पशुपालन वह समेकित कृषि गतिविधि है जिसमें सीमांत और दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में गाय, भैंस, भेड़, बकरी, बकरा और पोल्ट्री जैसी स्थानीय उपजाति के जानवरों का प्रजनन, पोषण, स्वास्थ्य-देखभाल और उत्पाद विपणन शामिल होता है। यह सिर्फ मांस या दूध जैसे उत्पाद जुटाने का काम नहीं है, बल्कि ग्रामीण परिवारों की आय का मुख्य स्रोत, देश की खाद्य आत्मनिर्भरता और सीमा सुरक्षा की नींव भी है।पंजाब की मैदानी तहों से लेकर उत्तराखंड की ऊंची वादियों तक, सीमांतवासी पशुपालक न सिर्फ़ देश की खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं, बल्कि सीमा चौकसी का भी आधार हैं। पंजाब में डेयरी और भैंस पालन व्यवस्थित फार्मों पर होता है, जबकि जम्मू-कश्मीर की वादियों में बकरा-भेड़ चराई ग्रामीण चरागाहों में फैली ट्रेडिशनल व्यवस्था पर टिकी है। हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी अंचलों में छोटे झुंडों में भेड़-बकरी चराकर परिवार की आय संवारी जाती है और उत्तराखंड के कस्बों में गौ-पालन अब भी सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रश्न है। बावजूद इसके सीमापार से घुसपैठ और तस्करी, चरागाहों का सिकुड़ना, मौसमी परिवर्तन से चराई में रुकावटें, पशु रोगों का फैलाव और दुर्गम बाजार तक पहुंच की चुनौती इन पशुपालकों के सामने रोज़गार संकट खड़ा कर देती हैं। सरकार द्वारा चारा योजनाएं, पशु बीमा और सब्सिडी दी जा रही है, लेकिन इनकी पहुंच व प्रभाव अभी पर्याप्त नहीं दिखते। सीमा सुरक्षा की पंक्तियों में खड़े इन देशभक्त पशुपालकों की समस्याएं सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ी हैं।
पंजाब: मैदानी अंचल में डेयरी और भैंस पालन
1.1 पशुपालन का स्वरूप
पंजाब के सीमा-नज़दीकी जिलों (अमृतसर, गुरदासपुर, करतारपुर) में डेयरी उद्योग का विकास हुआ है। यहाँ मुख्यतः भैंस पालन प्रचलित है, क्योंकि भैंसें उच्च वसा युक्त दूध देती हैं। किसान अपने आवासीय घरों के निकट ही छोटे-मध्यम ढांचे में 4–6 भैंस या गाय रखते हैं। अतिरिक्त जगह होने पर बफरिंग टैंक और फीड मिल सुविधाएं उपलब्ध कर ली गई हैं।
1.2 आबादी में हिस्सेदारी
पंजाब के सीमांत जिलों की कुल आबादी में लगभग 45% घरों में डेयरी, भैंस-गोपालन से जुड़े परिवार हैं। कई परिवारों में पशुपालन मुख्य आजीविका है, जबकि कुछ में कृषिकर्म के पूरक रूप में डेयरी आय स्रोत है।
1.3 आर्थिक स्थिति
औसतन प्रत्येक परिवार का वार्षिक डेयरी आय 1.8–2.5 लाख रुपये है। लेकिन कर्ज के बोझ, पशु चारा महंगा होने और दूध के दाम अनिश्चित होने के कारण कई पशुपालक वित्तीय संकट में हैं। प्रति पशु चारा व्यय 8,000–12,000 रुपये प्रति माह आता है, जबकि मिल्क यील्ड के आधार पर प्रति पशु आय 12,000–15,000 रुपये मासिक बनती है। अंतर रात्रि बिजली कटौती से दूध ठंडा नहीं हो पाता, मूल्य घटना का खतरा रहता है।
1.4 सरकारी सहायता
I.राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB)की सब्सिडी पर मिल्क कोल्ड स्टोरेज
II.पशुधन बीमा योजना के तहत 7,000 रुपये प्रति पशु तक का कवरेज
III.प्रधान मंत्री किसान मानधन योजना में डेयरी किसान भी शामिल
IV.राज्य पशु स्वास्थ्य योजनाओं में निःशुल्क टीकाकरण
1.5 चुनौतियाँ
I.सीमापारसेकभी–कभीमवेशीचोरीऔरअवैधतस्करी
II.उन्नतनस्लकेअभावमेंदूधउत्पादनसीमित
III.डेयरीकासमर्थनमूल्यस्थिरनहोना
IV.चरागाहसीमित, फसलअवशेषोंपरनिर्भरता
जम्मू-कश्मीर: पर्वतीय चरागाहों में बकरा-भेड़ पालन
2.1 परंपरागत चारागाह संस्कृति
जम्मू के सतवाड़ा-रियासत की घाटियों में गऊ चरवी रिवाज रहा, परंतु पशुधन में बकरा-भेड़ का महत्व बढ़ा। चरागाह ऊंचाई पर फैले हैं, जहां मई से अक्टूबर तक चराई होती है। पशुपालक “घुड़ारी” के रूप में चरागाह में ठहरते हैं और रात्रि में घाटी लौटते हैं।
2.2 सम्बद्धता और हिस्सेदारी
जम्मू-कश्मीर के सीमांत जिलों में 60% ग्रामीण परिवार पशुपालन से जुड़े हैं; इनमें से 30% चरागाह आधारित बकरापालन को प्राथमिक आजीविका मानते हैं। शेष गाई-भैंस डेयरी या पोल्ट्री रखता है।
2.3 आर्थिक हालात
अधिशेष वर्षा या बर्फबारी से चरागाह क्षतिग्रस्त, पशु तुलनात्मक रूप से कम लाभदायक रहे हैं। औसत वार्षिक आय 1.2–1.5 लाख रुपये। बकरों की बिक्री मेला-समारोहों में होती है, जिसकी कीमत 3,000–5,000 रुपये प्रति पशु।
2.4 सरकारी मदद
I.ICAR-IISWC द्वारा चरागाह सुधार योजनाएँ
II.प्रधानमंत्री पशुधन कल्याण योजना (PMPEKY) में 4,000 रुपये सब्सिडी
III.जम्मू-कश्मीर राज्य पशु पालन बोर्ड की चारा योजनाएँ
2.5 समस्याएँ
I.सीमापार आतंकवादी गतिविधियों से चरागाहों में घुसपैठ से डर
II.चरागाहों में जंगली जीवों का आक्रमण
III.ऊँचाई पर बर्फबारी से आवागमन बाधित
IV.पशु ट्रांसपोर्ट के लिए सड़कें चुनौतीपूर्ण
हिमाचल प्रदेश: हिमालयी पठारों पर भेड़-बकरी चरागाह
3.1 चरागाह-आधारित पारंपरिक प्रणाली
हिमाचल के किन्नौर, लाहौल-स्पीति, चम्बा जिलों में चरागाह चरवाने की प्रणाली सदियों पुरानी। “गावली” जाति के चरवाहे सालभर ऊंचाई-घटाव तीर्थ करते हैं। भेड़-बकरी के छोटे झुंडों को ट्रेक द्वारा चरने भेजते हैं।
3.2 पशुपालन से जुड़े परिवार
राज्य के सीमांत अंचलों में 55% परिवार भेड़-बकरी चराई से जुड़े हैं। इनमें से 40% चरागाह आधारित पशुपालन प्रमुख है।
3.3 आय और आर्थिक स्थिति
औसत वार्षिक आय 0.9–1.2 लाख रुपये हो जाती है। ऊंचाई वाले चरागाहों में चराई का व्यय कम, पर मादक बीमारियाँ (पर्वतीय गुलाबी आँख की बिमारी आदि) भयावह बन जाती हैं। ऊँचे इलाकों में पशु चरने भेजना जोखिमपूर्ण है।
3.4 सरकारी योजनाएँ
I.“प्राकृतिक पशुपालन विकास योजना”
II.पशु चारा पैकेज पर सब्सिडी
III.हिमाचल पशु स्वास्थ्य योजना में विशेष अंशदान
3.5 चुनौतियाँ
I.रिमोट-एरिया में पशु चिकित्सा सुविधाएँ सीमित
II.चरागाह पर प्राकृतिक आपदाओं का असर
III.सीमापार से दुष्ट चरवाहे और अवैध चराई
IV.पशुपालन का मौसम आधारित जीवन कठिन
उत्तराखंड: पर्वतीय देवाल में गौ-पालन और पोल्ट्री
4.1 गौ-पालन की भूमिका
उत्तराखंड के सीमांत जिलों (पिथौरागढ़, चमोली, टिहरी) में गौ-पालन पारंपरिक पूज्य कर्म है। छोटे-मध्यम स्तर पर 2–4 गाय या भैंस रखते हैं, दूध, गोबर, गोमूत्र का उपयोग घरेलू व आय के लिए होता है।
4.2 परिवारों की भागीदारी
राज्य के सीमांत ग्रामीण परिवारों में 50% गौ-पालन से सीधे जुड़े हैं। पोल्ट्री भी सहायक रूप से 30% परिवार पालते हैं।
4.3 आर्थिक आय
औसतन 1–1.4 लाख रुपये वार्षिक हो जाती है। पर्वतीय इलाकों में डेयरी उत्पाद का परिवहन महंगा है, कीमतें अक्सर मंडी पहुंचने तक गिर जाती हैं और किसान को बाज़ार मूल्य से कम दाम में दूध व डेयरी उत्पाद बेचने पड़ते हैं।
4.4 सरकारी सहायता
Iगौ-संरक्षण कार्यक्रम, गोशाला निर्माण अनुदान
II.पोल्ट्री किसान सम्मान निधि
III.वन्यजीव क्षति निवारण फंड
4.5 चुनौतियाँ
I.बाज़ार तक दूरी, परिवहन व्यय
II.जंगली जानवरों का हमल
III.सीमापार पशु तस्करी व चोरी का भय
सीमापार से उत्पन्न समस्या-संग्राम
I.पशु तस्करी: अवैध पारगमन
II.आतंकवादी गतिविधियाँ: घुसपैठ
III.सीमा फेंसिंग: चरागाह क्षति
IV.सुरक्षा मापदंड: पशु गमन प्रतिबन्ध
इन देशभक्त सीमांतवासी पशुपालकों की मेहनत अन्न, पोषण और सीमाओं की सुरक्षा – तीनों को सुचारू रख रही है। केवल सरकारी योजनाओं और तकनीकी सहयोग से नहीं, बल्कि सीमापार की चुनौतियों के ठोस समाधान से ही इन राज्यों में पशुपालन समृद्ध हो सकेगा और सीमा जागरुकता कायम रहेगी।