विशद विमर्शसीमा समाचारिका

कश्मीरी हिन्दुओं का अबतक जारी संघर्ष

कश्मीरी पंडितों की सुरक्षित पुनर्वापसी: इतिहास की सीख और वर्तमान की रणनीति   अश्विनी कुमार च्रोंगू (37वीं होलोकॉस्ट दिवस (19 जनवरी, 2026) पर) उन्नीस जनवरी 1990 को, आज से छत्तीस वर्ष पहले कश्मीर की धरती पर अपने ही घर में रहने वाले मूलनिवासी कश्मीरी पंडितों ने अपने इतिहास का सबसे काला अध्याय देखा था। दस…

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विशद विमर्शसीमा समाचारिका

जाली मुद्रा: मौन खतरा

जाली मुद्रा: अर्थव्यवस्था की जड़ों पर प्रहार, राष्ट्र की सुरक्षा पर अदृश्य खतरा आशीष केसरवानी  एक देश की राष्ट्रीय प्रगति की रीढ़ उसकी वित्तीय प्रणाली होती है। हालांकि, इस प्रणाली में जाली मुद्रा का प्रवेश एक मौन लेकिन बहुआयामी खतरा पैदा करता है जो आर्थिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालता है। नकली…

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विशद विमर्श

समुद्र, सुरक्षा और समृद्धि

समुद्री सुरक्षा और भारत की आर्थिक प्रगति वाइस एडमिरल अजेंद्र बहादुर सिंह (सेवानिवृत्त) भारत एक ऐसा देश है जिसकी समुद्री संस्कृति 4000 वर्षों से भी अधिक पुरानी है। भारतीय लोककथाओं और प्राचीन ग्रंथों से यह स्पष्ट होता है कि मोहनजोदड़ो, लोथल और हड़प्पा की सिंधु घाटी सभ्यता ने अफ्रीका, अरब, मेसोपोटामिया और भूमध्यसागरीय देशों से…

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विशद विमर्श

सीमा पार से आतंकवाद

सीमाओं के पार: आतंकवाद, मानव तस्करी और सुरक्षा की खोज के. के. शर्मा (पूर्व महानिदेशक, सीमा सुरक्षा बल (BSF) कौटिल्य ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में उल्लेख किया है कि किसी राष्ट्र के पड़ोसी स्वाभाविक रूप से उसके शत्रु होते हैं। अतः उनके साथ अत्यंत सावधानीपूर्वक व्यवहार किया जाना चाहिए। सीमाओं का प्रबंधन एक जटिल…

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विशद विमर्शसीमा समाचारिका

बंगाल की लड़ाई: सत्ता नहीं, सभ्यता का प्रश्न

  चुनाव से आगे की सोच: क्यों बंगाल भारत के लिए निर्णायक है अश्वनी कुमार च्रोंगू बीते वर्ष 2025 के अंतिम सप्ताह में भाजपा के राष्ट्रीय संगठनात्मक मामलों के प्रमुख और पार्टी के अखिल भारतीय महासचिव (संगठन) बी.एल. संतोष ने नई दिल्ली से प्रकाशित पत्रिका पाञ्चजन्य  को एक विशेष साक्षात्कार दिया, जिसे मीडिया में व्यापक…

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विशद विमर्शसीमा समाचारिका

बंगाल, विवेकानंद और सभ्यतागत संकट

    विवेकानंद दर्शन और भारत का सभ्यतागत संकट भोगेन्द्र पाठक स्वामी विवेकानंद का जन्म केवल एक महापुरुष का जन्म नहीं था, बल्कि वह क्षण था जब भारतीय चेतना ने आधुनिक युग में नई करवट ली। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि अध्यात्म जीवन से पलायन नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व निभाने…

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