से 1.2 लाख रुपये  है। कढ़ाई और बुनाई का काम परिवारों को पूरक आय प्रदान करता है। मुख्य आय तो कृषि से आती है, शिल्प से केवल दाने-दाने की कमाई होती है। किन्नू की विख्यात मंडी यहाँ है, जिससे कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था सशक्त है। परंतु यही कृषि-निर्भरता एक भारी खतरा भी है। सूखे के दिनों में यह सब कुछ धराशायी हो जाता है।
  • बीकानेर
  • बीकानेर थार मरुस्थल के हृदय में स्थित है। यह वह जिला है जहाँ ऊंटों की विरासत और मुगल-राजपूत सभ्यता का अद्भुत मेल दिखता है। महाराजा गंगा सिंह की दूरदर्शिता से यहाँ नहरों का जाल बिछा, जिससे यह कृषि का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र बना। परंतु बीकानेर की असली पहचान है – वहाँ की कला। सदियों की कारीगरी परंपरा यहाँ न केवल जीवंत है, बल्कि वह प्रत्येक मुहूर्त में श्वास ले रही है।
  • उस्ता कला
  • बीकानेर का सबसे प्रसिद्ध शिल्प है उस्ता कला जिसमें ऊंट की खाल पर सोने की मीनाकारी की जाती है। इसे शाही कला भी कहा जाता है। इसका उद्भव मुगल काल में हुआ, विशेषकर अकबर के शासनकाल में। परंतु इसे अपने वर्तमान रूप में महाराजा अनूप सिंह के शासनकाल में लाहौर के उस्ताद कारीगरों ने दिया। यह नाम ही एक संपूर्ण दर्शन की तरह है। ‘उस्ता’ का मतलब है – गुरु, शिक्षक, माहिर। इसलिए इस कला को ‘उस्ता कला’ कहते हैं। यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपी जाने वाली परंपरा है।
  • उस्ता कला की विशेषताएँ:
  • सामग्री: ऊंट की खाल (जो बीकानेर की सांड़ियों से मिलती है), सोने के पत्तर (foil), और विभिन्न रंग।
  • तकनीक: हाथ से महीन ब्रश से चित्रांकन। पहले पेंटिंग करते हैं, फिर सोने की परत चढ़ाते हैं। यह एक कला है, इसमें कोई मशीनी काम नहीं होता है।
  • उपयोग: सजावटी वस्तुएँ (दीवार पर टाँगने वाली), आभूषण, सुगंध की शीशियाँ, दर्पण।
  • मुख्य केंद्र: चोतन गाँव और इसके आसपास के क्षेत्र। चोतन का नाम उस्ता कला के साथ पर्याय बन गया है।
  • कारीगर समुदाय: मथेरण जाति के लोगों को इस कला का विशेषज्ञ माना जाता है। ये परिवार पीढ़ियों से इस कला को पल्लवित-पुष्पित कर रहे हैं।
  • GI Tag (भारतीय भौगोलिक संकेत): 2023 में प्राप्त हुआ है। यह एक ऐतिहासिक पहचान है।
  • अंतर्राष्ट्रीय निर्यात: यूरोप, यूएसए, यूएई, और मध्य एशिया के बाजारों में यह कला जाती है।
  • पद्मश्री सम्मानित: हिसामुद्दीन उस्ता को 1986 में पद्मश्री सम्मान मिला था। उनके हाथों से निकले उस्ता कला के टुकड़े अब विश्व के संग्रहालयों में हैं।
  • प्रशिक्षण का केंद्र:
  • राज सिख समुदाय के वरिष्ठ उस्ता कारीगरों द्वारा स्थापित कैमल हाइड ट्रेनिंग सेंटर बीकानेर में कारीगरों को प्रशिक्षण देता है। यह केंद्र न केवल तकनीकी शिक्षा देता है, बल्कि पीढ़ियों की परंपरा को भी संरक्षित करता है। उस्ता कला में एक चित्र बनाने में 15-20 दिन का समय लग जाता है। बेहद महीन कला। परंतु भारतीय बाजार में इसकी कीमत अभी भी सीमित है। निर्यात के माध्यम से ही इन्हें सही मूल्य मिलता है। तब ही विश्व के अमीर कलेक्टरों के पास यह कला पहुँचती है। फिर भी, बीकानेर के उन कारीगरों के घर में प्रायः अभाव ही रहता है।
  • अन्य महत्वपूर्ण हस्तशिल्प
  • बीकानेर में उस्ता कला के अलावा अन्य शिल्प भी समृद्ध हैं:
  • सिरेमिक (ODOP उत्पाद): मिट्टी के सजावटी बर्तन, पॉटरी। बीकानेर की मिट्टी की गुणवत्ता इस कला के लिए प्रसिद्ध है।
  • कशीदाकारी (Embroidery): रंगीन सूत से कपड़ों पर हाथ की कढ़ाई। यह एक महिला-केंद्रित कला है, और लाखों महिलाएं इसी से जीविका चलाती हैं।
  • ऊनी कालीन: ईरानी और भारतीय दोनों पद्धतियों से बने गलीचे। ये कालीन केवल सजावटी नहीं हैं; ये कला के संरक्षण का माध्यम हैं।
  • नमदे: ऊन को विशेष तरीके से दबाकर बनाई गई चादरें। यह एक प्राचीन तकनीक है जो बीकानेर में अभी भी जीवंत है।
  • लोई (Loi): नापासर में बनने वाली ऊन की विशेष बुनाई। इसे ‘बीकानेर का हीरा’ भी कहा जाता है।
  • मिट्टी के बर्तन: पारंपरिक डिजाइन की सुराहियाँ, मटके।
  • धातु कार्य: तांबे और पीतल की कलात्मक वस्तुएँ, घंटियाँ, सजावटी पात्र, आभूषण।
  • आर्थिक वास्तविकता
  • बीकानेर में कारीगरों की औसत वार्षिक आय 1.2 से 1.8 लाख रुपये (पारिवारिक स्तर पर)। उस्ता कला के कारीगर अधिक आय पाते हैं, क्योंकि उनकी कला को विश्वस्तर पर मान्यता प्राप्त है। परंतु अन्य शिल्पों में औसत आय कम है। 5-6 सदस्यों के परिवार में प्रति व्यक्ति मासिक आय 2,000-3,000 रुपये ही रहती है। यह आय न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बहुत कम है।
  • राज सिखों की भूमिका: बीकानेर के कारीगरों को राज सिख संगठन से विशेष समर्थन मिलता है। जेलों में दरियों का निर्माण होता है, जिससे कारीगर प्रशिक्षण और रोजगार दोनों पाते हैं। कारीगरी को एक आंदोलन बनाने का यह एक सामाजिक दृष्टिकोण है।
  • जैसलमेर
  • जैसलमेर पाकिस्तान सीमा से केवल 40 किलोमीटर दूर है। यहाँ की मिट्टी का रंग पीला-सुनहरा है जो सूर्य की किरणों में सोने जैसा चमकता है। इसीलिए इसे स्वर्ण नगरी (Golden City) कहा जाता है। जैसलमेर की संस्कृति सिंधु-मरुस्थल सभ्यता का प्रमाण है। यहाँ की ईंटें कहानियाँ कहती हैं – कहानियाँ व्यापार की, सांस्कृतिक आदान-प्रदान की और युद्धों की। यह वह भूमि है जहाँ राजपूत शौर्य और मरुस्थल की कठोरता का संगम स्पष्ट दिखाई देता है।
  • कारीगरी की परंपराएँ:
  • पत्थर पर कारीगरी
  • जैसलमेर का एक जिला एक उत्पाद (ODOP) है पीला संगमरमर (Yellow Marble) और टाइलें। यह एक भू-आधारित उत्पाद है। परंतु इसके साथ कारीगरी का गहरा संबंध है। इसके लिए पत्थर को तराशना कर उसे आकार दिया जाता है।
  • प्रमुख हस्तशिल्प:
  • लकड़ी की नक्काशी (Wood Carving): जैसलमेर की लकड़ी की नक्काशी पूरे भारत में प्रसिद्ध है। खाती और सुथार जाति के कारीगर इस कला में पारंगत हैं। हवेलियों के दरवाजों, खिड़कियों, फर्नीचर पर की जाने वाली नक्काशी अद्वितीय है। इन नक्काशियों को देखिए तो प्रत्येक कोने में एक पूरी कहानी दिखाई देती है – माध्यम होते हैं – फूल, पत्तियाँ, पशु, देवी-देवता। यह केवल सजावट नहीं होती है; यह एक दृश्य-काव्य की तरह प्रभावी होती है।
  • गेसो वर्क (Gesso Art): ऊंट की खाल पर की जाने वाली यह एक ऐसी कारीगरी है जहाँ चूने और गोंद का मिश्रण लगाकर पेंटिंग की जाती है। यह बीकानेर की उस्ता कला से भिन्न है, परंतु समान रूप से मूल्यवान है।
  • दरी और बुनाई: जैसलमेर ऊनी दरी (carpet) और बरड़ी (woolly wrap) के लिए विख्यात है। जामदानी साड़ियों की बुनाई भी यहाँ होती है। ये वस्तुएँ न केवल व्यावहारिक उपयोग के लिए प्रसिद्ध हैं, बल्कि सौंदर्य के प्रतीक भी माने जाते हैं।
  • चमड़े का काम: जूते, बैग, पौती (एक परंपरागत चमड़े की पात्र जिसमें दूध रखा जाता है) – ये सब यहाँ बनते हैं। चमड़े की खुशबू, इसकी कोमलता, इसका स्थायित्व – यह सब कुछ कारीगरी का एक अहम अंग है।
  • ग्रेनाइट और संगमरमर कार्य: यहाँ पीले संगमरमर से मूर्तियाँ, सजावटी वस्तुएँ बनाई जाती हैं। पोकरण की पॉटरी को GI Tag मिला है।
  • जैसलमेर में हजारों कारीगर लकड़ी की नक्काशी, बुनाई, चमड़ा कार्य में जुड़े हैं। महिलाएं दरी बुनाई और सजावटी कढ़ाई का काम करती हैं। स्थानीय खानाबदोश समुदाय (लूम्बा, राइका आदि) परंपरागत कलाओं को जीवंत रखते हैं। जैसलमेर के कारीगरों की औसत वार्षिक आय 1 लाख से 1.4 लाख रुपये है। लकड़ी की नक्काशी का काम अधिक समय लेता है, परंतु मूल्य भी अधिक मिलता है। पर्यटन की कमी के कारण स्थानीय बाजार सीमित है। अधिकतर काम निर्यात के लिए या दूर के शहरों के लिए किया जाता है। 
  • बाड़मेर
  • बाड़मेर पाकिस्तान सीमा से सटा हुआ राजस्थान का सबसे दक्षिण-पश्चिमी जिला है। यह वह भूमि है जहाँ महान कारीगर लीलाराम जांगिड़ की परंपरा अभी भी जीवंत है। यहाँ की रेगिस्तानी मिट्टी से लेकर कपास के खेत तक – सब कुछ कारीगरी के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। बाड़मेर की पहचान है – धैर्य। यहाँ के कारीगर सूखे को सहते हैं, तस्करी के दबाव को झेलते हैं, बाजार की अनिश्चितता को समझते हैं, फिर भी, वे अपना काम जारी रखते हैं। उऩकी दृष्टि में यह केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं है; यह एक राष्ट्रीय-धार्मिक कर्तव्य भी है।
  • कारीगरी की परंपराएँ
  • बाड़मेर में 15 से अधिक प्रमुख कारीगरी क्षेत्र हैं। यहाँ 60,000 से अधिक कारीगर (मुख्यतः महिलाएँ) जीविका कमाती हैं। गुजरात के कच्छ की तरह ही बाड़मेर भी कारीगरी का एक अदृश्य साम्राज्य है।
  • आइना कढ़ाई (Mirror Work): यह बाड़मेर की सबसे प्रसिद्ध और सबसे मूल्यवान कला है। इसका मुख्य केंद्र: चोतन गाँव (प्राचीन नाम: चोतन शर्प) है। यहाँ की आइना पर कढ़ाई विश्व प्रसिद्ध है। चोतन का नाम अब इस कला के साथ पर्याय बन गया है। इसके कुछ पहलू विशेष रूप से द्रष्टव्य हैं –
  • तकनीक: छोटे दर्पणों को कपड़े पर मज़बूती से सिल दिया जाता है। इसके बाद दर्पण के चारों ओर रंगीन धागों से सूक्ष्म और सघन कढ़ाई की जाती है, जिससे दर्पण स्थिर रहता है और डिज़ाइन स्पष्ट व आकर्षक बनता है।
  • डिजाइन: डिजाइन में मुख्य हैं – ज्यामितीय पैटर्न, फूल-पत्तियाँ, पशु-पक्षियों की आकृतियाँ, देवी-देवता। प्रत्येक डिजाइन एक कहानी कहता है।
  • धागे: लाल, हरा, नीला, पीला, सुनहरा जैसे विभिन्न रंगों में रेशमी, कॉटन, ऊनी धागे प्रयोग में लाए जाते हैं। ये रंग भारतीय त्योहारों की भाषा हैं।
  • उपयोग: ब्लाउज, साड़ियाँ, ओढ़नियाँ, दीवार की सजावट (wall hangings), तकिए के कवर का उपयोग आम लोग भी करते हैं। लेकिन, विशेषकर विवाह के अवसर पर दुल्हन की सजावट में ये सामग्रियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
  • GI Tag: इस हस्तशिल्प को भारतीय भौगोलिक संकेत GI Tag प्राप्त है। यह एक औपचारिक स्वीकृति है कि ‘बाड़मेर की आइना कढ़ाई’ केवल एक स्थान का उत्पाद नहीं है, बल्कि विश्व का एक सांस्कृतिक धरोहर है।
  • अंतर्राष्ट्रीय निर्यात: इसका निर्यात मुख्य रूप से यूएसए, यूके, फ्रांस, संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रिया और जर्मनी में किया जाता है। यूरोपीय के घरों में यह भारतीय दर्पण सगर्व चमकता है।
  • कारीगर: मुख्यतः महिलाएँ (70% से अधिक) हैं। ये महिलाएँ अपने घरों में, अपनी बैठकियों में, दिन-रात इस कला को जीवंत बनाए रखती हैं।
  • आय का कड़वा सच: आइना कढ़ाई में एक कारीगर की औसत वार्षिक आय 30,000 से 50,000 रुपये होती है। एक परिधान को पूरा करने में 2-3 महीने का समय लग जाता है। यह भीषण श्रम है, परंतु आय न्यूनतम है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इस वस्तु की कीमत 10,000-50,000 रुपये तक होती है, परंतु कारीगर को केवल 5-10% ही मिलता है। बाकी सब बिचौलिए खा जाते हैं।
  • ब्लॉक प्रिंटिंग – अजरख प्रिंट (Ajrakh):
  • स्थान: बालोतरा गाँव इस कला-कारीगरी का प्रमुख केंद्र है।
  • रंग: पूर्णतः प्राकृतिक – हल्दी, अनार के छिलके, स्याही, मिट्टी। कोई भी रासायनिक रंग नहीं। ये प्रकृति से लिए गए रंग और सौंदर्य हैं।
  • तकनीक: हाथ से बनाए गए लकड़ी के ब्लॉक से छपाई की जाती है। प्रत्येक ब्लॉक एक कारीगर के जीवन का प्रतिनिधि है। कई पीढ़ियों तक ये ब्लॉक चलते हैं।
  • विशेषता: दोनों तरफ छपाई (reversible print) की जाती है। इसका मतलब है कि कपड़े के दोनों ओर सामान डिजाइन, सामान रंग। यह एक तकनीकी चमत्कार है।
  • पारंपरिक डिजाइन: ज्यामितीय पैटर्न (squares, hexagons), फूल, बेल-बूटे, इस्लामिक आकार-विन्यास का प्रयोग किया जाता है। हर डिजाइन में एक भाषा होती है।
  • GI Tag: इसे यह भौगोलिक पैमाना प्राप्त है। 
  • मलीर प्रिंट:
  • रंग: कत्थई (brown) और काला। ये गहरे रंग हैं।
  • तकनीक: टिन सेल छपाई पद्धति।
  • विशेषता: मोटे कपड़ों (जैसे सूती के पर्दे, दीवार की सजावट) के लिए उपयुक्त।
  • लकड़ी की नक्काशी
  • यह बाड़मेर का एक उदीयमान कला है जो सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) से उत्प्रेरित है। पिछले 20-30 वर्षों में इसने यहाँ जड़ें जमा ली हैं।
  • प्रमुख कारीगर: लीलाराम जांगिड़ (तीन पीढ़ियों की परंपरा का वाहक)। लीलाराम की कहानी बाड़मेर के कारीगरों की एक प्रतीकात्मक प्रेरक गाथा है।
  • विशेषता: पहले ये कारीगर मुंबई, सूरत, पुणे – दूर के शहरों में काम करते थे, क्योंकि स्थानीय बाजार में काम नहीं था। परंतु आज, बाड़मेर में ही इन्हें काम मिल रहा है। यह एक विकास की कलात्मक गाथा है।
  • आकार और डिजाइन: फर्नीचर (मेज, कुर्सी, अलमारी), सजावटी पैनल, मूर्तियाँ, दरवाजे के फ्रेम।
  • निर्यात: इसका निर्यात मुख्य रूप से यूरोप और अमेरिकामें होता है। यहाँ के अमीर घरों में बाड़मेर की लकड़ी की नक्काशी की बहुत माँग है।
  • अन्य महत्वपूर्ण शिल्प
  • मिट्टी के बर्तन: रंगीन पॉटरी एवं पानी के बर्तन। बाड़मेर की मिट्टी इस कला के लिए उपयुक्त है।
  • चमड़ा कार्य: मोचरी (जूते), बैग और बेल्ट। जूते बनाने की परंपरा यहाँ सदियों पुरानी है।
  • चांदी के आभूषण: नाजुक कारीगरी। महिलाओं के गहने, नथ, बिछिए, कंगन आदि।
  • बुनाई: ऊनी दरी, नमदे और पट्टियों का निर्माण। ये सर्दियों में पहने जाते हैं।
  • कशीदाकारी: रंगीन धागों से हाथ की कढ़ाई। महिलाओं की परंपरागत कला।
  • बाड़मेर का एक जिला एक उत्पाद (ODOP): जीवन-रक्षक अनाज
  • इशबगोल (Ispaghul/Psyllium husk) – एक औषधीय पदार्थ कृषि उत्पाद है जिसे अतिसार (diarrhea) और कब्ज के इलाज में प्रयोग किया जाता है। यह एक विशुद्ध रूप से कृषि पदार्थ है, परंतु इसके प्रसंस्करण में कारीगरों का योगदान होता है। भारत में इशबगोल अथवा इस्पाघुल का सबसे बड़ा उत्पादन बाड़मेर में होता है।
  • अन्य भौगोलिक उत्पाद: घोड़ा जीरा (Ajwain), जीरा, अनार और टमाटर। बाड़मेर के भूगोल में सब कुछ उगता है।
  • आर्थिक वास्तविकता:
  • औसत वार्षिक आय: 1 लाख से 1.5 लाख रुपये (पारिवारिक स्तर पर), प्रति व्यक्ति मासिक आय: 5-6 सदस्यों के परिवार में ₹1,700-2,500 । यह संख्या एक कड़वी वास्तविकता है कि बाड़मेर के कारीगर अधिकतर सरकारी सहायता के बिना अपनी कारीगरी के बल पर पीढ़ियों की परंपरा को जीवंत रखते हैं।
  • नए संकट:
  • जलवायु परिवर्तन: सूखे की बारंबारता बढ़ रही है।
  • बाजार की अनिश्चितता: निर्यात में उतार-चढ़ाव होता रहता है।
  • पाकिस्तान से तस्करी का दबाव: सस्ते, नकली सामान के साथ प्रतिद्वंद्विता बढ़ रही है।
  • स्थानीय बाजार का विनाश: कारीगरों को अपनी कृतियाँ बाहर बेचनी पड़ती है।
  • आर्थिक अन्याय: गाँव में एक आइना कढ़ाई वाली महिला जिसे 10 वर्षोंका कर्यानुभव है – उसे एक ब्लाउज बनाने में 2 महीने लगते हैं। उसे 2,000-3,000 रुपये मिलते हैं। परंतु बाहर का एक दुकानदार उसी ब्लाउज को 15,000 रुपये में बेचता है। यह आर्थिक अन्याय है। यह शोषण है। परंतु वह महिला रुकती नहीं। क्यों? क्योंकि यह उसकी पहचान है, उसकी परंपरा है, उसका अस्तित्व है।
  • राजस्थान की राष्ट्रीय एकल-उत्पाद योजना (ODOP):
  • राजस्थान के 33 जिलों में से 4 सीमांत जिलों को ODOP के अंतर्गत विशेष उत्पाद सौंपे गए हैं:
जिला ODOP उत्पाद उद्योग प्रकार
श्रीगंगानगर गम पाउडर खाद्य प्रसंस्करण
बीकानेर सिरेमिक हस्तशिल्प
जैसलमेर पीला संगमरमर & टाइलें खनिज-आधारित
बाड़मेर इश्वगोल खाद्य/औषधि प्रसंस्करण

 

  • जलवायु संकट: सूखे की निरंतरता
  • थार मरुस्थल में सूखा एक नियमित आपदा है। यह एक दीर्घकालीन संकट है जो पीढ़ियों को प्रभावित कर रहा है। पानी की कमी, चारे की कमी, फसल की असफलता – ये सब मिलकर कारीगरों को अन्य आजीविका की ओर धकेलते हैं।
  • तस्करी और सीमांत अर्थव्यवस्था: विदेशी प्रतिद्वंद्विता
  • जब सीमांत समुदाय आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं, तो –
  • पाकिस्तान से आयातित सस्ते (और अक्सर नकली) सामान की प्रतिद्वंद्विता बढ़ जाती है।
  • अवैध व्यापार का दबाव होता है।
  • स्थानीय कारीगरों का मूल्य पतन हो जाता है।
  • यह एक राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न भी है। जब सीमांत कारीगर गरीब रहते हैं, तो तस्करी की ओर जाने का प्रलोभन बढ़ता है।
  • युवा पलायन: परंपरा की मृत्यु
  • बेरोजगारी और कम आय की वजह से युवा शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। परंपरागत कलाएँ संकट में हैं। एक पीढ़ी में यदि ये कलाएँ सिखाई न गईं, तो अगली पीढ़ी इन्हें कभी नहीं सीखेंगी। यह एक सांस्कृतिक बर्बादी है।
  • बाजार का अभाव: अदृश्य आर्थिकता
  • राजस्थान में गुजरात की तरह के जामनगर-भावनगर जैसे बंदरगाह नगर नहीं हैं।
  • राष्ट्रीय बाजार तक पहुँचना कठिन है।
  • पर्यटन की सुविधा सीमित है।
  • बिचौलियों का दबाव अधिक है।
  • GI Tag की कमी: अंतर्राष्ट्रीय मान्यता का अभाव
  • राजस्थान के सीमांत जिलों में GI Tag अभी भी बहुत कम हैं। बाड़मेर की आइना कढ़ाई को GI Tag मिला है, परंतु अन्य शिल्पों को अभी भी इंतज़ार है। GI Tag के बिना, अंतर्राष्ट्रीय मूल्य नहीं मिलता।
  • समाधान और सुझाव: तीन स्तरीय रणनीति
  • शीघ्र आवश्यक सुविधाएं
  • गाँवों को इंटरनेट से जोड़ना जरूरी है।
  • सभी गाँवों में 4G कनेक्टिविटी स्थापित करना।
  • डिजिटल पेमेंट सिस्टम के माध्यम से बिचौलिओं को हटाना।
  • WhatsApp, Instagram पर कारीगरों का सीधा विपणन आवश्यक हो गया है।
  • कारीगरों को Amazon, Flipkart, IndianCrafts जैसे प्लेटफॉर्मों से जोड़ना।
  • सोशल मीडिया पर सीधे विपणन (YouTube, Pinterest) की व्यवस्था ।
  • कारीगरों के अपने-अपने पोर्टल भी हों।
  • कच्चे माल की सुरक्षा
  • गुणवत्ता की गारंटी की व्यवस्था हो।
  • सरकारी सहायता में प्राकृतिक रंग, धागे की आपूर्ति हो।
  • आयातित सामान पर उपयक्त प्रतिरक्षा (customs duties) लगे।
  • गुणवत्ता की जाँच के लिए एक सीमांत हस्तशिल्प बोर्ड की स्थापना की जाय।
  • ऋण सुविधा
  • 25,000-50,000 रुपये तक ब्याज-मुक्त ऋण, 3-5 साल के लिए।
  • बैंकों को प्रोत्साहित करना कि वे कारीगरों को आसानी से ऋण दें।
  • माइक्रो-फाइनेंस के माध्यम से महिला कारीगरों को समर्थन मिले।
  • न्यूनतम मजदूरी
  • सीमांत जिलों के लिए विशेष न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करना।
  • कारीगरों की आय कम से कम 10,000 रुपये प्रति माह होनी चाहिए।
  • यह शहरी न्यूनतम मजदूरी से कम नहीं होनी चाहिए।
  • शिक्षा और प्रशिक्षण
  • स्कूलों में हस्तशिल्प को एक वैकल्पिक विषय बनाना।
  • गुरु-शिष्य परंपरा को सरकारी मान्यता देना।
  • क्लस्टर विकास: आधुनिक कारीगर संरचनाएँ
  • हर जिले में एक अंतर्राष्ट्रीय मानक की कारीगर हब स्थापित करना।
  • सामूहिक कार्यशालाएँ आयोजित हों।
  • डिज़ाइन स्टूडियो की सुविधाएँ दी जाएँ।
  • प्रदर्शनी स्थल की व्यवस्था हो जहाँ कारीगर अपने उत्पाद सीधे बेच सकें।
  • GI Tag का विस्तार: वैश्विक मान्यता
  • बीकानेर की उस्ता कला को यूनेस्को में सूचीबद्ध करना।
  • जैसलमेर की लकड़ी की नक्काशी को GI Tag दिलाना।
  • बाड़मेर की आईना कढ़ाई के लिए अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट सुरक्षा।
  • अंतर्राष्ट्रीय बाजार: विश्व का दरवाज़ा खोलना
  • यूरोपीय डिज़ाइनरों, फैशन हाउसों के साथ सहयोग स्थापित हो।
  • Fair Trade certification प्राप्त करना ताकि कारीगरों को सही मूल्य मिले।
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में राजस्थान की हस्तशिल्प को प्रदर्शित करना।
  • शिल्प-पर्यटन: सांस्कृतिक पर्यटन का विकास
  • बाड़मेर और बीकानेर को कारीगर-पर्यटन का केंद्र बनाना।
  • कारीगरों के घरों को हेरिटेज होम-स्टे में रूपांतरित करना।
  • पर्यटकों को कारीगरों से सीधे सामान खरीदने का अवसर देना।
  • महिला सशक्तीकरण: आर्थिक आत्मनिर्भरता
  • महिला कारीगरों के लिए स्वयं सहायता समूह (SHG) बनाना।
  • उन्हें सामूहिक विपणन में सहायता देना।
  • महिलाओं के नेतृत्व में कारीगर सहकारी समितियाँ गठित करना।
  • यूनेस्को में संरक्षण:
  • बाड़मेर की आइना कढ़ाई को यूनेस्को की Intangible Cultural Heritage of Humanity सूची में सूचीबद्ध करना।
  • बीकानेर की उस्ता कला को भी यही सम्मान दिलाना।
  • यह एक वैश्विक मान्यता है, जो कारीगरों को गरिमा देता है।
  • सांस्कृतिक विश्वविद्यालय: ज्ञान का नया पीठ
  • बीकानेर या बाड़मेर में एक राष्ट्रीय कारीगरी विश्वविद्यालय की स्थापना।
  • यहाँ न केवल तकनीक सिखाई जाए, बल्कि डिज़ाइन, व्यवसाय प्रबंधन, अंतर्राष्ट्रीय विपणन की शिक्षा भी दी जाए।
  • एक अनुसंधान केंद्र, की स्थापना हो जहाँ पारंपरिक कलाओं का वैज्ञानिक अध्ययन हो।
  • निर्यात बैंक: हस्तशिल्प का वित्तीय केंद्र
  • हस्तशिल्प-विशिष्ट निर्यात वित्तपोषण केंद्र स्थापित करना।
  • कारीगरों को विदेश में माल भेजने में सहायता देना।
  • अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन को आसान बनाना।
  • सीमांत-विशिष्ट नीति: नई आर्थिक नीति
  • राजस्थान सरकार को सीमांत जिलों के लिए विशेष औद्योगिक नीति बनानी चाहिए।
  • GST छूट (न्यूनतम 5%)।
  • निर्यात प्रोत्साहन (subsidy) मिले।
  • विदेशी सहयोग को प्रोत्साहित करना।
  • कारीगर को राष्ट्र-निर्माता के रूप में स्वीकार करना है। कारीगरों को केवल कामगार नहीं, बल्कि संस्कृति के रक्षक के रूप में मान्यता देना आवश्यक है। उन्हें राष्ट्रीय सम्मान और पद्मश्री-जैसी मान्यताएँ देने से कुटीर उद्योगों की सृजनशीलता में क्रान्तिकारी परिवर्तन होगा। राजस्थान की सीमांत अर्थव्यवस्था गुजरात से गुणात्मक रूप से भिन्न है। यहाँ न विभाजन की विरासत है, न ही वन-आधारित जीविका। यहाँ है शुद्ध कारीगरी – हजारों साल की परंपरा, जो अभी भी जीवंत है। परंतु लगातार सूखा, तस्करी का दबाव, बाजार का अभाव, और सरकारी उदासीनता ने इस व्यवस्था को गहरे संकट में डाल दिया है। बाड़मेर के लीलाराम जांगिड़ की तरह, बीकानेर के हिसामुद्दीन उस्ता की तरह, हजारों कारीगर अपनी परंपरा को जीवंत रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। परंतु ये व्यक्तिगत प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। राष्ट्र को इन कारीगरों को सम्मान, समर्थन, और सुयोग देना चाहिए। यह केवल आर्थिक विकास नहीं है – यह राष्ट्र धर्म है।

कर्नाटक

कर्नाटक

  • कर्नाटक की तटीय कुटीर अर्थव्यवस्था
  • (उत्तर कन्नड़, उडुपी, दक्षिण कन्नड़)
  • कर्नाटक का तटीय क्षेत्र को ‘करावली’ (Karavali) कहा जाता है। यह क्षेत्र केवल तटीय भूभाग नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और आर्थिक गलियारा है। अरब सागर यहाँ जीवन-निर्वाह का आधार प्रदान करता है, जैसा कि कच्छ क्षेत्र में देखा जाता है। परंतु करावली की कारीगरी और सांस्कृतिक पहचान मरुस्थलीय नहीं, बल्कि घने वनों, मंदिर स्थापत्य और तटीय परंपराओं से निर्मित है। उत्तर कन्नड़, उडुपी और दक्षिण कन्नड़ जिले एक अदृश्य स्वर्ण-सूत्र द्वारा जुड़े हैं, जो इस क्षेत्र की कला, संस्कृति और आजीविका को एक समग्र संरचना प्रदान करता है।
  • उत्तर कन्नड़ जिला: वन और सागर की जुगलबंदी
  • उत्तर कन्नड़ जिला 70% वनों से आच्छादित है और इसकी सीमा गोवा से लगती है। यहाँ की शिल्प कला में प्रकृति का गहरा प्रभाव है।
  • चंदन और काष्ठ शिल्प (Sandalwood & Wood Carving):
  • विरासत: सिरसी, कुमटा और होन्नावर के ‘गुडिगार’ (Gudigar) समुदाय के कारीगर चंदन की लकड़ी पर नक्काशी के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं।
  • कला: ये लकड़ी पर इतनी महीन नक्काशी करते हैं मानो सोने के तार पिरोए गए हों।
  • चुनौती: चंदन की लकड़ी की अनुपलब्धता और कड़े वन कानूनों के कारण अब वे शीशम और कदंब की लकड़ी का उपयोग कर रहे हैं।
  • सिद्दी समुदाय की रजाई (Kawandi):
  • यहाँ बसे अफ्रीकी मूल के ‘सिद्दी’ समुदाय की महिलाएं रंगीन कपड़ों के टुकड़ों से ‘कावंडी’ (Kawandi) नामक रजाई बनाती हैं, जो अब अंतर्राष्ट्रीय पहचान बना रही है।
  • ODOP (एक जिला एक उत्पाद): मसाले (Spices) और समुद्री उत्पाद।
  • उडुपी जिला: मंदिरों का शहर और बुनाई का केंद्र
  • उडुपी केवल कृष्ण मंदिर के लिए नहीं, बल्कि अपनी अनोखी साड़ी और खाद्य संस्कृति के लिए जाना जाता है।
  • उडुपी साड़ी (Udupi Saree):
  • जीआई टैग (GI Tag): उडुपी साड़ियों को हाल ही में भौगोलिक संकेत मिला है।
  • तकनीक: इसे मालाबार फ्रेम लूम पर बुना जाता है। इसकी खूबी यह है कि बुनाई से पहले धागे (Yarn) को स्टार्च (मांड) के घोल में रंगा जाता है, जिससे साड़ी मजबूत और हल्की बनती है।
  • पुनर्जीवन: कुछ साल पहले यह कला लुप्त हो रही थी, लेकिन ‘कदिके ट्रस्ट’ (Kadike Trust) के प्रयासों से अब 60+ नए युवा बुनकर इससे जुड़े हैं।
  • मट्टू गुल्ला (Mattu Gulla):
  • यह एक विशेष प्रकार का बैंगन है जो केवल मट्टू गाँव में उगता है। इसे भी GI टैग प्राप्त है और इसकी स्थानीय अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका है।
  • ODOP: एक जिला एक उफ्पाद के अंतर्गत समुद्री उत्पाद (Marine Products) आते हैं।
  • दक्षिण कन्नड़ जिला: यक्षगान और सोने की कारीगरी
  • मंगलुरु (दक्षिण कन्नड़ का मुख्यालय) एक प्रमुख बंदरगाह और शिक्षा का केंद्र है, लेकिन इसकी आत्मा यहाँ की लोककलाओं में बसती है।
  • यक्षगान मुखौटे और वेशभूषा:
  • कला: यक्षगान केवल नृत्य नहीं, यह एक उद्योग है। इसके विशाल मुकुट (Kirita) और आभूषण बनाने वाले कारीगर (मुख्यतः मंगलुरु और पुत्तूर में) हल्के लकड़ी और थर्माकोल का उपयोग करते हैं।
  • बाजार: ये मुखौटे अब सजावटी वस्तुओं के रूप में विदेशों में निर्यात हो रहे हैं।
  • बीड़ी उद्योग:
  • यह सुनने में छोटा लगता है, लेकिन दक्षिण कन्नड़ में लाखों महिलाएं घर बैठे बीड़ी रोलिंग (Beedi Rolling) से अपनी आजीविका चलाती हैं। यह एक विशाल कुटीर उद्योग है।
  • काजू प्रसंस्करण (Cashew Processing):
  • मंगलुरु भारत की ‘काजू राजधानी’ में से एक है। यहाँ की फैक्ट्रियों में 90% कामगार महिलाएं हैं।
  • ODOP: : एक जिला एक उफ्पाद के अंतर्गत समुद्री उत्पाद (Marine Products) आते हैं।
  • तुलनात्मक सार: गुजरात बनाम कर्नाटक (तटीय)
पहलू गुजरात (कच्छ/सौराष्ट्र) कर्नाटक (करावली)
मुख्य शिल्प कढ़ाई, ब्लॉक प्रिंट, मिट्टी के बर्तन लकड़ी की नक्काशी, यक्षगान मुखौटे, उडुपी साड़ी
भौगोलिक आधार मरुस्थल और शुष्क भूमि उष्णकटिबंधीय वन (Western Ghats) और नदियाँ
समुदाय मुख्य रूप से खानाबदोश (Nomadic) मंदिर-आधारित और कृषक समाज
महिला भागीदारी कढ़ाई में वर्चस्व (70%+) बीड़ी रोलिंग और काजू उद्योग में वर्चस्व
चुनौतियाँ पानी की कमी, भूकंप का डर अत्यधिक बारिश, वन कानून, युवाओं का पलायन
  • उत्तर कन्नड़ से दक्षिण कन्नड़ तक की यह पट्टी ‘कला और कौशल’ का जीवित संग्रहालय है। जहाँ गुजरात की कला में ‘रंगों का विस्फोट’ (Explosion of Colors) है, वहीं कर्नाटक की कला में ‘प्रकृति की सूक्ष्मता’ (Subtlety of Nature) है। दोनों ही सीमांत क्षेत्र यह सिद्ध करते हैं कि भारत की असली ताकत उसके कारखानों में नहीं, बल्कि उसके कारीगरों की झोपड़ियों में बसती है।

केरल

केरल 

  • केरल की तटीय कुटीर अर्थव्यवस्था
  • (कासरगोड से तिरुवनंतपुरम तक: ९ जिलों की शिल्प विरासत)
  • केरल की पश्चिमी सीमा पर अरब सागर और नारियल के विस्तृत उपवन एक प्राकृतिक अवरोध का निर्माण करते हैं। ये सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है और दृश्य-सौंदर्य से भी परिपूर्ण है। केरल की कुटीर अर्थव्यवस्था जैव-संसाधनों पर आधारित है। मिट्टी, नारियल जटा (कॉयर) और ताड़ के पत्ते यहाँ के कारीगरों के प्रमुख उत्पादन संसाधन हैं। इस तटीय पट्टी में पाँच लाख से अधिक कारीगर सक्रिय हैं, जिनमें सत्तर प्रतिशत से अधिक महिलाएँ हैं। ये कारीगर आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला को सुदृढ़ कर रहे हैं। केरल के 14 जिलों में 9 तटीय और अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर स्थित जिले हैं। यहाँ के कुटीर उद्योग ध्यातव्य हैं –
  • कासरगोड जिला: सात भाषाओं की भूमिऔर बुनाई का जादू
  • यह केरल का सबसे उत्तरी जिला है, जो कर्नाटक से सटा है। यहाँ कई संस्कृतियों का मिलन होता है। यहाँ कई तरह के कुटीर उद्योग सदियों से महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
  • कासरगोड साड़ी (Kasaragod Saree):
  • विरासत: १८वीं सदी से चली आ रही परंपरा। इसे ‘शालिया’ (Saliya) समुदाय के बुनकर बुनते हैं।
  • विशेषता: ये साड़ियाँ सूती (Cotton) होती हैं और इनमें ‘वट’ (Vat) रंगों का प्रयोग होता है जो कभी फीके नहीं पड़ते। यह पर्यावरण के अनुकूल है।
  • GI टैग: इस कुटीर उद्योग को GI टैग प्राप्त है।
  • बेल मेटल शिल्प (Bell Metal Craft):
  • कुन्हिमंगलम् (जो कन्नूर की सीमा पर है) के पास कासरगोड के कारीगर मंदिरों के लिए विशेष दीप और मूर्तियाँ बनाते हैं।
  • कन्नूर: लूम्स और लोअर‘ (Looms and Lore) की भूमि
  • कन्नूर को ‘हथकरघा का मैनचेस्टर’ कहा जाता था। यहाँ का हर घर एक कारखाना है।
  • हथकरघा (Handloom):
  • उत्पाद: घरेलू फर्निशिंग (पर्दे, बेडशीट) यहाँ बनते हैं, जो यूरोप और अमेरिका को निर्यात किए जाते हैं।
  • अर्थव्यवस्था: यहाँ सहकारी समितियों (Co-operatives) का एक मजबूत जाल है जो बिचौलियों को हटाकर बुनकरों को सीधा लाभ देता है।
  • थेय्यम (Theyyam) कला:
  • यह केवल नृत्य नहीं, एक कुटीर उद्योग है। इसके वेशभूषा, मुकुट और शृंगार सामग्री बनाने वाले कारीगर साल भर काम करते हैं।
  • कोझिकोड जिला: इतिहास का बंदरगाह
  • वास्को डी गामा यहीं आया था, और आज भी यह व्यापार का केंद्र है।
  • उरु (Uru) नौका निर्माण:
  • बेपोर (Beypore): यहाँ के कारीगर (खलासी) सागौन की लकड़ी से विशाल अरब नौकाएँ (Dhows) बनाते हैं। यह विश्व का सबसे प्राचीन नौका-निर्माण उद्योग है जो बिना किसी ब्लूप्रिंट के, केवल अनुभव से चलता है।
  • ग्राहक: इसके ग्राहक हैं – कतर, दुबई और सऊदी अरब के शाही परिवार।
  • लकड़ी की नक्काशी: कोझिकोड के कारीगर शीशम की लकड़ी पर बारीक काम के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • मलप्पुरम और थ्रिस्सूर जिले: परंपरा और धातु
  • मलप्पुरम (Adyanpara Jewelry): यहाँ के सुनार बहुत ही महीन और हल्के आभूषण बनाने में माहिर हैं।
  • थ्रिस्सूर (कुथम्पल्ली साड़ी):
  • गाँव: कुथम्पल्ली।
  • विशेषता: यहाँ देवेंद्र समुदाय के बुनकर रहते हैं। उनकी साड़ियाँ अपनी ‘कसावु’ (Kasavu – सुनहरी बॉर्डर) के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • ODOP: थ्रिस्सूर का एक उत्पाद ‘स्क्रू पाइन’ (केवड़ा) शिल्प भी है।
  • एरणाकुलम (कोच्चि): आधुनिकता और बांस 
  • बाँस और बेंत शिल्प (Bamboo & Cane): अंगामाली और इसके आसपास के क्षेत्रों में ‘संबवा’ और अन्य समुदायों द्वारा बांस की टोकरियाँ और मैट बनाए जाते हैं।
  • नारियल के खोल (Coconut Shell) शिल्प: फेंके हुए नारियल के खोल से चम्मच, कप और सजावटी वस्तुएँ बनाई जाती हैं। यह ‘वेस्ट टू वेल्थ’ का उत्तम उदाहरण है।
  • अलप्पुझा और कोल्लम जिले: गोल्डन फाइबर‘ (Coir) की राजधानी
  • यह उद्योग केरल की कुटीर अर्थव्यवस्था की रीढ़।
  • कॉयर उद्योग (Coir Industry):
  • विस्तार: अलप्पुझा और कोल्लम में लाखों महिलाएं नारियल के छिलके से रेशा निकालने (Retting) और रस्सी बटने का काम करती हैं।
  • उत्पाद: जियो-टेक्सटाइल्स (Geo-textiles) – जो अब सड़कों के निर्माण और भूस्खलन रोकने में पूरी दुनिया में इस्तेमाल हो रहा है।
  • चुनौती: मशीनीकरण और प्लास्टिक रस्सियों से कड़ी टक्कर।
  • काजू प्रसंस्करण (Cashew Processing – Kollam):
  • कोल्लम को ‘विश्व की काजू राजधानी’ कहा जाता है। यहाँ की ९०% श्रमिक महिलाएं हैं। यह एक विशाल कुटीर-स्तरीय उद्योग है।
  • तिरुवनंतपुरम: राजधानी का शिल्प
  • बलरामपुरम हथकरघा: यह लघु उद्योग त्रावणकोर के महाराजा द्वारा शुरू किया गया। यहाँ की ‘मुंडू’ और ‘नेरियथु’ (पारंपरिक वस्त्र) अपनी शुद्धता और सादगी के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • GI टैग: इसे GI टैग प्राप्त है।
  • लकड़ी और हाथीदांत (अब कृत्रिम) नक्काशी: यहाँ के कारीगर चंदन और शीशम पर पौराणिक कथाएँ उकेरते हैं।
  • तुलनात्मक विश्लेषण: गुजरात बनाम केरल (तटीय)
पहलू गुजरात (कच्छ) केरल (मालाबार/कोंकण)
मुख्य कच्चा माल कपास, ऊन, मिट्टी नारियल (Coir), लकड़ी, बांस, काजू
कारीगर संरचना पारिवारिक इकाइयाँ (Family Units) मजबूत सहकारी समितियाँ (Strong Co-operatives)
महिला भूमिका कढ़ाई (Embroidery) में प्रमुख कॉयर और काजू उद्योग में ९०% वर्चस्व
बाजार मॉडल निजी व्यापारी और प्रदर्शनी सरकार समर्थित (Matsyafed, Coirfed)
भूगोल का प्रभाव शुष्क जलवायु (सूती/ऊन अनुकूल) आर्द्र जलवायु (नारियल/लकड़ी अनुकूल)

 

  • केरल ने अपनी कुटीर उद्योगों को ‘सहकारिता’ (Co-operative Movement) के माध्यम से जीवित रखा है। अलप्पुझा की ‘कॉयर सोसायटियाँ’ और कन्नूर की ‘वीवर्स सोसायटियाँ’ इस बात का प्रमाण हैं कि संगठित होकर कारीगर न केवल अपना अस्तित्व बचा सकते हैं, बल्कि वैश्विक बाजार में भी अपनी जगह बना सकते हैं। जहाँ गुजरात में रंग बोलते हैं, वहाँ केरल में रेशे (Fibers) गाते हैं।

गोवा

गोवा

  • गोआ की तटीय कुटीर अर्थव्यवस्था
  • उत्तरी और दक्षिणी गोआ: पर्यटन की चमक के परे असली गोआ
  • गोआ विश्व-स्तर पर अवकाश-पर्यटन का प्रमुख केंद्र माना जाता है। इसकी 105 किमी लंबी तटरेखा केवल प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है। यह इंडो–पुर्तगाली सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत संग्रहालय है। गुजरात और केरल की भाँति गोआ की पश्चिमी सीमा अरब सागर से लगती है, जिसे स्थानीय संदर्भ में ‘सागर-सीमा’ कहा जाता है। इस तटीय क्षेत्र में गोआ की कुटीर अर्थव्यवस्था पर्यटन गतिविधियों और पारंपरिक शिल्प के बीच संतुलन बनाए रखती है। यहाँ के कारीगर विशाल कारखानों के लिए नहीं, बल्कि कला के पारखी पर्यटकों और अपनी संस्कृति को बचाने के लिए निर्माण करते हैं।
  • उत्तरी गोआ: विरासत और मिट्टी का सौंदर्य
  • यह जिला गोआ का पर्यटन केंद्र है, लेकिन इसके भीतरी गाँवों में (विशेषकर बिचोलिम और बारदेज़ में) एक अलग ही दुनिया है।
  • अजुलेजोस (Azulejos – टाइल पेंटिंग):
  • विरासत: यह 500 साल पुरानी पुर्तगाली कला है। ‘अजुलेजोस’ हाथ से पेंट की गई चमकदार टाइलें होती हैं, जो प्रायः नीले और सफेद रंग की होती हैं।
  • कारीगर: स्थानीय कलाकार मिट्टी की टाइलों पर गोआ के जनजीवन, चर्च और लैंडस्केप को चित्रित करते हैं।
  • बाजार: यह ‘प्रीमियम कुटीर उद्योग’ है। ये टाइलें महलों, विला और होटलों की दीवारों की शोभा बढ़ाती हैं। यह गोआ की पहचान बन चुका है।
  • कुम्हार कला (Pottery):
  • बिचोलिम (Bicholim): यहाँ की लाल मिट्टी (Red Clay) बहुत विशेष है। कुम्हार समुदाय यहाँ इस मिट्टी से ‘भगवान गणेश की मूर्तियों’ और रसोई के बर्तनों का निर्माण करता है। प्लास्टिक के वर्चस्व के बावजूद, बिचोलिम के मटके आज भी गोआ के हर घर में पाए जाते हैं।
  • काजू और फेनी उद्योग (Heritage Spirit):
  • शिल्प: काजू फेनी बनाना केवल शराब बनाना नहीं, यह एक ‘कृषि-शिल्प’ है।
  • GI टैग: ‘काजू फेनी’ को जीआई टैग प्राप्त है। इसे पारंपरिक तरीके से मिट्टी के बर्तनों में आसुत (Distill) किया जाता है। उत्तरी गोआ के पहाड़ियों में बसे हजारों परिवार इसी कुटीर उद्योग पर निर्भर हैं।
  • ODOP (एक जिला एक उत्पाद): काजू और काजू उत्पाद (Cashew Processing) ODOP (एक जिला एक उत्पाद) के अंतर्गत आते हैं।
  • दक्षिणी गोआ जिला: आदिम संस्कृति और प्रकृति
  • दक्षिणी गोआ अपेक्षाकृत शांत है और यहाँ की कला में गोआ के मूल निवासियों (आदिवासियों) की छाप अधिक है। यहाँ के कुटीर उद्योग में मुख्यतः निम्नलिखित हैं –
  • कुनबी साड़ी (Kunbi Saree):
  • पहचान: यह गोआ की ‘आदिवासी पहचान’ है। इसे ‘गावड़ा’ (Gawda) जनजाति की महिलाएं पहनती हैं।
  • विशेषता: यह एक सूती साड़ी है जिसमें लाल और सफेद रंग की चेक (Checkered) डिज़ाइन होती है। यह साड़ी इतनी मजबूत होती थी कि इसे खेतों में काम करते समय पहना जाता था।
  • पुनर्जीवन: यह कला लगभग लुप्त हो गई थी, लेकिन स्वर्गीय वेंडेल रॉड्रिक्स जैसे डिजाइनरों और सरकार के प्रयासों से अब हथकरघे फिर से चलने लगे हैं। यह ‘लुप्त होती विरासत’ को बचाने का एक संघर्ष है।
  • बांस और बेंत शिल्प (Bamboo Craft):
  • सत्तारी और काणकोण (Canacona) के जंगलों में रहने वाला ‘महार’ समुदाय बांस की टोकरियाँ (जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘पांटलो’ कहते हैं) बनाता है। इनका उपयोग मछली पकड़ने और धान रखने में होता है।
  • नारियल शिल्प (Coconut Craft):
  • नारियल के रेशों से रस्सियाँ बनाना और नारियल के कड़े खोल (Shell) से चम्मच, कटोरे और कलाकृतियाँ बनाना यहाँ का प्रमुख गृह उद्योग है।
  • ODOP (एक जिला एक उत्पाद): इसके अंतर्गत समुद्री उत्पाद (Marine Products) और कहीं-कहीं कटहल (Jackfruit) प्रसंस्करण आते हैं।
  • तुलनात्मक विश्लेषण: गुजरात, केरल और गोआ
पहलू गुजरात (सीमांत) केरल (तटीय) गोआ (तटीय)
मूल दर्शन मरुस्थल की कठोरता और रंगों का उत्सव संसाधनों का अधिकतम उपयोग (सहकारिता) ‘इंडो-वेस्टर्न’ संलयन और बुटीक (Boutique) संस्कृति
बाजार स्थानीय हाट और अंतर्राष्ट्रीय निर्यात (कपड़ा) घरेलू उपयोग और निर्यात (कॉयर/काजू) मुख्यतः पर्यटन आधारित (Souvenir Market)
उत्पाद का प्रकार उपयोगिता और परिधान (कढ़ाई) औद्योगिक (रस्सी/मैट) और खाद्य सजावटी (Decorative) और विरासत (Heritage)
आय स्तर मध्यम (कड़ी मेहनत, कम दाम) स्थिर (सहकारी सुरक्षा) उच्च (प्रीमियम उत्पाद, उच्च श्रम लागत)
सबसे बड़ी चुनौती पानी की कमी और पलायन मशीनीकरण से प्रतिस्पर्धा जमीन की कमी और पर्यटन क्षेत्र में श्रम का पलायन
  • गोआ की कुटीर अर्थव्यवस्था आकार में छोटी है, लेकिन ‘मूल्य’  में बहुत बड़ी है। गोआ के कारीगर कला, विरासत और विशिष्टता पर विशेष ध्यान देते हैं। यहाँ की चुनौती यह है कि नई पीढ़ी कुटीर उद्योगों को छोड़कर क्रूज जहाजों और होटलों में नौकरी करना पसंद करती है। यदि कुनबी साड़ी का करघा और अजुलेजोस की तूलिका रुक गई, तो गोआ केवल एक ‘पार्टी डेस्टिनेशन’ रह जाएगा, उसकी आत्मा खो जाएगी। गोआ के कारीगर उसी आत्मा के रक्षक हैं।

तमिलनाडु

मिलनाडु

  • तमिलनाडु की तटीय कुटीर अर्थव्यवस्था
  • तिरुवल्लूर से तूतीकोरिन तक: 13 जिलों की अप्रतिम विरासत
  • भारत की दूसरी सबसे लंबी, 1076 किमी की तटरेखा वाला तमिलनाडु केवल समुद्री व्यापार का क्षेत्र नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक प्रवाह का एक ऐतिहासिक मार्ग है। बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के संगम क्षेत्र में स्थित इस भूभाग पर कुटीर उद्योग धार्मिक और स्थापत्य परंपराओं के संरक्षण में विकसित हुए हैं। गुजरात और केरल की तटीय कारीगरी से भिन्न, तमिलनाडु की तटीय शिल्प परंपराओं में भक्ति और मंदिर वास्तुकला का गहरा प्रभाव परिलक्षित होता है। यहाँ उत्पादन से अधिक सृजन का महत्व है। यहाँ कुटीर उद्योग का जितना विकास होगा, उतना ही यहाँ आर्थिक संबर्धन होगा तटीय सीमा का, और फिर सुरक्षित होगी भारत की यह महत्वपूर्ण सीमा।
  • उत्तरी तटीय जिले (चेन्नई से विल्लुपुरम् तक)
  • यहाँ शहरीकरण और पारंपरिक कला का अद्भुत संगम है। कुटीर उद्योगों को निम्न प्रकार से विश्लेषित कया जा सकता है –
  • कांचीपुरम् (चेन्नई और कांचीपुरम्):
  • रेशम की राजधानी: कांचीपुरम् केवल शहर नहीं, एक ब्रांड है। यहाँ के ‘पट्टू’ (रेशम) की साड़ियाँ विश्व प्रसिद्ध हैं।
  • कारीगर: लगभग 60,000 हथकरघा (Looms) आज भी खटखटाते हैं। यहाँ बुनकर सोने के तारों (Zari) को रेशम में पिरोकर पौराणिक कथाएँ बहुत सुन्दर ढंग से बुनते हैं।
  • व्यवस्था: यहाँ सहकारी समितियाँ (जैसे कामक्षी अम्मन सोसाइटी) बहुत सशक्त हैं।
  • मामल्लपुरम् (चेंगलपट्टू):
  • पत्थर शिल्प (Stone Carving): पल्लव काल की विरासत है यह शिल्प। यहाँ के विश्वकर्मा समुदाय के कारीगर ग्रेनाइट पत्थर को मोम की तरह तराशते हैं। उनकी मूर्तियाँ जापान और यूरोप के मंदिरों और संग्रहालयों में जाती हैं।
  • GI टैग: मामल्लपुरम् पत्थर शिल्प को GI टैग प्राप्त है।
  • ODOP (एक जिला एक उद्योग): इसके अंतर्गत आते हैं – समुद्री उत्पाद और काजू प्रसंस्करण (कुड्डालोर)।
  • कावेरी डेल्टा (तंजावुर, मयिलादुथुरै, नागपट्टिनम्, तिरुवरूर जिले) 
  • यह क्षेत्र तमिलनाडु की सांस्कृतिक आत्मा है। यहाँ का हर गाँव एक विशेष शिल्प के लिए जाना जाता है।
  • तंजावुर गुड़िया (Thanjavur Dancing Dolls):
  • कला: ‘तलैयाटी बोम्मई’ (सिर हिलाने वाली गुड़िया)। यह गुरुत्वाकर्षण के केंद्र (Center of Gravity) के सिद्धांत पर काम करने वाला एक प्राचीन खिलौना है।
  • सामग्री: कागज की लुगदी (Papier-mâché) और प्लास्टर ऑफ पेरिस।
  • कारीगर: सैकड़ों परिवार केवल नवरात्र के ‘गोलू’ (Golu) उत्सव के लिए साल भर गुड़िया बनाते हैं।
  • नाचियार कोविल दीप (Nachiar Koil Lamp):
  • कुंभकोणम् के पास: यहाँ ‘पथर’ (Pather) समुदाय के कारीगर पीतल के विशाल दीप (Kuthuvilakku) बनाते हैं। यह दीप दक्षिण भारत के हर शुभ कार्य की शुरुआत में प्रज्ज्वलित किया जाता है।
  • GI टैग: इसे GI टैग प्राप्त है।
  • स्वामीमलाई कांस्य मूर्तियाँ (Swamimalai Bronze):
  • चोल काल की ‘लॉस्ट वैक्स’ (Lost Wax) तकनीक से आज भी यहाँ विश्व की सबसे बेहतरीन कांस्य नटराज मूर्तियाँ बनाई जाती हैं।
  • दक्षिणी तटीय जिले (रामनाथपुरम् से तूतीकोरिन के क्षेत्र)
  • यह क्षेत्र शुष्क है, लेकिन यहाँ के ताड़ (Palm) और समुद्र से जुड़े अनूठे शिल्प विख्यात हैं।
  • पत्तमादाई चटाई (Pattamadai Mat – तिरुनेलवेली/तूतीकोरिन चटाई):
  • रेशम जैसी घास: यहाँ ‘कोराई’ घास (Sedge grass) से ऐसी चटाई बुनी जाती है जो रेशम जैसी मुलायम होती है। इसे इतना बारीक बुना जाता है कि पूरी चटाई एक छोटी सी डिब्बी में समा सकती है।
  • विश्व प्रसिद्धि: महारानी एलिजाबेथ के राज्याभिषेक में यही चटाई उपहार में दी गई थी।
  • ताड़ के पत्तों का शिल्प (Palm Leaf Craft):
  • रामनाथपुरम्/मनापाड़: यहाँ की महिलाएं ताड़ के पत्तों से टोकरियाँ, पंखे और खिलौने बनाती हैं। मनापाड़ (तूतीकोरिन) में यह कला पुर्तगाली प्रभाव के साथ विकसित हुई है।
  • सीप शिल्प (Seashell Craft):
  • रामेश्वरम्/कन्याकुमारी: समुद्र से मिली सीपियों (Shells) से दर्पण, झूमर और आभूषण बनाने का काम हजारों महिलाओं को रोजगार देता है। यह पूरी तरह पर्यटन आधारित है।
  • ODOP (एक जिला एक उद्योग): इसके अंतर्गत आते हैं –  ताड़ के उत्पाद (Palm Products) और समुद्री उत्पाद।
  • तुलनात्मक सार: गुजरात बनाम तमिलनाडु (तटीय) 
पहलू गुजरात (पश्चिमी सीमा) तमिलनाडु (पूर्वी/दक्षिणी सीमा)
मुख्य प्रेरणा लोक-संस्कृति और खानाबदोश जीवन मंदिर-वास्तुकला और शास्त्रीय परंपरा
सामग्री कपड़ा (कढ़ाई), मिट्टी पत्थर, धातु (कांस्य/पीतल), ताड़
तकनीक सुई-धागा (कढ़ाई) ढलाई (Casting) और छेनी-हथौड़ा
बाजार फैशन और लाइफस्टाइल धार्मिक और आध्यात्मिक (मूर्तियाँ/दीप)
कारीगर की स्थिति व्यक्तिगत हुनर (Individual Skill) वंशानुगत गिल्ड (Hereditary Guilds)
  • तमिलनाडु के तट पर लहरों के शोर के बीच छेनी और हथौड़े की खटखट भी सुनाई देती है। जहाँ गुजरात का शिल्प ‘पहनने’ के लिए है, वहीं तमिलनाडु का शिल्प ‘पूजने’ और ‘सजोने’ के लिए है। रामनाथपुरम् की ताड़ की टोकरी से लेकर स्वामीमलाई की नटराज मूर्ति तक – यह यात्रा ‘प्रकृति से परमात्मा’ तक की यात्रा है, जिसे यहाँ के कारीगर अपने पसीने से पूरा करते हैं। तमिलनाडु की सीमा पर केवल सैनिक नहीं, शिल्पी भी पहरा देते हैं – अपनी संस्कृति को गढ़कर।

गुजरात

गुजरात

  • गुजरात की सीमांत कुटीर अर्थव्यवस्था: समुद्र और मरुभूमि का कारीगर वर्ग
  • (कच्छ से वालसाड़ तक: 17 जिलों की शिल्प विरासत)
  • गुजरात की सीमा केवल पाकिस्तान के साथ नहीं है। यह अरब सागर के साथ टकराती है, जहाँ 17 जिले न केवल राष्ट्र की रक्षा करते हैं, बल्कि विश्व की सबसे समृद्ध कारीगरी परंपराओं को भी संरक्षित करते हैं। मोरबी की मिट्टी, जामनगर का रंगीन बाँधनी, सूरत की बुनाई – ये सब भारत की सांस्कृतिक संपदा के प्रतीक हैं। गाँव में कारीगर ही राष्ट्र की आत्मा होते हैं। गुजरात की सीमांत भूमि पर 60,000 से अधिक कारीगर अपने हाथों से भारत की गरिमा को गढ़ते हैं।
  • कच्छ
  • भौगोलिक और सांस्कृतिक परिचय
  • कच्छ जिला विराट रण की सफेद रेतों में फैला है जहाँ हजारों साल की सभ्यता सोई है। यह भारत की सीमांत कला का सबसे प्रभावशाली केंद्र है। 969 गाँवों में बसे इस जिले की अर्थव्यवस्था कृषि और कारीगरी का समान मिश्रण है। परंतु कच्छ की विशेषता यह है कि यहाँ खानाबदोश समुदाय आदिकाल से निवास करते हैं। सिंध से लाया गया ज्ञान, उत्तर भारत की परंपरा, और कच्छ की अपनी विरासत – इन तीनों का अद्भुत संमिश्रण यहाँ दिखता है।
  • कारीगरी की परंपराएँ: एक अदृश्य अर्थव्यवस्था
  • कच्छ में 20 से अधिक कारीगरी क्षेत्र हैं, जिनमें 60,000 कारीगर – मुख्यतः महिलाएँ – अपनी जीविका कमाती हैं:
  • कच्छी कढ़ाई:
  • शैलियाँ: 40+ भिन्न-भिन्न प्रकार की कढ़ाई
  • विशेषता: दर्पण-कार्य (Mirror work), रंगीन धागे, अनोखे डिज़ाइन
  • मुख्य गाँव: होडका, अंजार, भुज क्षेत्र
  • कारीगर: प्रमुख महिला समूह
  • GI-टैग: प्राप्त (भारतीय भौगोलिक संकेत)
  • अंतर्राष्ट्रीय निर्यात: यूएसए, यूके, फ्रांस, संयुक्त अरब अमीरात
  • उपयोग: परिधान, घर की सजावट, सहायक वस्तुएँ
  • रोगन कला:
  • उद्भव: निरोना गाँव
  • तकनीक: तेल-आधारित रंगों को धातु की सुई से कपड़े पर खींचना
  • परंपरा: दुल्हन की पोशाक को सजाने के लिए ऐतिहासिक
  • कारीगर: विशेषज्ञ पारिवारिक समूह
  • अजरख ब्लॉक प्रिंटिंग:
  • प्राकृतिक रंग: हल्दी, अनार, स्याही, मिट्टी
  • तकनीक: हस्तनिर्मित ब्लॉक से छपाई (चूनामय पद्धति)
  • गाँव: अजरखपुर
  • पारिवारिक परंपरा: पीढ़ियों से चली आ रही
  • बाँनी कढ़ाई:
  • विशेषता: पैच-वर्क, अप्लिकेस, रंगीन सूत
  • गाँव: होडका (होडका के तहत समूह)
  • उपयोग: घरेलू वस्तुएँ, परिधान, आभूषण, त्रिंकेट
  • मिट्टी के बर्तन व मूर्तिकला:
  • गाँव: खावदा (खावदा के कुम्हार)
  • विशेषता: कच्छ की नरम मिट्टी से तैयार, लाल-काली-सफेद रंग से सजावट
  • परंपरा: विशिष्ट डिज़ाइन
  • चाँदी के आभूषण:
  • तकनीक: धातु को ढालना, नक्काशी
  • विशेषता: नाज़ुक कारीगरी
  • अन्य शिल्प:
  • बुनाई (Weaving)
  • लकड़ी की वस्तुएँ
  • कालीन निर्माण
  • प्राकृतिक रेशे के उत्पाद
  • आर्थिक वास्तविकता: आत्मनिर्भरता का संघर्ष
  • कच्छ में 60,000 कारीगरों की औसत वार्षिक आय: 1 लाख से 1.8 लाख रुपये (पारिवारिक स्तर पर)
  • यदि एक पारिवारिक इकाई 1.5 लाख रुपये कमाती है, तो 5 जनों के परिवार की प्रति व्यक्ति मासिक आय – 2,500 रुपये। परंतु यह संख्या छिपाती है एक गहरी चेतना: ये कारीगर सरकारी सहायता के बिना, अपनी कारीगरी से, पीढ़ियों की परंपरा को जीवंत रखते हैं।
  • 2001 की भूकंप विभीषिका: अभी भी जारी – परंतु कच्छ की कथा में एक दर्दनाक अध्याय है। जनवरी 26, 2001 को भारी भूकंप आया। इस आपदा ने हजारों कारीगरों के घर, कार्यशालाएँ, औज़ार, सामग्री सब कुछ नष्ट कर दिया। पशुपालन सम्पदा (जो खानाबदोशों का मुख्य आधार था) पूरी तरह समाप्त हो गई।
  • स्थानीय बाजार टूट गए। कारीगरों को शून्य से शुरुआत करनी पड़ी। 2025 में, 24 साल बाद भी, कच्छ अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ है। यह “कच्छी आत्मा” की शक्ति का प्रमाण है कि भूकंप के बावजूद, कारीगर अपनी परंपरा को पुनः जीवंत कर रहे हैं।
  • गुजरात के अन्य सीमांत जिले: विविधता की गाथा
  • मोरबी: मिट्टी का संगीत
  • मोरबी जिले में कठीपा कढ़ाई की परंपरा है। यह एक अनोखी कला है। यहाँ रेशमी धागे से हेरिंगबोन और शृंखला सिलाई की जाती है। किंवदंती कहती है कि यह कला भगवान कृष्ण के समय यहाँ आई थी। मोरबी के कारीगर इस कला को आधुनिक परिधानों, सजावटी वस्तुओं, तोरणों पर लागू कर रहे हैं। यह परंपरा का आधुनिकीकरण है।
  • जामनगर: रंग का राज्य
  • जामनगर का बाँधनी वस्त्र – भारत के सबसे प्रसिद्ध बँधाई डाई का एक केंद्र। यह टाई-डाई तकनीक में विश्व-प्रसिद्ध है। जामनगर और कच्छ मिलकर बाँधनी उत्पादन के मुख्य केंद्र हैं।
  • भावनगर: औद्योगिक विविधता
  • भावनगर जिला एक बहु-आयामी अर्थव्यवस्था का उदाहरण है:​
उद्योग का प्रकार इकाइयाँ रोजगार निवेश (लाख रु.)
कपास-आधारित वस्त्र 2,094 10,506 6,640
तैयार कपड़े व कढ़ाई 76 326 189
लकड़ी/फर्नीचर 507 2,555 632
चमड़ा-आधारित 138 626 429
धातु-आधारित (स्टील) 1,358 6,781 2,728
कृषि-आधारित 386 1,974 1,284
कुल 8,760 49,587 ₹282 करोड़
  • परंतु भावनगर की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है: हीरा काटने-पॉलिशिंग का कार्य
  • इकाइयाँ: 4,340
  • कारीगर: 74,000 अनुमानित
  • वार्षिक उत्पादन: 927,000 कैरेट हीरे पॉलिश किए जाते हैं
  • निवेश: 1,890 लाख रुपये
  • स्थिति: पूरी तरह अमान्य क्षेत्र
  • यह आश्चर्यजनक है कि भारत की हीरा-पॉलिशिंग का एक प्रमुख केंद्र सरकारी रिकॉर्ड में लगभग अदृश्य है।
  • गुजरात की राष्ट्रीय एकल-उत्पाद योजना (ODOP)
  • गुजरात के 33 जिलों में से 17 सीमांत/तटीय जिलों को ODOP के अंतर्गत विशेष उत्पाद सौंपे गए हैं:
जिला ODOP उत्पाद उद्योग प्रकार
अहमदाबाद गेहूँ-आधारित खाद्य प्रसंस्करण
आनंद केला-आधारित खाद्य प्रसंस्करण
भावनगर प्याज़-आधारित खाद्य प्रसंस्करण
भरूच केला-आधारित खाद्य प्रसंस्करण
कच्छ हस्तशिल्प, कढ़ाई, बुनाई हस्तशिल्प (प्राथमिक)
जामनगर बाँधनी, वस्त्र शिल्प हस्तशिल्प
मोरबी सिरेमिक/मिट्टी-आधारित हस्तशिल्प
सूरत (डेटा प्रतीक्षित) वस्त्र
वालसाड़ सपोता-आधारित खाद्य प्रसंस्करण
  • तुलनात्मक विश्लेषण: पंजाब-यूपी-गुजरात
पहलू पंजाब यूपी गुजरात
कुल कारीगर 1,90,000 80-1,00,000 60-1,50,000
मुख्य उद्योग वस्त्र, जूते, बर्तन वन-उत्पाद, खाद्य, शिल्प हस्तशिल्प, वस्त्र, खाद्य
परिवारिक आय ₹1.5-2.5 लाख ₹1.2-1.8 लाख ₹1-1.8 लाख
सीमा का प्रकार भू-सीमा (पाकिस्तान) भू-सीमा (नेपाल) भू + समुद्री
महिला भागीदारी 40% 35-40% 45-50%
GST दर (हाल) 5-12% 5-12% 5% (2023)
निर्यात बाजार एशिया-प्रशांत सीमित यूरोप, यूएसए, यूएई
आपदा प्रभाव विभाजन सीमित 2001 भूकंप (अभी प्रभावशाली)
  • GI-टैग की उपस्थिति:
  • कच्छ कढ़ाई: GI-टैग प्राप्त
  • यह गुणवत्ता प्रमाणीकरण और अंतर्राष्ट्रीय मूल्य बढ़ाता है।
  • समुद्री व्यापार का प्रभाव:
  • गुजरात के बंदरगाह (जामनगर, भावनगर) सीधी अंतर्राष्ट्रीय पहुँच प्रदान करते हैं।
  • सीमांत-विशिष्ट चुनौतियाँ
  • राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव: जब सीमांत समुदाय आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं, तो तस्करी, अवैध व्यापार, पाकिस्तान से आयात की अवैध प्रतियों का दबाव बढ़ता है।
  • समाधान और सुझाव
  • तत्काल (अगले 2 वर्ष):
  • डिजिटलीकरण: सभी गाँवों में 4G कनेक्टिविटी
  • ई-कॉमर्स: कारीगरों को अमेजन, फ्लिपकार्ट जैसे प्लेटफॉर्मों से जोड़ना
  • कच्चे माल की सुरक्षा: सरकारी सहायता में प्राकृतिक रंग, धागे की आपूर्ति
  • ऋण सुविधा: 50,000 रु. तक ब्याज-मुक्त, 3 साल के लिए
  • मध्यकालीन (3-10 वर्ष):
  • क्लस्टर विकास: हर जिले में आधुनिक कारीगर संरचनाएँ
  • अंतर्राष्ट्रीय बाजार: यूरोपीय डिज़ाइनरों के साथ सहयोग
  • शिल्प-पर्यटन: कच्छ को “कारीगर पर्यटन” के रूप में विकसित करना
  • दीर्घकालीन (10+ वर्ष):
  • यूनेस्को संरक्षण: कच्छ की 20+ कारीगरी परंपराओं को “मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत” सूचीबद्ध करना
  • सांस्कृतिक विश्वविद्यालय: कच्छ में एक कारीगरी-आधारित विश्वविद्यालय स्थापना
  • निर्यात बैंक: हस्तशिल्प-विशिष्ट निर्यात वित्तपोषण
  • गुजरात की सीमांत अर्थव्यवस्था पंजाब और उत्तर प्रदेश से भिन्न है। यहाँ न तो विभाजन की विरासत है, न ही वन-आधारित जीविका। यहाँ है शुद्ध कारीगरी – हजारों साल की परंपरा। परंतु 2001 के भूकंप ने इस व्यवस्था को गंभीर रूप से झकझोरा है। भूकंप के बाद की पीढ़ी अभी तक पूर्ण आत्मविश्वास नहीं पा सकी है। जलवायु परिवर्तन, समुद्री कटाव, युवा पलायन – ये सब नए संकट हैं। परंतु कच्छी आत्मा की शक्ति देखिए – 24 साल बाद भी, 60,000 कारीगर अपना काम जारी रखे हुए हैं। यह मानवीय सहनशीलता और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है। राष्ट्र को इन कारीगरों को सम्मान, समर्थन, और बाजार देना चाहिए। यह केवल आर्थिक विकास नहीं – यह राष्ट्र धर्म है।

आंध्र प्रदेश

आंध्र प्रदेश

  • भारत के पूर्वी तट पर स्थित आंध्र प्रदेश की 974 किमी लंबी तटरेखा सामरिक दृष्टि से बंगाल की खाड़ी की रक्षा करती है और सांस्कृतिक दृष्टि से एक समृद्ध गलियारे का निर्माण करती है। गुजरात के मरुस्थली कच्छ या केरल की हरित अर्थव्यवस्था से भिन्न, आंध्र प्रदेश की कुटीर अर्थव्यवस्था मिट्टी, लकड़ी और कपास पर आधारित बहु-संसाधन संरचना पर टिकी है। श्रीकाकुलम की खादी और नेल्लोर के रेशम जैसे शिल्प लाखों कारीगरों, विशेषकर बुनकरों के माध्यम से इस क्षेत्र की सांस्कृतिक निरंतरता को बनाए रखते हैं।
  • उत्तर तटीय आंध्र (श्रीकाकुलम, विजयनगरम्  और विशाखापत्तनम् जिलों के क्षेत्र)
  • यह क्षेत्र आदिवासी संस्कृति और परिष्कृत शिल्प का मिश्रण है। इस क्षेत्र के उत्पाद विशिष्ट माने जाते हैं-
  • पोंडुरु खादी (श्रीकाकुलम):
  • विरासत: पोंडुरु गाँव की खादी को महात्मा गांधी ने दुनिया की सबसे महीन खादी कहा था।
  • तकनीक: यहाँ की महिलाएं ‘मछली की हड्डी’ (Fish Jawbone) का उपयोग करके कपास को साफ करती हैं और लाल कपास (Red Cotton) से सूत कातती हैं। यह पूरी तरह हाथ से बनी खादी है, जिसमें एक भी मशीन का प्रयोग नहीं होता है।
  • कारीगर: पट्टूशाली समुदाय के लोग इस लुप्त होती कला के अंतिम संरक्षक हैं।
  • एटिकोप्पका खिलौने (विशाखापत्तनम्):
  • गाँव: एटिकोप्पका वराह नदी के तट पर बसा है।
  • तकनीक: इसे ‘लाख शिल्प’ (Lacquer Craft) कहते हैं। ‘अंकुडी’ लकड़ी को खराद (Lathe) पर घुमाकर उस पर प्राकृतिक लाख के रंग चढ़ाए जाते हैं।
  • विशेषता: ये खिलौने पूरी तरह से बच्चों के लिए सुरक्षित (Non-toxic) होते हैं क्योंकि इनमें कोई रासायनिक रंग नहीं होता।
  • GI टैग: यह कुटीर उद्योग GI टैग प्राप्त है।
  • बोब्बिली वीणा (विजयनगरम्):
  • संगीत और लकड़ी: यह तंजौर वीणा से अलग है। इसे ‘कटहल’ (Jackfruit) की एक ही लकड़ी के टुकड़े से तराशा जाता है। गोलापोल्लु समुदाय के कारीगर इसे बनाते हैं।
  • गोदावरी डेल्टा (पूर्वी और पश्चिमी गोदावरी के क्षेत्र)
  • यह क्षेत्र आंध्र का ‘चावल का कटोरा’ है, और यहाँ की कला में इसकी समृद्धि झलकती है। इस क्षेत्र के उत्पाद अपनी विशिष्टता के लिए ख्यात हैं-
  • उप्पदा जामदानी साड़ी (पूर्वी गोदावरी):
  • रेशम का जादू: उप्पदा गाँव में बनने वाली ये साड़ियाँ इतनी हल्की होती हैं कि इन्हें ‘माचिस की डिब्बी’ में रखा जा सकता है।
  • तकनीक: मूल रूप से बंगाल की जामदानी बुनाई को यहाँ के बुनकरों ने स्थानीय कपास के साथ मिलाकर एक नया रूप दिया है।
  • GI टैग: इस उद्योग को GI टैग प्राप्त है।
  • क्रोशिया लेस वर्क (Narsapur Crochet Lace – पश्चिमी गोदावरी):
  • नरसापुर: आंध्र प्रदेश के नरसापुर को ‘भारत का लेस शहर’ कहते हैं।
  • इतिहास: 19वीं सदी में स्कॉटिश मिशनरियों ने यहाँ की महिलाओं को क्रोशिया (Lace) बनाना सिखाया था। आज लाखों महिलाएं घर बैठे क्रोशिया के मेज़पोश, फ्रॉक और सजावटी सामान बनाती हैं जो यूके और यूएसए निर्यात होते हैं।
  • GI टैग: इस उद्योग को GI टैग प्राप्त है।
  • मध्य तटीय (कृष्णा और गुंटूर क्षेत्र)
  • यह क्षेत्र राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से बहुत सक्रिय है। इस क्षेत्र के उत्पाद विरासत की देन हैं –
  • कोंडापल्ली खिलौने (कृष्णा):
  • लकड़ी: ये खिलौने ‘टेल्ला पोनीकी’ (Tella Poniki) नामक बहुत ही हल्की लकड़ी से बनते हैं।
  • थीम: यहाँ के खिलौनों में ‘दशावतार’, ‘गाँव का जीवन’, और ‘पालकी’ (Palanquin) प्रमुख हैं।
  • कारीगर: राजस्थान से आकर यहाँ बसे आर्य क्षत्रिय समुदाय के लोग इसके मूल रूप से कारीगर हैं। कच्छ के कारीगरों की तरह ही इनका प्रवासी इतिहास है।
  • मछलीपट्टनम कलमकारी (कृष्णा):
  • ब्लॉक प्रिंट: श्रीकालाहस्ती की ‘पेन कलमकारी’ के विपरीत, यहाँ लकड़ी के ब्लॉक से कपड़ों पर प्राकृतिक रंगों (सब्जियों के रंग) से छपाई की जाती है। यह मुगलों और गोलकुंडा सुल्तानों के समय फली-फूली।
  • मंगलगिरी साड़ी (गुंटूर):
  • सादगी: इन सूती साड़ियों की विशेषता है कि इनके शरीर पर कोई बुनाई नहीं होती, केवल बॉर्डर और पल्लू पर ‘निज़ाम डिज़ाइन’ होता है। ये बहुत टिकाऊ होती हैं।
  • दक्षिण तटीय (प्रकाशम् और नेल्लोर क्षेत्र)
  • यहाँ की कला में सूखा क्षेत्र और धार्मिक प्रभाव दिखता है। इस क्षेत्र के उत्पाद राष्ट्र-ख्यात हैं-
  • चिराला बुनाई (प्रकाशम्):
  • तेलिया रुमाल: यहाँ की विशिष्टता है। पहले यह तेल में डूबा हुआ कपड़ा होता था जो व्यापारियों के लिए बनता था। अब यह फैशन का हिस्सा है। 
  • चमड़े की कठपुतलीः
  • निम्मलाकुंटा: यहाँ के कारीगर बकरी की खाल को पारदर्शी बनाकर उस पर रामायण-महाभारत के पात्रों को चित्रित करते हैं। पहले यह केवल शो के लिए था, अब ये लैंपशेड और दीवार की सजावट के लिए बनाते हैं।
  • वेंकटगिरी साड़ी (नेल्लोर):
  • राजसी वस्त्र: नेल्लोर के वेंकटगिरी राजाओं के संरक्षण में यह कारीगरी विकसित हुई। ये ‘जामदानी’ तकनीक वाली बहुत ही बारीक सूती और रेशमी साड़ियाँ हैं। पहले ये केवल राजघरानों के लिए बनती थीं।
  • तुलनात्मक सार: आंध्र प्रदेश बनाम अन्य तटीय राज्य
पहलू आंध्र प्रदेश (तटीय) तमिलनाडु (तटीय) केरल (तटीय)
विशिष्ट सामग्री हल्की लकड़ी (पोनीकी/अंकुडी) और प्राकृतिक रंग पत्थर, पीतल और ताड़ नारियल (Coir) और काजू
खिलौने कोंडापल्ली और एटिकोप्पका (लकड़ी) तंजावुर गुड़िया (मिट्टी/कागज) लकड़ी और कॉयर के खिलौने
वस्त्र खादी (पोंडुरु) और महीन कपास (मंगलगिरी/उप्पदा) भारी रेशम (कांचीपुरम्) सफेद/सुनहरा सूती (कसावु)
विदेशी प्रभाव क्रोशिया लेस (स्कॉटिश प्रभाव) पुर्तगाली प्रभाव (मनापाड़) अरब और डच प्रभाव
कारीगर आधार बुनकर और लकड़ी के शिल्पकार मंदिर शिल्पकार (स्थापत्य) महिला आधारित (कॉयर/काजू)
  • आंध्र प्रदेश की तटीय कुटीर अर्थव्यवस्था ‘रंगों और लकड़ी’ की एक सिम्फनी (Symphony) है। जहाँ केरल में रेशे प्रधान हैं और तमिलनाडु में पत्थर, वहीं आंध्र प्रदेश में ‘लकड़ी और कपड़ा’ बोलते हैं। पोंडुरु की चरखे की गूंज और एटिकोप्पका के रंगों की चमक यह बताती है कि मशीनीकरण के युग में भी मानव-स्पर्श अर्थात् मनुष्य के हस्तशिल्प का कोई विकल्प नहीं है। यह केवल रोजगार नहीं, बल्कि ‘आंध्र की अस्मिता’ का प्रश्न है।

ओढिशाा

ओडिशा

  • ओडिशा को प्राचीन ग्रंथों में उत्कल कहा गया है। ओडिशा नाम स्वयं ही ‘उत्कृष्ट कला’ की घोषणा करता है। भारत के पूर्वी तट पर विस्तृत 480 किमी की तटरेखा के साथ यह प्रदेश केवल आर्थिक गतिविधियों का क्षेत्र नहीं, अपितु श्रीजगन्नाथ-संस्कृति की कार्यशील अभिव्यक्ति है। गुजरात के शिल्प में जहाँ रंगों की दीप्ति व्याप्त रहती है और केरल में रेशों की कोमलता, वहीं ओडिशा की कला में प्रकृति का सूक्ष्म स्पर्श है। ओडिशा के इन तटीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय जिलों में कुटीर उद्योग में विशेषतः आदिवासी और ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी रहती है। बालासोर के प्रस्तर से लेकर गंजाम की केवड़ा-सुगंध तक लाखों कारीगर प्राकृतिक आपदाओं के बीच भी सांस्कृतिक उत्तराधिकार को सुरक्षित रखे हुए हैं।
  • उत्तरी तटीय जिले (बालासोर और भद्रक जिले)
  • यह क्षेत्र कला और संघर्ष का मिश्रण है, जहाँ पत्थर और घास के कुटीर उद्योगों की प्रमुखता है। इनमें कुछ विशेष रूप से चर्च्य हैं –
  • पत्थर नक्काशी (Stone Carving – बालासोर):
  • सामग्री: यहाँ नीलगिरि क्षेत्र में मिलने वाला नरम पत्थर और काला ग्रेनाइट मुख्य है।
  • कारीगर: सैकड़ों परिवार यहाँ के सोरो और नीलगिरि ब्लॉक में केवल छेनी-हथौड़े से जीवन गढ़ते हैं। उनकी बनाई छोटी मूर्तियाँ और रसोई के सिलबट्टे (Grinding Stones) पूरे पूर्वी भारत में जाते हैं।
  • चुनौती: मशीनी कटाई से कड़ी टक्कर इनकी प्रमुख चुनौती है।
  • भद्रक का कांसा और पीतल (Brass & Bell Metal):
  • यहाँ के ‘कंसारी’ समुदाय के लोग कांसा और पीतल के बर्तन बनाते हैं, जो ओडिशा के हर घर में पूजा और भोजन के लिए अनिवार्य हैं।
  • ODOP (एक जिला एक उत्पाद): समुद्री उत्पाद और चावल (भद्रक का बासमती चावल) ODOP (एक जिला एक उत्पाद) के अंतर्गत सूचीबद्ध हैं।
  • मध्य तटीय (केंद्रपाड़ा और जगतसिंहपुर जिले)
  • यह क्षेत्र बाढ़ और चक्रवातों से जूझता है, फिर भी यहाँ ‘सोना’ उगता है। यहाँ के प्रमुख कुटीर उद्योग राष्ट्रव्यापी ख्याति रखते हैं –
  • गोल्डन ग्रास शिल्प (Golden Grass Craft – केंद्रपाड़ा):
  • कइंचा (Kaincha): यह एक जंगली घास है जो मानसून के बाद नदियों के किनारे उगती है। सूखने पर यह सोने जैसी चमकीली हो जाती है।
  • कारीगर: लगभग 3000 से अधिक महिलाएं (SHGs के माध्यम से) इससे सुंदर टोकरियाँ, डिब्बे, और तश्तरियाँ बनाती हैं।
  • महत्व: यह ‘कचरे से कंचन’ (Wealth from Waste) का उत्तम उदाहरण है। यह पूरी तरह इको-फ्रेंडली है और प्लास्टिक का विकल्प है।
  • टेराकोटा (Terracotta):
  • जगतसिंहपुर और केंद्रपाड़ा के कुम्हार मिट्टी के खिलौने और छत की खपरैल (Tiles) बनाने में माहिर हैं।
  • पुरी: कला का श्रीक्षेत्र
  • पुरी केवल भगवान जगन्नाथ का धाम नहीं, बल्कि ओडिशा की शिल्प राजधानी है। यहाँ के कुछ विशेष कुटीर उत्पाद ख्यातिलब्ध हैं –
  • रघुराजपुर का पट्टचित्र:
  • विरासत: रघुराजपुर गाँव भारत का पहला ‘हेरिटेज क्राफ्ट विलेज’ है। यहाँ का हर घर एक स्टूडियो है।
  • तकनीक: कपड़े (पट्ट) पर प्राकृतिक रंगों से (शंख की सफेदी, काजल की कालिख से) भगवान की लीलाएँ उकेरी जाती हैं।
  • ताड़-पत्र नक्काशी (Palm Leaf Engraving): लोहे की कलम से ताड़ के सूखे पत्तों पर सूक्ष्म चित्रकारी करना यहाँ की विशिष्टता है।
  • पिपली एप्लिक वर्क (Pipli Applique):
  • रंगों का उत्सव: पुरी जाने वाले रास्ते पर पिपली गाँव पड़ता है। यहाँ कपड़े के टुकड़ों को जोड़कर (Applique) भगवान जगन्नाथ के रथ के लिए चंदोवा (Canopy), छाते और लैंपशेड बनाए जाते हैं।
  • GI टैग: इसे GI टैग प्राप्त है।
  • सीप शिल्प (Seashell):
  • पुरी के समुद्र तट पर महिलाएँ सीपियों से सजावटी सामान बनाती हैं।
  • दक्षिणी तटीय (गंजाम)
  • गंजाम ओडिशा का सबसे दक्षिणी जिला है, जिसकी सीमा आंध्र प्रदेश से लगती है। यहाँ के कुछ कुटीर उत्पाद चर्चा में बने रहते हैं –
  • केवड़ा उद्योग (Kewda Industry):
  • सुगंध: गंजाम (विशेषकर छत्रपुर क्षेत्र) दुनिया के 85-90% केवड़ा (Screw Pine) इत्र का उत्पादन करता है।
  • कुटीर भट्ठियाँ: हजारों किसान खेतों के किनारे केवड़ा उगाते हैं और छोटी भट्ठियों (Deg-Bhapka) में उसका अर्क निकालते हैं। यह पूरी तरह स्वदेशी तकनीक है।
  • GI टैग: ‘गंजाम केवड़ा रूह’ को जीआई टैग मिला है।
  • सींग शिल्प (Horn Craft – पारलाखेमुंडी):
  • विशिष्टता: गाय और भैंस के सींगों (Horns) को पॉलिश करके उनसे पक्षी, जानवर और कंघियाँ बनाई जाती हैं। यह कला पारलाखेमुंडी (गंजाम के पास) में प्रसिद्ध है।
  • ODOP (एक जिला एक उत्पाद): काजू और केवड़ा उत्पाद ODOP (एक जिला एक उत्पाद) के अंतर्गत सूचीबद्ध हैं।
  • तुलनात्मक सार: ओडिशा बनाम अन्य तटीय राज्य
पहलू ओडिशा (तटीय) आंध्र प्रदेश (तटीय) तमिलनाडु (तटीय)
मुख्य कच्चा माल जंगली घास (Golden Grass) और केवड़ा कपास और लकड़ी पत्थर और धातु
चित्रकला पट्टचित्र (कपड़े/ताड़ पर) कलमकारी (कपड़े पर) तंजावुर पेंटिंग (सोने/रत्न के साथ)
मंदिर का प्रभाव जगन्नाथ संस्कृति (रथ/चंदोवा) तिरुपति/वास्तुकला प्रभाव चोल/पल्लव वास्तुकला
सुगंध उद्योग केवड़ा (गंजाम जिला) – विश्व एकाधिकार चंदन (सीमित) चमेली/फूल (मदुरै)
कारीगर मॉडल हेरिटेज विलेज (रघुराजपुर) क्लस्टर आधारित (एटिकोप्पका) गिल्ड आधारित (कांस्य)

 

  • ओडिशा की तटीय कुटीर अर्थव्यवस्था भक्ति और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग का सजीव उदाहरण है। रघुराजपुर की पट्टचित्र परंपरा रंगों के माध्यम से सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखती है, जबकि गंजाम की केवड़ा परंपरा सुगंध के माध्यम से इस चेतना को विस्तार देती है। पिपली के चंदोवे और केंद्रापड़ा की स्वर्णघास शिल्प यह प्रमाणित करते हैं कि उत्कल का कारीगर सीमित साधनों में भी सौंदर्य सृजन की उच्च परंपरा निभाता है। यह शिल्प केवल आर्थिक क्रिया नहीं, बल्कि श्रीजगन्नाथ-केंद्रित सांस्कृतिक सेवा और उत्कल अस्मिता की निरंतर अभिव्यक्ति है।

पंजाब

पंजाब

भौगोलिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य

  • पंजाब की पाकिस्तान सीमा भारत की सबसे प्राचीन और सबसे विभाजित सीमा है। यहाँ, विभाजन की छाया से भी अधिक, पुनः-निर्माण की आशा का आलोक दिखता है। अमृतसर, गुरदासपुर, तरनतारन, पटियाला, लुधियाना, जालंधर, फिरोजपुर, होशियारपुर – ये आठ जिले न केवल सीमांत हैं, बल्कि भारतीय सामर्थ्य के प्रतीक हैं। यहाँ के कुटीर उद्योग पारंपरिक कौशल का जीवंत वाहक हैं, जहाँ प्रत्येक परिवार अपने हाथों से भारत की समृद्धि को गढ़ता है।
  • उद्योगों की विविधता: एक अदृश्य अर्थव्यवस्था
  • पंजाब के सीमांत क्षेत्रों में 11 से अधिक प्रमुख कुटीर उद्योग संचालित हैं, जिनमें 1,90,000 से अधिक लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से संलग्न हैं। यह संख्या कुछ भारतीय राज्यों की औद्योगिक कार्यबल के बराबर है। ये उद्योग हैं:
  • फुलकारी कढ़ाई उद्योग भारतीय सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण
  • स्थान: अमृतसर, पटियाला, कारीगर: 20,000 (मुख्यतः महिलाएँ), GI-टैग प्राप्त पारंपरिक शिल्प, प्रत्येक कढ़ाई 50-100 घंटों की मेहनत का परिणाम
  • ऊनी शॉल और स्टोल निर्माण शीतकालीन आजीविका
  • श्रमिक: 25,000, बाजार: राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय, प्रभाव: उपहार, विवाह परिधान, निर्यात
  • महिलाओं के सूती कुर्ते लैंगिक सशक्तीकरण का मॉडल
  • श्रमिक: 20,000+ (सभी महिलाएँ), लुधियाना, पटियाला के पारिवारिक सिलाई यूनिट्स
  • पंजाबी चमड़े के जूते परंपरा का आधुनिकीकरण
  • श्रमिक: 15,000, स्थान: पटियाला, अमृतसर, फाजिल्का, विशेष: विवाह परिधान, डिजाइनर संग्रह
  • हस्तनिर्मित लकड़ी के उत्पाद सरलता में सौंदर्य
  • कारीगर: 8,000 (होशियारपुर, पटियाला), विशेषता: विरासत गृह सजावट, विलास फर्नीचर
  • लकड़ी के लाख के खिलौने बाल-केंद्रित शिल्प
  • कारीगर: 3,000 (अमृतसर, मुख्यतः महिलाएँ), पारंपरिक पद्धति, कोई रासायनिक उपचार नहीं
  • स्टेनलेस स्टील के रसोई बर्तन आधुनिक उद्योग
  • कामगार: 25,000+ (जालंधर, लुधियाना), निर्यात: एशिया-प्रशांत बाजार
  • अचार और संरक्षित खाद्य स्वास्थ्य उद्योग, उद्यमी: 10,000 (गुरदासपुर, होशियारपुर),
  • महिला स्व सहायता समूह: 85% से अधिक
  • शहद और शहद उत्पाद प्रकृति की देन
  • मधुमक्खी पालक: 15,000+ (होशियारपुर, पठानकोट), उत्पादन: 500-800 किलोग्राम प्रति परिवार वार्षिक
  • सूखे मेवे प्रसंस्करण कृषि-वाणिज्य संयोजन
  • कार्यबल: 8,000
  • पापड़ और वड़ी दैनिक भोजन की परंपरा
  • निर्माता: 6,000+ (मुख्यतः महिला समूह)
  • डेयरी-आधारित मिठाई सांस्कृतिक पहचान
  • कर्मचारी: 10,000+ (लुधियाना, अमृतसर)
  • आर्थिक वास्तविकता: संघर्ष की गाथा
  • औसत वार्षिक आय: 1.5 लाख से 2.5 लाख रुपये (पारिवारिक औसत)। यह संख्या प्रथम दृष्टि में सकारात्मक लगती है, किंतु संदर्भ में देखने से सत्य उजागर होता है:
  • संलग्न जनसंख्या: ग्रामीण परिवारों का 25%, महिलाओं की भागीदारी: 40%, युवा स्वरोजगारी: 20%, ऋण का भार: 30% परिवारों पर सूदखोरों का कर्ज
  • आय विश्लेषण:
  • यदि एक पारिवारिक यूनिट 2.5 लाख रुपये वार्षिक कमाती है, तो 5 जनों के परिवार की प्रति व्यक्ति आय = 50,000 रुपये वार्षिक = 4,167 रुपये मासिक। यह महानगरीय गरीबी रेखा से नीचे है। किंतु ये संख्याएँ आत्मनिर्भरता की दास्तान कहती हैं – सरकारी सहायता के बिना, ये परिवार स्वयं को पोषित करते हैं।
  • सरकारी सहायता: अपर्याप्त और असंगठित
  • मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना (CSRY): 25,000 रुपये लोन अनुदान (प्रति परिवार), कवरेज: 40-50% पात्र परिवार
  • प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP):
  • सस्ती ऋण सुविधा
  • जटिल आवेदन प्रक्रिया – बहुत से कारीगर आवेदन ही नहीं कर पाते, GST सुधार (हाल ही में):
  • कर दर 12% से 5% में कमी (कुछ वर्गों के लिए), परिणाम: 15-20% का मूल्य ह्रास, किंतु माँग में कोई वृद्धि नहीं
  •  सीमांत-विशिष्ट चुनौतियाँ: बहुआयामी संकट
  • तत्काल चुनौती (अगले 2-3 वर्ष):
  • पाकिस्तान से तस्करी
  • हस्तनिर्मित कपड़े, जूते, बर्तनों की सस्ती प्रतियाँ, प्रभाव: स्थानीय विक्रय में 30-40% गिरावट,
  • दुःखद तथ्य: भारतीय कारीगर की मूल कृति = 2,000-5,000 रुपये; तस्करी वाली नकल = 500-1,000 रुपये
  • विद्युत की अनिश्चितता
  • अमृतसर, गुरदासपुर, फिरोजपुर: 6-8 घंटे की दैनिक कटौती, बुनाई, सिलाई जैसे यांत्रिक कार्य: विद्युत पर निर्भर, परिणाम: उत्पादन में 40% की गिरावट।
  • डिजिटलीकरण का अभाव
  • पंजाब के सीमांत क्षेत्रों में 35% घरों तक इंटरनेट नहीं, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म तक पहुँच: 10% से कम, ऑनलाइन मार्केटिंग ज्ञान: लगभग शून्य, परिणाम: निर्यात अवसर व्यर्थ हो रहे हैं।
  • सीमा पार कच्चे माल की अनिश्चितता
  • ऊन, रंग, चमड़ा – कई कुटीर पाकिस्तान से आयातित कच्चे माल पर निर्भर, सीमा पर देरी = उत्पादन में व्यवधान, मूल्य में उतार-चढ़ाव: 20-30% तक महीने-दर-महीने, मध्यकालीन संकट (3-10 वर्ष):
  • युवा पलायन: भारी सांस्कृतिक क्षरण
  • गुरदासपुर, होशियारपुर जैसे पिछड़े जिलों से युवाओं का शहरी पलायन, परिणाम:
  • कौशल का हस्तांतरण नहीं हो रहा है, परिवार-आधारित यूनिट्स बंद हो रही हैं, पारंपरिक शिल्प विलीन हो रहे हैं, उदाहरण: होशियारपुर की लकड़ी की नकार (wood carving) परंपरा,
  • 1970: 50,000 कारीगर, 2000: 15,000 कारीगर, 2025: 3,000 कारीगर (अधिकांश 60+ वर्ष के)
  • बाजार का एकाधिकार
  • बड़ी कंपनियाँ (जालंधर स्टील, लुधियाना बर्तन निर्माता) कुटीर उद्योगों को दूर कर रही हैं। कीमत प्रतियोगिता में कुटीर खिलाड़ी हार रहे हैं।
  • सीमांत समाज का विस्थापन
  • यदि यह प्रवृत्ति जारी रहीं, तो 2035 तक पंजाब के सीमांत जिलों की जनसंख्या में 15-20% की गिरावट हो सकती है। शहरी झुग्गियों में गरीब रह रहे हैं। सीमांत क्षेत्रों में जनसंख्या का रिक्ति हो रही है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव
  • जब सीमांत समुदाय आर्थिक रूप से कमजोर होता है, तो सीमा पार तस्करी में सहयोग करने लगता है। तब अवैध प्रवेश को नजरअंदाज करना सुरक्षा बोध की कमी बन जाती है।

अरुणाचल प्रदेश

  • भारत के प्राची-द्वार पर अवस्थित और उषा की प्रथम किरणों से अभिषिक्त भूमि अरुणाचल प्रदेश भूटान, तिब्बत (चीन) और म्यांमार की सीमाओं पर राष्ट्र-चेतना का सजग प्रहरी बनकर स्थित है। यहाँ से सूर्य ही नहीं, राष्ट्र-चेतना भी उदित होती है। यह प्रदेश न मरुस्थल की रूक्षता है, न समुद्र की चंचलता, यह पर्वत, वन और जनजातीय जीवन की त्रिवेणी है। यहाँ के छब्बीस प्रमुख जनजातीय समुदाय अपनी कला, वेश और जीवन-रीति के माध्यम से न केवल अपनी अस्मिता की रक्षा करते हैं, अपितु सीमाओं पर भारत की सांस्कृतिक प्राचीर बनकर अखंड खड़े हैं। यहाँ की जनजातियाँ अपनी कलाओं में केवल यहाँ की कुटीर अर्थव्यवस्था पर्वतों की कठोरता, वनों की उदारता और जनजातीय श्रम की साधना से आकार लेती है। वे अपनी कला में केवल परंपरा नहीं, राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व भी रचती हैं। सौंदर्य नहीं, स्वाधीन अस्मिता का संस्कार रचती हैं। इसलिए यहाँ संस्कृति स्वयं सीमा की रक्षा का व्रत धारण कर लेती है।
  • पश्चिमी सीमा (भूटान और तिब्बत से सटे): तवांग और पश्चिमी कामेंग जिले
  • यह क्षेत्र बौद्ध धर्म और मोनपा संस्कृति का केंद्र है। यहाँ के कुटीर उद्योग कुछ मायने में विशिष्ट होते हैं –
  • थांगका पेंटिंग (Thangka Painting – तवांग):
  • आध्यात्मिक कला: यह बौद्ध धर्म के देवी-देवताओं और मंडाला का चित्रण होता है, जो कपास या रेशम के कपड़े पर किया जाता है।
  • सामग्री: इसमें सोने की धूल (Gold Dust) और पत्थर के प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता है।
  • महत्व: यह केवल सजावट नहीं, ध्यान (Meditation) का एक माध्यम है।
  • लकड़ी की नक्काशी (Wood Carving – प. कामेंग):
  • मोनपा कारीगर लकड़ी से ‘चो-त्ज़े’ (Cho-tze) नामक छोटी मेज़ और लकड़ी के कप (Dong) बनाते हैं, जो स्थानीय शराब पीने के काम आते हैं।
  • हस्तनिर्मित कागज (Monpa Handmade Paper):
  • पुनर्जीवन: ‘शुगु शेंग’ (Shugu Sheng) पेड़ की छाल से बनने वाला यह एक हजार साल पुराना कागज अब फिर से जीवित हो रहा है। इसका उपयोग बौद्ध धर्मग्रंथ लिखने में होता है।
  • उत्तरी सीमा (तिब्बत/चीन से सटे): कुरुंग कुमे, सुबनसिरी, सियांग, दिबांग घाटी जिलों के क्षेत्र
  • यह दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र है जहाँ आदि और निशी जनजातियाँ रहती हैं। उनके पारंपरिक और क्षेत्र विशिष्ट सामग्रियाँ मनमोहक और उफयोगी होती हैं –
  • बेंत और बांस शिल्प (Cane & Bamboo – ऊपरी सुबनसिरी/सियांग):
  • अरुणाचल के लोग कहते हैं –  “बांस हमारे साथ पैदा होता है और हमारे साथ ही मरता है।”
  • उत्पाद: आदि जनजाति के लोग बांस से ‘हेलमेट’ बनाते हैं जो इतना मजबूत होता है कि भालू के वार को भी झेल ले। इसके अलावा मछली पकड़ने के जाल और पुल भी बांस से बनते हैं।
  • ऊन बुनाई (ऊपरी सियांग जिल):
  • मेम्बा और खंबा जनजातियाँ याक और भेड़ के ऊन से गर्म कालीन और जैकेट बनाती हैं।
  • पूर्वी और दक्षिणी सीमा (म्यामार से सटे): लोहित, अंजॉ, चांगलांग, तिराप जिलों के क्षेत्र
  • यह क्षेत्र ‘गोल्डन पैगोडा’ और नागा संस्कृति का प्रभाव क्षेत्र है। इनकी कुटीर कृतियाँ द्रष्ट्व्य हैं –
  • वांचो लकड़ी नक्काशी (तिराप/लोंगडिंग):
  • भयानक सौंदर्य: वांचो जनजाति जो पहले हेडहंटर्स थे। इस समुदाय के लोग लकड़ी पर मानव सिर और योद्धाओं की आकृतियाँ उकेरते हैं। यह कला उनकी पुरानी युद्ध-परंपरा की याद दिलाती है।
  • मोतियों का काम (Bead Work – चांगलांग/तिराप क्षेत्र):
  • यहाँ की महिलाएं कांच और पत्थर के रंगीन मोतियों से ‘गले का हार’ और आभूषण बनाती हैं। हर डिज़ाइन का एक सामाजिक महत्व होता है।
  • टेक्सटाइल (Mishmi Textiles – अंजॉ/लोहित क्षेत्र):
  • मिश्मी जनजाति की बुनाई में ज्यामितीय पैटर्न होते हैं। वे कपास के साथ-साथ पौधों के रेशों (जैसे बिच्छू घास) का भी उपयोग करते हैं।
  • जीरो घाटी (निचला सुबनसिरी – सीमा के पास)
  • अपातानी बुनाई (Apatani Weave):
  • जिग-जैग: अपातानी समुदाय अपने कपड़ों में अनोखे जिग-जैग पैटर्न के लिए जाना जाता है। इसे अब GI टैग भी मिल चुका है।
  • प्राकृतिक रंग: ये लोग अभी भी मंजिष्ठा और हल्दी जैसे प्राकृतिक रंगों का उपयोग करते हैं।
  • तुलनात्मक सार: अरुणाचल बनाम अन्य सीमांत राज्य
पहलू अरुणाचल प्रदेश (सीमांत) गुजरात (सीमांत) केरल (तटीय)
मुख्य कच्चा माल बांस, बेंत, याक ऊन, लकड़ी कपास, मिट्टी, चमड़ा नारियल (Coir), काजू
प्रकृति जनजातीय और आत्मनिर्भर (Tribal & Self-reliant) व्यावसायिक और व्यापारिक सहकारी और संगठित
रंग प्राकृतिक (Vegetable Dyes) भड़कीले और चमकदार सफेद और सुनहरा
चुनौती दुर्गम भूगोल और बाजार तक पहुँच पानी की कमी श्रम लागत
विशिष्टता युद्ध कला (बांस के हेलमेट) सजावटी कला (कढ़ाई) उपयोगिता कला (रस्सियाँ)

 

  • अरुणाचल प्रदेश की सीमांत कुटीर अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भरता का वह शुद्धतम रूप है, जहाँ उत्पादन बाज़ार के लिए नहीं, जीवन के निर्वाह और संस्कृति के संरक्षण के लिए होता है। यह भूमि उपभोग नहीं, साधना की परंपरा से परिचालित है। तवांग का पवित्र हस्तनिर्मित काग़ज़ और तिराप की मोतियों की माला यह प्रमाणित करते हैं कि विपरीततम परिस्थितियों में भी मनुष्य सौंदर्य की साधना का त्याग नहीं करता। यहाँ के कारीगर केवल शिल्प नहीं रचते, वे तिब्बत (चीन) और म्यांमार की सीमाओं पर भारत की सांस्कृतिक संप्रभुता का मौन, किंतु दृढ़ प्रहरी बनकर खड़े रहते हैं। इन सीमांत अंचलों में कारीगर सौंदर्य रचते हुए भी राष्ट्र की सांस्कृतिक मर्यादा की रक्षा करते हैं – बिना शोर, बिना घोषणा, केवल साधना के बल पर। ये कारीगर केवल वस्तुएँ नहीं बनाते हैं, वे चीन और म्यांमार की सीमाओं पर भारत की सांस्कृतिक संप्रभुता की रक्षा में मौन सैनिक की भूमिका निभाते हैं।

 

पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल

  • पश्चिम बंगाल की अंतर्राष्ट्रीय सीमा बांग्लादेश से 2216.7 किमी के सीमा-विस्तार के साथ भौगोलिक संपर्क में है। गंगा–ब्रह्मपुत्र के उपजाऊ मैदानों, डेल्टा प्रदेश और विस्तृत मैंग्रोव वनों से जुड़ा एक व्यापक पर्यावरणीय तथा सांस्कृतिक क्षेत्र कई मायनों में अनूठा और अखण्ड है। भारत की यह सीमा कृषि, मत्स्य और कुटीर उद्योग की सुदृढ़ आधारशिला है। इसी भू-सांस्कृतिक विस्तार में पूर्व मेदिनीपुर की समुद्र-स्पर्शी तटरेखा और दक्षिण 24 परगना का सुंदरबन डेल्टा बंगाल की समुद्री चेतना और जीवन-निर्वाह परंपराओं को आकार देते हैं, जहाँ मत्स्यजीवन, नौकायन और नमक-निर्माण जैसे व्यवसाय कुटीर अर्थव्यवस्था से गहरे जुड़े हुए हैं। यहाँ की कुटीर अर्थव्यवस्था ‘माटी, मैंग्रोव और मलमल’ के त्रिविध संसाधनों पर आधारित है। गुजरात के मरुस्थलीय शिल्प और ओडिशा के पत्थर-केंद्रित शिल्प से भिन्न, बंगाल की कारीगरी में रेशे, बुनाई और वस्त्र-संस्कृति का प्रधान स्थान है। इसमें तटीय अंचलों की आर्द्र जलवायु और नदी-डेल्टा की उर्वरता प्रत्यक्ष रूप से प्रतिबिंबित होती है। विभाजन के ऐतिहासिक आघात के बाद भी यह शिल्प-परंपरा, लोककला और वस्त्र-संस्कृति के माध्यम से, दोनों बंगालों के बीच सांस्कृतिक निरंतरता और आत्मीयता को जीवित रखे हुए है।
  • उत्तरी बंगाल (जलपाइगुड़ी, कूचबिहार, उत्तर/दक्षिण दिनाजपुर जिले)
  • यह क्षेत्र चाय बागानों और राजवंशी संस्कृति का गढ़ है। इनमें कुछ विशेष रूप से चर्च्य हैं –
  • शीतल पाटी (Sital Pati – कूचबिहार):
  • सामग्री: शीतल पाटी ‘मुर्ता’ (Murta) नामक पौधे की छाल से बनती है।
  • तकनीक: इसे इतनी बारीकी से बुना जाता है कि यह रेशम जैसी मुलायम और ठंडी होती है। गर्मियों में इस पर सोने से शरीर को ठंडक मिलती है।
  • कला: ‘नक्षी पाटी’ (Nakshi Pati) में बुनकर लाल रंग के रेशों से ज्यामितीय डिजाइन और पक्षियों के चित्र बनाते हैं।
  • UNESCO मान्यता: इसे ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ का दर्जा प्राप्त है।
  • बांस और बेंत शिल्प (Bamboo Craft – जलपाइगुड़ी):
  • यहाँ के आदिवासी और राजवंशी समुदाय बांस से ‘पोलो’ (मछली पकड़ने का जाल), ‘कुला’ (सूप) और फर्नीचर बनाते हैं। उत्तर बंगाल का बांस शिल्प अपनी मजबूती के लिए जाना जाता है।
  • मध्य बंगाल (मालदा, मुर्शिदाबाद, नादिया जिलों के क्षेत्र)
  • यह ऐतिहासिक बंगाल का हृदय है। यहाँ नवाबों और औपनिवेशिक काल की छाप अभी भी है। यहाँ के कुछ कुटीर उत्पाद चर्चा में बने रहते हैं –
  • मालदा का रेशम और आम (Malda):
  • रेशम: मालदा के सुजापुर और कालियाचक में रेशम कीट पालन (Sericulture) एक बड़ा कुटीर उद्योग है। यहाँ का कच्चा रेशम (Raw Silk) मुर्शिदाबाद और बांकुरा भेजा जाता है।
  • खाद्य प्रसंस्करण: ‘फजली’ और ‘हिमसागर’ आम से अचार और आम पापड़ (Amsotto) बनाना यहाँ की महिलाओं का मुख्य गृहोद्योग है।
  • मलमल और जामदानी (Muslin & Jamdani – मुर्शिदाबाद/नादिया):
  • पुनर्जीवन: मुर्शिदाबाद कभी दुनिया की ‘मलमल राजधानी’ था। आज भी यहाँ के बुनकर 200-500 काउंट की खादी मलमल बनाते हैं जो हवा जैसी हल्की होती है।
  • नादिया: यहाँ के शांतिपुर और फुलिया में विभाजन के बाद ढाका से आए बुनकरों ने ‘तांत’  और ‘जामदानी’ साड़ियों को नया जीवन दिया।
  • दक्षिणी सीमांत (उत्तर और दक्षिण 24 परगनाजिलों के क्षेत्र )
  • यह क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े डेल्टा (सुंदरबन) का हिस्सा है। यहाँ के कुछ कुटीर उत्पाद द्रष्टव्य हैं –
  • सुंदरबन शहद (दक्षिण 24 परगना):
  • मौली समुदाय: यहाँ के शहद संग्रहकर्ता ‘मौली’ समुदाय को लोग चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में जंगलों से शहद संग्रहकर लाते हैं।
  • सहकारिता: अब वन विभाग, सहकारी समितियाँ और स्थानीय स्वयं सहायता समूह (SHG) मिलकर सुंदरबन के प्राकृतिक मधु को ‘बोनफूल’ (Bonphool) जैसे ब्रांड के तहत बेचते हैं। यह मधु पारंपरिक मधु-संग्रहकर्ताओं (maulis) के द्वारा टिकाऊ तरीके से सुंदरबन के मैंग्रोव जंगलों से संग्रहित किया जाता है, जिससे जैव विविधता और जंगल-आधारित जीवन दोनों की सुरक्षा होती है। इस प्रकार के सहयोग से मधु-संग्रह कठिनाइयों को पार करते हुए अब यह राज्य की कुटीर अर्थव्यवस्था और स्थानीय आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है।
  • खूनी शहद सुंदरबन जैसे मैंग्रोव वनों में बहुत जोखिम उठाकर इकट्ठा किया जाता है। इसलिए ऐसा शहद जो जंगल से संग्रह किया गया उसे खूनी शहद कहा जाता है। मधु-संग्रह के दौरान संग्रहकर्ताओं (मौली समाज) को मगरमच्छ, ज़हरीले साँपों, ज्वार-भाटा और दलदली भूभाग से प्रोणों का संकट बना रहता है।
  • GI टैग: सुंदरबन शहद को हाल ही में GI टैग मिला है।
  • जूट शिल्प (Jute Craft – उ. 24 परगना):
  • भारत का जूट केंद्र। बैरकपुर और बशीरहाट की महिलाएं जूट से फैशनेबल बैग, गहने और सजावटी गुड़िया बनाती हैं। प्लास्टिक बैन के बाद इसकी मांग तेजी से बढ़ी है।
  • पूर्व मेदिनीपुर जिला(तटीय सीमा)
  • यह जिला ओडिशा की सीमा और समुद्र तट से लगा है। यहाँ के प्रमुख कुटीर उद्योग राष्ट्रव्यापी ख्याति रखते हैं –
  • मादुर काठी (चटाई बुनाई):
  • विरासत: सबंग और पंसकुड़ा के गाँवों में ‘मादुर काठी’ (एक प्रकार की नरकुल घास) से चटाइयां बुनी जाती हैं।
  • मसलंद (Masland): यह मादुर की सबसे उच्च कोटि की चटाई है। इसमें रेशम के धागे मिलाकर बारीक बुनाई की जाती है। बंगाल के हर घर में मेहमान का स्वागत इसी चटाई पर होता है।
  • GI टैग: इसे GI टैग प्राप्त है।
  • समुद्री सीप शिल्प (Seashell Craft – दीघा/मंदारमणि):
  • पर्यटन स्थलों पर स्थानीय महिलाएं सीपियों से जेवर और सजावटी सामान बनाती हैं।
  • तुलनात्मक सार: बंगाल बनाम अन्य सीमांत राज्य
पहलू पश्चिम बंगाल (सीमांत) गुजरात (सीमांत) ओडिशा (सीमांत)
मुख्य सामग्री जूट, बांस, मलमल, मुर्ता कपास, ऊन, मिट्टी पत्थर, धातु, घास
जलवायु का प्रभाव आर्द्र और नदीय शुष्क और मरुस्थलीय तटीय और चक्रवात प्रभावित
बुनाई शैली बहुत महीन रंगीन और भारी इकत और पट्टचित्र
विशिष्ट उत्पाद शीतल पाटी रजाई/शॉल पत्थर की मूर्तियाँ
कारीगर की स्थिति शरणार्थी इतिहास का प्रभाव खानाबदोश परंपरा मंदिर आश्रित परंपरा

 

  • पश्चिम बंगाल की सीमांत कुटीर अर्थव्यवस्था नदियों की गतिशीलता और प्राकृतिक रेशों के उपयोग पर आधारित एक सांस्कृतिक परंपरा है। यहाँ के कारीगर बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं और वन्य जीवों के खतरे के बीच भी अपनी सृजनशीलता को बनाए रखते हैं। कूचबिहार की शीतलपाटी और सुंदरबन का प्राकृतिक मधु इस क्षेत्र की आजीविका और परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह परंपरा दर्शाती है कि बंगाल की सांस्कृतिक समृद्धि केवल शहरी बाज़ारों में नहीं, बल्कि सीमांत ग्रामीण समाज में भी गहराई से विद्यमान है।
जम्मू-कश्मीर

जम्मू-कश्मीर

जम्मू-कश्मीर

भौगोलिक विडंबना – जम्मू-कश्मीर की विडंबना यह है कि यह क्षेत्र न केवल एक सीमांत क्षेत्र है, बल्कि दो सीमांतों की सीमा है – पश्चिम-मध्य पाकिस्तान (कश्मीर घाटी, कारगिल) की सीमा और पूर्व-उत्तर तिब्बत-चीन (लद्दाख, LAC) की सीमा। इस प्रदेश की विशेष सीमा-सुरक्षा और सीमा-जन संवर्धन आवश्यक है।

  • प्रमुख कुटीर उद्योग
  • कश्मीरी पश्मीना शॉल एक सांस्कृतिक संकट
  • पश्मीना” शब्द का मतलब केवल एक शॉल नहीं है। यह कश्मीर की पहचान, उसका गौरव, और उसकी सभ्यता है।
  • वास्तविकता:
  • कच्चा माल: चांगथांगी बकरी की ऊन (चांगथांग पठार, 4,000 मीटर पर)
  • निर्माण समय: एक शॉल = 6-12 महीने
  • विशेषज्ञता: 50+ चरणों की बुनाई प्रक्रिया
  • कीमत: 50,000 से 1,00,000+ रुपये (सच्ची शॉल)
  • आर्थिक वास्तविकता:
  • कारीगर: 3.40 लाख हस्तकार (UT में कुल)
  • महिलाओं की भागीदारी: 60%
  • औसत आय: 1.5-2.2 लाख रुपये (वार्षिक)
  • किंतु बुजुर्ग कारीगरों की पीढ़ी से युवा इस कला को नहीं सीख रहे हैं। एक 65 वर्षीय शॉल निर्माता कश्मीरी ने कहा: “मेरे बेटे ने 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी और कुछ और करने लगा। इस कला को कौन सीखेगा? मैं जो 50 साल से करता आ रहा हूँ, वह हमारे साथ ही खत्म हो जाएगा।”
  • कश्मीरी कालीन विरासत का विलोपन
  •  सिल्क-ऊन के पारंपरिक कालीन
  • निर्यात: यूरोप, अमेरिका
  • किंतु नकली कालीनों की तस्करी से बाजार खराब हो गया
  • जेली-जैम उद्योग अल्पाइन कृषि की फसल
  • मुख्य फल: एप्रिकॉट, बेर, खुबानी
  • महिला-केंद्रित उद्योग
  • प्रति परिवार वार्षिक आय: 50,000-1,00,000 रुपये
  • सूखे मेवे और मसाले
  • बादाम, अखरोट, केसर (कारगिल क्षेत्र की विशेषता)
  • प्रसंस्करण समूह: 10,000+
  • चुनौतियाँ: डबल-फ्रंट संकट
  • पाकिस्तान सीमांत की समस्याएँ:
  • नकली शॉल तस्करी
  • पाकिस्तान से नकली/अर्द्ध-निर्मित शॉलें आती हैं
  • कीमत: असली शॉल की 10-15% पर बेचीं जाती हैं
  • परिणाम: कश्मीरी कारीगरों की आय में 50% की गिरावट
  • कच्चे माल की तस्करी
  •  ऊन, रंग, सोती पाकिस्तान से आता है।
  • सीमा पर देरी से लागत में वृद्धि होती है।
  •  चीन सीमांत (LAC) की समस्याएँ:ॉ
  • सीमा पार संचार मार्ग का अवरोध
  •  लेह-लद्दाख राजमार्ग: 6-8 महीने बर्फ से बंद
  • परिणाम: लद्दाख के कुटीर उद्योगों का सांस्कृतिक अलगाथन
  • दोनों सीमांतों की साझा समस्या:
  • जलवायु कठोरता
  •  सर्दी में 6-8 महीने तापमान –15°C तक गिरता है
  • उत्पादन: पूरी तरह बंद
  • परिणाम: वार्षिक आय में 40% का नुकसान
  • पीढ़ीगत संकट
  •  शॉल बुनाई के लिए धैर्य, कठोर परिश्रम, और वर्षों की मेहनत आवश्यक है
  • युवाएँ शहरी नौकरियों की ओर भागते हैं
  • परिणाम: पारंपरिक कौशल का विलोपन
हिमाचल प्रदेश

हिमाचल प्रदेश

 

हिमाचल प्रदेश

तिब्बत-चीन LAC सीमांत

  • लाहौल-स्पीति: अति-दुर्गम क्षेत्र
  • लाहौल-स्पीति जिला भारत के सबसे ऊँचे, सबसे दुर्गम और सबसे महत्वपूर्ण सीमांत क्षेत्रों में से एक है।
  • भौगोलिक विशेषताएँ:
  • ऊंचाई: 3,000-5,000 मीटर
  • तापमान: सर्दी में –30°C तक
  • बर्फ: 6-8 महीने पूर्ण बर्फ से ढका
  • रोहतांग दर्रा (3,978 मीटर): मुख्य सड़क
  • निवास: भोटिया, किन्नौर, लद्दाखी जनजातियाँ
  •  प्रमुख कुटीर उद्योग
  • iबांस-लकड़ी की कारीगरी
  • पारिवारिक यूनिट्स
  • उत्पादन: 100-200 आइटम प्रति परिवार वार्षिक
  • विशेषता: सरल, टिकाऊ, पर्यावरण-अनुकूल
  • ऊन बुनाई महिला-नेतृत्ववाली
  • शॉल, पट्टू, मफलर
  • कारीगर: 3,000-4,000 (मुख्यतः महिलाएँ)
  • आय: 40,000-80,000 रुपये प्रति महिला (वार्षिक)
  •  नई आर्थिक गतिविधियाँ आशा की किरण
  •  हरी मटर प्रसंस्करण: नई पहल
  • उत्पादन समय: 3-4 महीने
  • वैश्विक गुणवत्ता (निर्यात योग्य)
  • प्रति परिवार आय: 1,00,000-1,50,000 रुपये
  •  आलू की खेती: विरासत फसल
  •  लाहौल आलू: विश्व-प्रसिद्ध गुणवत्ता
  • कम कीटनाशक की आवश्यकता
  • प्रति परिवार आय: 80,000-1,20,000 रुपये
  •  घोड़ा खेती विलुप्त परंपरा
  •  ऐतिहासिक: लाहौल के घोड़े सिल्क रोड पर प्रसिद्ध थे
  • वर्तमान: घटती पारंपरिक माँग
  •  कुल्हड़ और बर्तन पारंपरिक कला
  •  कुम्हार परिवार: 500-1,000
  • प्रति परिवार आय: 30,000-50,000 रुपये
  • संलग्न जनसंख्या
  • ग्रामीण परिवारों की भागीदारी: 30%
  • युवाओं की भागीदारी: सीमित (शहरी पलायन का कारण)
  • आर्थिक वास्तविकता
  • औसत वार्षिक आय: 0.7-1.1 लाख रुपये (लाहौल में)
  • यह आय पश्चिमी भारत के कुटीर कारीगरों की तुलना में 50% कम है, किंतु उच्च-ऊंचाई वाले कठोर परिस्थितियों में उल्लेखनीय है।
  • सीमांत-विशिष्ट चुनौतियाँ
  • तत्काल संकट:
  • अति-दुर्गम भूगोल
  •  रोहतांग दर्रा: 6-8 महीने बंद
  • पहुँच की लागत: 1.5-2 गुना अधिक
  • बाजार दुर्गमता: 300+ किलोमीटर
  •  ट्रांसपोर्ट महंगाई
  •  पहाड़ी सड़कें: खतरनाक और महंगी
  • एक यूनिट की कीमत में ट्रांसपोर्ट = 30-40%
  • मध्यकालीन संकट:
  • कारीगरों की उम्रदराज़ी
  •  औसत आयु: 55+ वर्ष
  • कौशल हस्तांतरण: 10% से भी कम
  • अगले 15 वर्षों में 70% कारीगर अवकाश ले लेंगे
  •  चीन सीमांत से तस्करी
  •  तिब्बत से अवैध ऊन व्यापार
  • लकड़ी की तस्करी (चीन में बहुत माँग)
  • परिणाम: स्थानीय उत्पादकों को प्रतिस्पर्धा में हार
  •  दीर्घकालीन संकट:
  • शीतकालीन उत्पादन का पूर्ण बंद
  •  6-8 महीने: कोई आर्थिक गतिविधि नहीं
  • वार्षिक आय = 4-6 महीने के श्रम में ही सीमित
उत्तराखंड

उत्तराखंड

उत्तराखंड

  •  दोहरी सीमांत – तिब्बत-चीन और नेपाल
  • भौगोलिक विशिष्टता
  • उत्तराखंड भारत का एकमात्र राज्य है जो दो भिन्न अंतर्राष्ट्रीय सीमांतों से लगा है:
  • उत्तर-पूर्व: चीन LAC (तिब्बत) – 350+ किलोमीटर
  • पूर्व-दक्षिण: नेपाल – 276 किलोमीटर (भारत-नेपाल सीमा का 16%)
  • प्रमुख कुटीर उद्योग
  • घरेलू खाद्य प्रसंस्करण
  • कुटीर नमकीन, अचार, जैम
  • महिला-नेतृत्ववाली यूनिट्स
  • औसत आय: 0.9-1.3 लाख रुपये
  • कुटीर लकड़ी कारखाने
  • हल्के फर्नीचर
  • कलात्मक लकड़ी के बर्तन
  • आय: 0.8-1.2 लाख रुपये
  • संलग्न जनसंख्या
  • ग्रामीण परिवार: 28%
  • महिला भागीदारी: 50%
  • सीमांत-विशिष्ट चुनौतियाँ
  • नेपाल-चीन दोहरी सीमांत
  • सीमा पार अवैध व्यापार होता है, यह तस्करी मार्ग है। पर सुरक्षा प्रतिबंध (चीन LAC के निकट) की व्यवस्था बनी हुई है।
  • लकड़ी की तस्करी
  • सीमापार जंगलों से अवैध निष्कर्षण हो रहा है जिससे पर्यावरणीय विनाश हो रहा है।
  •  आदिवासी समुदाय का पलायन
  • आदिवासी समुदाय शहरी रोजगार की ओर पलायन कर रहे हैं। पारंपरिक आजीविका छूट रही है
  • अंतर्राष्ट्रीय सीमांत-विशिष्ट चुनौतियाँ और समाधान
  • समस्याओं की गहन विश्लेषणात्मक संरचना
  • तत्काल समस्याएँ
  • तस्करी का बहुआयामी संकट
  • तस्करी केवल अवैध व्यापार नहीं है। यह भारतीय कारीगर का शोषण है। पाकिस्तान से सस्ते उत्पाद (10-20% कीमत में) की तस्करी होती है। चीन से स्टील, ऊन, लकड़ी की तस्करी होती है। नेपाल से भी सीमांत सामग्रियों की तस्करी होती है।
  • परिणाम: भारतीय कारीगर की सच्ची कृति अमूल्य रहती है, जबकि नकल सस्ते में बिकती है।
  • विद्युत, जल, संचार का अभाव
  • सीमांत गाँवों में 40% गाँवों में 24/7 विद्युत-आपूर्ती नहीं है।
  • इंटरनेट कनेक्टिविटी: 15% से कम
  • परिणाम: उत्पादन और विपणन दोनों बाधित
  • बाजार दुर्गमता
  • सीमांत से निकटतम बाजार: 50-200 किलोमीटर दूर है।
  • ऑनलाइन मार्केटिंग: 5% से कम कारीगर को ज्ञात है।
  •  स्तर 2: मध्यकालीन चुनौतियाँ (3-10 वर्ष)
  • कौशल का विलोपन
  • युवा पारंपरिक कार्य सीख नहीं रहे
  • 2035 तक: 50-70% पारंपरिक कारीगर अवकाश ले लेंगे
  • परिणाम: पीढ़ीगत ज्ञान का स्थायी विलोपन
  • सामाजिक विभाजन
  • पलायन करने वाले: शहरी, शिक्षित, आधुनिक
  • रुकने वाले: = ग्रामीण, कम शिक्षित, पारंपरिक
  • परिणाम: ग्रामीण-शहरी विभाजन का गहरा होना
  • दीर्घकालीन संकट (10+ वर्ष)
  • सीमांत समाज का विस्थापन
  • जब आय अपर्याप्त हो, तो समुदाय पलायन करेगा।
  • 2045 तक: सीमांत क्षेत्रों में 20-30% जनसंख्या में कमी
  • परिणाम: सीमा स्वयं सांस्कृतिकता खो देगी
  • राष्ट्रीय सुरक्षा पर भीषण प्रभाव
  • असुरक्षित और निराश सीमांत समुदाय
  • तस्करी में सहयोग (विवशता से)
  • आतंकवाद के प्रति संवेदनशीलता
  • सभ्यतागत संकट (हमेशा के लिए)
  • भारतीय सांस्कृतिक विरासत का नुकसान
  • फुलकारी, पश्मीना शॉल, लाहौल की बुनाई: वैश्विक प्रतीक
  • यदि ये लुप्त हों, तो भारत की सांस्कृतिक पहचान को चोट पहुँचेगी।
  • समाधान: रणनीतिक हस्तक्षेप
  • तीन-स्तरीय समाधान वास्तुकला
  • डिजिटल कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम
  • लक्ष्य: 50,000 कारीगरों को ई-कॉमर्स प्रशिक्षण
  • साधन: Google, Amazon, Flipkart के साथ साझेदारी
  • परिणाम: कम से कम 2,000-3,000 कारीगर ऑनलाइन बिक्रय शुरू कर सकेंगे।
  • वृद्धि: 50-100% की संभावना
  •  सीमा-पार तस्करी से निपटने के लिए संगठित बाजार बनाना
  • सरकार सीमांत कुटीर कोषा स्थापित करें।
  • सीधी बिक्री: सरकारी खरीद से सार्वजनिक संस्थानों को आपूर्ति हो।
  • शुरुआती आय: 20-30% की वृद्धि की वृद्धि हो।
  • विद्युत की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करना
  • सीमांत क्षेत्रों में सौर ऊर्जा पैनल: 5,000+ यूनिट्स स्थापित करें
  • लागत: 5,000-10,000 रुपये प्रति यूनिट (भारत सरकार सब्सिडी दे)
  • लाभ: 24/7 विद्युत, उत्पादन में 40% वृद्धि
  •  कौशल संरक्षण कार्यक्रम
  • सीमांत शिल्पी स्कॉलरशिप: 10,000 युवाओं को ₹10,000/माह 3 साल तक
  • शर्त: पारंपरिक कला सीखना, फिर 5 साल तक अपने गाँव में काम करना
  • निवेश: 30 करोड़ रुपये (3 साल में)
  • रिटर्न: 10,000 युवा कारीगर = 1,00,000+ लोगों का रोजगार
  •  “सीमांत कुटीर क्लस्टर” का विकास
  • प्रत्येक जिले में 5-10 क्लस्टर्स स्थापित करें
  • सुविधाएँ: कच्चा माल, बिजली, इंटरनेट, प्रशिक्षण केंद्र
  • निवेश: 100 करोड़ रुपये (सभी सीमांत क्षेत्रों में)
  • परिणाम: सीमांत गाँव का आधुनिकीकरण हो बिना सांस्कृतिक नुकसान पहुँचाए
  • अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौते
  • भारत-पाकिस्तान: सीमांत कुटीर उद्योग” के लिए विशेष व्यापार करार
  • भारत-चीन-नेपाल: त्रिपक्षीय सीमांत विकास समझौता
  • लक्ष्य: कारीगरों को सुरक्षित व्यापार मार्ग मिले
  •  सीमांत को “आर्थिक केंद्र” में रूपांतरित करना
  • सीमांत क्षेत्रों में विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ)
  • सुविधा: 5-7 वर्षों के लिए 50% कर छूट हो
  • परिणाम: बड़ी कंपनियों के निवेश, जहाँ कुटीर कारीगर आपूर्तिकर्ता बन सकें
उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश

  • सीमावर्ती जिला
  • (पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर और महाराजगंज)
  •  पीलीभीत
  • बाँस की बाँसुरी का उद्योग
  • पीलीभीत जिला, जो नेपाल की सीमा से सटा है, हज़ारों वर्षों से बाँस की बाँसुरी निर्माण के लिए विश्व प्रसिद्ध रहा है। यह केवल एक उद्योग नहीं हैयह भारतीय संगीत परंपरा का एक अभिन्न अंग है। कृष्ण की बाँसुरी, गोपियों का संगीत, हज़ारों वर्षों की सांस्कृतिक विरासत – सभी कुछ पीलीभीत की बाँसुरियों में गुँथा था।
  • उद्योग का पतन: पीलीभीत की बाँस बाँसुरी उद्योग का पतन एक आधुनिक विहंगावलोकन है। आँकड़े कहते हैं:
  • 2005-2010: 7,000+ कारीगर
  • 2024-2025: 150-200 कारीगर
  • पतन दर: 90% का विलोपन मात्र 20 वर्षों में
  • वार्षिक माँग का संकुचन:
  • तब: 60 लाख बाँसुरियों की वार्षिक माँग
  • अब: 5-5.5 लाख बाँसुरियों की वार्षिक माँग
  • माँग में गिरावट: 91.67%
  • कारण: बहुआयामी संकट
  • Ø  कच्चे माल की समस्या: पारंपरिक हिमालयी बाँस के स्थान पर अब असम का बाँस आयात किया जा रहा है, जो गुणवत्ता में अलग है और महँगा भी।
  • Ø  बाज़ार का विनाश: प्लास्टिक की सस्ती बाँसुरियों, इलेक्ट्रॉनिक संगीत यंत्रों का आगमन, संगीत शिक्षा में परिवर्तन।
  • Ø  विद्यार्थी वर्ग का विलोपन: नई पीढ़ी, बाँसुरी बनाने की कला सीखने के बजाय, शहर में रोज़गार ढूँढ रही है।
  • Ø  तस्करी और सीमा-पार अवैध व्यापार: नेपाल से सस्ती प्रतियों का आगमन।
  • लखीमपुर खीरी
  • लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में बसा यह जिला राज्य का सबसे बड़ा जिला (7,680 वर्ग किमी) है। इसकी 21.38% भूमि वनाच्छादित है – 165,212 हेक्टेयर वन है। शाग, शीशम, खैर, बाँस, इमली – ये वनों की संपदा हैं।
  • लखीमपुर खीरी के कुटीर उद्योग:

उद्योग का प्रकार

इकाइयाँ

रोजगार

निवेश (लाख रु.)

कृषि-आधारित

234

612

36.10

वस्त्र (तैयार कपड़े व कढ़ाई)

20

63

0.90

लकड़ी के फर्नीचर

23

65

2.36

चमड़ा-आधारित

12

38

0.28

धातु-आधारित (स्टील)

0

0

मरम्मत व सेवा

156

394

5.48

कुल

495

1,363

51.45

  • आर्थिक विश्लेषण 
  • औसत वार्षिक आय: 1.2-1.8 लाख रुपये (पारिवारिक स्तर पर)
  • यदि एक पारिवारिक इकाई 1.5 लाख रुपये वार्षिक कमाती है, तो 5 व्यक्तियों के परिवार की प्रति व्यक्ति मासिक आय = 2,500 रुपये। यह विश्व बैंक द्वारा परिभाषित अंतर्राष्ट्रीय गरीबी रेखा ($ 1.90/दिन = लगभग 150-200 प्रतिदिन) से अलग है, किंतु भारत की राष्ट्रीय गरीबी रेखा (ग्रामीण = 1,000/माह) से कुछ ऊपर है। परंतु आत्मनिर्भरता का एक प्रतीक यह आय है। जहाँ पूरा भारत सरकारी सहायता के लिए हाथ पसारता है, वहीं लखीमपुर खीरी के ये परिवार अपनी मेहनत से जीते हैं।
  • सरकारी समर्थन: अपर्याप्त
  •  लखीमपुर खीरी में सरकारी योजनाएँ:
  • मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना (CSRY): 25,000 रु. प्रति परिवार अनुदान (कवरेज: 40-50% पात्र परिवार)
  • प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP): सस्ते ऋण, किंतु आवेदन प्रक्रिया अत्यंत जटिल
  • वन-आधारित उद्यम: लगभग अस्पृश्य
  • बहराइच
  • बहराइच जिला, नेपाल की सीमा से सटा, गहरी वन संपदा से परिपूर्ण है (67,926 हेक्टेयर वन = जिले का 13.97%)। यहाँ का अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि-आधारित है, किंतु एक अनोखा पहलू है: गेहूँ की नरवार (wheat-stalk) से हस्तशिल्प।
  •  अद्भुत उद्योग: गेहूँ की नरवार का शिल्प
  •  बहराइच का गेहूँ-नरवार हस्तशिल्प (Wheat-stalk Handicrafts) भारत की सबसे अनोखी परंपराओं में से एक है। इसमें:
  • ताज-महल, संसद भवन, लाल क़िला, अक्षरधाम मंदिर – इन सभी को गेहूँ की नरवार से बनाया गया है।
  • पुरस्कार-प्राप्त शिल्पकार: तीन कारीगरों को राज्य पुरस्कार।
  • पर्यावरणीय लाभ: कृषि-अपशिष्ट का सर्वोत्तम उपयोग।
  •  बहराइच का कुटीर उद्योग परिदृश्य

उद्योग का प्रकार

इकाइयाँ

रोजगार

निवेश (करोड़ रु.)

कृषि-आधारित

1,310

4,855

9.06

तैयार कपड़े व कढ़ाई

800

2,800

5.52

लकड़ी/फर्नीचर

850

2,890

5.78

चमड़ा-आधारित

400

1,320

2.40

धातु-आधारित (स्टील)

650

1,950

4.42

कुल

5,518

18,779

38.19

  • बाँस कारीगर: डोकरा समुदाय
  • बहराइच के डोकरा समुदाय (Dokra—परंपरागत बाँस कारीगर) में:
  • कुल बाँस कारीगर: 200+
  • महिला स्वयंसेवी समूह: 15+ (कपड़े, कढ़ाई, मिट्टी के काम में)
  • मुख्य उत्पाद: टोकरियाँ (Tokri), चालनी (Soops), खिलौने, घर की वस्तुएँ
  • काम के घंटे: दैनिक 4-8 घंटे (अधिकांश कारीगरों के लिए)
  • वार्षिक आय: 80,000-1,20,000 रुपये (परिवार स्तर पर)
  •  संकट: बाज़ार और कौशल का विनाश
  • डोकरा कारीगरों के सामने:
  • Ø  बाज़ार संपर्क का अभाव: स्थानीय विक्रय तक सीमित
  • Ø  कच्चे माल की कमी: बाँस की गुणवत्ता में गिरावट
  • Ø  आधुनिक प्रतियोगिता: बड़ी कंपनियों की सस्ती प्लास्टिक टोकरियों से।
  • Ø  युवा पलायन: नई पीढ़ी बहराइच को छोड़ रही है।
  •  श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, महाराजगंज: लघु जिलों की अर्थव्यवस्था
  •  श्रावस्ती:
  • श्रावस्ती – जहाँ भगवान बुद्ध का कर्मक्षेत्र, यहाँ अंगुलिमाल का मंदिर है। यह आज भी जनजातीय शिल्प का केंद्र है। आँकड़े उपलब्ध नहीं, किंतु आवश्यक है कि राष्ट्र इस ऐतिहासिक सीमांत क्षेत्र के लिए विशेष विकास योजना बनाए।
  • बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, महाराजगंज
  •  ये तीनों जिले राष्ट्रीय एकल-उत्पाद योजना (One District One Product
  • अर्थात् एक जिलाएक उत्पाद) के अंतर्गत हैं:
  • बलरामपुर: शहद और शहद उत्पाद (मधुमक्खी पालन)
  • सिद्धार्थनगर: काला नमक चावल (खाद्य प्रसंस्करण)
  • महाराजगंज: जनजातीय शिल्प और फर्नीचर (220 कारीगर; 10 SHG अर्थात् स्वयं सहायता समूह)
  • प्रत्येक में कारीगरों की संख्या 5,000-15,000 के बीच अनुमानित है।
  •  तुलनात्मक विश्लेषण: पंजाब बनाम उत्तर प्रदेश
  •  

पहलू

पंजाब (8 जिले)

उत्तर प्रदेश (7 जिले)

कुल कारीगर (अनुमानित)

1,90,000

80,000-1,00,000

मुख्य उद्योग

वस्त्र, जूते, बर्तन

वन-उत्पाद, खाद्य, शिल्प

परिवारिक आय

1.5-2.5 लाख

1.2-1.8 लाख

इंटरनेट पहुँच

65%

35-40%

महिला भागीदारी

40%

35-40%

युवा पलायन दर

25-30%

30-40%

सीमा-पार तस्करी

अधिक व्यवस्थित

कम व्यवस्थित, किंतु गंभीर

सरकारी समर्थन

अपेक्षाकृत बेहतर

अत्यंत अपर्याप्त

 

  • उत्तर प्रदेश की सीमांत अर्थव्यवस्था की विशेषताएँ
  •  Ø  वन-आधारित अर्थव्यवस्था: यूपी की सीमांत अर्थव्यवस्था जंगल पर निर्भर है। बाँस, लकड़ी, शहद, औषधीय पौधे – ये सब वन से आते हैं। यह पंजाब के कृषि + कुटीर संयोजन से भिन्न है।
  • Ø  जनजातीय आधार: यूपी की सीमांत जनता में डोकरा, कोल, गोंड जैसी जनजातियाँ हैं। इनकी परंपराएँ, ज्ञान-पद्धति, पीढ़ियों से चली आई हैं। पंजाब के सिख, हिंदू कारीगरों से यह अलग है।
  • Ø  कम बाज़ार संपर्क: पंजाब में लुधियाना, अमृतसर, जालंधर बड़े औद्योगिक केंद्र हैं। यूपी में ऐसा कुछ नहीं है। महाराजगंज, बहराइच को निकटतम बड़े शहर 100+ किमी दूर हैं।
  • Ø  अंतर्राष्ट्रीय सीमा का अलग प्रभाव: पाकिस्तान सीमा पर सैन्य तनाव है। नेपाल सीमा पर सांस्कृतिक और वाणिज्यिक गतिविधियाँ हैं। यह आर्थिक गतिविधियों को भिन्न ढंग से प्रभावित करता है।
  •  सीमांत-विशिष्ट चुनौतियाँ
  •  तत्कालिक (2-3 वर्ष) चुनौतियाँ: कच्चे माल की सीमा पार अनिश्चितता: नेपाल से आयातित बाँस, रंग, छोटी वस्तुओं की आपूर्ति में दिन-प्रतिदिन बदलाव।
  • पर्यावरण प्रतिबंध: वन संरक्षण कानून, वन्यजीव संरक्षणये कारीगरों के लिए कच्चे माल पर प्रतिबंध लगाते हैं। कोई विकल्प नहीं है।
  • विद्युत की अनिश्चितता: बहराइच, लखीमपुर खीरी में 5-6 घंटे की दैनिक कटौती।
  •  मध्यकालिक (3-10 वर्ष) चुनौतियाँ:
  • पारंपरिक कौशल का विलोपन: पीलीभीत में 7,000 बाँसुरी कारीगर में 200 भी नहीं बचे हैं।
  • होशियारपुर: 3,000 (सभी 60+ आयु के)
  • महाराजगंज: 220 50 (15 वर्षों में)
  • श्रावस्ती, बलरामपुर: संपूर्ण विलोपन
  • जनसंख्या का विस्थापन: यदि कारीगर नहीं रह पाएँ, तो उनके परिवार भी शहर चले जाएँगे। 2035 तक यूपी की सीमांत जनता में 20-25% जनसंख्या कमी की संभावना है।
  •  राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव: जब सीमांत समुदाय आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं, तो तस्करी में सहयोग करने लगते हैं। यह राष्ट्रीय सीमा की सुरक्षा को कमजोर करता है।
  •  दीर्घकालीन (10+ वर्ष) चुनौतियाँ:
  • सांस्कृतिक विरासत का विलोपन: एक बार जब कौशल खो जाता है, तो उसे पुनः सीखना असंभव नहीं, किंतु बहुत महँगा होता है। पीलीभीत की बाँसुरी परंपरा उदाहरण है। अब पुनः शुरुआत करना बिलकुल नई पीढ़ी को प्रशिक्षित करने जितना महँगा होगा।
  •  सरकारी योजनाएँ: पर्याप्त नहीं
  •  यूपी में जो योजनाएँ हैं:
  • राष्ट्रीय एकल-उत्पाद योजना (ODOP): सभी 7 जिलों में सक्रिय
  • परिणाम: सीमित
  • कवरेज: 20-30% पात्र कारीगरों का
  •  प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP):
  • ऋण सुविधा: सस्ता
  • आवेदन प्रक्रिया: अत्यंत जटिल (60-70 कागज़ात)
  • कवरेज: 10-15% पात्र परिवारों का
  • वन-आधारित उद्यम योजना: लगभग अस्पृश्य, बहराइच, लखीमपुर खीरी में कोई सामग्री नहीं
  •  सुझाव और समाधान
  •  तत्काल (अगले 2 वर्ष):
  • Ø  डिजिटलीकरण: सभी सीमांत जिलों में 4G कनेक्टिविटी, ई-कॉमर्स प्रशिक्षण
  • Ø  कच्चे माल का संरक्षण: वन-आधारित उद्योगों के लिए विशेष अनुमति, सस्ते दरों पर आपूर्ति
  • Ø  ऋण सुविधा: 50,000 रु. तक ब्याज-मुक्त ऋण (2 वर्षों के लिए)
  •  मध्यकालीन (3-10 वर्ष):
  • Ø  कौशल हस्तांतरण: जनजातीय कारीगरों के साथ आधुनिक डिजाइन और बाज़ार ज्ञान जोड़ना
  • Ø  क्लस्टर विकास: हर जिले में कम-से-कम एक कारीगर क्लस्टर (पंजाब में हज़ारों हैं, यूपी में शून्य)
  • Ø  निर्यात सहायता: नेपाल, बांग्लादेश, दक्षिण-एशिया को निर्यात के लिए बाज़ार सुविधा
  •  दीर्घकालीन (10+ वर्ष):
  •  Ø  सांस्कृतिक संरक्षण: यूनेस्को, भारतीय संस्कृति मंत्रालय के साथ सीमांत शिल्पों को “मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत” के रूप में सूचीबद्ध करना
  • Ø  ग्रामीण-शहरी जुड़ाव: शहरी बाज़ारों में सीमांत उत्पादों की दुकानें खोलना
  •  उत्तर प्रदेश की नेपाल सीमा, पंजाब की पाकिस्तान सीमा की तुलना में आर्थिक दृष्टि से अधिक संकटग्रस्त है। साक्षरता कम है, आय कम है, बाज़ार दूर है, और सरकारी सहायता लगभग शून्य है। परंतु इसी सीमा पर दुनिया की सबसे पुरानी शिल्प-परंपराएँ जीवंत हैं। यहाँ वन से जीविका निकालने वाली जनता रहती है। यहाँ जनजातीय ज्ञान-पद्धति संरक्षित है।
  •  राष्ट्र-दायित्व
  • Ø  बाहर से – सुरक्षा: सीमा को सुरक्षित रखना, तस्करी को रोकना
  • Ø  भीतर से – विकास: इन कारीगरों को सम्मान, आय, बाज़ार, और भविष्य देना
  • जब तक उत्तर प्रदेश की सीमांत जनता आर्थिक रूप से सशक्त नहीं होगी, तब तक सीमा की सुरक्षा अधूरी रहेगी। यह राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण का अभिन्न संबंध है। सीमांत से राष्ट्र बनता है, कारीगर से
  • संस्कृति निर्मित होती है।” यह सत्य आज भी प्रासंगिक है।
राजस्थान

राजस्थान

  • राजस्थान की सीमांत कुटीर अर्थव्यवस्था: थार मरुस्थल का कारीगर वर्ग
  • श्रीगंगानगर से बाड़मेर तक: पाकिस्तान सीमा के चार जिलों की शिल्प विरासत
  • राजस्थान की पाकिस्तान सीमा उस तरह नहीं है जैसी किसी नक्शे में दिखती है। यह एक जीवंत, धड़कता हुआ सीमांत है – जहाँ रेगिस्तान की सुनहरी रेतें राष्ट्र की रक्षा करती हैं, और साथ-साथ हजारों साल की सांस्कृतिक धरोहर को संभाले रखती हैं। श्रीगंगानगर की ग्वार से लेकर बाड़मेर की आईना कढ़ाई तक – यह सब कुछ भारत के आत्मबोध की गाथा है जो गाँव के कारीगरों के हाथों से लिखी जाती है। उपनिषद् कहते हैं: “अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्।” अर्थात्, अपने-पराए का भेद करना छोटे मन का काम है। थार मरुस्थल के इन सीमांत गाँवों में इसी भाव को जीते-जागते देखा जा सकता है। यहाँ कारीगर न केवल अपनी कला को जीवंत रखते हैं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा को भी तराशते हैं। लाखों हाथ, मुख्यतः महिलाओं के हाथ, दिन-रात परिश्रम में डूबे रहते हैं, और इसमें न तो शोर है, न ही मीडिया की चकाचौंध। केवल अदृश्य भारत की गूँज है।
  • श्रीगंगानगर
  • श्रीगंगानगर राजस्थान का सबसे उत्तरी जिला है। यहाँ सतलज नदी की धारा पाकिस्तान सीमा से मिलती है। यह जिला अपने आप में एक अद्भुत संश्लेषण है – कृषि की समृद्धि और शिल्प की परंपरा के अलौकिक मेल का। सिंधु घाटी की सभ्यता के अवशेष यहाँ अभी भी धरती की गोद में सोए हैं। खानाबदोश राइका और बिश्नोई समुदाय सदियों से यहाँ वास करते हैं, और सदियों से इसी परंपरा को जीवंत रखते हैं। यहाँ नहरों की धारा बहती है, किन्नू के बागों में सुगंध तैरती है, और गाँवों की गलियों में रंगीन कपड़ों की गंध उड़ती है। यह वह भूमि है जहाँ राजा गंगा सिंह की दूरदर्शिता ने नहरों का जाल बिछाया था, और आज भी वही परंपरा यहाँ की आत्मा को जल देती है।
  • कारीगरी की परंपराएँ और एक जिला एक उत्पाद (ODOP) उत्पाद
  • श्रीगंगानगर का राष्ट्रीय एकल-उत्पाद योजना (ODOP) का उत्पाद है – गम पाउडर (ग्वार का मैदा)। ग्वार मरुस्थल में उगने वाली एक कृषि पदार्थ है, जो खाद्य उद्योग में गाढ़ापन कारक के रूप में काम आती है। भारत में गम पाउडर उत्पादन में राजस्थान सर्वोच्च स्थान पर है और इसमें श्रीगंगानगर की भूमिका केंद्रीय है।
  • परंतु इससे अधिक महत्वपूर्ण है यहाँ की पारंपरिक हस्तशिल्प परंपरा, जो अभी भी जीवंत है।
  • प्रमुख हस्तशिल्प क्षेत्र:
  • श्रीगंगानगर में कपड़ों की कढ़ाई एक कला है, छपाई एक भाषा है। यहाँ की बुनकर जाति कपास और ऊन की बुनाई में पारंगत है। जामदानी और दोपट्टों का निर्माण यहाँ होता है। ये उत्तर भारत की महिलाओं की सजावट का अभिन्न अंग हैं। हाथी दांत की कढ़ाई (जो अब कृत्रिम सामग्री से होती है) और मनिहारी के काम भी इसी क्षेत्र की विरासत हैं। दीवार पर लगी कढ़ाई को देखिए तो लगता है कि प्रत्येक धागा एक संवाद है, रंग से रंग तक, पैटर्न से पैटर्न तक। यह केवल कला नहीं है; यह संस्कृति का पवित्र पठन-पाठन है।
  • संघर्ष की गाथा
  • श्रीगंगानगर के हस्तशिल्प कारीगरों की औसत वार्षिक आय (पारिवारिक स्तर पर) 80 हजार से 1.2 लाख रुपये  है। कढ़ाई और बुनाई का काम परिवारों को पूरक आय प्रदान करता है। मुख्य आय तो कृषि से आती है, शिल्प से केवल दाने-दाने की कमाई होती है। किन्नू की विख्यात मंडी यहाँ है, जिससे कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था सशक्त है। परंतु यही कृषि-निर्भरता एक भारी खतरा भी है। सूखे के दिनों में यह सब कुछ धराशायी हो जाता है।
  • बीकानेर
  • बीकानेर थार मरुस्थल के हृदय में स्थित है। यह वह जिला है जहाँ ऊंटों की विरासत और मुगल-राजपूत सभ्यता का अद्भुत मेल दिखता है। महाराजा गंगा सिंह की दूरदर्शिता से यहाँ नहरों का जाल बिछा, जिससे यह कृषि का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र बना। परंतु बीकानेर की असली पहचान है – वहाँ की कला। सदियों की कारीगरी परंपरा यहाँ न केवल जीवंत है, बल्कि वह प्रत्येक मुहूर्त में श्वास ले रही है।
  • उस्ता कला
  • बीकानेर का सबसे प्रसिद्ध शिल्प है उस्ता कला जिसमें ऊंट की खाल पर सोने की मीनाकारी की जाती है। इसे शाही कला भी कहा जाता है। इसका उद्भव मुगल काल में हुआ, विशेषकर अकबर के शासनकाल में। परंतु इसे अपने वर्तमान रूप में महाराजा अनूप सिंह के शासनकाल में लाहौर के उस्ताद कारीगरों ने दिया। यह नाम ही एक संपूर्ण दर्शन की तरह है। ‘उस्ता’ का मतलब है – गुरु, शिक्षक, माहिर। इसलिए इस कला को ‘उस्ता कला’ कहते हैं। यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंपी जाने वाली परंपरा है।
  • उस्ता कला की विशेषताएँ:
  • सामग्री: ऊंट की खाल (जो बीकानेर की सांड़ियों से मिलती है), सोने के पत्तर (foil), और विभिन्न रंग।
  • तकनीक: हाथ से महीन ब्रश से चित्रांकन। पहले पेंटिंग करते हैं, फिर सोने की परत चढ़ाते हैं। यह एक कला है, इसमें कोई मशीनी काम नहीं होता है।
  • उपयोग: सजावटी वस्तुएँ (दीवार पर टाँगने वाली), आभूषण, सुगंध की शीशियाँ, दर्पण।
  • मुख्य केंद्र: चोतन गाँव और इसके आसपास के क्षेत्र। चोतन का नाम उस्ता कला के साथ पर्याय बन गया है।
  • कारीगर समुदाय: मथेरण जाति के लोगों को इस कला का विशेषज्ञ माना जाता है। ये परिवार पीढ़ियों से इस कला को पल्लवित-पुष्पित कर रहे हैं।
  • GI Tag (भारतीय भौगोलिक संकेत): 2023 में प्राप्त हुआ है। यह एक ऐतिहासिक पहचान है।
  • अंतर्राष्ट्रीय निर्यात: यूरोप, यूएसए, यूएई, और मध्य एशिया के बाजारों में यह कला जाती है।
  • पद्मश्री सम्मानित: हिसामुद्दीन उस्ता को 1986 में पद्मश्री सम्मान मिला था। उनके हाथों से निकले उस्ता कला के टुकड़े अब विश्व के संग्रहालयों में हैं।
  • प्रशिक्षण का केंद्र:
  • राज सिख समुदाय के वरिष्ठ उस्ता कारीगरों द्वारा स्थापित कैमल हाइड ट्रेनिंग सेंटर बीकानेर में कारीगरों को प्रशिक्षण देता है। यह केंद्र न केवल तकनीकी शिक्षा देता है, बल्कि पीढ़ियों की परंपरा को भी संरक्षित करता है। उस्ता कला में एक चित्र बनाने में 15-20 दिन का समय लग जाता है। बेहद महीन कला। परंतु भारतीय बाजार में इसकी कीमत अभी भी सीमित है। निर्यात के माध्यम से ही इन्हें सही मूल्य मिलता है। तब ही विश्व के अमीर कलेक्टरों के पास यह कला पहुँचती है। फिर भी, बीकानेर के उन कारीगरों के घर में प्रायः अभाव ही रहता है।
  • अन्य महत्वपूर्ण हस्तशिल्प
  • बीकानेर में उस्ता कला के अलावा अन्य शिल्प भी समृद्ध हैं:
  • सिरेमिक (ODOP उत्पाद): मिट्टी के सजावटी बर्तन, पॉटरी। बीकानेर की मिट्टी की गुणवत्ता इस कला के लिए प्रसिद्ध है।
  • कशीदाकारी (Embroidery): रंगीन सूत से कपड़ों पर हाथ की कढ़ाई। यह एक महिला-केंद्रित कला है, और लाखों महिलाएं इसी से जीविका चलाती हैं।
  • ऊनी कालीन: ईरानी और भारतीय दोनों पद्धतियों से बने गलीचे। ये कालीन केवल सजावटी नहीं हैं; ये कला के संरक्षण का माध्यम हैं।
  • नमदे: ऊन को विशेष तरीके से दबाकर बनाई गई चादरें। यह एक प्राचीन तकनीक है जो बीकानेर में अभी भी जीवंत है।
  • लोई (Loi): नापासर में बनने वाली ऊन की विशेष बुनाई। इसे ‘बीकानेर का हीरा’ भी कहा जाता है।
  • मिट्टी के बर्तन: पारंपरिक डिजाइन की सुराहियाँ, मटके।
  • धातु कार्य: तांबे और पीतल की कलात्मक वस्तुएँ, घंटियाँ, सजावटी पात्र, आभूषण।
  • आर्थिक वास्तविकता
  • बीकानेर में कारीगरों की औसत वार्षिक आय 1.2 से 1.8 लाख रुपये (पारिवारिक स्तर पर)। उस्ता कला के कारीगर अधिक आय पाते हैं, क्योंकि उनकी कला को विश्वस्तर पर मान्यता प्राप्त है। परंतु अन्य शिल्पों में औसत आय कम है। 5-6 सदस्यों के परिवार में प्रति व्यक्ति मासिक आय 2,000-3,000 रुपये ही रहती है। यह आय न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बहुत कम है।
  • राज सिखों की भूमिका: बीकानेर के कारीगरों को राज सिख संगठन से विशेष समर्थन मिलता है। जेलों में दरियों का निर्माण होता है, जिससे कारीगर प्रशिक्षण और रोजगार दोनों पाते हैं। कारीगरी को एक आंदोलन बनाने का यह एक सामाजिक दृष्टिकोण है।
  • जैसलमेर
  • जैसलमेर पाकिस्तान सीमा से केवल 40 किलोमीटर दूर है। यहाँ की मिट्टी का रंग पीला-सुनहरा है जो सूर्य की किरणों में सोने जैसा चमकता है। इसीलिए इसे स्वर्ण नगरी (Golden City) कहा जाता है। जैसलमेर की संस्कृति सिंधु-मरुस्थल सभ्यता का प्रमाण है। यहाँ की ईंटें कहानियाँ कहती हैं – कहानियाँ व्यापार की, सांस्कृतिक आदान-प्रदान की और युद्धों की। यह वह भूमि है जहाँ राजपूत शौर्य और मरुस्थल की कठोरता का संगम स्पष्ट दिखाई देता है।
  • कारीगरी की परंपराएँ:
  • पत्थर पर कारीगरी
  • जैसलमेर का एक जिला एक उत्पाद (ODOP) है पीला संगमरमर (Yellow Marble) और टाइलें। यह एक भू-आधारित उत्पाद है। परंतु इसके साथ कारीगरी का गहरा संबंध है। इसके लिए पत्थर को तराशना कर उसे आकार दिया जाता है।
  • प्रमुख हस्तशिल्प:
  • लकड़ी की नक्काशी (Wood Carving): जैसलमेर की लकड़ी की नक्काशी पूरे भारत में प्रसिद्ध है। खाती और सुथार जाति के कारीगर इस कला में पारंगत हैं। हवेलियों के दरवाजों, खिड़कियों, फर्नीचर पर की जाने वाली नक्काशी अद्वितीय है। इन नक्काशियों को देखिए तो प्रत्येक कोने में एक पूरी कहानी दिखाई देती है – माध्यम होते हैं – फूल, पत्तियाँ, पशु, देवी-देवता। यह केवल सजावट नहीं होती है; यह एक दृश्य-काव्य की तरह प्रभावी होती है।
  • गेसो वर्क (Gesso Art): ऊंट की खाल पर की जाने वाली यह एक ऐसी कारीगरी है जहाँ चूने और गोंद का मिश्रण लगाकर पेंटिंग की जाती है। यह बीकानेर की उस्ता कला से भिन्न है, परंतु समान रूप से मूल्यवान है।
  • दरी और बुनाई: जैसलमेर ऊनी दरी (carpet) और बरड़ी (woolly wrap) के लिए विख्यात है। जामदानी साड़ियों की बुनाई भी यहाँ होती है। ये वस्तुएँ न केवल व्यावहारिक उपयोग के लिए प्रसिद्ध हैं, बल्कि सौंदर्य के प्रतीक भी माने जाते हैं।
  • चमड़े का काम: जूते, बैग, पौती (एक परंपरागत चमड़े की पात्र जिसमें दूध रखा जाता है) – ये सब यहाँ बनते हैं। चमड़े की खुशबू, इसकी कोमलता, इसका स्थायित्व – यह सब कुछ कारीगरी का एक अहम अंग है।
  • ग्रेनाइट और संगमरमर कार्य: यहाँ पीले संगमरमर से मूर्तियाँ, सजावटी वस्तुएँ बनाई जाती हैं। पोकरण की पॉटरी को GI Tag मिला है।
  • जैसलमेर में हजारों कारीगर लकड़ी की नक्काशी, बुनाई, चमड़ा कार्य में जुड़े हैं। महिलाएं दरी बुनाई और सजावटी कढ़ाई का काम करती हैं। स्थानीय खानाबदोश समुदाय (लूम्बा, राइका आदि) परंपरागत कलाओं को जीवंत रखते हैं। जैसलमेर के कारीगरों की औसत वार्षिक आय 1 लाख से 1.4 लाख रुपये है। लकड़ी की नक्काशी का काम अधिक समय लेता है, परंतु मूल्य भी अधिक मिलता है। पर्यटन की कमी के कारण स्थानीय बाजार सीमित है। अधिकतर काम निर्यात के लिए या दूर के शहरों के लिए किया जाता है। 
  • बाड़मेर
  • बाड़मेर पाकिस्तान सीमा से सटा हुआ राजस्थान का सबसे दक्षिण-पश्चिमी जिला है। यह वह भूमि है जहाँ महान कारीगर लीलाराम जांगिड़ की परंपरा अभी भी जीवंत है। यहाँ की रेगिस्तानी मिट्टी से लेकर कपास के खेत तक – सब कुछ कारीगरी के संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं। बाड़मेर की पहचान है – धैर्य। यहाँ के कारीगर सूखे को सहते हैं, तस्करी के दबाव को झेलते हैं, बाजार की अनिश्चितता को समझते हैं, फिर भी, वे अपना काम जारी रखते हैं। उऩकी दृष्टि में यह केवल आर्थिक आवश्यकता नहीं है; यह एक राष्ट्रीय-धार्मिक कर्तव्य भी है।
  • कारीगरी की परंपराएँ
  • बाड़मेर में 15 से अधिक प्रमुख कारीगरी क्षेत्र हैं। यहाँ 60,000 से अधिक कारीगर (मुख्यतः महिलाएँ) जीविका कमाती हैं। गुजरात के कच्छ की तरह ही बाड़मेर भी कारीगरी का एक अदृश्य साम्राज्य है।
  • आइना कढ़ाई (Mirror Work): यह बाड़मेर की सबसे प्रसिद्ध और सबसे मूल्यवान कला है। इसका मुख्य केंद्र: चोतन गाँव (प्राचीन नाम: चोतन शर्प) है। यहाँ की आइना पर कढ़ाई विश्व प्रसिद्ध है। चोतन का नाम अब इस कला के साथ पर्याय बन गया है। इसके कुछ पहलू विशेष रूप से द्रष्टव्य हैं –
  • तकनीक: छोटे दर्पणों को कपड़े पर मज़बूती से सिल दिया जाता है। इसके बाद दर्पण के चारों ओर रंगीन धागों से सूक्ष्म और सघन कढ़ाई की जाती है, जिससे दर्पण स्थिर रहता है और डिज़ाइन स्पष्ट व आकर्षक बनता है।
  • डिजाइन: डिजाइन में मुख्य हैं – ज्यामितीय पैटर्न, फूल-पत्तियाँ, पशु-पक्षियों की आकृतियाँ, देवी-देवता। प्रत्येक डिजाइन एक कहानी कहता है।
  • धागे: लाल, हरा, नीला, पीला, सुनहरा जैसे विभिन्न रंगों में रेशमी, कॉटन, ऊनी धागे प्रयोग में लाए जाते हैं। ये रंग भारतीय त्योहारों की भाषा हैं।
  • उपयोग: ब्लाउज, साड़ियाँ, ओढ़नियाँ, दीवार की सजावट (wall hangings), तकिए के कवर का उपयोग आम लोग भी करते हैं। लेकिन, विशेषकर विवाह के अवसर पर दुल्हन की सजावट में ये सामग्रियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
  • GI Tag: इस हस्तशिल्प को भारतीय भौगोलिक संकेत GI Tag प्राप्त है। यह एक औपचारिक स्वीकृति है कि ‘बाड़मेर की आइना कढ़ाई’ केवल एक स्थान का उत्पाद नहीं है, बल्कि विश्व का एक सांस्कृतिक धरोहर है।
  • अंतर्राष्ट्रीय निर्यात: इसका निर्यात मुख्य रूप से यूएसए, यूके, फ्रांस, संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रिया और जर्मनी में किया जाता है। यूरोपीय के घरों में यह भारतीय दर्पण सगर्व चमकता है।
  • कारीगर: मुख्यतः महिलाएँ (70% से अधिक) हैं। ये महिलाएँ अपने घरों में, अपनी बैठकियों में, दिन-रात इस कला को जीवंत बनाए रखती हैं।
  • आय का कड़वा सच: आइना कढ़ाई में एक कारीगर की औसत वार्षिक आय 30,000 से 50,000 रुपये होती है। एक परिधान को पूरा करने में 2-3 महीने का समय लग जाता है। यह भीषण श्रम है, परंतु आय न्यूनतम है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इस वस्तु की कीमत 10,000-50,000 रुपये तक होती है, परंतु कारीगर को केवल 5-10% ही मिलता है। बाकी सब बिचौलिए खा जाते हैं।
  • ब्लॉक प्रिंटिंग – अजरख प्रिंट (Ajrakh):
  • स्थान: बालोतरा गाँव इस कला-कारीगरी का प्रमुख केंद्र है।
  • रंग: पूर्णतः प्राकृतिक – हल्दी, अनार के छिलके, स्याही, मिट्टी। कोई भी रासायनिक रंग नहीं। ये प्रकृति से लिए गए रंग और सौंदर्य हैं।
  • तकनीक: हाथ से बनाए गए लकड़ी के ब्लॉक से छपाई की जाती है। प्रत्येक ब्लॉक एक कारीगर के जीवन का प्रतिनिधि है। कई पीढ़ियों तक ये ब्लॉक चलते हैं।
  • विशेषता: दोनों तरफ छपाई (reversible print) की जाती है। इसका मतलब है कि कपड़े के दोनों ओर सामान डिजाइन, सामान रंग। यह एक तकनीकी चमत्कार है।
  • पारंपरिक डिजाइन: ज्यामितीय पैटर्न (squares, hexagons), फूल, बेल-बूटे, इस्लामिक आकार-विन्यास का प्रयोग किया जाता है। हर डिजाइन में एक भाषा होती है।
  • GI Tag: इसे यह भौगोलिक पैमाना प्राप्त है। 
  • मलीर प्रिंट:
  • रंग: कत्थई (brown) और काला। ये गहरे रंग हैं।
  • तकनीक: टिन सेल छपाई पद्धति।
  • विशेषता: मोटे कपड़ों (जैसे सूती के पर्दे, दीवार की सजावट) के लिए उपयुक्त।
  • लकड़ी की नक्काशी
  • यह बाड़मेर का एक उदीयमान कला है जो सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) से उत्प्रेरित है। पिछले 20-30 वर्षों में इसने यहाँ जड़ें जमा ली हैं।
  • प्रमुख कारीगर: लीलाराम जांगिड़ (तीन पीढ़ियों की परंपरा का वाहक)। लीलाराम की कहानी बाड़मेर के कारीगरों की एक प्रतीकात्मक प्रेरक गाथा है।
  • विशेषता: पहले ये कारीगर मुंबई, सूरत, पुणे – दूर के शहरों में काम करते थे, क्योंकि स्थानीय बाजार में काम नहीं था। परंतु आज, बाड़मेर में ही इन्हें काम मिल रहा है। यह एक विकास की कलात्मक गाथा है।
  • आकार और डिजाइन: फर्नीचर (मेज, कुर्सी, अलमारी), सजावटी पैनल, मूर्तियाँ, दरवाजे के फ्रेम।
  • निर्यात: इसका निर्यात मुख्य रूप से यूरोप और अमेरिकामें होता है। यहाँ के अमीर घरों में बाड़मेर की लकड़ी की नक्काशी की बहुत माँग है।
  • अन्य महत्वपूर्ण शिल्प
  • मिट्टी के बर्तन: रंगीन पॉटरी एवं पानी के बर्तन। बाड़मेर की मिट्टी इस कला के लिए उपयुक्त है।
  • चमड़ा कार्य: मोचरी (जूते), बैग और बेल्ट। जूते बनाने की परंपरा यहाँ सदियों पुरानी है।
  • चांदी के आभूषण: नाजुक कारीगरी। महिलाओं के गहने, नथ, बिछिए, कंगन आदि।
  • बुनाई: ऊनी दरी, नमदे और पट्टियों का निर्माण। ये सर्दियों में पहने जाते हैं।
  • कशीदाकारी: रंगीन धागों से हाथ की कढ़ाई। महिलाओं की परंपरागत कला।
  • बाड़मेर का एक जिला एक उत्पाद (ODOP): जीवन-रक्षक अनाज
  • इशबगोल (Ispaghul/Psyllium husk) – एक औषधीय पदार्थ कृषि उत्पाद है जिसे अतिसार (diarrhea) और कब्ज के इलाज में प्रयोग किया जाता है। यह एक विशुद्ध रूप से कृषि पदार्थ है, परंतु इसके प्रसंस्करण में कारीगरों का योगदान होता है। भारत में इशबगोल अथवा इस्पाघुल का सबसे बड़ा उत्पादन बाड़मेर में होता है।
  • अन्य भौगोलिक उत्पाद: घोड़ा जीरा (Ajwain), जीरा, अनार और टमाटर। बाड़मेर के भूगोल में सब कुछ उगता है।
  • आर्थिक वास्तविकता:
  • औसत वार्षिक आय: 1 लाख से 1.5 लाख रुपये (पारिवारिक स्तर पर), प्रति व्यक्ति मासिक आय: 5-6 सदस्यों के परिवार में ₹1,700-2,500 । यह संख्या एक कड़वी वास्तविकता है कि बाड़मेर के कारीगर अधिकतर सरकारी सहायता के बिना अपनी कारीगरी के बल पर पीढ़ियों की परंपरा को जीवंत रखते हैं।
  • नए संकट:
  • जलवायु परिवर्तन: सूखे की बारंबारता बढ़ रही है।
  • बाजार की अनिश्चितता: निर्यात में उतार-चढ़ाव होता रहता है।
  • पाकिस्तान से तस्करी का दबाव: सस्ते, नकली सामान के साथ प्रतिद्वंद्विता बढ़ रही है।
  • स्थानीय बाजार का विनाश: कारीगरों को अपनी कृतियाँ बाहर बेचनी पड़ती है।
  • आर्थिक अन्याय: गाँव में एक आइना कढ़ाई वाली महिला जिसे 10 वर्षोंका कर्यानुभव है – उसे एक ब्लाउज बनाने में 2 महीने लगते हैं। उसे 2,000-3,000 रुपये मिलते हैं। परंतु बाहर का एक दुकानदार उसी ब्लाउज को 15,000 रुपये में बेचता है। यह आर्थिक अन्याय है। यह शोषण है। परंतु वह महिला रुकती नहीं। क्यों? क्योंकि यह उसकी पहचान है, उसकी परंपरा है, उसका अस्तित्व है।
  • राजस्थान की राष्ट्रीय एकल-उत्पाद योजना (ODOP):
  • राजस्थान के 33 जिलों में से 4 सीमांत जिलों को ODOP के अंतर्गत विशेष उत्पाद सौंपे गए हैं:
जिला ODOP उत्पाद उद्योग प्रकार
श्रीगंगानगर गम पाउडर खाद्य प्रसंस्करण
बीकानेर सिरेमिक हस्तशिल्प
जैसलमेर पीला संगमरमर & टाइलें खनिज-आधारित
बाड़मेर इश्वगोल खाद्य/औषधि प्रसंस्करण

 

  • जलवायु संकट: सूखे की निरंतरता
  • थार मरुस्थल में सूखा एक नियमित आपदा है। यह एक दीर्घकालीन संकट है जो पीढ़ियों को प्रभावित कर रहा है। पानी की कमी, चारे की कमी, फसल की असफलता – ये सब मिलकर कारीगरों को अन्य आजीविका की ओर धकेलते हैं।
  • तस्करी और सीमांत अर्थव्यवस्था: विदेशी प्रतिद्वंद्विता
  • जब सीमांत समुदाय आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं, तो –
  • पाकिस्तान से आयातित सस्ते (और अक्सर नकली) सामान की प्रतिद्वंद्विता बढ़ जाती है।
  • अवैध व्यापार का दबाव होता है।
  • स्थानीय कारीगरों का मूल्य पतन हो जाता है।
  • यह एक राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न भी है। जब सीमांत कारीगर गरीब रहते हैं, तो तस्करी की ओर जाने का प्रलोभन बढ़ता है।
  • युवा पलायन: परंपरा की मृत्यु
  • बेरोजगारी और कम आय की वजह से युवा शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। परंपरागत कलाएँ संकट में हैं। एक पीढ़ी में यदि ये कलाएँ सिखाई न गईं, तो अगली पीढ़ी इन्हें कभी नहीं सीखेंगी। यह एक सांस्कृतिक बर्बादी है।
  • बाजार का अभाव: अदृश्य आर्थिकता
  • राजस्थान में गुजरात की तरह के जामनगर-भावनगर जैसे बंदरगाह नगर नहीं हैं।
  • राष्ट्रीय बाजार तक पहुँचना कठिन है।
  • पर्यटन की सुविधा सीमित है।
  • बिचौलियों का दबाव अधिक है।
  • GI Tag की कमी: अंतर्राष्ट्रीय मान्यता का अभाव
  • राजस्थान के सीमांत जिलों में GI Tag अभी भी बहुत कम हैं। बाड़मेर की आइना कढ़ाई को GI Tag मिला है, परंतु अन्य शिल्पों को अभी भी इंतज़ार है। GI Tag के बिना, अंतर्राष्ट्रीय मूल्य नहीं मिलता।
  • समाधान और सुझाव: तीन स्तरीय रणनीति
  • शीघ्र आवश्यक सुविधाएं
  • गाँवों को इंटरनेट से जोड़ना जरूरी है।
  • सभी गाँवों में 4G कनेक्टिविटी स्थापित करना।
  • डिजिटल पेमेंट सिस्टम के माध्यम से बिचौलिओं को हटाना।
  • WhatsApp, Instagram पर कारीगरों का सीधा विपणन आवश्यक हो गया है।
  • कारीगरों को Amazon, Flipkart, IndianCrafts जैसे प्लेटफॉर्मों से जोड़ना।
  • सोशल मीडिया पर सीधे विपणन (YouTube, Pinterest) की व्यवस्था ।
  • कारीगरों के अपने-अपने पोर्टल भी हों।
  • कच्चे माल की सुरक्षा
  • गुणवत्ता की गारंटी की व्यवस्था हो।
  • सरकारी सहायता में प्राकृतिक रंग, धागे की आपूर्ति हो।
  • आयातित सामान पर उपयक्त प्रतिरक्षा (customs duties) लगे।
  • गुणवत्ता की जाँच के लिए एक सीमांत हस्तशिल्प बोर्ड की स्थापना की जाय।
  • ऋण सुविधा
  • 25,000-50,000 रुपये तक ब्याज-मुक्त ऋण, 3-5 साल के लिए।
  • बैंकों को प्रोत्साहित करना कि वे कारीगरों को आसानी से ऋण दें।
  • माइक्रो-फाइनेंस के माध्यम से महिला कारीगरों को समर्थन मिले।
  • न्यूनतम मजदूरी
  • सीमांत जिलों के लिए विशेष न्यूनतम मजदूरी निर्धारित करना।
  • कारीगरों की आय कम से कम 10,000 रुपये प्रति माह होनी चाहिए।
  • यह शहरी न्यूनतम मजदूरी से कम नहीं होनी चाहिए।
  • शिक्षा और प्रशिक्षण
  • स्कूलों में हस्तशिल्प को एक वैकल्पिक विषय बनाना।
  • गुरु-शिष्य परंपरा को सरकारी मान्यता देना।
  • क्लस्टर विकास: आधुनिक कारीगर संरचनाएँ
  • हर जिले में एक अंतर्राष्ट्रीय मानक की कारीगर हब स्थापित करना।
  • सामूहिक कार्यशालाएँ आयोजित हों।
  • डिज़ाइन स्टूडियो की सुविधाएँ दी जाएँ।
  • प्रदर्शनी स्थल की व्यवस्था हो जहाँ कारीगर अपने उत्पाद सीधे बेच सकें।
  • GI Tag का विस्तार: वैश्विक मान्यता
  • बीकानेर की उस्ता कला को यूनेस्को में सूचीबद्ध करना।
  • जैसलमेर की लकड़ी की नक्काशी को GI Tag दिलाना।
  • बाड़मेर की आईना कढ़ाई के लिए अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट सुरक्षा।
  • अंतर्राष्ट्रीय बाजार: विश्व का दरवाज़ा खोलना
  • यूरोपीय डिज़ाइनरों, फैशन हाउसों के साथ सहयोग स्थापित हो।
  • Fair Trade certification प्राप्त करना ताकि कारीगरों को सही मूल्य मिले।
  • अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में राजस्थान की हस्तशिल्प को प्रदर्शित करना।
  • शिल्प-पर्यटन: सांस्कृतिक पर्यटन का विकास
  • बाड़मेर और बीकानेर को कारीगर-पर्यटन का केंद्र बनाना।
  • कारीगरों के घरों को हेरिटेज होम-स्टे में रूपांतरित करना।
  • पर्यटकों को कारीगरों से सीधे सामान खरीदने का अवसर देना।
  • महिला सशक्तीकरण: आर्थिक आत्मनिर्भरता
  • महिला कारीगरों के लिए स्वयं सहायता समूह (SHG) बनाना।
  • उन्हें सामूहिक विपणन में सहायता देना।
  • महिलाओं के नेतृत्व में कारीगर सहकारी समितियाँ गठित करना।
  • यूनेस्को में संरक्षण:
  • बाड़मेर की आइना कढ़ाई को यूनेस्को की Intangible Cultural Heritage of Humanity सूची में सूचीबद्ध करना।
  • बीकानेर की उस्ता कला को भी यही सम्मान दिलाना।
  • यह एक वैश्विक मान्यता है, जो कारीगरों को गरिमा देता है।
  • सांस्कृतिक विश्वविद्यालय: ज्ञान का नया पीठ
  • बीकानेर या बाड़मेर में एक राष्ट्रीय कारीगरी विश्वविद्यालय की स्थापना।
  • यहाँ न केवल तकनीक सिखाई जाए, बल्कि डिज़ाइन, व्यवसाय प्रबंधन, अंतर्राष्ट्रीय विपणन की शिक्षा भी दी जाए।
  • एक अनुसंधान केंद्र, की स्थापना हो जहाँ पारंपरिक कलाओं का वैज्ञानिक अध्ययन हो।
  • निर्यात बैंक: हस्तशिल्प का वित्तीय केंद्र
  • हस्तशिल्प-विशिष्ट निर्यात वित्तपोषण केंद्र स्थापित करना।
  • कारीगरों को विदेश में माल भेजने में सहायता देना।
  • अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन को आसान बनाना।
  • सीमांत-विशिष्ट नीति: नई आर्थिक नीति
  • राजस्थान सरकार को सीमांत जिलों के लिए विशेष औद्योगिक नीति बनानी चाहिए।
  • GST छूट (न्यूनतम 5%)।
  • निर्यात प्रोत्साहन (subsidy) मिले।
  • विदेशी सहयोग को प्रोत्साहित करना।
  • कारीगर को राष्ट्र-निर्माता के रूप में स्वीकार करना है। कारीगरों को केवल कामगार नहीं, बल्कि संस्कृति के रक्षक के रूप में मान्यता देना आवश्यक है। उन्हें राष्ट्रीय सम्मान और पद्मश्री-जैसी मान्यताएँ देने से कुटीर उद्योगों की सृजनशीलता में क्रान्तिकारी परिवर्तन होगा। राजस्थान की सीमांत अर्थव्यवस्था गुजरात से गुणात्मक रूप से भिन्न है। यहाँ न विभाजन की विरासत है, न ही वन-आधारित जीविका। यहाँ है शुद्ध कारीगरी – हजारों साल की परंपरा, जो अभी भी जीवंत है। परंतु लगातार सूखा, तस्करी का दबाव, बाजार का अभाव, और सरकारी उदासीनता ने इस व्यवस्था को गहरे संकट में डाल दिया है। बाड़मेर के लीलाराम जांगिड़ की तरह, बीकानेर के हिसामुद्दीन उस्ता की तरह, हजारों कारीगर अपनी परंपरा को जीवंत रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। परंतु ये व्यक्तिगत प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। राष्ट्र को इन कारीगरों को सम्मान, समर्थन, और सुयोग देना चाहिए। यह केवल आर्थिक विकास नहीं है – यह राष्ट्र धर्म है।
कर्नाटक

कर्नाटक

कर्नाटक

  • कर्नाटक की तटीय कुटीर अर्थव्यवस्था
  • (उत्तर कन्नड़, उडुपी, दक्षिण कन्नड़)
  • कर्नाटक का तटीय क्षेत्र को ‘करावली’ (Karavali) कहा जाता है। यह क्षेत्र केवल तटीय भूभाग नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और आर्थिक गलियारा है। अरब सागर यहाँ जीवन-निर्वाह का आधार प्रदान करता है, जैसा कि कच्छ क्षेत्र में देखा जाता है। परंतु करावली की कारीगरी और सांस्कृतिक पहचान मरुस्थलीय नहीं, बल्कि घने वनों, मंदिर स्थापत्य और तटीय परंपराओं से निर्मित है। उत्तर कन्नड़, उडुपी और दक्षिण कन्नड़ जिले एक अदृश्य स्वर्ण-सूत्र द्वारा जुड़े हैं, जो इस क्षेत्र की कला, संस्कृति और आजीविका को एक समग्र संरचना प्रदान करता है।
  • उत्तर कन्नड़ जिला: वन और सागर की जुगलबंदी
  • उत्तर कन्नड़ जिला 70% वनों से आच्छादित है और इसकी सीमा गोवा से लगती है। यहाँ की शिल्प कला में प्रकृति का गहरा प्रभाव है।
  • चंदन और काष्ठ शिल्प (Sandalwood & Wood Carving):
  • विरासत: सिरसी, कुमटा और होन्नावर के ‘गुडिगार’ (Gudigar) समुदाय के कारीगर चंदन की लकड़ी पर नक्काशी के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं।
  • कला: ये लकड़ी पर इतनी महीन नक्काशी करते हैं मानो सोने के तार पिरोए गए हों।
  • चुनौती: चंदन की लकड़ी की अनुपलब्धता और कड़े वन कानूनों के कारण अब वे शीशम और कदंब की लकड़ी का उपयोग कर रहे हैं।
  • सिद्दी समुदाय की रजाई (Kawandi):
  • यहाँ बसे अफ्रीकी मूल के ‘सिद्दी’ समुदाय की महिलाएं रंगीन कपड़ों के टुकड़ों से ‘कावंडी’ (Kawandi) नामक रजाई बनाती हैं, जो अब अंतर्राष्ट्रीय पहचान बना रही है।
  • ODOP (एक जिला एक उत्पाद): मसाले (Spices) और समुद्री उत्पाद।
  • उडुपी जिला: मंदिरों का शहर और बुनाई का केंद्र
  • उडुपी केवल कृष्ण मंदिर के लिए नहीं, बल्कि अपनी अनोखी साड़ी और खाद्य संस्कृति के लिए जाना जाता है।
  • उडुपी साड़ी (Udupi Saree):
  • जीआई टैग (GI Tag): उडुपी साड़ियों को हाल ही में भौगोलिक संकेत मिला है।
  • तकनीक: इसे मालाबार फ्रेम लूम पर बुना जाता है। इसकी खूबी यह है कि बुनाई से पहले धागे (Yarn) को स्टार्च (मांड) के घोल में रंगा जाता है, जिससे साड़ी मजबूत और हल्की बनती है।
  • पुनर्जीवन: कुछ साल पहले यह कला लुप्त हो रही थी, लेकिन ‘कदिके ट्रस्ट’ (Kadike Trust) के प्रयासों से अब 60+ नए युवा बुनकर इससे जुड़े हैं।
  • मट्टू गुल्ला (Mattu Gulla):
  • यह एक विशेष प्रकार का बैंगन है जो केवल मट्टू गाँव में उगता है। इसे भी GI टैग प्राप्त है और इसकी स्थानीय अर्थव्यवस्था में बड़ी भूमिका है।
  • ODOP: एक जिला एक उफ्पाद के अंतर्गत समुद्री उत्पाद (Marine Products) आते हैं।
  • दक्षिण कन्नड़ जिला: यक्षगान और सोने की कारीगरी
  • मंगलुरु (दक्षिण कन्नड़ का मुख्यालय) एक प्रमुख बंदरगाह और शिक्षा का केंद्र है, लेकिन इसकी आत्मा यहाँ की लोककलाओं में बसती है।
  • यक्षगान मुखौटे और वेशभूषा:
  • कला: यक्षगान केवल नृत्य नहीं, यह एक उद्योग है। इसके विशाल मुकुट (Kirita) और आभूषण बनाने वाले कारीगर (मुख्यतः मंगलुरु और पुत्तूर में) हल्के लकड़ी और थर्माकोल का उपयोग करते हैं।
  • बाजार: ये मुखौटे अब सजावटी वस्तुओं के रूप में विदेशों में निर्यात हो रहे हैं।
  • बीड़ी उद्योग:
  • यह सुनने में छोटा लगता है, लेकिन दक्षिण कन्नड़ में लाखों महिलाएं घर बैठे बीड़ी रोलिंग (Beedi Rolling) से अपनी आजीविका चलाती हैं। यह एक विशाल कुटीर उद्योग है।
  • काजू प्रसंस्करण (Cashew Processing):
  • मंगलुरु भारत की ‘काजू राजधानी’ में से एक है। यहाँ की फैक्ट्रियों में 90% कामगार महिलाएं हैं।
  • ODOP: : एक जिला एक उफ्पाद के अंतर्गत समुद्री उत्पाद (Marine Products) आते हैं।
  • तुलनात्मक सार: गुजरात बनाम कर्नाटक (तटीय)
पहलू गुजरात (कच्छ/सौराष्ट्र) कर्नाटक (करावली)
मुख्य शिल्प कढ़ाई, ब्लॉक प्रिंट, मिट्टी के बर्तन लकड़ी की नक्काशी, यक्षगान मुखौटे, उडुपी साड़ी
भौगोलिक आधार मरुस्थल और शुष्क भूमि उष्णकटिबंधीय वन (Western Ghats) और नदियाँ
समुदाय मुख्य रूप से खानाबदोश (Nomadic) मंदिर-आधारित और कृषक समाज
महिला भागीदारी कढ़ाई में वर्चस्व (70%+) बीड़ी रोलिंग और काजू उद्योग में वर्चस्व
चुनौतियाँ पानी की कमी, भूकंप का डर अत्यधिक बारिश, वन कानून, युवाओं का पलायन
  • उत्तर कन्नड़ से दक्षिण कन्नड़ तक की यह पट्टी ‘कला और कौशल’ का जीवित संग्रहालय है। जहाँ गुजरात की कला में ‘रंगों का विस्फोट’ (Explosion of Colors) है, वहीं कर्नाटक की कला में ‘प्रकृति की सूक्ष्मता’ (Subtlety of Nature) है। दोनों ही सीमांत क्षेत्र यह सिद्ध करते हैं कि भारत की असली ताकत उसके कारखानों में नहीं, बल्कि उसके कारीगरों की झोपड़ियों में बसती है।
केरल

केरल

केरल 

  • केरल की तटीय कुटीर अर्थव्यवस्था
  • (कासरगोड से तिरुवनंतपुरम तक: ९ जिलों की शिल्प विरासत)
  • केरल की पश्चिमी सीमा पर अरब सागर और नारियल के विस्तृत उपवन एक प्राकृतिक अवरोध का निर्माण करते हैं। ये सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है और दृश्य-सौंदर्य से भी परिपूर्ण है। केरल की कुटीर अर्थव्यवस्था जैव-संसाधनों पर आधारित है। मिट्टी, नारियल जटा (कॉयर) और ताड़ के पत्ते यहाँ के कारीगरों के प्रमुख उत्पादन संसाधन हैं। इस तटीय पट्टी में पाँच लाख से अधिक कारीगर सक्रिय हैं, जिनमें सत्तर प्रतिशत से अधिक महिलाएँ हैं। ये कारीगर आत्मनिर्भर भारत की आधारशिला को सुदृढ़ कर रहे हैं। केरल के 14 जिलों में 9 तटीय और अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर स्थित जिले हैं। यहाँ के कुटीर उद्योग ध्यातव्य हैं –
  • कासरगोड जिला: सात भाषाओं की भूमिऔर बुनाई का जादू
  • यह केरल का सबसे उत्तरी जिला है, जो कर्नाटक से सटा है। यहाँ कई संस्कृतियों का मिलन होता है। यहाँ कई तरह के कुटीर उद्योग सदियों से महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
  • कासरगोड साड़ी (Kasaragod Saree):
  • विरासत: १८वीं सदी से चली आ रही परंपरा। इसे ‘शालिया’ (Saliya) समुदाय के बुनकर बुनते हैं।
  • विशेषता: ये साड़ियाँ सूती (Cotton) होती हैं और इनमें ‘वट’ (Vat) रंगों का प्रयोग होता है जो कभी फीके नहीं पड़ते। यह पर्यावरण के अनुकूल है।
  • GI टैग: इस कुटीर उद्योग को GI टैग प्राप्त है।
  • बेल मेटल शिल्प (Bell Metal Craft):
  • कुन्हिमंगलम् (जो कन्नूर की सीमा पर है) के पास कासरगोड के कारीगर मंदिरों के लिए विशेष दीप और मूर्तियाँ बनाते हैं।
  • कन्नूर: लूम्स और लोअर‘ (Looms and Lore) की भूमि
  • कन्नूर को ‘हथकरघा का मैनचेस्टर’ कहा जाता था। यहाँ का हर घर एक कारखाना है।
  • हथकरघा (Handloom):
  • उत्पाद: घरेलू फर्निशिंग (पर्दे, बेडशीट) यहाँ बनते हैं, जो यूरोप और अमेरिका को निर्यात किए जाते हैं।
  • अर्थव्यवस्था: यहाँ सहकारी समितियों (Co-operatives) का एक मजबूत जाल है जो बिचौलियों को हटाकर बुनकरों को सीधा लाभ देता है।
  • थेय्यम (Theyyam) कला:
  • यह केवल नृत्य नहीं, एक कुटीर उद्योग है। इसके वेशभूषा, मुकुट और शृंगार सामग्री बनाने वाले कारीगर साल भर काम करते हैं।
  • कोझिकोड जिला: इतिहास का बंदरगाह
  • वास्को डी गामा यहीं आया था, और आज भी यह व्यापार का केंद्र है।
  • उरु (Uru) नौका निर्माण:
  • बेपोर (Beypore): यहाँ के कारीगर (खलासी) सागौन की लकड़ी से विशाल अरब नौकाएँ (Dhows) बनाते हैं। यह विश्व का सबसे प्राचीन नौका-निर्माण उद्योग है जो बिना किसी ब्लूप्रिंट के, केवल अनुभव से चलता है।
  • ग्राहक: इसके ग्राहक हैं – कतर, दुबई और सऊदी अरब के शाही परिवार।
  • लकड़ी की नक्काशी: कोझिकोड के कारीगर शीशम की लकड़ी पर बारीक काम के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • मलप्पुरम और थ्रिस्सूर जिले: परंपरा और धातु
  • मलप्पुरम (Adyanpara Jewelry): यहाँ के सुनार बहुत ही महीन और हल्के आभूषण बनाने में माहिर हैं।
  • थ्रिस्सूर (कुथम्पल्ली साड़ी):
  • गाँव: कुथम्पल्ली।
  • विशेषता: यहाँ देवेंद्र समुदाय के बुनकर रहते हैं। उनकी साड़ियाँ अपनी ‘कसावु’ (Kasavu – सुनहरी बॉर्डर) के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • ODOP: थ्रिस्सूर का एक उत्पाद ‘स्क्रू पाइन’ (केवड़ा) शिल्प भी है।
  • एरणाकुलम (कोच्चि): आधुनिकता और बांस 
  • बाँस और बेंत शिल्प (Bamboo & Cane): अंगामाली और इसके आसपास के क्षेत्रों में ‘संबवा’ और अन्य समुदायों द्वारा बांस की टोकरियाँ और मैट बनाए जाते हैं।
  • नारियल के खोल (Coconut Shell) शिल्प: फेंके हुए नारियल के खोल से चम्मच, कप और सजावटी वस्तुएँ बनाई जाती हैं। यह ‘वेस्ट टू वेल्थ’ का उत्तम उदाहरण है।
  • अलप्पुझा और कोल्लम जिले: गोल्डन फाइबर‘ (Coir) की राजधानी
  • यह उद्योग केरल की कुटीर अर्थव्यवस्था की रीढ़।
  • कॉयर उद्योग (Coir Industry):
  • विस्तार: अलप्पुझा और कोल्लम में लाखों महिलाएं नारियल के छिलके से रेशा निकालने (Retting) और रस्सी बटने का काम करती हैं।
  • उत्पाद: जियो-टेक्सटाइल्स (Geo-textiles) – जो अब सड़कों के निर्माण और भूस्खलन रोकने में पूरी दुनिया में इस्तेमाल हो रहा है।
  • चुनौती: मशीनीकरण और प्लास्टिक रस्सियों से कड़ी टक्कर।
  • काजू प्रसंस्करण (Cashew Processing – Kollam):
  • कोल्लम को ‘विश्व की काजू राजधानी’ कहा जाता है। यहाँ की ९०% श्रमिक महिलाएं हैं। यह एक विशाल कुटीर-स्तरीय उद्योग है।
  • तिरुवनंतपुरम: राजधानी का शिल्प
  • बलरामपुरम हथकरघा: यह लघु उद्योग त्रावणकोर के महाराजा द्वारा शुरू किया गया। यहाँ की ‘मुंडू’ और ‘नेरियथु’ (पारंपरिक वस्त्र) अपनी शुद्धता और सादगी के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • GI टैग: इसे GI टैग प्राप्त है।
  • लकड़ी और हाथीदांत (अब कृत्रिम) नक्काशी: यहाँ के कारीगर चंदन और शीशम पर पौराणिक कथाएँ उकेरते हैं।
  • तुलनात्मक विश्लेषण: गुजरात बनाम केरल (तटीय)
पहलू गुजरात (कच्छ) केरल (मालाबार/कोंकण)
मुख्य कच्चा माल कपास, ऊन, मिट्टी नारियल (Coir), लकड़ी, बांस, काजू
कारीगर संरचना पारिवारिक इकाइयाँ (Family Units) मजबूत सहकारी समितियाँ (Strong Co-operatives)
महिला भूमिका कढ़ाई (Embroidery) में प्रमुख कॉयर और काजू उद्योग में ९०% वर्चस्व
बाजार मॉडल निजी व्यापारी और प्रदर्शनी सरकार समर्थित (Matsyafed, Coirfed)
भूगोल का प्रभाव शुष्क जलवायु (सूती/ऊन अनुकूल) आर्द्र जलवायु (नारियल/लकड़ी अनुकूल)

 

  • केरल ने अपनी कुटीर उद्योगों को ‘सहकारिता’ (Co-operative Movement) के माध्यम से जीवित रखा है। अलप्पुझा की ‘कॉयर सोसायटियाँ’ और कन्नूर की ‘वीवर्स सोसायटियाँ’ इस बात का प्रमाण हैं कि संगठित होकर कारीगर न केवल अपना अस्तित्व बचा सकते हैं, बल्कि वैश्विक बाजार में भी अपनी जगह बना सकते हैं। जहाँ गुजरात में रंग बोलते हैं, वहाँ केरल में रेशे (Fibers) गाते हैं।
गोवा

गोवा

गोवा

  • गोआ की तटीय कुटीर अर्थव्यवस्था
  • उत्तरी और दक्षिणी गोआ: पर्यटन की चमक के परे असली गोआ
  • गोआ विश्व-स्तर पर अवकाश-पर्यटन का प्रमुख केंद्र माना जाता है। इसकी 105 किमी लंबी तटरेखा केवल प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है। यह इंडो–पुर्तगाली सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत संग्रहालय है। गुजरात और केरल की भाँति गोआ की पश्चिमी सीमा अरब सागर से लगती है, जिसे स्थानीय संदर्भ में ‘सागर-सीमा’ कहा जाता है। इस तटीय क्षेत्र में गोआ की कुटीर अर्थव्यवस्था पर्यटन गतिविधियों और पारंपरिक शिल्प के बीच संतुलन बनाए रखती है। यहाँ के कारीगर विशाल कारखानों के लिए नहीं, बल्कि कला के पारखी पर्यटकों और अपनी संस्कृति को बचाने के लिए निर्माण करते हैं।
  • उत्तरी गोआ: विरासत और मिट्टी का सौंदर्य
  • यह जिला गोआ का पर्यटन केंद्र है, लेकिन इसके भीतरी गाँवों में (विशेषकर बिचोलिम और बारदेज़ में) एक अलग ही दुनिया है।
  • अजुलेजोस (Azulejos – टाइल पेंटिंग):
  • विरासत: यह 500 साल पुरानी पुर्तगाली कला है। ‘अजुलेजोस’ हाथ से पेंट की गई चमकदार टाइलें होती हैं, जो प्रायः नीले और सफेद रंग की होती हैं।
  • कारीगर: स्थानीय कलाकार मिट्टी की टाइलों पर गोआ के जनजीवन, चर्च और लैंडस्केप को चित्रित करते हैं।
  • बाजार: यह ‘प्रीमियम कुटीर उद्योग’ है। ये टाइलें महलों, विला और होटलों की दीवारों की शोभा बढ़ाती हैं। यह गोआ की पहचान बन चुका है।
  • कुम्हार कला (Pottery):
  • बिचोलिम (Bicholim): यहाँ की लाल मिट्टी (Red Clay) बहुत विशेष है। कुम्हार समुदाय यहाँ इस मिट्टी से ‘भगवान गणेश की मूर्तियों’ और रसोई के बर्तनों का निर्माण करता है। प्लास्टिक के वर्चस्व के बावजूद, बिचोलिम के मटके आज भी गोआ के हर घर में पाए जाते हैं।
  • काजू और फेनी उद्योग (Heritage Spirit):
  • शिल्प: काजू फेनी बनाना केवल शराब बनाना नहीं, यह एक ‘कृषि-शिल्प’ है।
  • GI टैग: ‘काजू फेनी’ को जीआई टैग प्राप्त है। इसे पारंपरिक तरीके से मिट्टी के बर्तनों में आसुत (Distill) किया जाता है। उत्तरी गोआ के पहाड़ियों में बसे हजारों परिवार इसी कुटीर उद्योग पर निर्भर हैं।
  • ODOP (एक जिला एक उत्पाद): काजू और काजू उत्पाद (Cashew Processing) ODOP (एक जिला एक उत्पाद) के अंतर्गत आते हैं।
  • दक्षिणी गोआ जिला: आदिम संस्कृति और प्रकृति
  • दक्षिणी गोआ अपेक्षाकृत शांत है और यहाँ की कला में गोआ के मूल निवासियों (आदिवासियों) की छाप अधिक है। यहाँ के कुटीर उद्योग में मुख्यतः निम्नलिखित हैं –
  • कुनबी साड़ी (Kunbi Saree):
  • पहचान: यह गोआ की ‘आदिवासी पहचान’ है। इसे ‘गावड़ा’ (Gawda) जनजाति की महिलाएं पहनती हैं।
  • विशेषता: यह एक सूती साड़ी है जिसमें लाल और सफेद रंग की चेक (Checkered) डिज़ाइन होती है। यह साड़ी इतनी मजबूत होती थी कि इसे खेतों में काम करते समय पहना जाता था।
  • पुनर्जीवन: यह कला लगभग लुप्त हो गई थी, लेकिन स्वर्गीय वेंडेल रॉड्रिक्स जैसे डिजाइनरों और सरकार के प्रयासों से अब हथकरघे फिर से चलने लगे हैं। यह ‘लुप्त होती विरासत’ को बचाने का एक संघर्ष है।
  • बांस और बेंत शिल्प (Bamboo Craft):
  • सत्तारी और काणकोण (Canacona) के जंगलों में रहने वाला ‘महार’ समुदाय बांस की टोकरियाँ (जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘पांटलो’ कहते हैं) बनाता है। इनका उपयोग मछली पकड़ने और धान रखने में होता है।
  • नारियल शिल्प (Coconut Craft):
  • नारियल के रेशों से रस्सियाँ बनाना और नारियल के कड़े खोल (Shell) से चम्मच, कटोरे और कलाकृतियाँ बनाना यहाँ का प्रमुख गृह उद्योग है।
  • ODOP (एक जिला एक उत्पाद): इसके अंतर्गत समुद्री उत्पाद (Marine Products) और कहीं-कहीं कटहल (Jackfruit) प्रसंस्करण आते हैं।
  • तुलनात्मक विश्लेषण: गुजरात, केरल और गोआ
पहलू गुजरात (सीमांत) केरल (तटीय) गोआ (तटीय)
मूल दर्शन मरुस्थल की कठोरता और रंगों का उत्सव संसाधनों का अधिकतम उपयोग (सहकारिता) ‘इंडो-वेस्टर्न’ संलयन और बुटीक (Boutique) संस्कृति
बाजार स्थानीय हाट और अंतर्राष्ट्रीय निर्यात (कपड़ा) घरेलू उपयोग और निर्यात (कॉयर/काजू) मुख्यतः पर्यटन आधारित (Souvenir Market)
उत्पाद का प्रकार उपयोगिता और परिधान (कढ़ाई) औद्योगिक (रस्सी/मैट) और खाद्य सजावटी (Decorative) और विरासत (Heritage)
आय स्तर मध्यम (कड़ी मेहनत, कम दाम) स्थिर (सहकारी सुरक्षा) उच्च (प्रीमियम उत्पाद, उच्च श्रम लागत)
सबसे बड़ी चुनौती पानी की कमी और पलायन मशीनीकरण से प्रतिस्पर्धा जमीन की कमी और पर्यटन क्षेत्र में श्रम का पलायन
  • गोआ की कुटीर अर्थव्यवस्था आकार में छोटी है, लेकिन ‘मूल्य’  में बहुत बड़ी है। गोआ के कारीगर कला, विरासत और विशिष्टता पर विशेष ध्यान देते हैं। यहाँ की चुनौती यह है कि नई पीढ़ी कुटीर उद्योगों को छोड़कर क्रूज जहाजों और होटलों में नौकरी करना पसंद करती है। यदि कुनबी साड़ी का करघा और अजुलेजोस की तूलिका रुक गई, तो गोआ केवल एक ‘पार्टी डेस्टिनेशन’ रह जाएगा, उसकी आत्मा खो जाएगी। गोआ के कारीगर उसी आत्मा के रक्षक हैं।
तमिलनाडु

तमिलनाडु

मिलनाडु

  • तमिलनाडु की तटीय कुटीर अर्थव्यवस्था
  • तिरुवल्लूर से तूतीकोरिन तक: 13 जिलों की अप्रतिम विरासत
  • भारत की दूसरी सबसे लंबी, 1076 किमी की तटरेखा वाला तमिलनाडु केवल समुद्री व्यापार का क्षेत्र नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक प्रवाह का एक ऐतिहासिक मार्ग है। बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के संगम क्षेत्र में स्थित इस भूभाग पर कुटीर उद्योग धार्मिक और स्थापत्य परंपराओं के संरक्षण में विकसित हुए हैं। गुजरात और केरल की तटीय कारीगरी से भिन्न, तमिलनाडु की तटीय शिल्प परंपराओं में भक्ति और मंदिर वास्तुकला का गहरा प्रभाव परिलक्षित होता है। यहाँ उत्पादन से अधिक सृजन का महत्व है। यहाँ कुटीर उद्योग का जितना विकास होगा, उतना ही यहाँ आर्थिक संबर्धन होगा तटीय सीमा का, और फिर सुरक्षित होगी भारत की यह महत्वपूर्ण सीमा।
  • उत्तरी तटीय जिले (चेन्नई से विल्लुपुरम् तक)
  • यहाँ शहरीकरण और पारंपरिक कला का अद्भुत संगम है। कुटीर उद्योगों को निम्न प्रकार से विश्लेषित कया जा सकता है –
  • कांचीपुरम् (चेन्नई और कांचीपुरम्):
  • रेशम की राजधानी: कांचीपुरम् केवल शहर नहीं, एक ब्रांड है। यहाँ के ‘पट्टू’ (रेशम) की साड़ियाँ विश्व प्रसिद्ध हैं।
  • कारीगर: लगभग 60,000 हथकरघा (Looms) आज भी खटखटाते हैं। यहाँ बुनकर सोने के तारों (Zari) को रेशम में पिरोकर पौराणिक कथाएँ बहुत सुन्दर ढंग से बुनते हैं।
  • व्यवस्था: यहाँ सहकारी समितियाँ (जैसे कामक्षी अम्मन सोसाइटी) बहुत सशक्त हैं।
  • मामल्लपुरम् (चेंगलपट्टू):
  • पत्थर शिल्प (Stone Carving): पल्लव काल की विरासत है यह शिल्प। यहाँ के विश्वकर्मा समुदाय के कारीगर ग्रेनाइट पत्थर को मोम की तरह तराशते हैं। उनकी मूर्तियाँ जापान और यूरोप के मंदिरों और संग्रहालयों में जाती हैं।
  • GI टैग: मामल्लपुरम् पत्थर शिल्प को GI टैग प्राप्त है।
  • ODOP (एक जिला एक उद्योग): इसके अंतर्गत आते हैं – समुद्री उत्पाद और काजू प्रसंस्करण (कुड्डालोर)।
  • कावेरी डेल्टा (तंजावुर, मयिलादुथुरै, नागपट्टिनम्, तिरुवरूर जिले) 
  • यह क्षेत्र तमिलनाडु की सांस्कृतिक आत्मा है। यहाँ का हर गाँव एक विशेष शिल्प के लिए जाना जाता है।
  • तंजावुर गुड़िया (Thanjavur Dancing Dolls):
  • कला: ‘तलैयाटी बोम्मई’ (सिर हिलाने वाली गुड़िया)। यह गुरुत्वाकर्षण के केंद्र (Center of Gravity) के सिद्धांत पर काम करने वाला एक प्राचीन खिलौना है।
  • सामग्री: कागज की लुगदी (Papier-mâché) और प्लास्टर ऑफ पेरिस।
  • कारीगर: सैकड़ों परिवार केवल नवरात्र के ‘गोलू’ (Golu) उत्सव के लिए साल भर गुड़िया बनाते हैं।
  • नाचियार कोविल दीप (Nachiar Koil Lamp):
  • कुंभकोणम् के पास: यहाँ ‘पथर’ (Pather) समुदाय के कारीगर पीतल के विशाल दीप (Kuthuvilakku) बनाते हैं। यह दीप दक्षिण भारत के हर शुभ कार्य की शुरुआत में प्रज्ज्वलित किया जाता है।
  • GI टैग: इसे GI टैग प्राप्त है।
  • स्वामीमलाई कांस्य मूर्तियाँ (Swamimalai Bronze):
  • चोल काल की ‘लॉस्ट वैक्स’ (Lost Wax) तकनीक से आज भी यहाँ विश्व की सबसे बेहतरीन कांस्य नटराज मूर्तियाँ बनाई जाती हैं।
  • दक्षिणी तटीय जिले (रामनाथपुरम् से तूतीकोरिन के क्षेत्र)
  • यह क्षेत्र शुष्क है, लेकिन यहाँ के ताड़ (Palm) और समुद्र से जुड़े अनूठे शिल्प विख्यात हैं।
  • पत्तमादाई चटाई (Pattamadai Mat – तिरुनेलवेली/तूतीकोरिन चटाई):
  • रेशम जैसी घास: यहाँ ‘कोराई’ घास (Sedge grass) से ऐसी चटाई बुनी जाती है जो रेशम जैसी मुलायम होती है। इसे इतना बारीक बुना जाता है कि पूरी चटाई एक छोटी सी डिब्बी में समा सकती है।
  • विश्व प्रसिद्धि: महारानी एलिजाबेथ के राज्याभिषेक में यही चटाई उपहार में दी गई थी।
  • ताड़ के पत्तों का शिल्प (Palm Leaf Craft):
  • रामनाथपुरम्/मनापाड़: यहाँ की महिलाएं ताड़ के पत्तों से टोकरियाँ, पंखे और खिलौने बनाती हैं। मनापाड़ (तूतीकोरिन) में यह कला पुर्तगाली प्रभाव के साथ विकसित हुई है।
  • सीप शिल्प (Seashell Craft):
  • रामेश्वरम्/कन्याकुमारी: समुद्र से मिली सीपियों (Shells) से दर्पण, झूमर और आभूषण बनाने का काम हजारों महिलाओं को रोजगार देता है। यह पूरी तरह पर्यटन आधारित है।
  • ODOP (एक जिला एक उद्योग): इसके अंतर्गत आते हैं –  ताड़ के उत्पाद (Palm Products) और समुद्री उत्पाद।
  • तुलनात्मक सार: गुजरात बनाम तमिलनाडु (तटीय) 
पहलू गुजरात (पश्चिमी सीमा) तमिलनाडु (पूर्वी/दक्षिणी सीमा)
मुख्य प्रेरणा लोक-संस्कृति और खानाबदोश जीवन मंदिर-वास्तुकला और शास्त्रीय परंपरा
सामग्री कपड़ा (कढ़ाई), मिट्टी पत्थर, धातु (कांस्य/पीतल), ताड़
तकनीक सुई-धागा (कढ़ाई) ढलाई (Casting) और छेनी-हथौड़ा
बाजार फैशन और लाइफस्टाइल धार्मिक और आध्यात्मिक (मूर्तियाँ/दीप)
कारीगर की स्थिति व्यक्तिगत हुनर (Individual Skill) वंशानुगत गिल्ड (Hereditary Guilds)
  • तमिलनाडु के तट पर लहरों के शोर के बीच छेनी और हथौड़े की खटखट भी सुनाई देती है। जहाँ गुजरात का शिल्प ‘पहनने’ के लिए है, वहीं तमिलनाडु का शिल्प ‘पूजने’ और ‘सजोने’ के लिए है। रामनाथपुरम् की ताड़ की टोकरी से लेकर स्वामीमलाई की नटराज मूर्ति तक – यह यात्रा ‘प्रकृति से परमात्मा’ तक की यात्रा है, जिसे यहाँ के कारीगर अपने पसीने से पूरा करते हैं। तमिलनाडु की सीमा पर केवल सैनिक नहीं, शिल्पी भी पहरा देते हैं – अपनी संस्कृति को गढ़कर।
गुजरात

गुजरात

गुजरात

  • गुजरात की सीमांत कुटीर अर्थव्यवस्था: समुद्र और मरुभूमि का कारीगर वर्ग
  • (कच्छ से वालसाड़ तक: 17 जिलों की शिल्प विरासत)
  • गुजरात की सीमा केवल पाकिस्तान के साथ नहीं है। यह अरब सागर के साथ टकराती है, जहाँ 17 जिले न केवल राष्ट्र की रक्षा करते हैं, बल्कि विश्व की सबसे समृद्ध कारीगरी परंपराओं को भी संरक्षित करते हैं। मोरबी की मिट्टी, जामनगर का रंगीन बाँधनी, सूरत की बुनाई – ये सब भारत की सांस्कृतिक संपदा के प्रतीक हैं। गाँव में कारीगर ही राष्ट्र की आत्मा होते हैं। गुजरात की सीमांत भूमि पर 60,000 से अधिक कारीगर अपने हाथों से भारत की गरिमा को गढ़ते हैं।
  • कच्छ
  • भौगोलिक और सांस्कृतिक परिचय
  • कच्छ जिला विराट रण की सफेद रेतों में फैला है जहाँ हजारों साल की सभ्यता सोई है। यह भारत की सीमांत कला का सबसे प्रभावशाली केंद्र है। 969 गाँवों में बसे इस जिले की अर्थव्यवस्था कृषि और कारीगरी का समान मिश्रण है। परंतु कच्छ की विशेषता यह है कि यहाँ खानाबदोश समुदाय आदिकाल से निवास करते हैं। सिंध से लाया गया ज्ञान, उत्तर भारत की परंपरा, और कच्छ की अपनी विरासत – इन तीनों का अद्भुत संमिश्रण यहाँ दिखता है।
  • कारीगरी की परंपराएँ: एक अदृश्य अर्थव्यवस्था
  • कच्छ में 20 से अधिक कारीगरी क्षेत्र हैं, जिनमें 60,000 कारीगर – मुख्यतः महिलाएँ – अपनी जीविका कमाती हैं:
  • कच्छी कढ़ाई:
  • शैलियाँ: 40+ भिन्न-भिन्न प्रकार की कढ़ाई
  • विशेषता: दर्पण-कार्य (Mirror work), रंगीन धागे, अनोखे डिज़ाइन
  • मुख्य गाँव: होडका, अंजार, भुज क्षेत्र
  • कारीगर: प्रमुख महिला समूह
  • GI-टैग: प्राप्त (भारतीय भौगोलिक संकेत)
  • अंतर्राष्ट्रीय निर्यात: यूएसए, यूके, फ्रांस, संयुक्त अरब अमीरात
  • उपयोग: परिधान, घर की सजावट, सहायक वस्तुएँ
  • रोगन कला:
  • उद्भव: निरोना गाँव
  • तकनीक: तेल-आधारित रंगों को धातु की सुई से कपड़े पर खींचना
  • परंपरा: दुल्हन की पोशाक को सजाने के लिए ऐतिहासिक
  • कारीगर: विशेषज्ञ पारिवारिक समूह
  • अजरख ब्लॉक प्रिंटिंग:
  • प्राकृतिक रंग: हल्दी, अनार, स्याही, मिट्टी
  • तकनीक: हस्तनिर्मित ब्लॉक से छपाई (चूनामय पद्धति)
  • गाँव: अजरखपुर
  • पारिवारिक परंपरा: पीढ़ियों से चली आ रही
  • बाँनी कढ़ाई:
  • विशेषता: पैच-वर्क, अप्लिकेस, रंगीन सूत
  • गाँव: होडका (होडका के तहत समूह)
  • उपयोग: घरेलू वस्तुएँ, परिधान, आभूषण, त्रिंकेट
  • मिट्टी के बर्तन व मूर्तिकला:
  • गाँव: खावदा (खावदा के कुम्हार)
  • विशेषता: कच्छ की नरम मिट्टी से तैयार, लाल-काली-सफेद रंग से सजावट
  • परंपरा: विशिष्ट डिज़ाइन
  • चाँदी के आभूषण:
  • तकनीक: धातु को ढालना, नक्काशी
  • विशेषता: नाज़ुक कारीगरी
  • अन्य शिल्प:
  • बुनाई (Weaving)
  • लकड़ी की वस्तुएँ
  • कालीन निर्माण
  • प्राकृतिक रेशे के उत्पाद
  • आर्थिक वास्तविकता: आत्मनिर्भरता का संघर्ष
  • कच्छ में 60,000 कारीगरों की औसत वार्षिक आय: 1 लाख से 1.8 लाख रुपये (पारिवारिक स्तर पर)
  • यदि एक पारिवारिक इकाई 1.5 लाख रुपये कमाती है, तो 5 जनों के परिवार की प्रति व्यक्ति मासिक आय – 2,500 रुपये। परंतु यह संख्या छिपाती है एक गहरी चेतना: ये कारीगर सरकारी सहायता के बिना, अपनी कारीगरी से, पीढ़ियों की परंपरा को जीवंत रखते हैं।
  • 2001 की भूकंप विभीषिका: अभी भी जारी – परंतु कच्छ की कथा में एक दर्दनाक अध्याय है। जनवरी 26, 2001 को भारी भूकंप आया। इस आपदा ने हजारों कारीगरों के घर, कार्यशालाएँ, औज़ार, सामग्री सब कुछ नष्ट कर दिया। पशुपालन सम्पदा (जो खानाबदोशों का मुख्य आधार था) पूरी तरह समाप्त हो गई।
  • स्थानीय बाजार टूट गए। कारीगरों को शून्य से शुरुआत करनी पड़ी। 2025 में, 24 साल बाद भी, कच्छ अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुआ है। यह “कच्छी आत्मा” की शक्ति का प्रमाण है कि भूकंप के बावजूद, कारीगर अपनी परंपरा को पुनः जीवंत कर रहे हैं।
  • गुजरात के अन्य सीमांत जिले: विविधता की गाथा
  • मोरबी: मिट्टी का संगीत
  • मोरबी जिले में कठीपा कढ़ाई की परंपरा है। यह एक अनोखी कला है। यहाँ रेशमी धागे से हेरिंगबोन और शृंखला सिलाई की जाती है। किंवदंती कहती है कि यह कला भगवान कृष्ण के समय यहाँ आई थी। मोरबी के कारीगर इस कला को आधुनिक परिधानों, सजावटी वस्तुओं, तोरणों पर लागू कर रहे हैं। यह परंपरा का आधुनिकीकरण है।
  • जामनगर: रंग का राज्य
  • जामनगर का बाँधनी वस्त्र – भारत के सबसे प्रसिद्ध बँधाई डाई का एक केंद्र। यह टाई-डाई तकनीक में विश्व-प्रसिद्ध है। जामनगर और कच्छ मिलकर बाँधनी उत्पादन के मुख्य केंद्र हैं।
  • भावनगर: औद्योगिक विविधता
  • भावनगर जिला एक बहु-आयामी अर्थव्यवस्था का उदाहरण है:​
उद्योग का प्रकार इकाइयाँ रोजगार निवेश (लाख रु.)
कपास-आधारित वस्त्र 2,094 10,506 6,640
तैयार कपड़े व कढ़ाई 76 326 189
लकड़ी/फर्नीचर 507 2,555 632
चमड़ा-आधारित 138 626 429
धातु-आधारित (स्टील) 1,358 6,781 2,728
कृषि-आधारित 386 1,974 1,284
कुल 8,760 49,587 ₹282 करोड़
  • परंतु भावनगर की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है: हीरा काटने-पॉलिशिंग का कार्य
  • इकाइयाँ: 4,340
  • कारीगर: 74,000 अनुमानित
  • वार्षिक उत्पादन: 927,000 कैरेट हीरे पॉलिश किए जाते हैं
  • निवेश: 1,890 लाख रुपये
  • स्थिति: पूरी तरह अमान्य क्षेत्र
  • यह आश्चर्यजनक है कि भारत की हीरा-पॉलिशिंग का एक प्रमुख केंद्र सरकारी रिकॉर्ड में लगभग अदृश्य है।
  • गुजरात की राष्ट्रीय एकल-उत्पाद योजना (ODOP)
  • गुजरात के 33 जिलों में से 17 सीमांत/तटीय जिलों को ODOP के अंतर्गत विशेष उत्पाद सौंपे गए हैं:
जिला ODOP उत्पाद उद्योग प्रकार
अहमदाबाद गेहूँ-आधारित खाद्य प्रसंस्करण
आनंद केला-आधारित खाद्य प्रसंस्करण
भावनगर प्याज़-आधारित खाद्य प्रसंस्करण
भरूच केला-आधारित खाद्य प्रसंस्करण
कच्छ हस्तशिल्प, कढ़ाई, बुनाई हस्तशिल्प (प्राथमिक)
जामनगर बाँधनी, वस्त्र शिल्प हस्तशिल्प
मोरबी सिरेमिक/मिट्टी-आधारित हस्तशिल्प
सूरत (डेटा प्रतीक्षित) वस्त्र
वालसाड़ सपोता-आधारित खाद्य प्रसंस्करण
  • तुलनात्मक विश्लेषण: पंजाब-यूपी-गुजरात
पहलू पंजाब यूपी गुजरात
कुल कारीगर 1,90,000 80-1,00,000 60-1,50,000
मुख्य उद्योग वस्त्र, जूते, बर्तन वन-उत्पाद, खाद्य, शिल्प हस्तशिल्प, वस्त्र, खाद्य
परिवारिक आय ₹1.5-2.5 लाख ₹1.2-1.8 लाख ₹1-1.8 लाख
सीमा का प्रकार भू-सीमा (पाकिस्तान) भू-सीमा (नेपाल) भू + समुद्री
महिला भागीदारी 40% 35-40% 45-50%
GST दर (हाल) 5-12% 5-12% 5% (2023)
निर्यात बाजार एशिया-प्रशांत सीमित यूरोप, यूएसए, यूएई
आपदा प्रभाव विभाजन सीमित 2001 भूकंप (अभी प्रभावशाली)
  • GI-टैग की उपस्थिति:
  • कच्छ कढ़ाई: GI-टैग प्राप्त
  • यह गुणवत्ता प्रमाणीकरण और अंतर्राष्ट्रीय मूल्य बढ़ाता है।
  • समुद्री व्यापार का प्रभाव:
  • गुजरात के बंदरगाह (जामनगर, भावनगर) सीधी अंतर्राष्ट्रीय पहुँच प्रदान करते हैं।
  • सीमांत-विशिष्ट चुनौतियाँ
  • राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव: जब सीमांत समुदाय आर्थिक रूप से कमजोर होते हैं, तो तस्करी, अवैध व्यापार, पाकिस्तान से आयात की अवैध प्रतियों का दबाव बढ़ता है।
  • समाधान और सुझाव
  • तत्काल (अगले 2 वर्ष):
  • डिजिटलीकरण: सभी गाँवों में 4G कनेक्टिविटी
  • ई-कॉमर्स: कारीगरों को अमेजन, फ्लिपकार्ट जैसे प्लेटफॉर्मों से जोड़ना
  • कच्चे माल की सुरक्षा: सरकारी सहायता में प्राकृतिक रंग, धागे की आपूर्ति
  • ऋण सुविधा: 50,000 रु. तक ब्याज-मुक्त, 3 साल के लिए
  • मध्यकालीन (3-10 वर्ष):
  • क्लस्टर विकास: हर जिले में आधुनिक कारीगर संरचनाएँ
  • अंतर्राष्ट्रीय बाजार: यूरोपीय डिज़ाइनरों के साथ सहयोग
  • शिल्प-पर्यटन: कच्छ को “कारीगर पर्यटन” के रूप में विकसित करना
  • दीर्घकालीन (10+ वर्ष):
  • यूनेस्को संरक्षण: कच्छ की 20+ कारीगरी परंपराओं को “मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत” सूचीबद्ध करना
  • सांस्कृतिक विश्वविद्यालय: कच्छ में एक कारीगरी-आधारित विश्वविद्यालय स्थापना
  • निर्यात बैंक: हस्तशिल्प-विशिष्ट निर्यात वित्तपोषण
  • गुजरात की सीमांत अर्थव्यवस्था पंजाब और उत्तर प्रदेश से भिन्न है। यहाँ न तो विभाजन की विरासत है, न ही वन-आधारित जीविका। यहाँ है शुद्ध कारीगरी – हजारों साल की परंपरा। परंतु 2001 के भूकंप ने इस व्यवस्था को गंभीर रूप से झकझोरा है। भूकंप के बाद की पीढ़ी अभी तक पूर्ण आत्मविश्वास नहीं पा सकी है। जलवायु परिवर्तन, समुद्री कटाव, युवा पलायन – ये सब नए संकट हैं। परंतु कच्छी आत्मा की शक्ति देखिए – 24 साल बाद भी, 60,000 कारीगर अपना काम जारी रखे हुए हैं। यह मानवीय सहनशीलता और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है। राष्ट्र को इन कारीगरों को सम्मान, समर्थन, और बाजार देना चाहिए। यह केवल आर्थिक विकास नहीं – यह राष्ट्र धर्म है।
आंध्र प्रदेश

आंध्र प्रदेश

आंध्र प्रदेश

  • भारत के पूर्वी तट पर स्थित आंध्र प्रदेश की 974 किमी लंबी तटरेखा सामरिक दृष्टि से बंगाल की खाड़ी की रक्षा करती है और सांस्कृतिक दृष्टि से एक समृद्ध गलियारे का निर्माण करती है। गुजरात के मरुस्थली कच्छ या केरल की हरित अर्थव्यवस्था से भिन्न, आंध्र प्रदेश की कुटीर अर्थव्यवस्था मिट्टी, लकड़ी और कपास पर आधारित बहु-संसाधन संरचना पर टिकी है। श्रीकाकुलम की खादी और नेल्लोर के रेशम जैसे शिल्प लाखों कारीगरों, विशेषकर बुनकरों के माध्यम से इस क्षेत्र की सांस्कृतिक निरंतरता को बनाए रखते हैं।
  • उत्तर तटीय आंध्र (श्रीकाकुलम, विजयनगरम्  और विशाखापत्तनम् जिलों के क्षेत्र)
  • यह क्षेत्र आदिवासी संस्कृति और परिष्कृत शिल्प का मिश्रण है। इस क्षेत्र के उत्पाद विशिष्ट माने जाते हैं-
  • पोंडुरु खादी (श्रीकाकुलम):
  • विरासत: पोंडुरु गाँव की खादी को महात्मा गांधी ने दुनिया की सबसे महीन खादी कहा था।
  • तकनीक: यहाँ की महिलाएं ‘मछली की हड्डी’ (Fish Jawbone) का उपयोग करके कपास को साफ करती हैं और लाल कपास (Red Cotton) से सूत कातती हैं। यह पूरी तरह हाथ से बनी खादी है, जिसमें एक भी मशीन का प्रयोग नहीं होता है।
  • कारीगर: पट्टूशाली समुदाय के लोग इस लुप्त होती कला के अंतिम संरक्षक हैं।
  • एटिकोप्पका खिलौने (विशाखापत्तनम्):
  • गाँव: एटिकोप्पका वराह नदी के तट पर बसा है।
  • तकनीक: इसे ‘लाख शिल्प’ (Lacquer Craft) कहते हैं। ‘अंकुडी’ लकड़ी को खराद (Lathe) पर घुमाकर उस पर प्राकृतिक लाख के रंग चढ़ाए जाते हैं।
  • विशेषता: ये खिलौने पूरी तरह से बच्चों के लिए सुरक्षित (Non-toxic) होते हैं क्योंकि इनमें कोई रासायनिक रंग नहीं होता।
  • GI टैग: यह कुटीर उद्योग GI टैग प्राप्त है।
  • बोब्बिली वीणा (विजयनगरम्):
  • संगीत और लकड़ी: यह तंजौर वीणा से अलग है। इसे ‘कटहल’ (Jackfruit) की एक ही लकड़ी के टुकड़े से तराशा जाता है। गोलापोल्लु समुदाय के कारीगर इसे बनाते हैं।
  • गोदावरी डेल्टा (पूर्वी और पश्चिमी गोदावरी के क्षेत्र)
  • यह क्षेत्र आंध्र का ‘चावल का कटोरा’ है, और यहाँ की कला में इसकी समृद्धि झलकती है। इस क्षेत्र के उत्पाद अपनी विशिष्टता के लिए ख्यात हैं-
  • उप्पदा जामदानी साड़ी (पूर्वी गोदावरी):
  • रेशम का जादू: उप्पदा गाँव में बनने वाली ये साड़ियाँ इतनी हल्की होती हैं कि इन्हें ‘माचिस की डिब्बी’ में रखा जा सकता है।
  • तकनीक: मूल रूप से बंगाल की जामदानी बुनाई को यहाँ के बुनकरों ने स्थानीय कपास के साथ मिलाकर एक नया रूप दिया है।
  • GI टैग: इस उद्योग को GI टैग प्राप्त है।
  • क्रोशिया लेस वर्क (Narsapur Crochet Lace – पश्चिमी गोदावरी):
  • नरसापुर: आंध्र प्रदेश के नरसापुर को ‘भारत का लेस शहर’ कहते हैं।
  • इतिहास: 19वीं सदी में स्कॉटिश मिशनरियों ने यहाँ की महिलाओं को क्रोशिया (Lace) बनाना सिखाया था। आज लाखों महिलाएं घर बैठे क्रोशिया के मेज़पोश, फ्रॉक और सजावटी सामान बनाती हैं जो यूके और यूएसए निर्यात होते हैं।
  • GI टैग: इस उद्योग को GI टैग प्राप्त है।
  • मध्य तटीय (कृष्णा और गुंटूर क्षेत्र)
  • यह क्षेत्र राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से बहुत सक्रिय है। इस क्षेत्र के उत्पाद विरासत की देन हैं –
  • कोंडापल्ली खिलौने (कृष्णा):
  • लकड़ी: ये खिलौने ‘टेल्ला पोनीकी’ (Tella Poniki) नामक बहुत ही हल्की लकड़ी से बनते हैं।
  • थीम: यहाँ के खिलौनों में ‘दशावतार’, ‘गाँव का जीवन’, और ‘पालकी’ (Palanquin) प्रमुख हैं।
  • कारीगर: राजस्थान से आकर यहाँ बसे आर्य क्षत्रिय समुदाय के लोग इसके मूल रूप से कारीगर हैं। कच्छ के कारीगरों की तरह ही इनका प्रवासी इतिहास है।
  • मछलीपट्टनम कलमकारी (कृष्णा):
  • ब्लॉक प्रिंट: श्रीकालाहस्ती की ‘पेन कलमकारी’ के विपरीत, यहाँ लकड़ी के ब्लॉक से कपड़ों पर प्राकृतिक रंगों (सब्जियों के रंग) से छपाई की जाती है। यह मुगलों और गोलकुंडा सुल्तानों के समय फली-फूली।
  • मंगलगिरी साड़ी (गुंटूर):
  • सादगी: इन सूती साड़ियों की विशेषता है कि इनके शरीर पर कोई बुनाई नहीं होती, केवल बॉर्डर और पल्लू पर ‘निज़ाम डिज़ाइन’ होता है। ये बहुत टिकाऊ होती हैं।
  • दक्षिण तटीय (प्रकाशम् और नेल्लोर क्षेत्र)
  • यहाँ की कला में सूखा क्षेत्र और धार्मिक प्रभाव दिखता है। इस क्षेत्र के उत्पाद राष्ट्र-ख्यात हैं-
  • चिराला बुनाई (प्रकाशम्):
  • तेलिया रुमाल: यहाँ की विशिष्टता है। पहले यह तेल में डूबा हुआ कपड़ा होता था जो व्यापारियों के लिए बनता था। अब यह फैशन का हिस्सा है। 
  • चमड़े की कठपुतलीः
  • निम्मलाकुंटा: यहाँ के कारीगर बकरी की खाल को पारदर्शी बनाकर उस पर रामायण-महाभारत के पात्रों को चित्रित करते हैं। पहले यह केवल शो के लिए था, अब ये लैंपशेड और दीवार की सजावट के लिए बनाते हैं।
  • वेंकटगिरी साड़ी (नेल्लोर):
  • राजसी वस्त्र: नेल्लोर के वेंकटगिरी राजाओं के संरक्षण में यह कारीगरी विकसित हुई। ये ‘जामदानी’ तकनीक वाली बहुत ही बारीक सूती और रेशमी साड़ियाँ हैं। पहले ये केवल राजघरानों के लिए बनती थीं।
  • तुलनात्मक सार: आंध्र प्रदेश बनाम अन्य तटीय राज्य
पहलू आंध्र प्रदेश (तटीय) तमिलनाडु (तटीय) केरल (तटीय)
विशिष्ट सामग्री हल्की लकड़ी (पोनीकी/अंकुडी) और प्राकृतिक रंग पत्थर, पीतल और ताड़ नारियल (Coir) और काजू
खिलौने कोंडापल्ली और एटिकोप्पका (लकड़ी) तंजावुर गुड़िया (मिट्टी/कागज) लकड़ी और कॉयर के खिलौने
वस्त्र खादी (पोंडुरु) और महीन कपास (मंगलगिरी/उप्पदा) भारी रेशम (कांचीपुरम्) सफेद/सुनहरा सूती (कसावु)
विदेशी प्रभाव क्रोशिया लेस (स्कॉटिश प्रभाव) पुर्तगाली प्रभाव (मनापाड़) अरब और डच प्रभाव
कारीगर आधार बुनकर और लकड़ी के शिल्पकार मंदिर शिल्पकार (स्थापत्य) महिला आधारित (कॉयर/काजू)
  • आंध्र प्रदेश की तटीय कुटीर अर्थव्यवस्था ‘रंगों और लकड़ी’ की एक सिम्फनी (Symphony) है। जहाँ केरल में रेशे प्रधान हैं और तमिलनाडु में पत्थर, वहीं आंध्र प्रदेश में ‘लकड़ी और कपड़ा’ बोलते हैं। पोंडुरु की चरखे की गूंज और एटिकोप्पका के रंगों की चमक यह बताती है कि मशीनीकरण के युग में भी मानव-स्पर्श अर्थात् मनुष्य के हस्तशिल्प का कोई विकल्प नहीं है। यह केवल रोजगार नहीं, बल्कि ‘आंध्र की अस्मिता’ का प्रश्न है।
ओडिशा

ओढिशाा

ओडिशा

  • ओडिशा को प्राचीन ग्रंथों में उत्कल कहा गया है। ओडिशा नाम स्वयं ही ‘उत्कृष्ट कला’ की घोषणा करता है। भारत के पूर्वी तट पर विस्तृत 480 किमी की तटरेखा के साथ यह प्रदेश केवल आर्थिक गतिविधियों का क्षेत्र नहीं, अपितु श्रीजगन्नाथ-संस्कृति की कार्यशील अभिव्यक्ति है। गुजरात के शिल्प में जहाँ रंगों की दीप्ति व्याप्त रहती है और केरल में रेशों की कोमलता, वहीं ओडिशा की कला में प्रकृति का सूक्ष्म स्पर्श है। ओडिशा के इन तटीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय जिलों में कुटीर उद्योग में विशेषतः आदिवासी और ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी रहती है। बालासोर के प्रस्तर से लेकर गंजाम की केवड़ा-सुगंध तक लाखों कारीगर प्राकृतिक आपदाओं के बीच भी सांस्कृतिक उत्तराधिकार को सुरक्षित रखे हुए हैं।
  • उत्तरी तटीय जिले (बालासोर और भद्रक जिले)
  • यह क्षेत्र कला और संघर्ष का मिश्रण है, जहाँ पत्थर और घास के कुटीर उद्योगों की प्रमुखता है। इनमें कुछ विशेष रूप से चर्च्य हैं –
  • पत्थर नक्काशी (Stone Carving – बालासोर):
  • सामग्री: यहाँ नीलगिरि क्षेत्र में मिलने वाला नरम पत्थर और काला ग्रेनाइट मुख्य है।
  • कारीगर: सैकड़ों परिवार यहाँ के सोरो और नीलगिरि ब्लॉक में केवल छेनी-हथौड़े से जीवन गढ़ते हैं। उनकी बनाई छोटी मूर्तियाँ और रसोई के सिलबट्टे (Grinding Stones) पूरे पूर्वी भारत में जाते हैं।
  • चुनौती: मशीनी कटाई से कड़ी टक्कर इनकी प्रमुख चुनौती है।
  • भद्रक का कांसा और पीतल (Brass & Bell Metal):
  • यहाँ के ‘कंसारी’ समुदाय के लोग कांसा और पीतल के बर्तन बनाते हैं, जो ओडिशा के हर घर में पूजा और भोजन के लिए अनिवार्य हैं।
  • ODOP (एक जिला एक उत्पाद): समुद्री उत्पाद और चावल (भद्रक का बासमती चावल) ODOP (एक जिला एक उत्पाद) के अंतर्गत सूचीबद्ध हैं।
  • मध्य तटीय (केंद्रपाड़ा और जगतसिंहपुर जिले)
  • यह क्षेत्र बाढ़ और चक्रवातों से जूझता है, फिर भी यहाँ ‘सोना’ उगता है। यहाँ के प्रमुख कुटीर उद्योग राष्ट्रव्यापी ख्याति रखते हैं –
  • गोल्डन ग्रास शिल्प (Golden Grass Craft – केंद्रपाड़ा):
  • कइंचा (Kaincha): यह एक जंगली घास है जो मानसून के बाद नदियों के किनारे उगती है। सूखने पर यह सोने जैसी चमकीली हो जाती है।
  • कारीगर: लगभग 3000 से अधिक महिलाएं (SHGs के माध्यम से) इससे सुंदर टोकरियाँ, डिब्बे, और तश्तरियाँ बनाती हैं।
  • महत्व: यह ‘कचरे से कंचन’ (Wealth from Waste) का उत्तम उदाहरण है। यह पूरी तरह इको-फ्रेंडली है और प्लास्टिक का विकल्प है।
  • टेराकोटा (Terracotta):
  • जगतसिंहपुर और केंद्रपाड़ा के कुम्हार मिट्टी के खिलौने और छत की खपरैल (Tiles) बनाने में माहिर हैं।
  • पुरी: कला का श्रीक्षेत्र
  • पुरी केवल भगवान जगन्नाथ का धाम नहीं, बल्कि ओडिशा की शिल्प राजधानी है। यहाँ के कुछ विशेष कुटीर उत्पाद ख्यातिलब्ध हैं –
  • रघुराजपुर का पट्टचित्र:
  • विरासत: रघुराजपुर गाँव भारत का पहला ‘हेरिटेज क्राफ्ट विलेज’ है। यहाँ का हर घर एक स्टूडियो है।
  • तकनीक: कपड़े (पट्ट) पर प्राकृतिक रंगों से (शंख की सफेदी, काजल की कालिख से) भगवान की लीलाएँ उकेरी जाती हैं।
  • ताड़-पत्र नक्काशी (Palm Leaf Engraving): लोहे की कलम से ताड़ के सूखे पत्तों पर सूक्ष्म चित्रकारी करना यहाँ की विशिष्टता है।
  • पिपली एप्लिक वर्क (Pipli Applique):
  • रंगों का उत्सव: पुरी जाने वाले रास्ते पर पिपली गाँव पड़ता है। यहाँ कपड़े के टुकड़ों को जोड़कर (Applique) भगवान जगन्नाथ के रथ के लिए चंदोवा (Canopy), छाते और लैंपशेड बनाए जाते हैं।
  • GI टैग: इसे GI टैग प्राप्त है।
  • सीप शिल्प (Seashell):
  • पुरी के समुद्र तट पर महिलाएँ सीपियों से सजावटी सामान बनाती हैं।
  • दक्षिणी तटीय (गंजाम)
  • गंजाम ओडिशा का सबसे दक्षिणी जिला है, जिसकी सीमा आंध्र प्रदेश से लगती है। यहाँ के कुछ कुटीर उत्पाद चर्चा में बने रहते हैं –
  • केवड़ा उद्योग (Kewda Industry):
  • सुगंध: गंजाम (विशेषकर छत्रपुर क्षेत्र) दुनिया के 85-90% केवड़ा (Screw Pine) इत्र का उत्पादन करता है।
  • कुटीर भट्ठियाँ: हजारों किसान खेतों के किनारे केवड़ा उगाते हैं और छोटी भट्ठियों (Deg-Bhapka) में उसका अर्क निकालते हैं। यह पूरी तरह स्वदेशी तकनीक है।
  • GI टैग: ‘गंजाम केवड़ा रूह’ को जीआई टैग मिला है।
  • सींग शिल्प (Horn Craft – पारलाखेमुंडी):
  • विशिष्टता: गाय और भैंस के सींगों (Horns) को पॉलिश करके उनसे पक्षी, जानवर और कंघियाँ बनाई जाती हैं। यह कला पारलाखेमुंडी (गंजाम के पास) में प्रसिद्ध है।
  • ODOP (एक जिला एक उत्पाद): काजू और केवड़ा उत्पाद ODOP (एक जिला एक उत्पाद) के अंतर्गत सूचीबद्ध हैं।
  • तुलनात्मक सार: ओडिशा बनाम अन्य तटीय राज्य
पहलू ओडिशा (तटीय) आंध्र प्रदेश (तटीय) तमिलनाडु (तटीय)
मुख्य कच्चा माल जंगली घास (Golden Grass) और केवड़ा कपास और लकड़ी पत्थर और धातु
चित्रकला पट्टचित्र (कपड़े/ताड़ पर) कलमकारी (कपड़े पर) तंजावुर पेंटिंग (सोने/रत्न के साथ)
मंदिर का प्रभाव जगन्नाथ संस्कृति (रथ/चंदोवा) तिरुपति/वास्तुकला प्रभाव चोल/पल्लव वास्तुकला
सुगंध उद्योग केवड़ा (गंजाम जिला) – विश्व एकाधिकार चंदन (सीमित) चमेली/फूल (मदुरै)
कारीगर मॉडल हेरिटेज विलेज (रघुराजपुर) क्लस्टर आधारित (एटिकोप्पका) गिल्ड आधारित (कांस्य)

 

  • ओडिशा की तटीय कुटीर अर्थव्यवस्था भक्ति और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग का सजीव उदाहरण है। रघुराजपुर की पट्टचित्र परंपरा रंगों के माध्यम से सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रखती है, जबकि गंजाम की केवड़ा परंपरा सुगंध के माध्यम से इस चेतना को विस्तार देती है। पिपली के चंदोवे और केंद्रापड़ा की स्वर्णघास शिल्प यह प्रमाणित करते हैं कि उत्कल का कारीगर सीमित साधनों में भी सौंदर्य सृजन की उच्च परंपरा निभाता है। यह शिल्प केवल आर्थिक क्रिया नहीं, बल्कि श्रीजगन्नाथ-केंद्रित सांस्कृतिक सेवा और उत्कल अस्मिता की निरंतर अभिव्यक्ति है।
पंजाब

पंजाब

पंजाब

भौगोलिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य

  • पंजाब की पाकिस्तान सीमा भारत की सबसे प्राचीन और सबसे विभाजित सीमा है। यहाँ, विभाजन की छाया से भी अधिक, पुनः-निर्माण की आशा का आलोक दिखता है। अमृतसर, गुरदासपुर, तरनतारन, पटियाला, लुधियाना, जालंधर, फिरोजपुर, होशियारपुर – ये आठ जिले न केवल सीमांत हैं, बल्कि भारतीय सामर्थ्य के प्रतीक हैं। यहाँ के कुटीर उद्योग पारंपरिक कौशल का जीवंत वाहक हैं, जहाँ प्रत्येक परिवार अपने हाथों से भारत की समृद्धि को गढ़ता है।
  • उद्योगों की विविधता: एक अदृश्य अर्थव्यवस्था
  • पंजाब के सीमांत क्षेत्रों में 11 से अधिक प्रमुख कुटीर उद्योग संचालित हैं, जिनमें 1,90,000 से अधिक लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से संलग्न हैं। यह संख्या कुछ भारतीय राज्यों की औद्योगिक कार्यबल के बराबर है। ये उद्योग हैं:
  • फुलकारी कढ़ाई उद्योग भारतीय सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण
  • स्थान: अमृतसर, पटियाला, कारीगर: 20,000 (मुख्यतः महिलाएँ), GI-टैग प्राप्त पारंपरिक शिल्प, प्रत्येक कढ़ाई 50-100 घंटों की मेहनत का परिणाम
  • ऊनी शॉल और स्टोल निर्माण शीतकालीन आजीविका
  • श्रमिक: 25,000, बाजार: राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय, प्रभाव: उपहार, विवाह परिधान, निर्यात
  • महिलाओं के सूती कुर्ते लैंगिक सशक्तीकरण का मॉडल
  • श्रमिक: 20,000+ (सभी महिलाएँ), लुधियाना, पटियाला के पारिवारिक सिलाई यूनिट्स
  • पंजाबी चमड़े के जूते परंपरा का आधुनिकीकरण
  • श्रमिक: 15,000, स्थान: पटियाला, अमृतसर, फाजिल्का, विशेष: विवाह परिधान, डिजाइनर संग्रह
  • हस्तनिर्मित लकड़ी के उत्पाद सरलता में सौंदर्य
  • कारीगर: 8,000 (होशियारपुर, पटियाला), विशेषता: विरासत गृह सजावट, विलास फर्नीचर
  • लकड़ी के लाख के खिलौने बाल-केंद्रित शिल्प
  • कारीगर: 3,000 (अमृतसर, मुख्यतः महिलाएँ), पारंपरिक पद्धति, कोई रासायनिक उपचार नहीं
  • स्टेनलेस स्टील के रसोई बर्तन आधुनिक उद्योग
  • कामगार: 25,000+ (जालंधर, लुधियाना), निर्यात: एशिया-प्रशांत बाजार
  • अचार और संरक्षित खाद्य स्वास्थ्य उद्योग, उद्यमी: 10,000 (गुरदासपुर, होशियारपुर),
  • महिला स्व सहायता समूह: 85% से अधिक
  • शहद और शहद उत्पाद प्रकृति की देन
  • मधुमक्खी पालक: 15,000+ (होशियारपुर, पठानकोट), उत्पादन: 500-800 किलोग्राम प्रति परिवार वार्षिक
  • सूखे मेवे प्रसंस्करण कृषि-वाणिज्य संयोजन
  • कार्यबल: 8,000
  • पापड़ और वड़ी दैनिक भोजन की परंपरा
  • निर्माता: 6,000+ (मुख्यतः महिला समूह)
  • डेयरी-आधारित मिठाई सांस्कृतिक पहचान
  • कर्मचारी: 10,000+ (लुधियाना, अमृतसर)
  • आर्थिक वास्तविकता: संघर्ष की गाथा
  • औसत वार्षिक आय: 1.5 लाख से 2.5 लाख रुपये (पारिवारिक औसत)। यह संख्या प्रथम दृष्टि में सकारात्मक लगती है, किंतु संदर्भ में देखने से सत्य उजागर होता है:
  • संलग्न जनसंख्या: ग्रामीण परिवारों का 25%, महिलाओं की भागीदारी: 40%, युवा स्वरोजगारी: 20%, ऋण का भार: 30% परिवारों पर सूदखोरों का कर्ज
  • आय विश्लेषण:
  • यदि एक पारिवारिक यूनिट 2.5 लाख रुपये वार्षिक कमाती है, तो 5 जनों के परिवार की प्रति व्यक्ति आय = 50,000 रुपये वार्षिक = 4,167 रुपये मासिक। यह महानगरीय गरीबी रेखा से नीचे है। किंतु ये संख्याएँ आत्मनिर्भरता की दास्तान कहती हैं – सरकारी सहायता के बिना, ये परिवार स्वयं को पोषित करते हैं।
  • सरकारी सहायता: अपर्याप्त और असंगठित
  • मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना (CSRY): 25,000 रुपये लोन अनुदान (प्रति परिवार), कवरेज: 40-50% पात्र परिवार
  • प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP):
  • सस्ती ऋण सुविधा
  • जटिल आवेदन प्रक्रिया – बहुत से कारीगर आवेदन ही नहीं कर पाते, GST सुधार (हाल ही में):
  • कर दर 12% से 5% में कमी (कुछ वर्गों के लिए), परिणाम: 15-20% का मूल्य ह्रास, किंतु माँग में कोई वृद्धि नहीं
  •  सीमांत-विशिष्ट चुनौतियाँ: बहुआयामी संकट
  • तत्काल चुनौती (अगले 2-3 वर्ष):
  • पाकिस्तान से तस्करी
  • हस्तनिर्मित कपड़े, जूते, बर्तनों की सस्ती प्रतियाँ, प्रभाव: स्थानीय विक्रय में 30-40% गिरावट,
  • दुःखद तथ्य: भारतीय कारीगर की मूल कृति = 2,000-5,000 रुपये; तस्करी वाली नकल = 500-1,000 रुपये
  • विद्युत की अनिश्चितता
  • अमृतसर, गुरदासपुर, फिरोजपुर: 6-8 घंटे की दैनिक कटौती, बुनाई, सिलाई जैसे यांत्रिक कार्य: विद्युत पर निर्भर, परिणाम: उत्पादन में 40% की गिरावट।
  • डिजिटलीकरण का अभाव
  • पंजाब के सीमांत क्षेत्रों में 35% घरों तक इंटरनेट नहीं, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म तक पहुँच: 10% से कम, ऑनलाइन मार्केटिंग ज्ञान: लगभग शून्य, परिणाम: निर्यात अवसर व्यर्थ हो रहे हैं।
  • सीमा पार कच्चे माल की अनिश्चितता
  • ऊन, रंग, चमड़ा – कई कुटीर पाकिस्तान से आयातित कच्चे माल पर निर्भर, सीमा पर देरी = उत्पादन में व्यवधान, मूल्य में उतार-चढ़ाव: 20-30% तक महीने-दर-महीने, मध्यकालीन संकट (3-10 वर्ष):
  • युवा पलायन: भारी सांस्कृतिक क्षरण
  • गुरदासपुर, होशियारपुर जैसे पिछड़े जिलों से युवाओं का शहरी पलायन, परिणाम:
  • कौशल का हस्तांतरण नहीं हो रहा है, परिवार-आधारित यूनिट्स बंद हो रही हैं, पारंपरिक शिल्प विलीन हो रहे हैं, उदाहरण: होशियारपुर की लकड़ी की नकार (wood carving) परंपरा,
  • 1970: 50,000 कारीगर, 2000: 15,000 कारीगर, 2025: 3,000 कारीगर (अधिकांश 60+ वर्ष के)
  • बाजार का एकाधिकार
  • बड़ी कंपनियाँ (जालंधर स्टील, लुधियाना बर्तन निर्माता) कुटीर उद्योगों को दूर कर रही हैं। कीमत प्रतियोगिता में कुटीर खिलाड़ी हार रहे हैं।
  • सीमांत समाज का विस्थापन
  • यदि यह प्रवृत्ति जारी रहीं, तो 2035 तक पंजाब के सीमांत जिलों की जनसंख्या में 15-20% की गिरावट हो सकती है। शहरी झुग्गियों में गरीब रह रहे हैं। सीमांत क्षेत्रों में जनसंख्या का रिक्ति हो रही है।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव
  • जब सीमांत समुदाय आर्थिक रूप से कमजोर होता है, तो सीमा पार तस्करी में सहयोग करने लगता है। तब अवैध प्रवेश को नजरअंदाज करना सुरक्षा बोध की कमी बन जाती है।
अरुणाचल प्रदेश

अरुणाचल प्रदेश

  • भारत के प्राची-द्वार पर अवस्थित और उषा की प्रथम किरणों से अभिषिक्त भूमि अरुणाचल प्रदेश भूटान, तिब्बत (चीन) और म्यांमार की सीमाओं पर राष्ट्र-चेतना का सजग प्रहरी बनकर स्थित है। यहाँ से सूर्य ही नहीं, राष्ट्र-चेतना भी उदित होती है। यह प्रदेश न मरुस्थल की रूक्षता है, न समुद्र की चंचलता, यह पर्वत, वन और जनजातीय जीवन की त्रिवेणी है। यहाँ के छब्बीस प्रमुख जनजातीय समुदाय अपनी कला, वेश और जीवन-रीति के माध्यम से न केवल अपनी अस्मिता की रक्षा करते हैं, अपितु सीमाओं पर भारत की सांस्कृतिक प्राचीर बनकर अखंड खड़े हैं। यहाँ की जनजातियाँ अपनी कलाओं में केवल यहाँ की कुटीर अर्थव्यवस्था पर्वतों की कठोरता, वनों की उदारता और जनजातीय श्रम की साधना से आकार लेती है। वे अपनी कला में केवल परंपरा नहीं, राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व भी रचती हैं। सौंदर्य नहीं, स्वाधीन अस्मिता का संस्कार रचती हैं। इसलिए यहाँ संस्कृति स्वयं सीमा की रक्षा का व्रत धारण कर लेती है।
  • पश्चिमी सीमा (भूटान और तिब्बत से सटे): तवांग और पश्चिमी कामेंग जिले
  • यह क्षेत्र बौद्ध धर्म और मोनपा संस्कृति का केंद्र है। यहाँ के कुटीर उद्योग कुछ मायने में विशिष्ट होते हैं –
  • थांगका पेंटिंग (Thangka Painting – तवांग):
  • आध्यात्मिक कला: यह बौद्ध धर्म के देवी-देवताओं और मंडाला का चित्रण होता है, जो कपास या रेशम के कपड़े पर किया जाता है।
  • सामग्री: इसमें सोने की धूल (Gold Dust) और पत्थर के प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता है।
  • महत्व: यह केवल सजावट नहीं, ध्यान (Meditation) का एक माध्यम है।
  • लकड़ी की नक्काशी (Wood Carving – प. कामेंग):
  • मोनपा कारीगर लकड़ी से ‘चो-त्ज़े’ (Cho-tze) नामक छोटी मेज़ और लकड़ी के कप (Dong) बनाते हैं, जो स्थानीय शराब पीने के काम आते हैं।
  • हस्तनिर्मित कागज (Monpa Handmade Paper):
  • पुनर्जीवन: ‘शुगु शेंग’ (Shugu Sheng) पेड़ की छाल से बनने वाला यह एक हजार साल पुराना कागज अब फिर से जीवित हो रहा है। इसका उपयोग बौद्ध धर्मग्रंथ लिखने में होता है।
  • उत्तरी सीमा (तिब्बत/चीन से सटे): कुरुंग कुमे, सुबनसिरी, सियांग, दिबांग घाटी जिलों के क्षेत्र
  • यह दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र है जहाँ आदि और निशी जनजातियाँ रहती हैं। उनके पारंपरिक और क्षेत्र विशिष्ट सामग्रियाँ मनमोहक और उफयोगी होती हैं –
  • बेंत और बांस शिल्प (Cane & Bamboo – ऊपरी सुबनसिरी/सियांग):
  • अरुणाचल के लोग कहते हैं –  “बांस हमारे साथ पैदा होता है और हमारे साथ ही मरता है।”
  • उत्पाद: आदि जनजाति के लोग बांस से ‘हेलमेट’ बनाते हैं जो इतना मजबूत होता है कि भालू के वार को भी झेल ले। इसके अलावा मछली पकड़ने के जाल और पुल भी बांस से बनते हैं।
  • ऊन बुनाई (ऊपरी सियांग जिल):
  • मेम्बा और खंबा जनजातियाँ याक और भेड़ के ऊन से गर्म कालीन और जैकेट बनाती हैं।
  • पूर्वी और दक्षिणी सीमा (म्यामार से सटे): लोहित, अंजॉ, चांगलांग, तिराप जिलों के क्षेत्र
  • यह क्षेत्र ‘गोल्डन पैगोडा’ और नागा संस्कृति का प्रभाव क्षेत्र है। इनकी कुटीर कृतियाँ द्रष्ट्व्य हैं –
  • वांचो लकड़ी नक्काशी (तिराप/लोंगडिंग):
  • भयानक सौंदर्य: वांचो जनजाति जो पहले हेडहंटर्स थे। इस समुदाय के लोग लकड़ी पर मानव सिर और योद्धाओं की आकृतियाँ उकेरते हैं। यह कला उनकी पुरानी युद्ध-परंपरा की याद दिलाती है।
  • मोतियों का काम (Bead Work – चांगलांग/तिराप क्षेत्र):
  • यहाँ की महिलाएं कांच और पत्थर के रंगीन मोतियों से ‘गले का हार’ और आभूषण बनाती हैं। हर डिज़ाइन का एक सामाजिक महत्व होता है।
  • टेक्सटाइल (Mishmi Textiles – अंजॉ/लोहित क्षेत्र):
  • मिश्मी जनजाति की बुनाई में ज्यामितीय पैटर्न होते हैं। वे कपास के साथ-साथ पौधों के रेशों (जैसे बिच्छू घास) का भी उपयोग करते हैं।
  • जीरो घाटी (निचला सुबनसिरी – सीमा के पास)
  • अपातानी बुनाई (Apatani Weave):
  • जिग-जैग: अपातानी समुदाय अपने कपड़ों में अनोखे जिग-जैग पैटर्न के लिए जाना जाता है। इसे अब GI टैग भी मिल चुका है।
  • प्राकृतिक रंग: ये लोग अभी भी मंजिष्ठा और हल्दी जैसे प्राकृतिक रंगों का उपयोग करते हैं।
  • तुलनात्मक सार: अरुणाचल बनाम अन्य सीमांत राज्य
पहलू अरुणाचल प्रदेश (सीमांत) गुजरात (सीमांत) केरल (तटीय)
मुख्य कच्चा माल बांस, बेंत, याक ऊन, लकड़ी कपास, मिट्टी, चमड़ा नारियल (Coir), काजू
प्रकृति जनजातीय और आत्मनिर्भर (Tribal & Self-reliant) व्यावसायिक और व्यापारिक सहकारी और संगठित
रंग प्राकृतिक (Vegetable Dyes) भड़कीले और चमकदार सफेद और सुनहरा
चुनौती दुर्गम भूगोल और बाजार तक पहुँच पानी की कमी श्रम लागत
विशिष्टता युद्ध कला (बांस के हेलमेट) सजावटी कला (कढ़ाई) उपयोगिता कला (रस्सियाँ)

 

  • अरुणाचल प्रदेश की सीमांत कुटीर अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भरता का वह शुद्धतम रूप है, जहाँ उत्पादन बाज़ार के लिए नहीं, जीवन के निर्वाह और संस्कृति के संरक्षण के लिए होता है। यह भूमि उपभोग नहीं, साधना की परंपरा से परिचालित है। तवांग का पवित्र हस्तनिर्मित काग़ज़ और तिराप की मोतियों की माला यह प्रमाणित करते हैं कि विपरीततम परिस्थितियों में भी मनुष्य सौंदर्य की साधना का त्याग नहीं करता। यहाँ के कारीगर केवल शिल्प नहीं रचते, वे तिब्बत (चीन) और म्यांमार की सीमाओं पर भारत की सांस्कृतिक संप्रभुता का मौन, किंतु दृढ़ प्रहरी बनकर खड़े रहते हैं। इन सीमांत अंचलों में कारीगर सौंदर्य रचते हुए भी राष्ट्र की सांस्कृतिक मर्यादा की रक्षा करते हैं – बिना शोर, बिना घोषणा, केवल साधना के बल पर। ये कारीगर केवल वस्तुएँ नहीं बनाते हैं, वे चीन और म्यांमार की सीमाओं पर भारत की सांस्कृतिक संप्रभुता की रक्षा में मौन सैनिक की भूमिका निभाते हैं।

 

पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल

  • पश्चिम बंगाल की अंतर्राष्ट्रीय सीमा बांग्लादेश से 2216.7 किमी के सीमा-विस्तार के साथ भौगोलिक संपर्क में है। गंगा–ब्रह्मपुत्र के उपजाऊ मैदानों, डेल्टा प्रदेश और विस्तृत मैंग्रोव वनों से जुड़ा एक व्यापक पर्यावरणीय तथा सांस्कृतिक क्षेत्र कई मायनों में अनूठा और अखण्ड है। भारत की यह सीमा कृषि, मत्स्य और कुटीर उद्योग की सुदृढ़ आधारशिला है। इसी भू-सांस्कृतिक विस्तार में पूर्व मेदिनीपुर की समुद्र-स्पर्शी तटरेखा और दक्षिण 24 परगना का सुंदरबन डेल्टा बंगाल की समुद्री चेतना और जीवन-निर्वाह परंपराओं को आकार देते हैं, जहाँ मत्स्यजीवन, नौकायन और नमक-निर्माण जैसे व्यवसाय कुटीर अर्थव्यवस्था से गहरे जुड़े हुए हैं। यहाँ की कुटीर अर्थव्यवस्था ‘माटी, मैंग्रोव और मलमल’ के त्रिविध संसाधनों पर आधारित है। गुजरात के मरुस्थलीय शिल्प और ओडिशा के पत्थर-केंद्रित शिल्प से भिन्न, बंगाल की कारीगरी में रेशे, बुनाई और वस्त्र-संस्कृति का प्रधान स्थान है। इसमें तटीय अंचलों की आर्द्र जलवायु और नदी-डेल्टा की उर्वरता प्रत्यक्ष रूप से प्रतिबिंबित होती है। विभाजन के ऐतिहासिक आघात के बाद भी यह शिल्प-परंपरा, लोककला और वस्त्र-संस्कृति के माध्यम से, दोनों बंगालों के बीच सांस्कृतिक निरंतरता और आत्मीयता को जीवित रखे हुए है।
  • उत्तरी बंगाल (जलपाइगुड़ी, कूचबिहार, उत्तर/दक्षिण दिनाजपुर जिले)
  • यह क्षेत्र चाय बागानों और राजवंशी संस्कृति का गढ़ है। इनमें कुछ विशेष रूप से चर्च्य हैं –
  • शीतल पाटी (Sital Pati – कूचबिहार):
  • सामग्री: शीतल पाटी ‘मुर्ता’ (Murta) नामक पौधे की छाल से बनती है।
  • तकनीक: इसे इतनी बारीकी से बुना जाता है कि यह रेशम जैसी मुलायम और ठंडी होती है। गर्मियों में इस पर सोने से शरीर को ठंडक मिलती है।
  • कला: ‘नक्षी पाटी’ (Nakshi Pati) में बुनकर लाल रंग के रेशों से ज्यामितीय डिजाइन और पक्षियों के चित्र बनाते हैं।
  • UNESCO मान्यता: इसे ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ का दर्जा प्राप्त है।
  • बांस और बेंत शिल्प (Bamboo Craft – जलपाइगुड़ी):
  • यहाँ के आदिवासी और राजवंशी समुदाय बांस से ‘पोलो’ (मछली पकड़ने का जाल), ‘कुला’ (सूप) और फर्नीचर बनाते हैं। उत्तर बंगाल का बांस शिल्प अपनी मजबूती के लिए जाना जाता है।
  • मध्य बंगाल (मालदा, मुर्शिदाबाद, नादिया जिलों के क्षेत्र)
  • यह ऐतिहासिक बंगाल का हृदय है। यहाँ नवाबों और औपनिवेशिक काल की छाप अभी भी है। यहाँ के कुछ कुटीर उत्पाद चर्चा में बने रहते हैं –
  • मालदा का रेशम और आम (Malda):
  • रेशम: मालदा के सुजापुर और कालियाचक में रेशम कीट पालन (Sericulture) एक बड़ा कुटीर उद्योग है। यहाँ का कच्चा रेशम (Raw Silk) मुर्शिदाबाद और बांकुरा भेजा जाता है।
  • खाद्य प्रसंस्करण: ‘फजली’ और ‘हिमसागर’ आम से अचार और आम पापड़ (Amsotto) बनाना यहाँ की महिलाओं का मुख्य गृहोद्योग है।
  • मलमल और जामदानी (Muslin & Jamdani – मुर्शिदाबाद/नादिया):
  • पुनर्जीवन: मुर्शिदाबाद कभी दुनिया की ‘मलमल राजधानी’ था। आज भी यहाँ के बुनकर 200-500 काउंट की खादी मलमल बनाते हैं जो हवा जैसी हल्की होती है।
  • नादिया: यहाँ के शांतिपुर और फुलिया में विभाजन के बाद ढाका से आए बुनकरों ने ‘तांत’  और ‘जामदानी’ साड़ियों को नया जीवन दिया।
  • दक्षिणी सीमांत (उत्तर और दक्षिण 24 परगनाजिलों के क्षेत्र )
  • यह क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े डेल्टा (सुंदरबन) का हिस्सा है। यहाँ के कुछ कुटीर उत्पाद द्रष्टव्य हैं –
  • सुंदरबन शहद (दक्षिण 24 परगना):
  • मौली समुदाय: यहाँ के शहद संग्रहकर्ता ‘मौली’ समुदाय को लोग चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में जंगलों से शहद संग्रहकर लाते हैं।
  • सहकारिता: अब वन विभाग, सहकारी समितियाँ और स्थानीय स्वयं सहायता समूह (SHG) मिलकर सुंदरबन के प्राकृतिक मधु को ‘बोनफूल’ (Bonphool) जैसे ब्रांड के तहत बेचते हैं। यह मधु पारंपरिक मधु-संग्रहकर्ताओं (maulis) के द्वारा टिकाऊ तरीके से सुंदरबन के मैंग्रोव जंगलों से संग्रहित किया जाता है, जिससे जैव विविधता और जंगल-आधारित जीवन दोनों की सुरक्षा होती है। इस प्रकार के सहयोग से मधु-संग्रह कठिनाइयों को पार करते हुए अब यह राज्य की कुटीर अर्थव्यवस्था और स्थानीय आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है।
  • खूनी शहद सुंदरबन जैसे मैंग्रोव वनों में बहुत जोखिम उठाकर इकट्ठा किया जाता है। इसलिए ऐसा शहद जो जंगल से संग्रह किया गया उसे खूनी शहद कहा जाता है। मधु-संग्रह के दौरान संग्रहकर्ताओं (मौली समाज) को मगरमच्छ, ज़हरीले साँपों, ज्वार-भाटा और दलदली भूभाग से प्रोणों का संकट बना रहता है।
  • GI टैग: सुंदरबन शहद को हाल ही में GI टैग मिला है।
  • जूट शिल्प (Jute Craft – उ. 24 परगना):
  • भारत का जूट केंद्र। बैरकपुर और बशीरहाट की महिलाएं जूट से फैशनेबल बैग, गहने और सजावटी गुड़िया बनाती हैं। प्लास्टिक बैन के बाद इसकी मांग तेजी से बढ़ी है।
  • पूर्व मेदिनीपुर जिला(तटीय सीमा)
  • यह जिला ओडिशा की सीमा और समुद्र तट से लगा है। यहाँ के प्रमुख कुटीर उद्योग राष्ट्रव्यापी ख्याति रखते हैं –
  • मादुर काठी (चटाई बुनाई):
  • विरासत: सबंग और पंसकुड़ा के गाँवों में ‘मादुर काठी’ (एक प्रकार की नरकुल घास) से चटाइयां बुनी जाती हैं।
  • मसलंद (Masland): यह मादुर की सबसे उच्च कोटि की चटाई है। इसमें रेशम के धागे मिलाकर बारीक बुनाई की जाती है। बंगाल के हर घर में मेहमान का स्वागत इसी चटाई पर होता है।
  • GI टैग: इसे GI टैग प्राप्त है।
  • समुद्री सीप शिल्प (Seashell Craft – दीघा/मंदारमणि):
  • पर्यटन स्थलों पर स्थानीय महिलाएं सीपियों से जेवर और सजावटी सामान बनाती हैं।
  • तुलनात्मक सार: बंगाल बनाम अन्य सीमांत राज्य
पहलू पश्चिम बंगाल (सीमांत) गुजरात (सीमांत) ओडिशा (सीमांत)
मुख्य सामग्री जूट, बांस, मलमल, मुर्ता कपास, ऊन, मिट्टी पत्थर, धातु, घास
जलवायु का प्रभाव आर्द्र और नदीय शुष्क और मरुस्थलीय तटीय और चक्रवात प्रभावित
बुनाई शैली बहुत महीन रंगीन और भारी इकत और पट्टचित्र
विशिष्ट उत्पाद शीतल पाटी रजाई/शॉल पत्थर की मूर्तियाँ
कारीगर की स्थिति शरणार्थी इतिहास का प्रभाव खानाबदोश परंपरा मंदिर आश्रित परंपरा

 

  • पश्चिम बंगाल की सीमांत कुटीर अर्थव्यवस्था नदियों की गतिशीलता और प्राकृतिक रेशों के उपयोग पर आधारित एक सांस्कृतिक परंपरा है। यहाँ के कारीगर बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं और वन्य जीवों के खतरे के बीच भी अपनी सृजनशीलता को बनाए रखते हैं। कूचबिहार की शीतलपाटी और सुंदरबन का प्राकृतिक मधु इस क्षेत्र की आजीविका और परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह परंपरा दर्शाती है कि बंगाल की सांस्कृतिक समृद्धि केवल शहरी बाज़ारों में नहीं, बल्कि सीमांत ग्रामीण समाज में भी गहराई से विद्यमान है।