सुरक्षित सीमा- समर्थ भारत
  • “राष्ट्र की सीमाओं की रक्षा केवल शस्त्रों से नहीं होती; इसके लिए सजग नागरिक, सशक्त चरित्र और राष्ट्रीय चेतना आवश्यक है।”-एम. एस. गोलवलकर (गुरुजी)
  • “हे मातृ-भूमि तेरे लिए मरना ही जीना है और तुझे भूलकर जीना भी मरना है।” – स्वातंत्र्य वीर सावरकर
  • “राज्य की सीमाओं की रक्षा वही कर सकता है, जो अंतः और बाह्य- दोनों प्रकार की शत्रु प्रवृत्तियों से सतर्क हो।”- कौटिल्य
  • “राष्ट्र की स्वतंत्रता का वास्तविक मूल्य वही जानता है जो उसे सीमा पर खड़ा होकर सुरक्षित रखता है।”- फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ
सीमा जागरण मंच की स्थापना वर्ष 1985 ई. में रामनवमी के दिन जैसलमेर (राजस्थान) में हुई थी। स्थापना के पश्चात् इसका विस्तार देश के अन्य सीमावर्ती राज्यों में हुआ है। वर्तमान में यह संगठन देश के समस्त 24 सीमावर्ती राज्यों जिसमें संघशासित क्षेत्र भी शामिल हैं, विभिन्न नामों के साथ कार्यरत है। देश का संवेदनशील क्षेत्र और राष्ट्रीय राजधानी होने के कारण सन् 2016 में इसके लिए कार्य का विस्तार दिल्ली में भी किया गया है, जहाँ पर यह संगठन विभिन्न आयामों के साथ कार्यरत है।
  • ⭐️सुरक्षित सीमाएँ क्यों आवश्यक हैं

    सुरक्षित सीमाएँ किसी राष्ट्र के स्वास्थ्य, शौर्य और सम्प्रभुता की पहचान हैं। आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और सामरिक विकास की पहली शर्त सुदृढ़ सीमा सुरक्षा है। असुरक्षित सीमाएँ शासन-अस्थिरता, अवैध गतिविधियों और अंततः राष्ट्र के अस्तित्व तक को संकट में डाल देती हैं। तिब्बत–चीन, रूस–यूक्रेन, इज़राइल–फिलिस्तीन जैसे संघर्ष इसी यथार्थ को रेखांकित करते हैं।
  • ⭐️भारत के संदर्भ में सीमा सुरक्षा का विशेष महत्व

    • भारत ऐतिहासिक रूप से पश्चिम व उत्तर से आक्रमणों का दंश झेलता रहा है। स्वतंत्रता के बाद भी घुसपैठ, तस्करी, आतंकवाद और सीमा-विवाद निरंतर चुनौती बने हुए हैं। शत्रु का दुस्साहस वहीं बढ़ता है जहाँ सीमा कमजोर होती है। इसलिए कालजयी समाधान का केंद्रबिंदु—मजबूत सीमा सुरक्षा है।
  • ⭐️असुरक्षित सीमाओं के दुष्परिणाम

    • हथियार व नशीले पदार्थों की तस्करी
    • आतंकवाद, मानव तस्करी, देह-व्यापार
    • सामाजिक अस्थिरता व नैतिक क्षरण
      को बढ़ावा देती हैं।
    • सुरक्षित सीमा से ही स्थिर, सक्षम और शक्तिशाली राष्ट्र का निर्माण संभव है।
  • ⭐️नागरिक सहभागिता व सीमा जागरण मंच

    • सीमा सुरक्षा केवल सेना व बलों की नहीं, सीमावर्ती नागरिकों की भी जिम्मेदारी है। कारगिल में स्थानीय बक्करवालों द्वारा दी गई सूचना इसका प्रमाण है।
      परंतु आज सीमावर्ती क्षेत्रों से पलायन और योजनाबद्ध जनसांख्यिकीय परिवर्तन नई चुनौती हैं।
सीमा जागरण मंच का विस्तार देश के अन्य सीमावर्ती राज्यों में भी हुआ है। जहाँ पर यह संगठन विभिन्न आयामों के साथ कार्यरत है। सविस्तार सीमा जागरण मंच देश के समस्त 24 सीमावर्ती राज्यों में कार्यरत है। इन 24 राज्यों का विवरण दो भागों में बांटकर दिया गया है, जो निम्नवत हैं:
  • सीमा जागरण मंच – गुजरात, सौराष्ट्र कच्छ, हिमाचल, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार एवं दिल्ली।
  • सीमान्त चेतना मंच – असम, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, त्रिपुरा, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा।
  • सीमाजन कल्याण समिति – राजस्थान एवं जम्मू-कश्मीर
  • सरहदी लोक सेवा समिति- पंजाब।
  • सागरीय सीमा मंच – महाराष्ट्र एवं गोवा।
  • भारतीय मत्स्य प्रवर्तक संघ – केरल।
  • करावली कल्याण परिषद् – कर्नाटक।
  • मत्स्यकार समक्षेम समिति – आंध्रप्रदेश।
  • समुद्र भारती – तमिलनाडु।

उपर्युक्त संगठनों के बारे में संक्षिप्त विवरण निम्नवत है:

  • सीमान्त चेतना मंच – मुख्य रूप से इसका कार्य क्षेत्र उत्तर-पूर्व के 8 राज्य हैं। अपने विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से यह न सिर्फ सीमा सम्बन्धी चेतना का विकास करता है बल्कि राष्ट्रभक्ति को जगाने वाले कार्यक्रम भी करता है। इसके द्वारा आयोजित किये जाने वाले कार्यक्रमों में मुख्यतः रक्षाबंधन कार्यक्रम, भारत माता पूजन कार्यक्रम, देशभक्ति सन्देश आदि हैं। सीमान्त चेतना मंच के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी के वेबसाइट https://seemantachetanamancha.org/ पर उपलब्ध है।

 

  • सीमाजन कल्याण समिति- इस संगठन का पंजीकरण 20 जनवरी 1986 को हुआ। लेकिन यह संगठन छह जिलों श्रीगंगानगर, बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर तथा जालोर के सीमाग्रस्त गावों एवं ढाणियों में काफी लोकप्रिय था और संगठन के सम्मेलन में 750 प्रमुख लोगों ने भाग लिया।

 

  • सरहदी लोक सेवा समिति – 1947 ई. में भारत के दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन के कारण पंजाब को भारत का सीमावर्ती राज्य के रूप में आना पड़ा। विदित है कि पंजाब प्रांत के 6 जिले पठानकोट, गुरदासपुर, अमृतसर, तरनतारन, फ़िरोज़पुर और फाजिल्का का 553 किलोमीटर का क्षेत्र पाकिस्तान के साथ सीमा साझा करता है। अतः इस क्षेत्र के नागरिकों को शिक्षित, आत्मनिर्भर, संगठित और जागरूक कर सीमावर्ती विषयों पर चैतन्यशील बनाने हेतु यह संगठन समर्पित है। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी वेबसाइट https://www.sarhadiloksewasamiti.org/ से ली जा सकती है।

 

  • सागरीय सीमा मंच – भारत की सागरीय सीमा के मुख्यतः दो राज्यों महाराष्ट्र और गोवा में यह संगठन कार्यरत है। सागरों की सुरक्षा और स्वच्छता को केंद्र-बिंदु में रखकर यह संगठन कार्यरत है।

 

  • भारतीय मत्स्य प्रवर्तक संघ – यह संगठन मूल रूप से केरल में कार्यरत है। इसके नाम से ही विदित है कि यह मुख्यतः मछुआरों के मध्य ही सक्रिय है। सदियों से सागरीय सीमा की सुरक्षा में मछुआरों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह संगठन इसी दृष्टि को ध्यान में रखकर कार्य करता है। इसका वेबसाइट है – https://www.searchdonation.com/ngo/akhil-bhartiya-matsya-pravartak-sangh.php

 

  • करावली कल्याण परिषद् – कर्नाटक का दक्षिणी तटीय क्षेत्र करावली के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र में न सिर्फ विशेष प्रकार की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान पाई जाती है बल्कि यह क्षेत्र सागरीय सीमा की दृष्टि से विशेष प्रकार से चुनौतीपूर्ण है। करावली कल्याण परिषद् ऐसी पृष्ठभूमि में अपनी विशेष उपस्थिति दर्ज करने का प्रयास करता है।

 

  • मत्स्यकार समझेम समिति – मत्स्यकार समक्षेम समिति की स्थापना वर्ष 2004 में संयुक्त राज्य आंध्र प्रदेश में मछुआरों की स्थिति को बदलने, उनके निर्देशों और सुझावों के साथ 7 सिद्धांतों के आधार पर उनके कल्याण और विकास के लिए की गई थी। इसकी शुरुआत 27 जिला मछली पकड़ने वाले गांवों में मछुआरों के साथ की गई थी। इस संगठन के द्वारा मछुआरों के मध्य शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल-कूद, महिला सशक्तिकरण, स्वरोजगार एवं अन्य विषयों पर कार्य किया जाता है। इसके सन्दर्भ में विस्तृत विवरण के लिए वेबसाइट है –  https://www.mssap.in/

 

  • समुद्र भारती – यह मुख्यतः भारत के समुद्र तटीय राज्य तमिलनाडु में मछुआरों के भीतर शिक्षा, सुरक्षा और स्वावलंबन को ध्यान में रखकर समर्पित संगठन है। समुद्र भारती एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है जो उपर्युक्त विषयों के साथ ही तमिलनाडु के तटीय गांवों में महिलाओं को सशक्त बनाने का प्रयास करता है।

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