मेजर सोमनाथ शर्मा, मेजर जनरल अमरनाथ शर्मा के सुपुत्र, का जन्म 31 जनवरी 1923 को हिमाचल प्रदेश की पुण्यभूमि पर हुआ। 22 फरवरी 1942 को उन्हें कुमाऊँ रेजिमेंट में कमीशन प्राप्त हुआ और तभी से राष्ट्रसेवा उनके जीवन का ध्येय बन गई। 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान समर्थित कबाइली आक्रमणकारियों ने जम्मू-कश्मीर पर धावा बोला। 3 नवंबर 1947 को बडगाम के रणक्षेत्र में मेजर सोमनाथ शर्मा ने सीमित संसाधनों और भीषण शत्रु-आक्रमण के बीच अदम्य साहस का परिचय देते हुए मोर्चा संभाले रखा। राष्ट्र की रक्षा करते हुए उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी और अमरत्व को प्राप्त हुए। उनके इस अद्वितीय बलिदान के लिए उन्हें भारत के प्रथम और सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके पिता मेजर जनरल अमरनाथ शर्मा ने राष्ट्र की ओर से ग्रहण किया। मेजर सोमनाथ शर्मा स्वतंत्र भारत के पहले परमवीर चक्र विजेता हैं — साहस, कर्तव्य और बलिदान की अमिट ज्योति।
शौर्य के शिखर: भारत के परमवीर चक्र विजेता की गाथाएँ
मेजर सोमनाथ शर्मा : बलिदान की प्रथम ज्वाला (परमवीर चक्र - मरणोपरांत)
लांस नायक करम सिंह : हिमालय की छाती पर लिखा गया शौर्य (परमवीर चक्र)
15 सितंबर 1915 को पंजाब की वीरभूमि बरनाला में जन्मे करम सिंह ने 15 सितंबर 1941 को 1 सिख रेजिमेंट में प्रवेश कर राष्ट्रसेवा का प्रण लिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के रण में उनका साहस ऐसा चमका कि उन्हें मिलिटरी मेडल से विभूषित किया गया। फिर, 1948 में जब जम्मू-कश्मीर की पर्वतीय सीमाएँ युद्ध की ज्वाला से दहक उठीं, तब तितवाल सेक्टर में करम सिंह वीरता की जीवंत प्रतिमा बनकर खड़े हुए। गोलियों की बौछार, विस्फोटों की गर्जना और मृत्यु की परछाइयों के बीच उन्होंने मोर्चा संभाले रखा और शत्रु के आक्रमणों को विफल कर दिया। उनकी इस अतुलनीय वीरता ने युद्ध की दिशा बदल दी। राष्ट्र ने उनके पराक्रम को नमन करते हुए उन्हें वीरता की सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र प्रदान किया।
सेकेंड लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे : विजय-पथ के शिल्पकार (परमवीर चक्र)
26 जून 1918 को कर्नाटक की धरती पर जन्मे राम राघोबा राणे ने 15 दिसंबर 1947 को कोर ऑफ इंजीनियर्स में कमीशन प्राप्त कर राष्ट्रसेवा का संकल्प लिया। 1947-48 के जम्मू-कश्मीर युद्ध में वे केवल सैनिक नहीं, विजय के शिल्पकार बनकर उभरे। 18 मार्च 1948 को झंगर की पुनर्विजय के पश्चात, जब भारतीय सेना ने नौशेरा से राजौरी की ओर कूच का संकल्प लिया, तब आगे का मार्ग मानो मृत्यु का विस्तृत जाल बन चुका था – बारूदी सुरंगों से बिंधा धरातल, ध्वस्त पुलों की टूटती साँसें और हर क्षण ताकता शत्रु का क्रूर पहरा। ऐसे विकट क्षणों में राणे स्वयं आगे बढ़े, विस्फोटों के बीच रास्ता बनाते गए, और अपने साथ पूरी सेना को विजय-पथ पर ले आए। हर कदम पर प्राणों का संकट था, पर उनका संकल्प अडिग रहा। उनकी इस अद्भुत वीरता और निर्भीक सेवा ने अभियान की दिशा बदल दी। राष्ट्र ने इस अनुपम शौर्य को नमन करते हुए उन्हें भारत के सर्वोच्च युद्धकालीन वीरता सम्मान परमवीर चक्र से विभूषित किया।
नायक जदुनाथ सिंह : नौशेरा के अमर रक्षक (परमवीर चक्र - मरणोपरांत)
21 नवंबर 1916 को शाहजहाँपुर में जन्मे जदुनाथ सिंह ने अपने जन्मदिवस पर ही, 21 नवंबर 1941 को, 1 राजपूत रेजिमेंट की वर्दी पहनकर राष्ट्र को अपना जीवन सौंप दिया। यह केवल भर्ती नहीं थी – यह आत्मसमर्पण था राष्ट्र के चरणों में। जीवन नहीं, ज्वाला चुनने का वह क्षण था। 1947 की बर्फीली सर्दियों में जब कश्मीर रणांगन बन उठा और 24 दिसम्बर को शत्रु ने झंगर को रौंदकर नौशेरा की छाती पर संकट की तलवार टाँग दी, तब रण की उस धुँध में नायक जदुनाथ सिंह वज्र-स्तंभ बनकर खड़े हो गए। चारों ओर से बरसती आग, सीमित साधन, मृत्यु की साँसें — फिर भी उनकी चौकी न झुकी, न टूटी।उन्होंने अपनी चौकी नहीं छोड़ी, क्योंकि वे जानते थे कि यदि यह चौकी गिरी, तो विश्वास गिरेगा, मनोबल टूटेगा, और राष्ट्र झुकेगा। वे गिरे, पर झुके नहीं। उनकी देह रणभूमि में मौन हुई, पर उनका प्रतिरोध सीमा की स्थायी दीवार बन गया। नौशेरा बचा, क्योंकि एक सैनिक अडिग खड़ा रहा। देह रणभूमि में गिरकर मौन हो गई, पर उनका प्रतिरोध इतिहास की चट्टान बन गया। सीमित संसाधनों, भीषण गोलाबारी और चारों ओर से घिरे होने के बावजूद उन्होंने अपनी चौकी को टूटने नहीं दिया। वे रणभूमि में अमर हुए, पर उनका अडिग प्रतिरोध नौशेरा की रक्षा-दीवार बनकर इतिहास में अमर हो गया। उनके इस अनुपम शौर्य को नमन करते हुए राष्ट्र ने उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र अर्पित किया – वीरता की वह अमिट मुद्रा जो युगों तक प्रेरणा देती रहेगी।
कंपनी हवलदार मेजर पीरू सिंह (परमवीर चक्र - मरणोपरांत)
20 मई 1918 को राजस्थान की पुण्यधरा पर जन्मे पीरू सिंह केवल एक सैनिक नहीं थे – वे राष्ट्र-रक्षा के यज्ञ में स्वयं को आहुति देने के लिए प्रज्वलित हुई एक ज्वाला थे। अपने जन्मदिवस पर ही, 20 मई 1936 को, उन्होंने 6 राजपूताना राइफल्स में भर्ती होकर मातृभूमि की सेवा का संकल्प धारण किया था। 1948 की ग्रीष्म ऋतु में, जब जम्मू-कश्मीर की घाटियाँ रणक्षेत्र बन चुकी थीं और तिथवाल सेक्टर में पाकिस्तानी आक्रांताओं ने उग्र प्रत्याक्रमण छेड़ दिया था, तब शत्रु के प्रचंड दबाव में भारतीय सेना को किशनगंगा नदी के पार स्थित अग्रिम चौकियाँ अस्थायी रूप से छोड़नी पड़ीं। किंतु इस प्रतिकूलता में भी भारतीय वीरों का मनोबल नहीं टूटा। तिथवाल की दुर्गम पर्वत-श्रृंखलाओं पर भारतीय सैनिक पुनः संगठित हुए – जैसे गिरी हुई बिजली फिर आकाश में दहक उठे। उसी रणभूमि में हवलदार मेजर पीरू सिंह सिंहनाद करते हुए शत्रु पर टूट पड़े। अकेले ही उन्होंने दुश्मन के सुदृढ़ मोर्चों को ललकारा। गोलियों की बौछार, बारूद की तीव्र गंध और मृत्यु की छायाओं के बीच भी उनका साहस तनिक भी विचलित नहीं हुआ। वे अंतिम श्वास तक, अंतिम संकल्प तक लड़ते रहे। उनका रक्त धरती पर गिरा, पर उसी रक्त से वीरता की वह रेखा अंकित हुई जो पीढ़ियों तक प्रेरणा का दीप जलाती रहेगी।
पीरू सिंह रणभूमि में अमर हो गए, किंतु अपने साथियों और राष्ट्र के लिए वे अदम्य साहस, एकाकी पराक्रम और अडिग संकल्प की अमिट मिसाल छोड़ गए। राष्ट्र ने उनके इस अनुपम शौर्य को नमन करते हुए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से अलंकृत किया, वह सर्वोच्च सम्मान समर्पित किया जो मृत्यु को पराजित करने वाले महासैनिकों को ही प्राप्त होता है।
गुरबचन सिंह सलारिया— जागरूकता की लौ (परमवीर चक्र - मरणोपरांत)
अमरीका-विरोधी युद्ध के साथ इस वीर ने, अफ्रीका के कांगो में, अपने प्राणों का उत्सर्ग किया था। युद्ध के मैदान में, अपना पराक्रम दिखाते हुए, कनक के समान चमकने वाला यह सैनिक, भारत माता के श्रेष्ट सपूतों में शुमार हुआ। इन्होंने सिद्ध कर दिया कि वीरता मातृभूमि की गोद में ही सबसे अधिक शोभा पाती है।
मेजर धन सिंह थापा (परमवीर चक्र)
10 अप्रैल 1928 को हिमाचल प्रदेश की हिमाच्छादित धरती शिमला में जन्मे धन सिंह थापा केवल एक सैनिक नहीं थे – वे हिमालय-सा अडिग साहस और वज्र-सा संकल्प लेकर जन्मे भारतीय योद्धा थे। 28 अगस्त 1949 को उन्होंने 8 गोरखा राइफल्स में कमीशन प्राप्त कर राष्ट्र-रक्षा के महान व्रत को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया था।
लद्दाख की निर्जन, निस्तब्ध और कठोर भूमि में, पांगोंग झील के उत्तर स्थित सिरिजाप घाटी चुशूल हवाई अड्डे की सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत सामरिक महत्व रखती थी। शत्रु की किसी भी घुसपैठ को रोकने हेतु वहाँ 1/8 गोरखा राइफल्स की अग्रिम चौकियाँ स्थापित थीं। उन्हीं चौकियों में से एक – सिरिजाप-1 – ‘डी’ कंपनी की एक प्लाटून के अधीन थी, जिसकी कमान मेजर धन सिंह थापा के सशक्त हाथों में थी। 21 अक्टूबर 1962 को जब चीनी सेना ने अचानक आक्रमण किया, तब मेजर थापा वज्र-स्तंभ बनकर अपने मोर्चे पर अडिग खड़े रहे। उन्होंने न केवल आक्रमण को विफल किया, बल्कि शत्रु को भारी क्षति पहुँचाकर उसकी आक्रामकता को तोड़ दिया। गोलियों की बौछार, बर्फ़ीली हवाएँ और मृत्यु की छाया – कुछ भी उनके संकल्प को डिगा न सका। उनका नेतृत्व सैनिकों के लिए ढाल भी बना और दीपक भी। उनके इस अद्वितीय पराक्रम, नेतृत्व और अपराजेय साहस के लिए राष्ट्र ने उन्हें युद्धकाल का सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र प्रदान कर गौरवान्वित किया।
सूबेदार जोगिंदर सिंह (परमवीर चक्र – मरणोपरांत)
26 सितंबर 1921 को पंजाब की वीरभूमि फ़रीदकोट में जन्मे जोगिंदर सिंह केवल एक सैनिक नहीं थे – वे शौर्य, अनुशासन और त्याग की जीवंत प्रतिमूर्ति थे। 28 सितंबर 1936 को उन्होंने प्रथम सिख रेजिमेंट में भर्ती होकर मातृभूमि की सेवा को अपना जीवन-व्रत बना लिया था।
1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान वे पूर्वोत्तर सीमांत एजेंसी के तवांग सेक्टर में एक प्लाटून का नेतृत्व कर रहे थे। 23 अक्टूबर को जब चीनी सेना ने बुम ला धुरी पर भीषण आक्रमण किया, तब सूबेदार जोगिंदर सिंह अपनी टुकड़ी सहित चट्टान-से अडिग खड़े रहे। जाँघ में गंभीर घाव लगने के बावजूद उन्होंने पीछे हटने या उपचार हेतु वहाँ से हटना अस्वीकार कर दिया था। उन्होंने स्वयं लाइट मशीनगन संभाली और शत्रुओं का भारी संहार किया। शीघ्र ही प्लाटून का समस्त गोला-बारूद समाप्त हो गया, परंतु उनके संकल्प का भंडार शेष था। तब सूबेदार सिंह ने अपने साथियों के साथ आगे बढ़ते शत्रु पर धावा बोल दिया और संगीनों से अनेक दुश्मनों को धराशायी कर दिया। यह युद्ध वीरता का ऐसा महाकाव्य बन गया, जिसमें सूबेदार जोगिंदर सिंह वीरगति को प्राप्त हुए। उनके प्रेरणादायी नेतृत्व, अद्भुत साहस और कर्तव्यनिष्ठा के लिए राष्ट्र ने उन्हें मरणोपरांत युद्धकाल के सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र से विभूषित किया।
मेजर शैतान सिंह (परमवीर चक्र – मरणोपरांत)
लेफ्टिनेंट कर्नल हेम सिंह जी के सुपुत्र मेजर शैतान सिंह ने 1 अगस्त 1949 को कुमाऊँ रेजिमेंट में कमीशन प्राप्त कर राष्ट्र-रक्षा के महान व्रत का विधिवत् वरण किया था। 1962 के भारत-चीन संघर्ष के दौरान 13 कुमाऊँ बटालियन चुशूल सेक्टर में तैनात थी। इस बटालियन का नेतृत्व करते हुए मेजर शैतान सिंह ने पाँच हज़ार मीटर की दुर्गम ऊँचाई पर स्थित रेज़ांग ला की सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण चौकी को अदम्य दृढ़ता से सुरक्षित रखा। 18 नवम्बर को जब अपेक्षित चीनी आक्रमण रेज़ांग ला पर टूट पड़ा, तब अपने प्राणों की परवाह किए बिना मेजर शैतान सिंह एक चौकी से दूसरी चौकी तक पहुँचते रहे, सैनिकों का मनोबल बढ़ाते रहे और उन्हें अंतिम क्षण तक डटे रहने की प्रेरणा देते रहे। गोलियों की बौछार और तोपों की गर्जना के बीच उनका नेतृत्व सैनिकों के लिए सुरक्षा-कवच भी बना और प्रेरणा-दीप भी।
इसी भीषण रणसंघर्ष में वे घातक रूप से घायल हो गए, किंतु उनका संकल्प अंत तक अविचल रहा। उनका शरीर रणभूमि में आहुति बन गया, पर उनका शौर्य अमर हो गया। उनके अद्वितीय नेतृत्व, अटूट कर्तव्यनिष्ठा और अनुपम वीरता के सम्मान में राष्ट्र ने उन्हें मरणोपरांत युद्धकाल के सर्वोच्च अलंकरण परमवीर चक्र से विभूषित किया।
कंपनी हवलदार अब्दुल हमीद (परमवीर चक्र - मरणोपरांत)
1 जुलाई 1933 को उत्तर प्रदेश की धरती पर जन्मे अब्दुल हमीद ने 27 दिसंबर 1954 को 4 ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में भर्ती होकर राष्ट्र-सेवा का व्रत धारण किया था। साधारण पृष्ठभूमि से उठकर असाधारण साहस के शिखर तक पहुँचे अब्दुल हमीद अनुशासन, निष्ठा और वीरता के जीवंत प्रतीक थे।
1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान चौथी भारतीय डिवीजन को इछोगिल नहर के पूर्व स्थित पाकिस्तानी क्षेत्रों पर अधिकार करने तथा कसूर-खेमकरण धुरी पर संभावित शत्रु आक्रमण को रोकने का दायित्व सौंपा गया था। इसी अभियान के अंतर्गत शत्रु के टैंकों ने अग्रिम मोर्चों में गहरी घुसपैठ कर ली थी। उस निर्णायक घड़ी में अब्दुल हमीद एक रिकॉयललेस गन (झटकारहित तोप) की टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे। अद्भुत साहस का परिचय देते हुए उन्होंने एक के बाद एक शत्रु के दो टैंकों को ध्वस्त कर दिया। इस पर शत्रु ने उन पर केंद्रित मशीनगन और उच्च-विस्फोटक गोले बरसाने प्रारंभ कर दिए। भीषण गोलाबारी के बीच भी वे विचलित नहीं हुए और निरंतर प्रतिघात करते रहे। अंततः एक भारी विस्फोटक गोले के प्रहार से वे प्राणान्तक रूप से घायल हो गए और रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए। उनके अनुपम साहस, अदम्य कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्र के प्रति सर्वोच्च समर्पण के सम्मान में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत युद्धकाल के सर्वोच्च वीरता अलंकरण परमवीर चक्र से विभूषित किया।
लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुर्ज़ोरजी तारापोर (परमवीर चक्र – मरणोपरांत)
18 अगस्त 1923 को मुंबई में जन्मे अर्देशिर बुर्ज़ोरजी तारापोर बचपन से ही साहस, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति के संस्कारों से ओतप्रोत थे। 1942 में उन्होंने हैदराबाद स्टेट फ़ोर्स में प्रवेश किया और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पश्चिम एशिया में सक्रिय सैन्य सेवा का अनुभव प्राप्त किया। 1 अप्रैल 1951 को वे पूना हॉर्स (बख़्तरबंद रेजिमेंट) में कमीशन प्राप्त कर भारतीय सेना के अग्रिम पंक्ति के योद्धा बने।
1965 के भारत-पाक युद्ध का सबसे बड़ा टैंक युद्ध सियालकोट सेक्टर के फिल्लौरा क्षेत्र में लड़ा गया। इस निर्णायक संग्राम में लेफ्टिनेंट कर्नल तारापोर ने शत्रु के तीव्र आक्रमण को निर्भीकता से रोका, मोर्चा संभाले रखा और एक इन्फैंट्री बटालियन के सहयोग से अपनी एक स्क्वाड्रन के साथ फिल्लौरा पर साहसिक आक्रमण किया। युद्ध में घायल होने के बावजूद उन्होंने मोर्चा छोड़कर अस्पताल जाने से मना कर दिया। 14 सितंबर 1965 को उन्होंने अपनी रेजिमेंट का नेतृत्व करते हुए वज़ीराली पर अधिकार किया। गंभीर चोट के बावजूद उन्होंने 16 सितंबर 1965 को पुनः अग्रिम मोर्चे पर नेतृत्व संभाला और जस्सोरन तथा बुतुर-डोगरांडी क्षेत्रों को भी मुक्त कराया। इसी भीषण संघर्ष में उनका स्वयं का टैंक कई बार शत्रु के प्रहारों से क्षतिग्रस्त हुआ। जब उनका टैंक अग्नि की लपटों में घिर गया, तब उन्होंने रणभूमि में वीरगति प्राप्त की। उनके अद्वितीय नेतृत्व, अनुपम साहस और राष्ट्र के प्रति सर्वोच्च समर्पण के सम्मान में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत युद्धकाल के सर्वोच्च वीरता अलंकरण परमवीर चक्र से विभूषित किया।
लांस नायक अल्बर्ट एक्का (परमवीर चक्र – मरणोपरांत)
27 दिसंबर 1942 को बिहार के रांची में जन्मे अल्बर्ट एक्का सरल जीवन, दृढ़ संकल्प और अदम्य साहस के प्रतीक थे। 27 दिसंबर 1962 को, ठीक अपने जन्मदिवस पर उन्होंने 14 गार्ड्स रेजिमेंट में भर्ती होकर राष्ट्र-सेवा का व्रत धारण किया था।
1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान पूर्वी मोर्चे पर 14 गार्ड्स को अगरतला से लगभग साढ़े छह किलोमीटर पश्चिम स्थित गंगासागर में एक सुदृढ़ पाकिस्तानी मोर्चे पर अधिकार करने का आदेश मिला। इस निर्णायक अभियान में अल्बर्ट एक्का बटालियन की अग्रिम बाईं कंपनी के साथ आक्रमण में सम्मिलित हुए। अदम्य साहस का परिचय देते हुए उन्होंने शत्रु के बंकर पर सीधा धावा बोल दिया, संगीन से दो दुश्मन सैनिकों को ढेर कर दिया और लाइट मशीनगन की घातक आग को शांत कर दिया। इस मुठभेड़ में वे गंभीर रूप से घायल हो गए, किंतु उन्होंने रणभूमि नहीं छोड़ी। साथियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर वे आगे बढ़ते रहे और एक-एक कर शत्रु के बंकरों पर अधिकार करते गए। अंततः उन्होंने एक शत्रु बंकर में ग्रेनेड फेंककर उसे ध्वस्त किया। इसी भीषण संघर्ष में लगी चोटों के कारण वे वीरगति को प्राप्त हुए। उनके अनुपम साहस, अदम्य पराक्रम और राष्ट्र के प्रति सर्वोच्च समर्पण के सम्मान में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत युद्धकाल के सर्वोच्च वीरता अलंकरण परमवीर चक्र से विभूषित किया।
फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों (परमवीर चक्र – मरणोपरांत)
17 जुलाई 1943 को पंजाब के लुधियाना में जन्मे निर्मलजीत सिंह सेखों साहस, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति की जीवंत प्रतिमूर्ति थे। 4 जून 1967 को उन्होंने भारतीय वायुसेना में कमीशन प्राप्त कर आकाश-रक्षा के महान दायित्व को अपने जीवन का संकल्प बनाया। 1971 के युद्धकालीन अभियानों के दौरान वे श्रीनगर स्थित नंबर 18 स्क्वाड्रन फ्लाइंग बुलेट्स के साथ फॉलैंड नैट लड़ाकू विमान उड़ाते हुए तैनात थे। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर घुसपैठ करने वाले पाकिस्तानी विमानों की लगातार आने वाली लहरों का अद्भुत वीरता और अडिग संकल्प के साथ सामना किया। 14 दिसंबर 1971 को छह शत्रु सेबर विमानों के एक दल ने श्रीनगर हवाई अड्डे पर आक्रमण किया। इस संकट की घड़ी में निर्मलजीत सिंह सेखों तुरंत आकाश में उड़ान भरकर शत्रु के दो सेबर विमानों से सीधे भिड़ गए। उन्होंने दोनों विमानों को गंभीर क्षति पहुँचाने में सफलता प्राप्त की। इसी भीषण वायु-संग्राम के दौरान उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और वे वीरगति को प्राप्त हुए। उनके इस अनुपम शौर्य, अतुलनीय साहस और अद्वितीय वीरता के सम्मान में राष्ट्र ने उन्हें मरणोपरांत युद्धकाल के सर्वोच्च वीरता अलंकरण परमवीर चक्र से विभूषित किया।
सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल (परमवीर चक्र – मरणोपरांत)
ब्रिगेडियर एम. एल. खेत्रपाल के सुपुत्र अरुण खेत्रपाल का जन्म 14 अक्टूबर 1950 को महाराष्ट्र के पुणे में हुआ। 13 जून 1971 को उन्होंने 17 पूना हॉर्स में कमीशन प्राप्त कर राष्ट्र-रक्षा के महान संकल्प को अपने जीवन का ध्येय बनाया। 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान 17 पूना हॉर्स के नेतृत्व में 47 इन्फैंट्री ब्रिगेड को शकरगढ़ सेक्टर में बासंतर नदी के पार एक सुरक्षित ब्रिजहेड स्थापित करने का आदेश मिला। इस निर्णायक अभियान में सेकंड लेफ्टिनेंट खेत्रपाल ने शत्रु की सुदृढ़ चौकियों पर तीव्र आक्रमण किया और बंदूक की नोक पर अनेक शत्रु सैनिकों तथा रिकॉयललेस तोपों को अपने कब्ज़े में लिया। उन्होंने कई शत्रु टैंकों को भी ध्वस्त कर दिया। भीषण युद्ध के दौरान उनका स्वयं का टैंक भी शत्रु के प्रहार से आग की लपटों में घिर गया। किंतु यह समझते हुए कि उनका टैंक शत्रु की आगे बढ़ने की योजना को रोकने में निर्णायक भूमिका निभा रहा है, उन्होंने साहस के साथ शेष शत्रु टैंकों पर आक्रमण जारी रखा। इसी क्रम में उनके टैंक पर दूसरा घातक प्रहार हुआ। अंततः उन्होंने शत्रु की योजना को नाकाम करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी। उनके इस अद्वितीय पराक्रम, निर्भीक नेतृत्व और प्रखर वीरता के सम्मान में राष्ट्र ने उन्हें मरणोपरांत युद्धकाल के सर्वोच्च वीरता अलंकरण परमवीर चक्र से विभूषित किया।
मेजर होशियार सिंह (परमवीर चक्र)
5 मई 1936 को हरियाणा की वीरभूमि पर जन्मे होशियार सिंह साहस, अनुशासन और अदम्य संकल्प के प्रतीक थे। 30 जून 1963 को उन्होंने ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में कमीशन प्राप्त कर राष्ट्र-रक्षा के महान दायित्व को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया। उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें ‘मेंशन्ड-इन-डिस्पैचेस’ से भी सम्मानित किया गया। 17 दिसंबर 1971 को भारत-पाक युद्ध के दौरान शत्रु की भीषण गोलाबारी में वे गंभीर रूप से घायल हो गए। किंतु इस अवस्था में भी उन्होंने मोर्चा नहीं छोड़ा। वे खुले मैदान में अकेले ही एक खाई से दूसरी खाई तक जाते रहे, सैनिकों का उत्साह बढ़ाते रहे और मोर्चों को सुदृढ़ करते रहे। स्थिति की गंभीरता को समझते हुए मेजर सिंह ने तत्काल मशीनगन संभाली और लगातार फायर करते हुए शत्रु को भारी क्षति पहुँचाई। उनकी सटीक और तीव्र गोलीबारी से शत्रु को भारी नुकसान हुआ। परिणामस्वरूप दुश्मन का हमला विफल हो गया और उसे पीछे हटना पड़ा। इस पूरे अभियान के दौरान मेजर होशियार सिंह ने शत्रु के समक्ष असाधारण वीरता, अडिग संकल्प और अपराजेय आत्मबल का परिचय दिया। उनके इस अद्वितीय शौर्य और कर्तव्यनिष्ठा के सम्मान में राष्ट्र ने उन्हें युद्धकाल के सर्वोच्च वीरता अलंकरण परमवीर चक्र से विभूषित किया।
नायब सूबेदार बाना सिंह (परमवीर चक्र)
6 जनवरी 1949 को जम्मू के कडयाल गाँव में जन्मे बाना सिंह ने ठीक अपने बीसवें जन्मदिवस पर, 6 जनवरी 1969 को, भारतीय सेना की जम्मू एवं कश्मीर लाइट इन्फैंट्री (JAK LI) में भर्ती होकर राष्ट्र-सेवा का व्रत धारण किया। जून 1987 में 8 जम्मू एवं कश्मीर लाइट इन्फैंट्री सियाचिन क्षेत्र में तैनात थी। इसी दौरान पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए गठित विशेष कार्यबल में नायब सूबेदार बाना सिंह ने स्वेच्छा से सम्मिलित होने का निर्णय लिया। उन्होंने अत्यंत दुर्गम, जोखिमपूर्ण और हिमाच्छादित मार्ग से अपने दल का नेतृत्व किया। हाथों में ग्रेनेड, संगीन से सुसज्जित बंदूक और अदम्य साहस के साथ वे खाई-दर-खाई आगे बढ़ते गए। ग्रेनेड फेंकते हुए, संगीन से धावा बोलते हुए और एक-एक मोर्चे को साफ़ करते हुए उन्होंने शत्रु की पूरी चौकी को घुसपैठियों से मुक्त कर दिया। उनकी इस अद्वितीय वीरता, निर्भीक नेतृत्व और अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में प्रदर्शित अदम्य साहस के लिए राष्ट्र ने उन्हें युद्धकाल के सर्वोच्च वीरता अलंकरण परमवीर चक्र से सम्मानित किया।
मेजर रामास्वामी परमेश्वरन (परमवीर चक्र – मरणोपरांत)
13 सितंबर 1946 को मुंबई में जन्मे रामास्वामी परमेश्वरन अनुशासन, साहस और कर्तव्यनिष्ठा की जीवंत मिसाल थे। 16 जनवरी 1972 को उन्हें महार रेजिमेंट में शॉर्ट सर्विस कमीशन प्राप्त हुआ और उन्होंने भारतीय सेना के अग्रिम पंक्ति के योद्धा के रूप में अपनी सेवाएँ प्रारंभ कीं। उन्होंने सेना द्वारा संचालित अनेक अभियानों में सक्रिय भागीदारी निभाई।
भारत-श्रीलंका समझौते के अंतर्गत शांति एवं व्यवस्था बनाए रखने हेतु भारतीय सेना की कई इकाइयाँ श्रीलंका भेजी गई थीं। 25 नवंबर 1987 को मेजर परमेश्वरन अपने दस्ते के साथ गश्त पर थे, तभी उग्रवादियों के एक समूह ने उन पर अचानक घात लगाकर हमला कर दिया। असाधारण सूझबूझ का परिचय देते हुए उन्होंने पीछे से शत्रुओं को घेर लिया और निर्भीकता से उन पर धावा बोल दिया। आमने-सामने की भीषण मुठभेड़ के दौरान एक उग्रवादी ने उनके सीने में गोली मार दी। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने अदम्य साहस का परिचय देते हुए उस उग्रवादी से राइफल छीन ली और उसे मार गिराया। अत्यंत नाज़ुक अवस्था में भी वे अंतिम क्षण तक अपने सैनिकों को निर्देश देते रहे और उनका मनोबल बढ़ाते रहे। अंततः उन्होंने राष्ट्र-सेवा में अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनकी इस असाधारण वीरता, सर्वोच्च बलिदान और कर्तव्यपरायणता के सम्मान में राष्ट्र ने उन्हें मरणोपरांत युद्धकाल के सर्वोच्च वीरता अलंकरण परमवीर चक्र से विभूषित किया।
कैप्टन विक्रम बत्रा (परमवीर चक्र - मरणोपरांत)
1999 की कारगिल युद्ध भारत और पाकिस्तान के बीच एक महत्वपूर्ण सशस्त्र संघर्ष था, जिसे ‘ऑपरेशन विजय’ के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध के दौरान 13 जम्मू और कश्मीर राइफल्स की डेल्टा कंपनी के नेतृत्वकर्ता कैप्टन विक्रम बत्रा को दुश्मन के कब्ज़े से प्वाइंट 5140 को पुनः प्राप्त करने का दायित्व सौंपा गया था। प्वाइंट 5140 इस लड़ाई का सबसे महत्वपूर्ण और कठिन शिखर था। यह ड्रास सेक्टर में स्थित था, जहां की ऊंचाई 5,160 मीटर थी। यह तोलोलिंग पर्वत श्रेणी का सर्वोच्च बिंदु था और पूरे ड्रास क्षेत्र में सबसे दुर्गम और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान था। लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कैप्टन बत्रा ने आमने-सामने की लड़ाई में अकेले ही तीन दुश्मन सैनिकों से मुकाबला किया और उन्हें मार गिराया। इस संघर्ष में वे गंभीर रूप से घायल हो गए, किंतु उन्होंने उपचार हेतु पीछे हटने के बजाय अपने सैनिकों को पुनर्गठित कर अभियान जारी रखने पर बल दिया। उनके असाधारण साहस से प्रेरित होकर 13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स के सैनिकों ने दुश्मन की चौकी पर धावा बोल दिया और 20 जून 1999 की प्रातः 3:30 बजे प्वाइंट 5140 पर पुनः अधिकार कर लिया। इसके पश्चात कैप्टन बत्रा के नेतृत्व में भारतीय सैनिकों ने प्वाइंट 4750 और प्वाइंट 4875 को भी पुनः मुक्त कराते हुए ऐतिहासिक विजय प्राप्त की।
शत्रु के एक प्रत्याक्रमण के दौरान एक घायल अधिकारी को बचाने का प्रयास करते हुए कैप्टन बत्रा वीरगति को प्राप्त हुए। उनके निरंतर प्रदर्शित असाधारण व्यक्तिगत साहस, नेतृत्व और राष्ट्र के प्रति सर्वोच्च समर्पण के सम्मान में भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र से विभूषित किया।
लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे: कारगिल की वीरगाथा (परमवीर चक्र - मरणोपरांत)
11 जून 1999 को 1/11 गोरखा राइफल्स के शूरवीर लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पाण्डेय ने बाटालिक सेक्टर में घुसपैठियों को परास्त कर पीछे हटने को विवश कर दिया था। उनके नेतृत्व में सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण जौबर टॉप पुनः भारत के अधिकार में आया। किंतु उनका सबसे उज्ज्वल और अमर क्षण 3 जुलाई 1999 की भोर में खलुबर की विजय के साथ इतिहास में अंकित हुआ। 2–3 जुलाई की अँधेरी रात में, जब बटालियन की प्रगति अंतिम लक्ष्य से ठीक पहले शत्रु की मज़बूत मोर्चेबंदी के कारण थम गई थी, तब इस युवा सैन्य अधिकारी ने मृत्यु की आँखों में आँख डालकर आगे बढ़ने का संकल्प लिया। उन्होंने अपनी प्लाटून को एक संकरी, खतरनाक पहाड़ी धार से होते हुए शत्रु की ओर अग्रसर किया। गोलियों की बौछार के बीच ऊँचे स्वर में युद्धघोष करते हुए वे अपने सैनिकों से आगे निकल गए और अकेले ही शत्रु पर टूट पड़े। कंधे और पैर में गंभीर चोट लगने के बाद भी उनका संकल्प अडिग बना रहा। गंभीर रूप से रक्तस्राव करते हुए वे अंतिम बंकर के पास धराशायी हुए और वीरगति को प्राप्त हुए, किंतु उससे पहले शत्रु का अंतिम ठिकाना भी ध्वस्त हो चुका था। राष्ट्र के लिए समर्पित इस महान बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च वीरता अलंकरण परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव (परमवीर चक्र)
18 ग्रेनेडियर्स के ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव ने 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान कमांडो ‘घातक’ प्लाटून के सदस्य के रूप में अद्वितीय शौर्य का परिचय दिया। 3-4 जुलाई 1999 की रात्रि उन्हें टाइगर हिल पर स्थित तीन अत्यंत सामरिक महत्व के शत्रु बंकरों पर अधिकार करने का दायित्व सौंपा गया था। इस दुर्गम और प्राणघातक अभियान के दौरान उनके कमर और कंधे में तीन गोलियाँ लगीं, फिर भी अद्भुत शारीरिक सामर्थ्य और अटूट संकल्प का परिचय देते हुए उन्होंने शेष लगभग साठ फीट की खड़ी चढ़ाई अकेले पूरी की और शिखर तक पहुँचे। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद असाधारण धैर्य और साहस के साथ वे घिसटते हुए शत्रु के बंकर तक पहुँचे और एक ग्रेनेड फेंककर चार पाकिस्तानी सैनिकों को निष्क्रिय किया तथा शत्रु की गोलीबारी को प्रभावी रूप से शांत कर दिया।
उनके इस निरंतर प्रदर्शित अद्वितीय व्यक्तिगत साहस, सर्वोच्च वीरता और शत्रु के सम्मुख अपराजेय धैर्य के लिए राष्ट्र ने उन्हें भारत के सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र से अलंकृत किया।
राइफलमैन संजय कुमार (परमवीर चक्र)
4 जुलाई 1999 को, मुश्कोह घाटी में स्थित प्वाइंट 4875 के ‘एरिया फ्लैट टॉप’ को मुक्त कराने का दायित्व 13 जम्मू और कश्मीर राइफल्स की टुकड़ी को सौंपा गया था। इस दल के अग्रिम स्काउट थे – राइफलमैन संजय कुमार। यह क्षेत्र पाकिस्तानी समर्थित आतंकियों के कब्ज़े में था। अपने प्राणों की परवाह किए बिना, राइफलमैन संजय कुमार अकेले ही चट्टानी धार के सहारे रेंगते हुए आगे बढ़े और स्वचालित हथियारों की भीषण बौछार के बीच शत्रु के बंकर पर टूट पड़े। वह पत्थर दर पत्थर, इंच दर इंच, अपने दुश्मन के करीब बढ़ते गए। हर बुलेट जो उसके कंधे को छेदती, वह आगे का संकेत था। हर गोली जो उसके पैर को घायल करती, वह विजय की ओर एक कदम थी। पहला बंकर। उनका गंतव्य। वे अपने दुश्मन के दरवाजे पर पहुँच गए। और तब जैसे अर्जुन महाभारत के युद्ध में उतरा था, वह अपनी पूरी शक्ति के साथ अपने शत्रु पर टूट पड़े। पहली बंकर विजीत हुई। दुश्मन पराजित हुआ और संजय कुमार खड़ा रहा – रक्त से भीगा हुआ, किंतु अपराजेय।
लेकिन लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई थी। दूसरा बंकर अभी भी दुश्मन के नियंत्रण में था। और तब जब कोई भी सामान्य सैनिक विश्राम लेता, जहाँ कोई भी चोटग्रस्त योद्धा पीछे हट जाता, संजय कुमार ने अपने दुश्मन की ही मशीन गन उठा ली। यह वीरता की चरम सीमा थी। दुश्मन का हथियार अब भारतीय वीर के हाथ में। वे अपने दुश्मन की ओर बढ़ गए। दूसरी बंकर में तीन पाकिस्तानी सैनिक बैठे थे। संजय कुमार ने वह गन चलाई। तीनों दुश्मन सैनिक तुरंत ढेर हो गए। वे अपने ही बंकर में, अपने ही गढ़ में एक भारतीय वीर के सामने असहाय सिद्ध हुए। यह केवल एक सैन्य क्रिया नहीं थी – एक अकेला वीर, घायल, लहू-लुहान, अकेला, पूरी सेना को परास्त कर देता है।
इस अविराम शौर्य और अद्वितीय वीरता के लिए राष्ट्र ने राइफलमैन संजय कुमार को परमवीर चक्र से विभूषित किया। वे भारत के एकमात्र ऐसे वीर योद्धा बने, जिनके जीवित रहते ही उन्हें परमवीर चक्र का सर्वोच्च सम्मान प्राप्त हुआ।






















