भारत के वीर योद्धा

फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ - शौर्य के साक्षात् अवतार

मधुर मुस्कान और मजबूत निर्णय शक्ति के साथ, यह वीर सपूत भारत के स्वाभिमान का आधार हैं। 4 अप्रैल 1914 को जन्मे और 27 जून 2008 को हमे अलविदा कह गए इस महायोद्धा ने 1971 के युद्ध में अपनी सेनाध्यक्षता का अद्भुत परिचय दिया। सेनापति के रूप में, भारत क रणभूमि में व धूप-छांह का संतुलन रहे। उनसे पूर्व कोई ऐसा शूरवीर भारत में न हुआ, जिन्होंने सेना के पहले फील्ड मार्शल का खिताब पाया हो। उन्हें देखकर यही ज्ञात होता है कि वे भी उस विराट सूर्य के आलोक हैं, जिसने राष्ट्र के अंधकार को दूर कर दिया।

अरुण कुमार वैद्य - महावीर चक्र से अलंकृत महायोद्धा

महावीर चक्र से सम्मानित योद्धा अरुण कुमार वैद्य ने 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में चाविंडा की युद्धभूमि में शत्रु की प्रथम आर्मर्ड डिविजन को ध्वस्त कर दिया था। इतना ही नहीं, 1971 में, अरुण कुमार वैद्य ने खदानों से भरे बीहड़ क्षेत्र को पार कर पाकिस्तानी प्रत्याक्रमण को चक्र और दहिरा के युद्धों में विफल करने का अतुल्य साहसिक कार्य किया। उसी संघर्ष में, बारापिंड के युद्ध में, उन्होंने खदान क्षेत्र में टैंकों को सक्रिय कर द्वितीय महावीर चक्र प्राप्त किया। 1984 में, उन्होंने ऑपरेशन ब्लू स्टार की रूपरेखा तैयार की, जिसका उद्देश्य स्वर्ण मंदिर में छिपे सिख उग्रवादियों को निकाल बाहर करना था।

मेजर संदीप उन्नीकृष्णन - “ऊपर मत आओ, मैं संभाल लूंगा”

यह एक अत्यंत भावुक वर्णन है मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के अंतिम वीरतापूर्ण क्षणों का, जिन्होंने 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के दौरान असाधारण साहस दिखाया। उनके शब्द – “ऊपर मत आओ, मैं संभाल लूंगा” – आज भी साहस, बलिदान और निस्वार्थ सेवा का प्रतीक बने हुए हैं।मेजर उन्नीकृष्णन, जिन्हें बिहार रेजिमेंट की 7वीं बटालियन में कमीशन मिला था, बाद में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG) की विशेष कार्रवाई समूह में नियुक्त हुए। 27 नवम्बर 2008 की रात, जब आतंकवादी ताजमहल पैलेस होटल में छिपे हुए थे, उन्होंने अपनी टीम का नेतृत्व करते हुए इमारत में प्रवेश किया। संकट अत्यधिक था, लेकिन उन्होंने पहले अपने घायल साथी को सुरक्षित बाहर निकाला और फिर अकेले आतंकवादियों का पीछा किया। इस मुठभेड़ में वे गंभीर रूप से घायल हुए और वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी अदम्य वीरता और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया, जो भारत का सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है।

कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला- एक महान वीर की स्मृतियाँ

1971 के युद्ध के दौरान, आईएनएस खुखरी के कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला अपने जहाज़ पर ही जान न्योछावर कर दिया, जब दुश्मन की पनडुब्बी से छोड़े गए टॉरपीडो ने जहाज़ को निशाना बनाया। कैप्टन मुल्ला ने अपना जीवनरक्षक जैकेट एक नाविक को दे दिया और अंत तक जितने अधिक से अधिक जीवन बचा सकते थे, बचाने का प्रयास किया। अंततः वे अपने जहाज़ के साथ जल समाधि ले गए।यदि आप कभी दीव की यात्रा करें, तो वहाँ आपको कैप्टन मुल्ला की स्मृति में बना स्मारक और आईएनएस खुखरी का एक पूर्ण-आकार का मॉडल देखने को मिलेगा।

राइफलमैन जसवंत सिंह रावत— अकेले की भक्ति

1962 का भारत-चीन युद्ध, जब पूरा युद्ध रेगिस्तान और पर्वतशृंखलाओं के बीच लड़ा गया, उस समय यह अकेला शूरवीर अपने सैनिक साथियों का सहारा बना। उसने मोनपा की दो वंदनीय बालिकाओंसेला और नूराकी सहायता से, भारतीय बल को चीनी दमनचक्र से बचा लियावे मानते थे कि स्वयं का बलिदान ही हमारे देश का सर्वोच्च सेवा है, उनके इस वीर साहस की कथा आज भी अमर है।

जमादार नंद सिंह- अदभुत शौर्य का प्रदर्शन

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, नंद सिंह ने बर्मा में एक खड़ी पहाड़ी पर अपने सैनिकों का नेतृत्व किया और अनेक चोटें लगने के बावजूद महत्वपूर्ण मोर्चों पर नियंत्रण कर लिया। 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, उन्होंने पाकिस्तान के साथ भारत के पहले युद्ध में हिस्सा लिया। उसी वर्ष, उरी में वे गंभीर रूप से घायल हो गए, जिसके बाद पाकिस्तान में उनके शव को घसीटकर जुलूस में प्रदर्शित किया गया और अंततः एक कचरे के ढेर में फेंक दिया गया। दुख की बात है कि उनका शव कभी बरामद नहीं हो सका। नंद सिंह को ब्रिटिश साम्राज्य और राष्ट्रमंडल देशों की सेनाओं को दिया जाने वाला सर्वोच्च और सर्वाधिक प्रतिष्ठित वीरता पुरस्कार “विक्टोरिया क्रॉस” प्रदान किए जाने का गौरव प्राप्त है।

कर्नल नीलकंठन जयचंद्रन नायर - शौर्य और त्याग के प्रतीक

1993 में नागालैंड में, अपनी टोली के बीच, नाग विद्रोहियों से अकेले ही जूझते हुए, इस वीर महायोद्धा ने अपने प्राणों का पर्वत चढ़कर, अपने साथियों को सुरक्षित निकाला। उनकी बहादुरी का संगीत सदैव सुना जाएगा और उनका नाम अमर रहेगा। उन्हें अशोक और कीर्ति चक्र दोनों ही मिलेदोनों पदक वही पाते हैं, जो श्रद्धा एवं वीरता का संगम हो

Seema Jagran Manch

ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह चांदपुरी— सच्चे देशभक्तों के नायक

4-5 दिसंबर 1971 की रात, जब थार की धरती पर अश्वमेध यज्ञ सा युद्ध हुआ, तब इस वीर ने 124 साथी सैनिकों का नेतृत्व किया। पाकिस्तान की सेना के हौसलों को रौंदकर, वीरता का अद्भुत पराक्रम दिखाया। उनका नाम अमर कथा बन गया, जिसके चरित्र को फिल्मी पर्दे पर रूपांकित किया गया – इनकी भूमिका में सनी देओल का अभिनय वाकई उस राम-राज्य की झलक है, जिसे हम सदैव याद करते रहेंगे।