भारतवर्ष के उत्तुंग शिखरों से लेकर विस्तृत मैदानों तक फैली हुई हमारी पावन मातृभूमि के चतुर्दिशीय सीमान्तों में निवासकरने वाले कृषक नागरिक न केवल अन्न उत्पादन के दिव्य यज्ञ में संलग्न है, वरन् राष्ट्रीय सुरक्षा की प्रथम पंक्ति के रूप में मातृभूमि की रक्षा में निरन्तर तत्पर है। आर्य संस्कृति की महान् परम्परा के अनुसार ‘अन्नं ब्रह्म‘ – अन्न ही ब्रह्म है – के सिद्धान्त को चरितार्थ करते हुए ये धन्य कृषक न केवल देश की खाद्य सुरक्षा के अग्रदूत हैं, अपितु सीमा पर खड़े होकर राष्ट्रीय एकता और अखंडता के अमर संतरी भी हैं। पंजाब की सुवर्ण धरा से लेकर हिमाचल प्रदेश की पर्वतमाला, जम्मू-कश्मीर की स्वर्गिक भूमि से उत्तराखंड के देवभूमि क्षेत्र तक, भारत के पूर्वी तटों से लेकर पश्चिमी समुद्री तटों तक – इन सभी सीमावर्ती प्रदेशों के अन्नदाता अनेक विकट परिस्थितियों एवं द्विगुणित चुनौतियों का सामना करते हुए भी अपने कर्तव्य पथ पर अविचल हैं। यही कारण है कि इन प्रांतों की कृषि व्यवस्था का वैज्ञानिक एवं सामाजिक अध्ययन न केवल आवश्यक है, वरन् देश की सुरक्षा की दृष्टि से भी अनिवार्य है, क्योंकि ये वीर कृषक भारतीय संस्कृति के ‘वसुधैव कुटुम्बकम्‘ के आदर्श को जीवंत रूप प्रदान करते हुए एक ओर जहाँ अपनी मेधा और श्रम से देश की अन्न आपूर्ति में योगदान दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सीमापार से आने वाली घुसपैठ, आतंकवाद और नार्को-टेररिज्म जैसी गम्भीर समस्याओं का सामना करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा की अग्रिम चौकी के रूप में कार्य कर रहे हैं।
पंजाब: हरित क्रांति की धरती पर सीमावर्ती कृषि
फसल उत्पादन एवं कृषि क्षेत्रफल
पंजाब राज्य के 87% भौगोलिक क्षेत्र पर खेती होती है, जो देश में सर्वाधिक है। राज्य अपने मात्र 1.5% भौगोलिक क्षेत्र में देश के गेहूं उत्पादन का 22%, चावल का 12% और कपास का 12% उत्पादन करता है।
पंजाब के सीमावर्ती जिलों में मुख्य फसलों में गेहूं, धान, कपास, मक्का, गन्ना और बाजरा शामिल हैं। पंजाब की कृषि चावल-गेहूं की एकरूप कृषि प्रणाली पर आधारित है, जहाँ किसान खरीफ मौसम में चावल और रबी मौसम में गेहूं की खेती करते हैं।
कृषि में संलग्न जनसंख्या
अमृतसर जिले में 70,705 कृषक परिवार निवास करते हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों में किसानों की फसल गहनता 186% से अधिक है, जो कृषि की गहनता को दर्शाती है।
किसानों की आर्थिक स्थिति
पंजाब के किसानों की आर्थिक स्थिति चिंताजनक है। प्रति किसान औसतन 2.77 लाख रुपये का कर्ज है, जो देश में सर्वाधिक है। राज्य में 37.62 लाख किसान खाता धारकों पर 104,353 करोड़ रुपये का कुल कर्ज है।
सरकारी सहायता एवं योजनाएं
सीमावर्ती किसानों के लिए विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं। केंद्रीय कृषि मंत्री द्वारा सीमा से 10-15 किलोमीटर की पट्टी में आने वाले गांवों की पहचान कर खाद-बीज की विशेष व्यवस्था की जा रही है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के तहत प्रति वर्ष 6,000 रुपये की राशि प्रदान की जाती है।
मुख्य समस्याएं
जल संकट:चावल की खेती के लिए 25 बार सिंचाई की आवश्यकता होती है जबकि गेहूं के लिए केवल 4-5 बार। इससे भूजल स्तर में गंभीर गिरावट आई है।
मिट्टी की गुणवत्ता में ह्रास:अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से मिट्टी की उर्वरता घट रही है।
फसल विविधीकरण की कमी:एकरूप चावल-गेहूं प्रणाली से निकलने में कठिनाई।
सीमापार से उत्पन्न समस्याएं
नार्को-टेररिज्म:पंजाब में ड्रोन द्वारा नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी एक गंभीर समस्या है। इसकी चपेट में सीमावर्ती क्षेत्रों के लोग सबसे ज्यादा आ रहे हैं।
खेती में बाधा:सुरक्षा चिंताओं के कारण BSFद्वारा 48 घंटे में खेत खाली करने के निर्देश मिलते हैं। अमृतसर-दिल्ली राजमार्ग पर व्यापार में बाधा से किसानों की आय प्रभावित होती है।
जम्मू-कश्मीर: कृषि संकट में घिरा सीमावर्ती क्षेत्र
कृषि भूमि एवं फसल पैटर्न
जम्मू-कश्मीर में कृषि भूमि लगातार कम हो रही है। शुद्ध बोया गया क्षेत्र 2020-21 में 736,000 हेक्टेयर से घटकर 2022-23 में 733,000 हेक्टेयर रह गया है। परती भूमि 120,000 हेक्टेयर से बढ़कर 135,000 हेक्टेयर हो गई है।
मुख्य फसलों में धान, गेहूं, मक्का, सेब, सब्जियां और केसर शामिल हैं। जम्मू क्षेत्र में धान, गेहूं और मक्का मुख्य खाद्यान्न फसलें हैं जबकि कश्मीर घाटी में बागवानी प्रमुख है।
कृषि में संलग्न जनसंख्या
जम्मू-कश्मीर में लगभग 4.5 लाख परिवार बागवानी से जुड़े हैं। यह राज्य की कृषि व्यवस्था का मुख्य आधार है।
किसानों की आर्थिक स्थिति
बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं के कारण किसानों की आर्थिक स्थिति गंभीर है। आरएस पुरा-सतवारी बेल्ट के 1000 किसान बाढ़ से प्रभावित हुए हैं, जिनमें से 400 किसान सब्जी की खेती नहीं कर पाएंगे।
सरकारी सहायता
केंद्र सरकार द्वारा सीमांत किसानों को 47,000 रुपये की सहायता का प्रावधान है। पीएम किसान सम्मान निधि की एक किश्त तुरंत जम्मू-कश्मीर के किसानों के खातों में डाली जा रही है।
प्रमुख समस्याएं
जल संसाधन प्रबंधन:पर्याप्त जल संसाधन होने के बावजूद अपर्याप्त सिंचाई अवसंरचना एक बड़ी समस्या है।
भूमि का गैर-कृषि उपयोग:कृषि भूमि का आवासीय कॉलोनियों और व्यावसायिक परिसरों में रूपांतरण हो रहा है।
जलवायु परिवर्तन:अनियमित वर्षा, दीर्घकालिक सूखा और असामयिक हिमपात की समस्याएं बढ़ रही हैं।
सीमापार चुनौतियां
सुरक्षा चिंताएं:घुसपैठ और सीमा तनाव के कारण किसानों को अपने खेतों से दूर रखा जाता है। बाढ़ में रेत के ढेर खेतों को बंजर बना रहे हैं।
हिमाचल प्रदेश: प्राकृतिक खेती का अग्रणी राज्य
प्राकृतिक खेती एवं फसल विविधता
हिमाचल प्रदेश प्राकृतिक खेती में देश का अग्रणी राज्य है। 2.22 लाख किसान प्राकृतिक खेती से जुड़े हैं और 38,437 हेक्टेयर भूमि पर प्राकृतिक कृषि हो रही है। राज्य के 3,584 पंचायतों में यह पद्धति अपनाई जा रही है।
मुख्य फसलों में गेहूं, मक्का, जौ, सेब, आलू और विभिन्न प्राकृतिक उत्पाद शामिल हैं। राज्य सरकार देश में सबसे अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य दे रही है – मक्का के लिए 40 रुपये प्रति किलो, गेहूं के लिए 60 रुपये प्रति किलो।
कृषि में संलग्न जनसंख्या
हिमाचल प्रदेश में अधिकांश छोटे एवं सीमांत किसान हैं जिनके पास थोड़ी-थोड़ी भूमि है। 3.06 लाख किसानों और बागवानों को प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण दिया गया है।
आर्थिक स्थिति एवं चुनौतियां
हिमाचल के सिरमौर जिले के 316 किसानों को गेहूं बीज की 3 करोड़ रुपये से अधिक की राशि का भुगतान लंबित है। निचले क्षेत्रों (4000 फुट से कम ऊंचाई) में अधिकांश जोतें 5 बीघे से कम हैं।
सरकारी योजनाएं
प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना के तहत सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। सात किसान उत्पादक कंपनियां (FPCs)का गठन किया गया है।
मुख्य समस्याएं
छोटी जोतें:भूमि के छोटे टुकड़ों में बंटने से दस जगह बाड़ बंदी की समस्या। केवल 25% भूमि सिंचित है।
मार्केटिंग की समस्या:प्राकृतिक उत्पादों का उचित मूल्य नहीं मिलना और बिचौलियों द्वारा धोखा दिया जाता है।
जलवायु परिवर्तन:लाहौल-स्पीति में हिमपात की कमी से सिंचाई संकट। 50% से अधिक फसलें खराब हो रही हैं।
उत्तराखंड: पलायन और कृषि संकट
कृषि निर्भरता एवं आर्थिक योगदान
उत्तराखंड की 70% आबादी खेती पर निर्भर है, परंतु राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान केवल 2.61% है। यह असंतुलन कृषि क्षेत्र की गंभीर स्थिति को दर्शाता है।
फसल पैटर्न एवं पारंपरिक कृषि
उत्तराखंड बारहनाजा कृषि विधि के लिए विश्व प्रसिद्ध है। कौणी, मंडुवा और अन्य मोटे अनाज की पारंपरिक खेती को पुनर्जीवित किया जा रहा है। किसान कम लागत, कम पानी और कम मेहनत वाली मोटे अनाज की खेती पर ध्यान दे रहे हैं।
किसानों की समस्याएं
पलायन की समस्या:पर्वतीय क्षेत्रों में सुविधाओं और रोजगार की कमी के कारण व्यापक पलायन हो रहा है। अधिकांश परिवार पलायन कर चुके हैं और कृषि भूमि बंजर हो रही है।
वन्यजीव संकट:बंदरों और अन्य वन्यजीवों द्वारा फसल नुकसान एक गंभीर समस्या है। किसान फसलों का चुनाव इस आधार पर करने लगे हैं कि कौन सी फसल जानवर नहीं खाते।
मार्केट एक्सेस:दुर्गम इलाकों से बड़ी मंडियां दूर होने के कारण उचित मूल्य नहीं मिलता है।
सरकारी सहायता एवं योजनाएं
ICAR-IISWCद्वारा विकसित कृषि संकल्प अभियान के तहत 521 किसानों से संवाद किया गया है। मुख्य समस्याओं में कंकरीली मृदा, वन्यजीव नुकसान, गुणवत्तापूर्ण बीज की कमी शामिल हैं।
सीमावर्ती कृषि की सामान्य चुनौतियां
सुरक्षा संबंधी चुनौतियां
घुसपैठ की समस्या:सभी सीमावर्ती राज्यों में अवैध घुसपैठ एक गंभीर समस्या है। पाकिस्तान के ISI द्वारा पूर्वी सीमा का दुरुपयोग किया जा रहा है।
सीमा फेंसिंग की समस्या:शीतकाल में भारी हिमपात से लगभग एक-तिहाई फेंसिंग वार्षिक क्षति होती है। BSFद्वारा सुरक्षा कारणों से खेत खाली करने के निर्देश मिलते रहते हैं।
कृषि तकनीकी चुनौतियां
सिंचाई की समस्या:अधिकांश सीमावर्ती क्षेत्रों में वर्षा आधारित खेती होती है। जलवायु परिवर्तन के कारण अनियमित वर्षा पैटर्न की समस्या बढ़ रही है।
तकनीकी सहायता का अभाव:कीट व रोग प्रबंधन में तकनीकी जानकारी की कमी और गुणवत्तापूर्ण बीज व नस्लों की कमी प्रमुख समस्याएं हैं।
सरकारी सहायता एवं नीतिगत हस्तक्षेप
केंद्रीय योजनाएं
प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि:सभी पात्र किसानों को प्रति वर्ष 6,000 रुपये की राशि तीन किस्तों में प्रदान की जाती है।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना:फसल नुकसान की स्थिति में बीमा कवरेज प्रदान किया जाता है।
बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम (BADP):सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास के लिए विशेष कार्यक्रम चलाया जा रहा है।
राज्य स्तरीय पहल
हिमाचल प्रदेश:प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना के तहत व्यापक कार्यक्रम।
उत्तराखंड:मुख्यमंत्री बॉर्डर एरिया डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत सीमावर्ती विकास।
आपातकालीन सहायता
केंद्रीय कृषि मंत्री द्वारा सीमावर्ती किसानों के लिए विशेष व्यवस्था की घोषणा की गई है। खाद-बीज की आपूर्ति और तकनीकी सहायता प्रदान की जा रही है।
सुझाव
भारत के सीमावर्ती राज्यों की कृषि व्यवस्था राष्ट्रीय सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा दोनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन क्षेत्रों के किसान द्विगुणित चुनौतियों का सामना कर रहे हैं – एक ओर सामान्य कृषि समस्याएं और दूसरी ओर सुरक्षा संबंधी बाधाएं।
तत्काल आवश्यक सुधार:
i.सीमावर्ती किसानों के लिए विशेष बीमा योजना
ii.फसल विविधीकरण को बढ़ावा
iii.जल संरक्षण तकनीक का विस्तार
iv.डिजिटल कृषि सेवाओं की पहुंच
v.त्वरित वितरण प्रणाली की स्थापना
सीमावर्ती कृषि की समृद्धि राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत बनाने के साथ-साथ स्थानीय जनसंख्या को अपनी मातृभूमि से जोड़े रखने में भी सहायक होगी। इन वीर किसानों का सशक्तिकरण देश की समग्र प्रगति के लिए अनिवार्य है।