
जम्मू-कश्मीर
भौगोलिक विडंबना – जम्मू-कश्मीर की विडंबना यह है कि यह क्षेत्र न केवल एक सीमांत क्षेत्र है, बल्कि दो सीमांतों की सीमा है – पश्चिम-मध्य पाकिस्तान (कश्मीर घाटी, कारगिल) की सीमा और पूर्व-उत्तर तिब्बत-चीन (लद्दाख, LAC) की सीमा। इस प्रदेश की विशेष सीमा-सुरक्षा और सीमा-जन संवर्धन आवश्यक है।
- प्रमुख कुटीर उद्योग
- कश्मीरी पश्मीना शॉल – एक सांस्कृतिक संकट
- “पश्मीना” शब्द का मतलब केवल एक शॉल नहीं है। यह कश्मीर की पहचान, उसका गौरव, और उसकी सभ्यता है।
- वास्तविकता:
- कच्चा माल: चांगथांगी बकरी की ऊन (चांगथांग पठार, 4,000 मीटर पर)
- निर्माण समय: एक शॉल = 6-12 महीने
- विशेषज्ञता: 50+ चरणों की बुनाई प्रक्रिया
- कीमत: 50,000 से 1,00,000+ रुपये (सच्ची शॉल)
- आर्थिक वास्तविकता:
- कारीगर: 3.40 लाख हस्तकार (UT में कुल)
- महिलाओं की भागीदारी: 60%
- औसत आय: 1.5-2.2 लाख रुपये (वार्षिक)
- किंतु बुजुर्ग कारीगरों की पीढ़ी से युवा इस कला को नहीं सीख रहे हैं। एक 65 वर्षीय शॉल निर्माता कश्मीरी ने कहा: “मेरे बेटे ने 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी और कुछ और करने लगा। इस कला को कौन सीखेगा? मैं जो 50 साल से करता आ रहा हूँ, वह हमारे साथ ही खत्म हो जाएगा।”
- कश्मीरी कालीन – विरासत का विलोपन
- सिल्क-ऊन के पारंपरिक कालीन
- निर्यात: यूरोप, अमेरिका
- किंतु नकली कालीनों की तस्करी से बाजार खराब हो गया
- जेली-जैम उद्योग – अल्पाइन कृषि की फसल
- मुख्य फल: एप्रिकॉट, बेर, खुबानी
- महिला-केंद्रित उद्योग
- प्रति परिवार वार्षिक आय: 50,000-1,00,000 रुपये
- सूखे मेवे और मसाले
- बादाम, अखरोट, केसर (कारगिल क्षेत्र की विशेषता)
- प्रसंस्करण समूह: 10,000+
- चुनौतियाँ: डबल-फ्रंट संकट
- पाकिस्तान सीमांत की समस्याएँ:
- नकली शॉल तस्करी
- पाकिस्तान से नकली/अर्द्ध-निर्मित शॉलें आती हैं
- कीमत: असली शॉल की 10-15% पर बेचीं जाती हैं
- परिणाम: कश्मीरी कारीगरों की आय में 50% की गिरावट
- कच्चे माल की तस्करी
- ऊन, रंग, सोती – पाकिस्तान से आता है।
- सीमा पर देरी से लागत में वृद्धि होती है।
- चीन सीमांत (LAC) की समस्याएँ:ॉ
- सीमा पार संचार मार्ग का अवरोध
- लेह-लद्दाख राजमार्ग: 6-8 महीने बर्फ से बंद
- परिणाम: लद्दाख के कुटीर उद्योगों का सांस्कृतिक अलगाथन
- दोनों सीमांतों की साझा समस्या:
- जलवायु कठोरता
- सर्दी में 6-8 महीने तापमान –15°C तक गिरता है
- उत्पादन: पूरी तरह बंद
- परिणाम: वार्षिक आय में 40% का नुकसान
- पीढ़ीगत संकट
- शॉल बुनाई के लिए धैर्य, कठोर परिश्रम, और वर्षों की मेहनत आवश्यक है
- युवाएँ शहरी नौकरियों की ओर भागते हैं
- परिणाम: पारंपरिक कौशल का विलोपन



























